प्रमाण ये रहा
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दीवार से रगड़ खाकर उसका हाथ छिल गया। क्रीम पाउडर जो लगाना था उसने लगाया और दो तीन बाद वहाँ पपड़ी (खोरठी) पड़ गई।
पहले उसने उस पपड़ी को उंगली से स्पर्श किया, पपड़ी का खुरदुरापन उसे अच्छा लगा और इसलिए उसने पपड़ी को कई बार छुआ लेकिन, शीघ्र ही उसका मन भर गया।
अब उसने पपड़ी को धीरे-धीरे नोंचना शुरू किया। बड़ी बारीकी से पपड़ी के एक कोने का चुनाव किया और नाखून लगाकर हल्का सा उसे उकसा दिया। काफी हल्का दर्द हुवा लेकिन उसे यह बात ज्यादा मज़ा दे रही थी कि उसकी पपड़ी उखड़ गई।
उसने पपड़ी को और नोचा लेकिन बीच मे पपड़ी की जख्म से पकड़ पक्की थी अतः ज्यादा दर्द होने लगा इसलिए उसने एक दूसरा तरीका अपनाया और पपड़ी के बीच के हिस्से को छोड़कर बाकी चारो तरफ से उसे नोचा।
लेकिन, उफ, पपड़ी के बीच से जख्म से जुड़े रहते देखकर निकलती वो टीस!
उसने पपड़ी को तर्जनी और अंगूठा के बीच फँसा कर धीरे धीरे कभी वामावर्त तो कभी दक्षिणवर्त घुमाया और आखिर कार पपड़ी को नोच ही दिया। हालांकि पपड़ी के नीचे जख्म अभी जिंदा था जिसके कारण उसे दर्द भी हुवा और जख्म की सतह पर खून भी चला आया लेकिन उसको चेहरे पर संतोष का भाव था, जैसे उसने जग जीत लिया हो।
चूंकि उसने जग जीत ही लिया था तो अब जीत को भोगने की बारी थी अतः उसने पपड़ी को मुँह में रख लिया।
आप कहते हो कि क्या प्रमाण है कि हम पहले बंदर नही थे!
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