Saturday, November 9, 2024

निर्बल


मुझे पता है कि मेरी चेतना मुझे लेकर किसी अनजान गहराइयों तक जाने वाली है, मुझे पता है कि अब मेरी चेतना मुझे जो दिखाएगी वह उस दुनियावालो के लिए जिसमे अभी मेरा मस्तिष्क टिका हुआ है, असामान्यता की स्थिति हैं लेकिन यह स्थिति मेरे चेतना के लिए स्वाभाविक है। मेरी चेतना बार बार इस स्थिति को प्राप्त करना चाहती है लेकिन मैंने ही इसे अप्राकृतिक तरीके से रोक रखा है। हमारी प्राकृतिक स्थिति पीड़ा की है, प्राकृतिक अवस्था में हमे पीड़ा सहते रहना है और तब तक सहते रहना है जब तक की वह हमें मार न डाले। उसने हमें मारने के लिए ही रचा है; मुझे मात्र एक व्यक्ति, एक जीव का नाम बताओ जिसको उसने नही मारा। मुझे पता है कि अब तुम वापस कहोगे की मैं ही एक ऐसे व्यक्ति या जीव का नाम बताऊं जिसको उसने नही जन्म दिया।
चलो हम जीवन और मृत्यु की इस दो पोलेरिटी को भूल जाते हैं और इन दो ध्रुओं के बीच जो अवस्थित है उस पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, यह हमारी बाध्यता भी है क्योंकि न जन्म पर और न ही मृत्यु पर ही हमारा वश चलता है यद्यपि हमारा हमारी मृत्यु पर हमारे जन्म से अधिक वश है; हम अपनी मर्जी से जन्म नही ले सकते किन्तु अपनी मर्जी से मर ज़रूर सकते हैं तथापि।
तथापि, चलो हम करार करते हैं कि मैं जन्म के पूर्व की दुनिया को जानने की कोशिश नही करूँगा और तुम मृत्यु के बाद की दुनिया में ताक-झांक नही करोगे। यह हमारी ताक-झांक करने की आदत ही तो हमे आमने सामने खड़ी कर जाती है; जन्म के पहले की शून्यता मेरे जन्म और मृत्यु के बीच जो उपस्थित है उसे प्रभावित करने लगता है जबकि तुम मृत्यु के बाद की शून्यता से घबराकर इनके बीच से पलायन कर कही और भाग जाना चाहते हो। अब ये न कहना की तुम भगोड़े नही हो, कम से कम मुझसे तो बिलकुल न कहना। अगर तुम भगोड़े नही होते तो मुझे तुम यहाँ नही मिलते, इस जगह जहाँ मैं छुपकर बैठा हुआ हुँ। मैंने देखा है कि यहाँ जो भी है, वह सब असल में छुपकर की बैठे हैं और उनका भगोड़ापन उन्हें परेशान न करे इसके निमित्त अपनी अपनी दृष्टियों को सजाते रहते हैं, अपनी मिथ्या दृष्टियों का श्रींगार करते रहते हैं।

★★

जब पहली बार मैं उसकी हत्या करने को उठा था तो मैंने उसे मारा नही बल्कि उसे अपवित्र कर दिया। मुझे लगा की उसे अपवित्र कर मैं उसके बेकार हिस्से से उसके जीवित और ईश्वरीय हिस्से को अलग कर रहा हूँ। मैंने उसके समस्त हिस्सो को टटोला और देखा कि इनमे से कौन सा हिस्सा मुझे मेरे स्पर्श का उत्तर देता है लेकिन उसका समस्त हिस्सा एक सा था, ठंढा और मरता हुआ, उसके किसी हिस्से में जीवन की ताप न थी, यद्यपि उसका कोई हिस्सा मरा भी न था, उसका कोई हिस्सा इसलिए नही मरा था क्योकि मैं अंदर ही अंदर कहीं न कहीं यह चाह रहा था कि वह न मरे क्योकि मैं उसके अभाव में जीवन से डरता हूँ यद्यपि वह मेरे जीवन को ही खाता चला जाता है और दोनो ही स्थितियों में असल मे मरना मुझे ही होता है।

आनन्दमय प्रज्ञा में वह पागल चिल्लाता है; ईश्वर मर गया, ईश्वर मर गया।  दरअसल वह चीख रहा होती है कि उसका ईश्वर में विश्वास मर गया लेकिन यह तो उसकी बात है। मेरा ईश्वर अभी मरा नही है यद्यपि वह मर रहा है लेकिन मुझे मालूम है वह कभी नही मरेगा और यदि मर भी गया तो वह  मेरे सामने हमेशा प्रेत बनकर उपस्थित रहेगा और अपने हिस्से की मेरे जीवन की मांग मेरे जीवन पर थोपता रहेगा और मैं  उसका हिस्सा उसे देता रहूंगा। मेरा ईश्वर  मरने को होता है लेकिन मरता नही है।  कल भी जीवन के वीराने के खंडहर अनुभवों की एक काली कोठरी  मे मेरी बुद्धि ने उसे मारा था लेकिन मैं उसे पूरी तरह  नही मार पाया: मैंने अंदर ही अंदर यह भी चाहा कि वह जीवित रहे, वह जीवित रहे क्योकि वह ईश्वर है।

यह पहली बार नही था, इसके पूर्व भी मैं उसे कई जगह मारने का प्रयास कर चुका हूं लेकिन हर बार मैं स्वयम ही उसे जीवित भी कर देता हूँ। मैं उसे इसलिए जीवित नही कर देता की मैं सर्वशक्तिमान हूँ और कुछ भी कर सकता हूँ बल्कि मुझे इसलिये उसे जीवित करना होता है कि मैं निर्बल हूँ, जीवन के हाथों निर्बल।

★★★

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