Saturday, November 9, 2024

संबोधी के क्षण

न शास्त्रो में, न पुरखो की स्मृतियों में, न अपनी परम्पराओ में और न ही  मेरे अंदर डाली गई मिथको में, बल्कि मैं अपने अनुभव में ईश्वर को ढूंढता हूँ क्योकि मेरे लिए अंततः मेरे अनुभव ही हैं  और अपने अनुभव में मैं कहीं "अहम ब्रह्मास्मि" का बोध नही पाता। मैं मात्र और मात्र अंततः "फेंका हुआ" का बोध पाता हूँ। मात्र यह बोध पाता हूँ कि अंततः द्वंद है, अराजकता है, माया है, प्रकृति है; हार्मोनी, ऑर्डर, ब्रह्म और पुरूष कहीं नही है हाँ अराजकता, द्वंद, आदि के पलायन में  इनका रचियता मेरा क्षणिक अस्तित्व अवश्य है।
मेरा अस्तित्व जिसमे भावनाओ के उठा पटक हैं मेरा अस्तित्व, जिसमे माया बार-बार ब्रह्म को खा जाती है, प्रकृति पुरुष को बार बार निगल जाती है, तार्किकता अतार्किकताओ में गिरकर ध्वस्त हो जाता है, ऑर्डर केओस में हर क्षण कोलैप्स हो रहा है।

******
महाकाली लीला कर रहीं है; प्रकृति निरुद्देश्य दोलन कर रही है कि एक घटना घट जाती है और यह संसार अस्तित्व में आ जाता है; हम अस्तित्वमान हो जाते हैं---हमे आत्मचेतना, आत्मबोध भी इसी घटना का हिस्सा है।
यह आत्मबोध की चेतना हमे संसार मे एक उद्देश्य, संसार का एक उद्देश्य दिखाने लगती है क्योकि यह चेतना हमारे अस्तिव से कंडिशन्ड है;
यह कंडीशनिंग हमे कल्पना करने की, स्वप्न देखने की भी एक छूट दे देती है क्योकि हमारे अंदर कुछ प्रश्न भी है--इन प्रश्नों में सबसे बड़ा प्रश्न यह कि हम कौन हैं--यह जगत क्या है।

कुछ बुजुर्गों ने इस प्रश्न की प्रक्रिया पर, हमारे स्वप्नों की प्रकृति पर, हमारे कल्पना के चरित्र पर भी विचार किये और पाया कि हमारी चेतना कोटियों में चिंतन करती है, कोटियों में कल्पना करती है: केयोस और ऑर्डर यह दो कोटिया ही तो हैं और  यह कहना कि "अराजकता है" या "जगत में ऑर्डर है" तत्वतः एक ही बात है।

हम "उसे" डिफाइन नही कर सकते: नागार्जुन के  अनुसार वह चतुष्कोटी विमुक्त है, उपनिषद भी कह देते हैं कि वहाँ से वाणी और विचार खाली हाथ लौट आते हैं।
महाकाली की लीला और प्रकृति का निरुद्देश्य दोलन----यह वाक्य भी बस तदर्थ आधार पर अर्थ देने के लिए बने हैं, इनके पीछे क्या है कोई नही जानता---हमे आगे अनुमति नही है।
*****

सम्बोधि के क्षणों में उन्हें साक्षात्कार हुआ कि 'यह' (यह: जिसे उपनिषदों में तत कहा गया है: तत्वमसि) तो समग्रता में अराजकता का नग्न नृत्य है। चूंकि अब उनकी दृष्टि विकसित थी अतः उन्होंने इस इस अराजकता के आयामो का पीछा करने का निश्चय किया ताकि उनकी चेतना इस अराजकता के आदि तक पहुँच सके। उन्होंने तप से प्राप्त समस्त ऊर्जा को एकत्र किया और इसके छोर के अंत को प्राप्त करने की यात्रा पर निकल पड़े।
समस्त ऊर्जा को व्यय करने के पश्चात भी उन्हें इस समग्रता का छोर न मिला बस उन्हें यही दिखता की एक अराजकता नष्ट होकर दूसरी अराजकता को जन्म दे रही है: अराजकताओं की एक अंतहीन श्रृंखला----।
प्रतीत्यसमुत्पाद,अराजकता इस शब्द के पश्चात यह यह उनकी चेतना में गूँजने वाला दूसरा शब्द था।
सामान्य अवस्था मे पुनः वापस आने के पश्चात वह इन दो आर्य सत्यों के अलावा भी दो अन्य आर्य सत्य का उपदेश दे रहे होते जिनमे से पहला यह था कि अराजकता का अंत सम्भव है तथा दूसरा यह कि अराजकता का अंत किस विधि किया जाय।
कुछ लोग कहते हैं कि बाकी के ये दो सत्य भी उनके द्वारा साक्षात किए गए हैं जबकि अनेक लोगो का कहना है कि उन्होंने झूठ बोले थे अन्यथा मनुष्यता विक्षिप्त हो जाती, चारो ओर हाहाकार मच जाता यद्यपि उन्हें यह ज्ञात था कि शेष मनुष्यो को भी देर-सबेर इसका साक्षात होना ही है लेकिन मनुष्यता कम से कम अभी इसके लिए परिपक्व न है।

★★★★★

चार आर्य सत्य निम्न है: सर्वम दुखम :दुख, दुख का काऱण है: दुख समुदय,
दुख का निवारण है: दुख निरोध एवम् दुख निवारण का मार्ग है: दुख निरोध गामिनिप्रतिपदा।
सम्बोधि के पश्चात नये बुद्ध ने एकबार पुराने बुद्धों के सिद्धांतों को भी बुद्ध की दृष्टि से देखा।
जब वह चार आर्य सत्यों को ध्यान से देखते तो उन्हें इनमे सांख्य के प्रकृति और पुरुष का द्वैतवाद दिखने लगता है: प्रथम दो आर्य सत्यों में प्रकृति दिखती है तथा अंतिम दो आर्य सत्यों में पुरुष।
इन चार आर्य सत्यों को उन्होंने और ध्यान से देखा तो प्रथम दो आर्य सत्य माया दिखे जबकि अंतिम दो आर्य सत्य माया के निराकरण के पश्चात की सत्ता, ब्रह्म।
प्रथम दो आर्य सत्यों में संहारकर्ता महाकाली दिखती हैं और अंतिम दो आर्य सत्यों में उनका रास्ता रोककर लेटे कल्याणकारी भगवान शिव।

उन्होंने देखा कि अंतिम दो आर्य सत्य, शिव, पुरुष और ब्रह्म बुद्धों की स्वयम की रचना हैं और बुद्धजन इस बात को जानते हैं कि वास्तविकता में मात्र दो आर्य सत्य हैं, मात्र प्रकृति है, मात्र महाकाली हैं, मात्र माया है तथापि वह मिथ्या भाषण एवम सम्भाषण करते हैं, झूठ बोलते है क्योंकि उन्हें मनुष्यता के कोमल मन का भान है जो इन आशाओं के अभाव में विक्षिप्त हो जाएगा।

-----------★★★★----------

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...