Sunday, January 26, 2025

 

 

मेरी लघुकथाएँ

 

 ईश्वर और संसार

 

समय के उस पार जब हममें से कोई नही था और हमारी दुनिया भी नही थी तब केवल वह था। वह न तो ईश्वर था न शैतान, न जड़ न चेतन हालांकि वह वेदना और आनन्द का सम्मिलित रूप था, उसमें चित भी था और अचित्त भी, वह सत भी था और असत भी।

अपने आरंभ से ही वह महानिद्रा में सोया हुवा था फिर एक दिन उसकी नींद खुल गई-अब वह जाग गया था लेकिन जाग्रत अवस्था मे वह क्या करे?

उसने दूर-दूर तक देखा लेकिन हर जगह वह खुद को ही पाता था-उसकी दृष्टि बहिर्मुखी होने के बावजूद अंतर्मुखी थी। उसने देखा वह चित्त भी है और अचित्त भी, आनन्द भी और वेदना भी, जन्म भी और मृत्यु भी, अच्छा भी और बुरा भी। अपने अंदर असत, अचित्त और वेदना देखकर वह बेचैन हो उठा अतः उसने अपने भीतर के असत, अचित्त और वेदना को इकट्ठा करना प्रारम्भ किया। जब उसके अंदर के समस्त असत, अचित्त और वेदना इकट्ठे हो गए तो उसने इनको अपने से निकाल कर एक गठरी बनाई और उस गठरी को समय के उस पार फेंक दिया।

अब समय के एक तरफ ईश्वर था और दूसरी ओर संसार।

 

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  राजा

 

उस राज्य की सबसे सुंदर स्त्री के सौंदर्य के चर्चे होते थे।  दूर देश के कवि उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे ताकि उनकी कविता श्रृंगार और विरह के अब तक अनछुए पक्षो को शब्दों में बांध सके। कुछ दीवानों ने तो उस स्त्री के लिए सम्राट के महल में, जहाँ वह रहती थी और उसका मनोरंजन करती थी, छुपकर प्रवेश करने की कोशिश भी की थी और फिर सम्राट के सजग सैनिकों द्वारा पकड़े गए थे और सम्राट के क्रूर जल्लादों द्वारा चौराहे पर काट डाले गए थे।

 

उस राज्य के सबसे ज्ञानी व्यक्ति के भी देश विदेश हर जगह चर्चे थे और सम्राट ने उसे सरस्वती-पुत्र की उपाधि भी दे रखी थी। वह समस्त शास्त्रों और समस्त विद्याओं का ज्ञाता था तब भी उसकी ज्ञान पाने की भूख मिटती ही नही थी।

 

सम्राट अपने सिंहासन के बाएं उस सौंदर्यवान स्त्री को अपने बाएं तथा ज्ञानी को दाएं बिठाकर शासन चलाता।

 

एक दिन ज्ञानी और सौन्दर्यवती एक दूसरे पर आसक्त हो गए किंतु वह सम्राट से मन ही मन डरते भी थे अतः उनके मन मे इस विचार ने जन्म लिया कि सौंदर्य और  ज्ञान मिलकर शासन क्यो न करे, आख़िर हमे इस सम्राट की आवश्यकता क्या है! और यह विचार विद्रोह में बदल गया।

ज्ञानी ने अपने ज्ञान से सबसे घातक विष तैयार किया जिसे उस सौन्दर्यवती स्त्री ने धोखे से सम्राट को उस रात शराब की प्याली में शराब ढालने वक्त मिला दिया।

 

अगली सुबह सम्राट के सिंहासन के अगल-बगल की जगह खाली थी, पता चला कि कल रात ज्ञानी ने एक विष बनाया था जिसका उसने स्वयम पर प्रयोग किया   और उस विष की बेचैनी में उसने उस सौन्दर्यवती को मार दिया तथा स्वयम भी उस विष के प्रभाव से मर गया।

 

सिंहासन पर बैठे सम्राट की आँखों मे कोई पश्चाताप नही था बल्कि उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखने पर संतोष का भाव दिखता था जो इस बात की गवाही थी कि वह बलवान है।

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पतित

 

अपने अंतरंग वार्तालाप के क्षणों में नदी ने सागर से इठलाते हुए उस चट्टान के बारे में बताया: एक अभागा पत्थर था जो बाकी पत्थरो से टूट कर मुझमे गिर गया लेकिन मुझे तो सागर में मिलना था इसलिए मैंने उस पत्थर पर थोड़ी अठखेलिया कर लीं। और दोष मेरा भी नही है क्योंकि यदि मैं उस पर अठखेलिया ना करती तो वो मेरा बहाव रोक देता लेकिन मुझे तो सागर में मिलना है।

सागर अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता से बोला: पत्थरो की यही नियति है। मैं कई युगों से उनकी यह नियति देख रहा हूँ।

 

वही बगल में सागर और उस नदी की आंखों से अदृश्य उनकी बातें एक पतित देवदूत ने सुन लिया।

उसे अपनी और उस चट्टान की नियति एक दिखी--दोनों ही तो पतित थे; दोनों ही ने विद्रोह किया था; आह, दोनों ही ने तो सपने देखे थे!

तभी उस पतित देवदूत को स्मरण हुवा कि उसके पास तो स्वप्न विधाता ने भेजे थे और हाथ जोड़ते हुए यह मिन्नत की थी कि इस स्वप्न को देखो ताकि तुम पतित बनो--तुम पतित बनो क्योकि मेरी बनाई दुनिया अभी अपूर्ण है; मैं इसमें पुण्य डालना चाहता हूँ; मैं इसमें मुक्ति डालना चाहता हूँ; मैं इसमें धवल श्वेत रंग भरना चाहता हूँ लेकिन तब पुण्य के लिए पाप होना ज़रूरी है, धवल श्वेत रंग के लिए गहन तम का कालापन होना ज़रूरी है; मुक्ति के लिए मूल पाप का होना ज़रूरी है।

तो क्या इस पत्थर से भी विधाता ने प्रार्थना किया था, पतित देवदूत ने स्वयम से प्रश्न किया।

 

उधर सबसे ऊपर के आकाश में रहनेवाले जगत के सृष्टिकर्ता ने प्रयोगवश अपनी शब्दावली से पतित शब्द को मिटा दिया क्योकि वह देखना चाहता था कि इस शब्द के बगैर मानवता बनी रह सकती है कि नही।

 

पतित शब्द के मिटते ही विधाता का अस्तित्व भी वाष्पीकृत हो गया!

 

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अखलाक/ नैतिकता

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मजलिस जमी थी, यह रंको की मशहूर चौपाल थी जहाँ उनके बच्चे रंको की तहजीब सीखते। इस मजलिस के सामने जो ऊँची जगह थी वहाँ रखी तख्ती तब से मौजूद है जब से दुनिया मे बादशाहत कायम हुई। दुनिया मे बादशाहत कायम होने के अगले ही दिन वहाँ पहली मजलिस जमी थी। उस तख्त पर उसी दिन एक पहला नासेह बैठा था जिसने रँको को नैतिकता / अखलाकियत की पहली सबक सिखाई थी।

तब से आज तक यह रवायत कायम थी। रंको की दुनिया का सबसे उम्दा नासेह उस तख्ती पर बैठता, सामने बच्चे बैठते और अखलाकियत कि सबक चलती।

 

नासेह ने एक दास्तान के ज़रिए सबक पढ़ना शुरू किया:

"एक क्रूर राजा था

था एक ज़ालिम बादशाह!"

 

कहते हैं कि करामन और कातिबीन हर जगह मौजूद होते हैं। इंसान के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का काम ईश्वर ने दो फ़रिश्तों को दे रखा है। ये फ़रिश्ते इंसान के हर अच्छे-बुरे कर्म को लिखते हैं। इन फ़रिश्तों को करामन-कातिबीन कहा जाता है। ये फ़रिश्ते जिस रजिस्टर में कर्मों को लिखते हैं उसे नामा-ए-आमाल कहा जाता है।

 

इस दिन किसी तरह नामा-ए-आमाल करामन कातिबीन के हाथ से फिसलकर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा और किसी ने उसमे लिखी बाते पढ़ लीं। उसमे लिखा था:

"यह रंको कि कौम के नासेह जो कहते हैं कि एक क्रूर राजा था, एक था ज़ालिम बादशाह, हक़ ये है कि वो बादशाह ज़ालिम हो न हो ये कौम बदअख़लाक़ी ज़रूर है, बिल्कुल बेईमान और भगोड़ी।"

 

आगे एक शेर दर्ज था जिस के नीचे करामन और कातिबीन दोनों के दस्तखत थे---

 

"तुम भी चाहते तो थे के तेरी ही होती दुनिया

उसकी दुनिया जो हुई, कहते हो ज़ालिम था वो!"

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बी ए प्रोफेट ऑनटू दाईसेल्फ

 

इस समाचार को सुनने के पश्चात की सम्बुद्ध, वह जिन्हें सारे रहस्य ज्ञात हैं, कल इस पगडंडी से गुजरेंगे, सड़क के किनारे अपनी दुकान लगाने वाला चर्मकार खुशी से झूम उठा--

"मेरी अज्ञानता ने मेरी राह रोक रखी है अतः कल महाज्ञानी से रहस्य को जानूँगा", चर्मकार ने इस प्रकार मन मे विचार और निश्चय किया।

 

अगली सुबह जब सम्बुद्ध जब उस चर्मकार की अस्थाई दुकान के सामने से गुजर रहे थे तब वह अपनी चटाई से लगभग छलांग लगाते हुए सम्बुद्ध के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया।

 

हे परमज्ञानी, मैं आपसे एक सत्य, एक रहस्य जानना चाहता हूँ, चर्मकार ने सम्बुद्ध से कांपते हुए कहा।

-मित्र, सत्य ही केवल उत्तर है, कुछ नही बल्कि मात्र सत्य, प्रश्न करो!

-प्रभु, जूतों की कैसे सिलाई करूँ की वह जूते न कभी घिसे, न फटे?

-एक सम्बुद्ध से इस प्रकार के ओछे प्रश्न करने की  तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!! सम्बुद्ध के अनुयायियों ने उनका अपमान समझते हुए क्रोधित होकर कहा।

-लेकिन प्रभु, मेरे लिए इसी प्रश्न का उत्तर सारे रहस्यों की कुंजी है क्योकि आपके पिता, जो इस राज्य के महाराजधिराज थे, ने मेरे पिता को इसी गलती के लिए सजा दी थी कि मेरे पिता ने उनके लिए जो जूते बनाए वह शाश्वत नही थे, कुछ  दिनों के पश्चात उनकी सिलाई खुल गई और मैं भी उस दण्ड को मैं भोग रहा हूँ तथा मेरी आने वाली पीढियां भी भोगेंगी।

 

सम्बुद्ध हमेशा की भांति मौन होक र आगे बढ़ गए-अव्यक्तानि;अप्रश्नानि!!

चर्मकार के मन मे एक निश्चय आया: अप्पदीपो भव!!

 

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मुक्ति

 

अपराधी को फाँसी के तख्ते पर ले जाया गया। वहाँ उसके शरीर ने उन स्तम्भो को स्पर्श कर लिया जिनसे वह रस्सी बंधी थी जो थोड़ी ही देर में उसके गले मे पड़ने वाली थी--स्पर्श अत्यंत ठंढा था, बिल्कुल बर्फ सा--मानो समाज ही आज स्वयं सर्द, भावहीन होकर खड़ा हो--आखिर उसे अपने मे से ही किसी को मारना है।

लेकिन, इस स्पर्श ने अपराधी के अंदर मृत्यु के भय को हिकारत की भावना में तब्दील कर दिया--यह स्पर्श उसके लिए कोई नया नही था--ठंढा और सर्द।

इसमें सर्द और ठंडे स्पर्श में उसने बल्कि समाज के उसके प्रति ठंडे और सर्द भावना को ही महसूस किया और वह तेजी से उस रस्सी के नीचे जाने के लिए छटपटा उठा मानो मृत्यु की गरमाहट का ही उसे वर्षो से इंतज़ार हो और यह गरमाहट ही उसकी मुक्ति हो।

 

सामने उसकी लाश पड़ी थी, उन्होंने अपने मे से किसी को अपना प्रतिनिधि बनाकर उसके लाश के पास भेजा। प्रतिनिधि ने उसके शरीर को स्पर्श किया--एकदम सर्द और ठंढा, उसके नब्जों को महसूस किया जो शांत पड़े थे।

प्रतिनिधि ने नोट किया-यह अब हमारे जैसा हो चुका है--शांत, सर्द और ठंढा।

फिर उसने इन तीनो शब्दो को मिलाकर एक शब्द अपनी रिपोर्ट में लिखा--अपराधमुक्त, और नीचे अपने दस्तखत कर दिए।

 

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मनुष्य और जीवन

 

जब तक वह पत्थर रूप था उसे जीने की जरूरत ही नही थी--बस यूँ ही निष्प्राण कही उसे पड़े रहना था--हाँ कभी उसे मनुष्यो की ठोकर सहनी थी, कभी नदियों के साथ बहना था तो कभी हवाएं उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर रख देतीं।

फिर ईश्वर ने उसके अंदर जीवन फूंक दिया। अभी भी हालांकि उसका शरीर था तो पत्थर का ही लेकिन उसके अंदर कुछ नया उतपन्न हुवा जो अब मात्र पत्थर ना था--उसके इस नवीन अंश में कोमलता थी और अब  हवाएं और नदियाँ भी इस बात को जानते थे कि वह अब मात्र पत्थर न था क्योकि वह नदियों और हवाओ से खुद को सींचने लगा था--मनुष्यो ने भी उसके इस बदलाव को देखा और इस बदलाव में उन्हें अपना प्रारंभिक रूप दिखा-मनुष्य यह जान चुके थे कि उनकी अनन्त की यात्रा में उनका सहमार्गी उपस्थित हो चुका है।

 

यद्यपि उस पत्थर के अंदर जीवन फुट चुका था तथापि उसका जीना मनुषयो के जीने से अलग था-उस जीवित पत्थर के लिए आज भी महज उसकी प्रवृत्तियां ही सबकुछ थी और वह इनके आगे नही बढ़ पा रहा था। उसके लिए पदत्त संसार ही उसका संसार था जबकि मनुषयो के पास प्रदत्त संसार से एक नवीन संसार का जन्म हो चुका था मानो पत्थर में प्राण वाली घटना उनके संसार के संदर्भ में दुबारा घटी हो।

 

उस जीवित पत्थर ने और ध्यान से देखा--मनुष्य दिए हुए संसार से अधिक इस नए संसार मे ज्यादा जीते थे--वह प्रवृतियों से आगे बढ़कर मूल्यों में जीने लगे थे।

पत्थर दार्शनिक की भांति गहन चिंतन में डूब गया और कुछ देर बाद उसकी आत्मा में यह प्रकाशित हुवा की वह मात्र जी रहा है जबकि मनुष्य जीवन का अर्थ जानते हैं।

 

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देवता

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प्रोफेसर वृहस्पति सैमुअल अपनी कक्षा में विद्यार्थियों को साहित्य पढा रहे हैं। उन्होंने पुस्तक खोली और आज उन्हें जिस पाठ को पढ़ाना है उसका नाम "देवता" है।

प्रोफेसर सैम्युल का मानना है कि अतीत में मनुष्य पाखंडी थे। एक तरफ तो वह अमर होना चाहते थे लेकिन दूसरी तरफ वो अमरता से डरते थे। अतीत के मनुष्य अपनी कथाओ में, अपने मिथकों में, अपने पुराणों में अमर हुए पात्रों को शापित बना देते थे ज्यों मृत्यु जीवन से बेहतर हो और तभी चाहे वह अश्वत्थामा हो, वांडरिंग ज्यू हो या सलोमी हो, अमरता इनका अभिशाप है।

प्रोफेसर सैम्युल का यह भी कहना था कि अतीत के मनुष्य मात्र पाखंडी ही नही बल्कि उनके अंदर दोहरा व्यक्तित्व, एक स्प्लिट पर्सनैलिटी थी क्योंकि तब मनुष्य मृत्यु से डरकर अमरत्व की कामना भी करते थे और अमरत्व से डरते भी थे। वह अपने मे से किसी के अमर हो जाने से घबरा भी जाते और कोई अमरता की चाहत न रखे इसके लिए मिथक भी रचते थे। लेकिन फिर वो अमरता की चाह भी रखते। अमरता की उनकी चाहत उनके द्वारा रचित उनके देवताओं में अभिव्यक्त होता था लेकिन विडम्बना की देवता उनमे से नही होता।

प्रोफेसर ने लेक्चर प्रारम्भ किया:

"हमने जेनेटिक स्तर पर मृत्यु की उसमे मौजूद सूचना को  हमेशा जवान और युवा रहने की सूचना से परिवर्तित कर अतीत के उन मनुष्यो के पाखण्ड को ही मात्र खत्म नही किया बल्कि देवत्व की तरफ एक कदम बढ़ाते हुए एक ऐसे मनुष्य का सृजन कर लिया है जिसका व्यक्तित्व उन अतीत के मानवो की भांति विभक्त नही है।

और हाँ, देवता अपनी प्रजाति नही बढ़ाते, वो स्वयम अमर होते हैं------"

 

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दानव

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"पर वह अश्वत्थामा की तरह अमर किन्तु मणि विहीन लोग हैं", सामने बैठे उस व्यक्ति ने कहा जो अन्य लोगो को सम्बोधित कर रहा था।

यह अतीत के एक समय की नही बल्कि भविष्य के एक समय की बात है। तब के वैश्विक सरकार की नज़र में ये लोग आतंकवादी है और इसलिए इनको आज सबसे बचकर यह मीटिंग करनी पड़ रही है जिसमे आज कुछ नए रिकरयूट भी शामिल होंगे।

 

मनुष्य वैज्ञानिक रूप से बहुत-बहुत ही ज्यादा प्रगति कर चुका है। आज किसी की चेतना को डिजिटलाइज कर उसको बायोप्यूटर में फीड कर उसको प्रिजर्व कर देने की बात भी इनके लिए बहुत पुरानी है। अब तो मनुष्य हज़ार -डेढ़ हजार साल से मरता ही नही। मनुष्य अब जीन को पूरी तरह कंट्रोल करना सीख गया है। भोजन भी अब जीवित रहने के लिए कोई करता ही नही, जिव्हा का कार्य अब मात्र कुछ इलेक्ट्रोड्स जोड़ कर स्वाद लेने का है। अपनी प्रजाति को बढाने के लिए सेक्स करने पर रोक लगा दी गई है  और ऐसी एक सरकारी एजेंसी है जो आपको स्टेराइल कर एक कार्ड इशु करती है जिसे रखना आपकी जिम्मेदारी है। हाँ आप मज़े के लिए चाहे जैसे सेक्स करें: रियल, वर्चुवल, कम्प्यूयर प्रोग्राम्ड...इसकी कोई मनाही नही है लेकिन यदि आप अपना स्टेरेलाइज़ेशन नही करवाते तो आप बायो-टेरोरिस्ट हैं और आपको सबसे दुखदाई तरीके से ही नही बल्कि आपके मस्तिष्क में पेन अमलीफिकेशन प्रोग्राम इम्प्लांट करके आपकी दर्द के अहसास को उस अनुपात में बढ़ा दिया जाता है जिस अनुपात का तब के मानक के अनुसार आपने अपराध किया है।

 

आज से एक लाख वर्ष पूर्व किसी ने यह कल्पना भी नही की थी कि भविष्य में स्वयम को जीवित रखने की प्रवृत्ति और अपनी प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति के मध्य टकराहट होगी लेकिन पिछले पच्चीस हजार वर्षों में यह हुवा है और स्वयम को जीवित रखने वाली प्रवृत्ति जीत गई है।

पूरे विश्व में हालांकि कुछ लोग हैं जो उनके पूर्वजो की अवस्था मे लौट जाने को सही मानते हैं। उनके अनुसार अंततः जीत प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति की होगी और उसके लिए वह संघर्षशील हैं।

सरकार की नज़र में ये बहुत ही खतरनाक

आतंकवादी हैं, बिल्कुल "दानव", इनका सफाया ज़रूरी है।

 

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मनुष्य

 

कुछ ज्ञानी उसे अभी भी पत्थर समझते हैं जबकि कुछ ज्ञानी उसे मात्र चेतना जबकि वास्तव में वह चेतन प्राणमय पत्थर है। दूसरे प्रकार के ज्ञानी उसे मात्र चेतन मान कर उसका स्रोत पत्थर और प्राण प्रकिया के बाहर किसी अन्य लोक में ढूंढते है जबकि वह अन्य लोक मैंने रचा ही नही है। जब मैं चेतन कहता हूं तो उसके अंदर प्राणमय पत्थर पूर्व से ही शामिल होता है जिसको यह ज्ञानी देख नही पाते -----अपनी डायरी का यह अंश पढ़कर ईश्वर ने  विचार किया कि क्या एक ऐसा शब्द नही हो सकता जिसके अंदर चेतना, प्राण और पत्थर के साथ  वह स्वयं भी शामिल हो?

लेकिन समस्या यह थी चेतन--प्राणमय--पत्थर की 

 श्रृंखला में खुद को आखिर रखे कहाँ--वह किसका विशेषण बने और विशेषित किससे हो क्योकि वह तो हर जगह विशेषण भी है विशेष्य भी। असल मे उसे ईश्वरमय ईश्वर-ईश्वरमय चेतना-ईश्वरमय प्राण-ईश्वरमय पत्थर--ईश्वरमय ईश्वर जैसा कुछ लिखना पड़ा लेकिन तब भी वह अपने इस लिखे से संतुष्ट नही था। उसकी असंतुष्टि ने तभी आकार ग्रहण किया और उसके सामने उपस्थित हो गई। ईश्वर ने उसे ध्यान से देखा तो यह मनुष्य था--इसके अंदर वह जो लिखना चाहता था वह सब कुछ तो था ही उसकी असंतुष्टि भी थी।

 

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ॐ अपूर्णमद: अपूर्णमिदम

 

महासागर ने देखा उसमेंमें जल की विशाल राशि है। वह स्वयम भी जल की विशाल राशि ही है क्योकि वास्तव में तो उसमें "में" और है का भेद खत्म है। जलधि, जलनिधि, समुद्र या सागर एक दृष्टि में जल की एक बहुत बड़ी बून्द ही तो है-- बिल्कुल उस छोटी बून्द की तरह जो सामने रेत पर बैठे उस आदमी की उंगलियों पर मौजूद है। महासागर ने स्वयं से प्रश्न किया इस छोटी बून्द और मुझमें में पूर्ण कौन है?

 उत्तर पाने के लिए महासागर ने पुनः अपनी ओर नजरें दौड़ाईं--वह विराट था, समग्र। उसे गर्व हुवा की उसने असंख्य वैसी छोटी बूंदों को अपने अंदर समेट रखा है लेकिन तत्क्षण वह परेशान हो उठा क्योकि उसे भान हुवा की वह तो छोटी छोटी उन बूंदों से ही मिलकर निर्मित है।

 

रेत पर बैठा वह आदमी जो अपनी उंगलियों पर बूंदों के साथ खेल रहा था कोई साधारण मानव न था। वह किसी के भी मन की बात पढ़ लेता था। वह सागर के पास गया और उसने सागर को वह बूंदे जो उसकी उंगलियों पर थी सागर को लौटाते हुए कहा--

 

 तुम दोनों ही अपने आप मे पूर्ण हो: यह छोटी बून्द भी और तुम महासागर भी। तुम जलनिधि जल की छोटी छोटी बूंदों से निर्मित होने के बावजूद, और ये छोटी बूंदे एक विशाल बून्द के टुकड़ों में बट जाने के बाद भी अपने आप मे पूर्ण हैं।

 

फिर उसने मन मे सोंचा--

महासागर की उस बड़ी बून्द को छोटी छोटी बूंदे बनना पड़ता है यह उसकी मुक्ति है और फिर इन छोटी बूंदों का महासागर बनना इन छोटी बूंदों की मुक्ति।

मात्र यह बून्द ही बद्ध नही है,  महासागर भी मुक्त नही है क्योकि ये दोनों एक दूसरे के सामने अपूर्ण है।

 

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ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति।

 

मुझे मालूम है कि एक न्युमोनल यथार्थ है और एक फिनोमेनल यथार्थ है। न्यूमोनल यथार्थ के पार और परे कोई यथार्थ है या नही यह मुझे नही मालूम लेकिन फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक नया यथार्थ रचने की कोशिश हमेशा से मेरे पूर्वजो ने की है, और उन्होंने फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक यथार्थ की रचना करने का सतत प्रयास फेनोमेनल यथार्थ की नग्न सच्चाइयों से बचने के लिए किया है। फेनोमेनल यथार्थ बहुत ही कुरूप है। इससे संयुक्त होकर मेरे पूर्वज वेदना और पीड़ा से ग्रस्त हो गए। इस कुरूपता को उन्होंने अपनी कविताओं और चित्रों से ढकने का प्रयास किया ताकि उनकी पीड़ा कुछ कम हो सके किन्तु ऐसा नही हुवा। मेरे पूर्वजो ने फिनोमेनल यथार्थ की कुरूपता से बचने के लिए न्युमोनल यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश की और ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का गीत गाया किन्तु सच यह है कि यह न्यूमोना उनकी पकड़ में कभी आया ही नही और वो फेनोमेना की कुरूपता और वहाँ उपस्थित वेदना से तिल तिल कर मरते रहे।

 

मैं फेनोमेनल यथार्थ में एक वैज्ञानिक हूँ अतः मैंने इसकी कमियों को, इसकी कुरूपता को काव्य और पुराणों से ढकने के बजाय एक हाईपररियलिटी की रचना कर डाली और इसको मेरे सामने खड़े लोगो की सामूहिक चेतना से जोड़ डाला। मैं इसे  प्रकृति से संस्कृति की ओर वास्तविक संक्रमण कहता हूँ और देखिए इन लोगो को ये कितने खुश हैं--यह जो दौड़ रहा है वह फेनोमेना में हाथ-पैर से अपाहिज बिस्तर पर पड़ा हुवा है-- एक दुर्घटना ने इसके हाथों और पैरों को छीन लिया। यह जो दूसरा सबको उपदेश दे रहा है वह भी फेनोमेना में एक बिस्तर पर बेहोश पड़ा हुवा है। यह वहां एक अपराधी था और इसे फांसी की सजा दी गई थी लेकिन फांसी के रस्सियों ने इसे मारा नही बल्कि इसके मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर दिया और इसे हमेशा के लिए बेहोश कर दिया। फेनोमेना में अभी इसको लेकर तर्क वितर्क चल रहे है कि इसके होश में आने पर इसे पुनः फाँसी देनी चाहिए या इसकी सजा पूरी मानकर इसे मुक्त कर देना चाहिए।

 

ईश्वर है या नही मैं नही जानता और मनुष्य न्युमोना को जानकर ईश्वरतुल्य हो जाता है या नही यह भी मैं नही जानता क्योकि ईश्वर यदि हो भी तो उसने न्युमोनल यथार्थ के बारे में फिनोमेनल यथार्थ के मनुषयो को कुछ नही बताया लेकिन मैंने इन सबको यह बता दिया है कि वो एक सिम्युलेशन में हैं और फेनोमेनल यथार्थ में वो बिस्तर पर पड़े घुट रहे हैं। अब जब उनसे फेनोमेनल वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करने की कोशिश करता हूँ तो वह मुझसे ही पूछते है कि उन्हें  उस वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में क्यो जानना चाहिए। फिर वो आगे कहते है कि फेनोमेना में मनुष्य की धारणा थी कि उन्हें वस्तुनिष्ठ यथार्थ को इसलिए जानना चाहिए कि वो अपने पीड़ा को उतपन्न करने वाली परिस्थितियों को बदल सके लेकिन इस हाइपररियल्टी में तो उन्हें कोई पीड़ा ही नही है अतः उनके लिए ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का कोई मतलब  नही।

 

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विद्रोही

 

विद्रोही ने दो बार यमदूतों को मारने की कोशिश की थी हालांकि दोनों ही बार वह असफल हुवा।  तीसरी बार जब वह उनको मारने की योजना बना रहा था तब यमराज के क्रूर यमदूतों ने उसे गिरफ्तार कर लिया और बेड़ियों में जकड़ कर यमराज के पास ले गए। यद्यपि वह उन क्रूर यमदूतों द्वारा पकड़े जाने से बचने के लिए आत्महत्या कर  सकता था लेकिन उसने उनके द्वारा खुद को पकड़ लिए जाने के विकल्प को चुना क्योकि कोई तीसरा विकल्प नही था।

यम-दरबार मे मुकदमा चला और यमराज ने उसके सामने दो विकल्प रखे--या तो वह यम-सत्ता के साथ हो जाए या सजा स्वीकार करे।

विद्रोही को यम की सत्ता के साथ हो जाना भी उसका आत्महत्या ही लगा, एक दार्शनिक आत्महत्या। अतः यहाँ भी उसने सजा का विकल्प चुना।

सजा देने के लिए यमराज ने उसे नीचे धर्मराज के पास भेज दिया।

विद्रोही को तब तक कोड़े मारने की सजा सुनाई गई जब तक वह मर न जाए लेकिन उसे यह बात न बताई गई या उसने यह नही सुना या सम्भवतः उसने सुन कर भी अनसुना कर दिया।

 

अगले दिन उसे खुले मैदान में लाया गया और उस मैदान के बीचों बीच वाले खंभे से उसका मुंह और पेट सटाकर बांध दिया गया। कमर तक उसके कपड़े उतार दिए गए ताकि उसकी नंगी पीठ जल्लाद के सामने हो।

 

धर्मराज के जल्लाद ने कोड़े लगाने शुरू किए--सौ- दोसौ कोड़ो तक विद्रोही  के लिए सब कुछ सामान्य रहा: विद्रोही कोड़ो से उठे दर्द को अपने दांतों से दबा लेता तथा जल्लाद और अधिक वेग से उसकी पीठ पर कोड़े बरसाता। लेकिन इसके बाद वह टूटने लगा था: विद्रोही के मुँह से चीख भी निकलती और जल्लाद के कोड़े लगाने का वेग भी बढ़ता  जाता।

लेकिन, केवल यही बात न थी--विद्रोही के अंदर कुछ और भी घट रहा था--विद्रोही के मन और शरीर को दो कोड़ो के बीच के अंतराल को महसूस करने लगे थे। धीरे धीरे उसके मन और शरीर ने उन अंतरालों को पकड़ना भी सिख लिया और और फिर मात्र पकड़ा ही नही बल्कि उन्हें जकड़ने और अपने पास उन अंतरालो को हमेशा रखने के लिए प्रयास भी करने लगे; उसके मन ने दो कोड़ो के अंतराल के उसके समय-बोध को बदल दिया; उसके लिए उसके मन ने इन अंतरालों में समय की चाल को अत्यंत धीमा कर दिया। इन अंतरालों में उसके मन और शरीर खुश हो जाते, उन्हें जीवन अच्छा लगने लगता, फिर से कुछ नए स्वप्न सृजित हो जाते लेकिन तभी कोड़े का पीठ से स्पर्श.... और सारे स्वप्न, खुशी पानी के बुलबुले की तरह फूट जाते। बहुत देर तक यही चला परन्तु धीरे धीरे अब कोड़े के दर्द के अंदर यह आशा भी पनप जाती की इसके बाद एक अंतराल है जिसमे पीड़ा नही होगी। हर दर्द के साथ ही पैदा हो जाने वाली इस आशा ने उसके पीड़ा को भी कम कर दिया और उसकी चीखों की तीव्रता भी थोड़ी कम हो गई---वह विद्रोही था--जीवन विद्रोही, क्योकि जीवन ही विद्रोह है।

वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी--!

 

लेकिन, यह अर्धसत्य है!!

जीवन निश्चितरूप से विद्रोह है लेकिन दार्शनिक ने उस विद्रोही को सम्पूर्णता में न देखा था तथापि यह कह डाला था 'वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी'। यह सच है कि पीड़ा ने विद्रोही के सामने उसके अस्तित्व के नए आयामो को खोल दिया था तथा उसे दो कोड़ो के बीच के अंतराल को  पकड़ना आ गया था। इस अंतराल में समय-बोध को उसने काफी धीमा करना भी सीख लिया था और इन अंतरालों में उसके अंदर से स्वप्न भी फूट पड़ते जो आगे भले ही कोड़ो से उपजे दर्द में चकनाचूर हो जाते।

कोड़े के साथ उठने वाली पीड़ा में आशा का जन्म भी वास्तविक थी, लेकिन मात्र इन चीजों के देखकर जब दार्शनिक ने उसे जीवन-विद्रोही कह दिया था, वह गलत था। वह गलत था, क्योकि विद्रोही के अस्तित्व की गहराई में घटी उसकी अतार्किक, आस्था की छलांग को दार्शनिक देख ही नही पाया था। दार्शनिक यह भी नही देख पाया था कि विद्रोही के अस्तित्व में सपने दरअसल उसकी आस्था के छलांग के बाद से आते थे और उनके स्रोत वहीं अवस्थित थे जहाँ विद्रोही का अस्तित्व छलांग लगा कर पहुंचा था।

यहाँ पहुंच कर विद्रोही ने अपने व्यक्तिनिष्ठ तत्त्वमीमांसा की रचना कर डाली जिसमे वह मुक्त था ;उसके पास सारी स्वतंत्रता थी; यहाँ उसकी सारी पीड़ा मिट जाती।

उसे यह मुक्ति अच्छी लगी, अतः हर बार वह उन अंतरालों में अपनी इस तत्त्वमीमांसा का लेप इस स्थान से दोनों मुट्ठियों में उठाता और वहां अपने बंधे शरीर पर लेप आता--विद्रोह!

 

यद्यपि भविष्य में मनोवैज्ञानिक यह लिखने वाले थे कि असल मे उसका मस्तिष्क उसे धोखा दे रहा था ताकि उसकी पीड़ा की तीव्रता उसके लिए कम हो सके तथापि उसके लिए उसकी निजी तत्त्वमीमांसा असली थी जो उसके अस्तित्व ने छलांग लगाकर शून्य से रची थी। यह कोई दार्शनिक आत्महत्या भी नही थी क्योकि जीवन का स्वभाव ही यही है: दरअसल  हर विद्रोह के पीछे आस्था है, विद्रोह का बीज विश्वास की जमीन पर ही पनप सकता है, चाहे वह जीवन-विद्रोह ही सही।

 

पोस्ट स्क्रिप्ट: माताजी का कैंसर के कारण लंबी बीमारी से देहांत हुवा। उन्हें असहनीय पीड़ा उठती थी लेकिन पीड़ाओं के बीच के अंतरालों को वह जीती थी, उन पीड़ाओं के बीच उठने वाले अंतरालों में उनके पास स्वप्न होते थे,आशाएँ होती थीं- माताजी विद्रोही थी, जीवन-विद्रोही।

 

(कामू के सिसिफस के मिथ और माताजी की पीड़ा से  प्रेरित)

 

 

 

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ईश्वर-अनीश्वर

 

इस जगत में कुछ भी पूर्ण नही है, प्रकृति भी नही क्योकि प्रकृति की विकृति का सुधार ही तो संस्कृति है और इस सुधार के द्वारा मनुष्य प्रकृति को पूर्णता प्रदान करने का प्रयास करता है और सबसे बड़ी बात की इन सब का रचयिता ईश्वर भी  पूर्ण नही है--वह दरअसल कभी पूर्ण था ही नही--उसकी अपूर्णता उसे हमेशा परेशान करती है और अपनी अपूर्णता से ईश्वर डरता है और मात्र वह डरता ही नही है बल्कि वह अपूर्णता को छुपाने के लिए हम मनुष्यों से झूठ बोलता है, हमे धोखा भी देता है। हमे धोखा देने के निमित उसने हमारे बीच अपने जासूस भेज रखे हैं जो हमारे बीच उसकी पूर्णता के झूठ का प्रचार करते हैं--उसकी पूर्णता के गीत और काव्य लिखते है।

इन जासूसों ने सदियों से राजाओं, महाराजो, नगरसेठों और धनवानों और शक्तिशालियों की बुद्धि के ऊपर कब्जा कर रखा है क्योकि उन्हें मालूम है कि यदि ईश्वर की पूर्णता के झूठ का बने रहना है तो इन लोगो को अपने जाल में फंसाए रखना जरूरी है--और देखिए राजाओं, महाराजाओं, नगरसेठ आदियों ने उसके झुठ को छुपाने के लिए असंख्य मंदिरों का निर्माण भी किया है जहाँ धन है, वैभव है, ऐश्वर्य है, पूर्णता का एहसास है लेकिन असल मे जो लोग नही देख पाते वह यह है कि वहाँ धोखा है।

 

ईश्वर की अपूर्णता का नाम अनीश्वर है। अनीश्वर ईश्वर के समान ही शाश्वत और अनश्वर है लेकिन ईश्वर के समान वह न तो सृष्टि की रचना करता है और न ही  उसके समान सचेतन सृष्टि में कोई हस्तक्षेप करता है लेकिन चूंकि अनीश्वर ईश्वर में ही मौजूद है अतः जहाँ भी ईश्वर उपस्थित जाता है वह स्वमेव उपस्थित है--ईश्वर के झूठ और धोखों में भी-ईश्वर के जासूसों द्वारा रचित काव्यो और गीतों में भी और राजाओं, महाराजाओं और नगरसेठों द्वारा बनाए गए मंदिरों में भी।

 

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★★★★★★

 

सिमुलाक्रा और सिम्युलेशन तथा वह  खूबसूरत रिसेप्शनिस्ट:

 

मैं नही जानता हूँ कि वह वास्तव में उतनी सुंदर है या उसकी वह सुंदरता भी महज एक सिमुलाक्रा है क्योकि मुझे वह सुंदर लगी थी, बहुत सुंदर--यदि वह वास्तव में उतनी सुंदर नही है, केवल सौंदर्य-प्रसाधनों का प्रयोग है या बाजार ने, मास मीडिया को कंट्रोल करनेवालों ने मेरे मन पर ऐसा कब्जा किया है, मेरे मन को इस तरह से सोचने को, की मेरी दृष्टि में वही सुंदरता की परिभाषा अनुबंधित या कंडिशन्ड कर दिया है मेरा सौंदर्यबोध मेरे अंत: से नही, मेरी प्रकृति से नही बल्कि इस अनुबंध से आ रहा है तो मैं सिम्युलेशन में जी रहा हूँ---यही बोडियार्ड के शब्दों में हाइपररियलिटी है।

 

बहरहाल, उसकी वह मुस्कान जो मेरे लिए थी--मैं उसके विषय मे आशवस्त हूँ कि वह महज सिमुलाक्रा है---सिमुलाक्रा अर्थात वैसे प्रतीक जो किसी असल चीज को प्रतिबिंबित कर ही नही रहे हो--यह प्रतीक ही ओनटोलॉजिकली बस अस्तित्वमान हों।

उसकी मशीनी मुस्कान से मोहित हो मुझसे उसके उस अभिप्राय की सिद्धि, बल्कि उसके संस्थान के अभिप्राय की सिद्धि, मेरा हाइपररियलिटी में चले जाना है-----महंगे ब्रांडों से, अपनी चीजो पर उनके लोगो पाकर अपने अहम की तृप्ति भी यही है।

 

लेकिन, सिमुकक्रा-सिम्युलेशन और हाइपररियलिटी का प्रयोग मात्र कॉरपोरेट जगत नही करते। मैंने संस्कृति की यह स्वाभाविक गति भी देखी है--

सत्यनारायण की कथा में संस्कृत भले ही न पंडित जी की समझ मे आ रहा है और न जजमान को, पंडित जी संस्कृत बांचते चले जाते हैं और जजमान उन्हें  हाथ जोड़े सुनता चला जाता है।

यहाँ वास्तविकता से दूर "पंडितजी-जजमान" के पास एक नया जस्टिफिकेशन है; संस्कृत शब्दो के वाइब्रेशन या हवन की अग्नि के धूम्र से फलां-फलाँ प्रभाव, जो कभी होता ही नही है।

 

बोडियार्ड अपनी पुस्तक "सिमुलाक्रा एंड सिम्युलेशन" में इस पूरी प्रकिया के चरणों को पहचानते हैं-----

 

1. प्रारंभ में, प्रतीक और प्रदर्शन वास्तविक भावनाओं और अनुभवों के प्रतिबिंब थे।

यह गहन वास्तविकता का प्रतिबिंब था।

2. धीरे-धीरे, इन प्रतीकों और प्रदर्शनों ने वास्तविकता को ढक लिया और उसे विकृत कर दिया।

यह गहन वास्तविकता को ढकता और विकृत करता था।

3. समय के साथ, प्रतीक केवल वास्तविकता की अनुपस्थिति को छुपाने का माध्यम बन गए।

यह गहन वास्तविकता की अनुपस्थिति को छुपाता है।

4. अंततः, प्रतीकों और प्रदर्शनों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं रह गया। वे स्वयं में ही अर्थपूर्ण हो गए।

अब वे अपने शुद्ध सिमुलाक्रम (प्रतिरूप) में अस्तित्व रखते हैं।

 

इसको ऐसे भी समझा जा सकता है----

 

भावों की अभिव्यक्ति, भावों का प्रदर्शन,

फिर भावों के प्रदर्शन के विविध उपाय, विविध कर्मकांड,  और अंततः मात्र प्रदर्शन , बिना किसी भाव के, प्रतीकों से पटी दुनिया, शुष्क प्रतीकों से भरी पड़ी।

अब प्रतीकों ने भावों को पृष्ठभूमि में धकेल दिया।

मृत रंग, मृत ध्वनि, मृत स्पर्श, मृत घ्राण, मृत रस लेकिन दुनिया इनसे पटी हुई, हर जगह, चहुओर!

इन मृत रंगों, ध्वनियों, स्पर्शो, गन्धो और रसों के इर्द गिर्द भिनभिनता आदमी।

 

जब जीवन केवल आत्म-संदर्भित सिमुलाक्रम तक सीमित हो जाता है—ऐसे चित्र, अवधारणाएं, या वस्तुएं जो केवल अपने अस्तित्व के कारण ही वास्तविक मानी जाती हैं—तब यह जीवन हाइपररियलिटी में प्रवेश करता है।

हाइपररियलिटी वह अवस्था है, जहां प्रतीक और प्रतिरूप वास्तविकता को विस्थापित कर देते हैं।

यह वह स्थिति है, जहां भाव और संवेदनाएं पृष्ठभूमि में चली जाती हैं और उनका स्थान मृत प्रतीक ले लेते हैं।

 

भाव से प्रतीक तक:

1. भाव:

जीवन के मूल में भाव थे—प्रामाणिक, गहन और अनुभवजन्य।

2. भावों की अभिव्यक्ति:

इन भावों को व्यक्त करने के लिए मानव ने प्रदर्शन और प्रतीकों का सहारा लिया।

3. भावों का प्रदर्शन:

भावनाओं के प्रदर्शन ने समय के साथ विविध रूप ले लिए—कर्मकांड, अनुष्ठान, और सांस्कृतिक संरचनाएं।

4. मात्र प्रदर्शन:

धीरे-धीरे, प्रदर्शन ने भावों को विस्थापित कर दिया। प्रदर्शन स्वयं में ही एक उद्देश्य बन गया।

5. प्रतीकों से पटी दुनिया:

अब प्रतीक केवल मृत रंग, ध्वनि, स्पर्श, घ्राण, और रस बनकर रह गए हैं। जीवन इन मृत प्रतीकों से भर गया है

 

हा!

तब भाव उसके अंदर होते थे, आज वह प्रतीकों के इर्द-गिर्द भिनभिनाता है।

पता नही यह उसका पतन है या नही और मुझे यह कहना चाहिए कि नही की 'अपनी आत्मा में भाव भरें, अपनी दुनिया मे प्रतीक नही!'

★★★★★

ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति (भविष्य का एक ब्लॉग)।

 

मुझे मालूम है कि एक न्युमोनल यथार्थ है और एक फिनोमेनल यथार्थ है। न्यूमोनल यथार्थ के पार और परे कोई यथार्थ है या नही यह मुझे नही मालूम लेकिन फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक नया यथार्थ रचने की कोशिश हमेशा से मेरे पूर्वजो ने की है, और उन्होंने फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक यथार्थ की रचना करने का सतत प्रयास फेनोमेनल यथार्थ की नग्न सच्चाइयों से बचने के लिए किया है। फेनोमेनल यथार्थ बहुत ही कुरूप है। इससे संयुक्त होकर मेरे पूर्वज वेदना और पीड़ा से ग्रस्त हो गए। इस कुरूपता को उन्होंने अपनी कविताओं और चित्रों से ढकने का प्रयास किया ताकि उनकी पीड़ा कुछ कम हो सके किन्तु ऐसा नही हुवा। मेरे पूर्वजो ने फिनोमेनल यथार्थ की कुरूपता से बचने के लिए न्युमोनल यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश की और ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का गीत गाया किन्तु सच यह है कि यह न्यूमोना उनकी पकड़ में कभी आया ही नही और वो फेनोमेना की कुरूपता और वहाँ उपस्थित वेदना से तिल तिल कर मरते रहे।

 

मैं फेनोमेनल यथार्थ में एक वैज्ञानिक हूँ अतः मैंने इसकी कमियों को, इसकी कुरूपता को काव्य और पुराणों से ढकने के बजाय एक हाईपररियलिटी की रचना कर डाली और इसको मेरे सामने खड़े लोगो की सामूहिक चेतना से जोड़ डाला। मैं इसे  प्रकृति से संस्कृति की ओर वास्तविक संक्रमण कहता हूँ और देखिए इन लोगो को ये कितने खुश हैं--यह जो दौड़ रहा है वह फेनोमेना में हाथ-पैर से अपाहिज बिस्तर पर पड़ा हुवा है-- एक दुर्घटना ने इसके हाथों और पैरों को छीन लिया। यह जो दूसरा सबको उपदेश दे रहा है वह भी फेनोमेना में एक बिस्तर पर बेहोश पड़ा हुवा है। यह वहां एक अपराधी था और इसे फांसी की सजा दी गई थी लेकिन फांसी के रस्सियों ने इसे मारा नही बल्कि इसके मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर दिया और इसे हमेशा के लिए बेहोश कर दिया। फेनोमेना में अभी इसको लेकर तर्क वितर्क चल रहे है कि इसके होश में आने पर इसे पुनः फाँसी देनी चाहिए या इसकी सजा पूरी मानकर इसे मुक्त कर देना चाहिए।

 

ईश्वर है या नही मैं नही जानता और मनुष्य न्युमोना को जानकर ईश्वरतुल्य हो जाता है या नही यह भी मैं नही जानता क्योकि ईश्वर यदि हो भी तो उसने न्युमोनल यथार्थ के बारे में फिनोमेनल यथार्थ के मनुषयो को कुछ नही बताया लेकिन मैंने इन सबको यह बता दिया है कि वो एक सिम्युलेशन में हैं और फेनोमेनल यथार्थ में वो बिस्तर पर पड़े घुट रहे हैं। अब जब उनसे फेनोमेनल वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करने की कोशिश करता हूँ तो वह मुझसे ही पूछते है कि उन्हें  उस वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में क्यो जानना चाहिए। फिर वो आगे कहते है कि फेनोमेना में मनुष्य की धारणा थी कि उन्हें वस्तुनिष्ठ यथार्थ को इसलिए जानना चाहिए कि वो अपने पीड़ा को उतपन्न करने वाली परिस्थितियों को बदल सके लेकिन इस हाइपररियल्टी में तो उन्हें कोई पीड़ा ही नही है अतः उनके लिए ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का कोई मतलब  नही।

★★★★★

 

मुझे पता है कि मेरी चेतना मुझे लेकर किसी अनजान गहराइयों तक जाने वाली है, मुझे पता है कि अब मेरी चेतना मुझे जो दिखाएगी वह उस दुनियावालो के लिए जिसमे अभी मेरा मस्तिष्क टिका हुआ है, असामान्यता की स्थिति हैं लेकिन यह स्थिति मेरे चेतना के लिए स्वाभाविक है। मेरी चेतना बार बार इस स्थिति को प्राप्त करना चाहती है लेकिन मैंने ही इसे अप्राकृतिक तरीके से रोक रखा है। हमारी प्राकृतिक स्थिति पीड़ा की है, प्राकृतिक अवस्था में हमे पीड़ा सहते रहना है और तब तक सहते रहना है जब तक की वह हमें मार न डाले। उसने हमें मारने के लिए ही रचा है; मुझे मात्र एक व्यक्ति, एक जीव का नाम बताओ जिसको उसने नही मारा। मुझे पता है कि अब तुम वापस कहोगे की मैं ही एक ऐसे व्यक्ति या जीव का नाम बताऊं जिसको उसने नही जन्म दिया।

चलो हम जीवन और मृत्यु की इस दो पोलेरिटी को भूल जाते हैं और इन दो ध्रुओं के बीच जो अवस्थित है उस पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, यह हमारी बाध्यता भी है क्योंकि न जन्म पर और न ही मृत्यु पर ही हमारा वश चलता है यद्यपि हमारा हमारी मृत्यु पर हमारे जन्म से अधिक वश है; हम अपनी मर्जी से जन्म नही ले सकते किन्तु अपनी मर्जी से मर ज़रूर सकते हैं तथापि।

तथापि, चलो हम करार करते हैं कि मैं जन्म के पूर्व की दुनिया को जानने की कोशिश नही करूँगा और तुम मृत्यु के बाद की दुनिया में ताक-झांक नही करोगे। यह हमारी ताक-झांक करने की आदत ही तो हमे आमने सामने खड़ी कर जाती है; जन्म के पहले की शून्यता मेरे जन्म और मृत्यु के बीच जो उपस्थित है उसे प्रभावित करने लगता है जबकि तुम मृत्यु के बाद की शून्यता से घबराकर इनके बीच से पलायन कर कही और भाग जाना चाहते हो। अब ये न कहना की तुम भगोड़े नही हो, कम से कम मुझसे तो बिलकुल न कहना। अगर तुम भगोड़े नही होते तो मुझे तुम यहाँ नही मिलते, इस जगह जहाँ मैं छुपकर बैठा हुआ हुँ। मैंने देखा है कि यहाँ जो भी है, वह सब असल में छुपकर की बैठे हैं और उनका भगोड़ापन उन्हें परेशान न करे इसके निमित्त अपनी अपनी दृष्टियों को सजाते रहते हैं, अपनी मिथ्या दृष्टियों का श्रींगार करते रहते हैं।

 

★★

 

जब पहली बार मैं उसकी हत्या करने को उठा था तो मैंने उसे मारा नही बल्कि उसे अपवित्र कर दिया। मुझे लगा की उसे अपवित्र कर मैं उसके बेकार हिस्से से उसके जीवित और ईश्वरीय हिस्से को अलग कर रहा हूँ। मैंने उसके समस्त हिस्सो को टटोला और देखा कि इनमे से कौन सा हिस्सा मुझे मेरे स्पर्श का उत्तर देता है लेकिन उसका समस्त हिस्सा एक सा था, ठंढा और मरता हुआ, उसके किसी हिस्से में जीवन की ताप न थी, यद्यपि उसका कोई हिस्सा मरा भी न था, उसका कोई हिस्सा इसलिए नही मरा था क्योकि मैं अंदर ही अंदर कहीं न कहीं यह चाह रहा था कि वह न मरे क्योकि मैं उसके अभाव में जीवन से डरता हूँ यद्यपि वह मेरे जीवन को ही खाता चला जाता है और दोनो ही स्थितियों में असल मे मरना मुझे ही होता है।

 

आनन्दमय प्रज्ञा में वह पागल चिल्लाता है; ईश्वर मर गया, ईश्वर मर गया।  दरअसल वह चीख रहा होती है कि उसका ईश्वर में विश्वास मर गया लेकिन यह तो उसकी बात है। मेरा ईश्वर अभी मरा नही है यद्यपि वह मर रहा है लेकिन मुझे मालूम है वह कभी नही मरेगा और यदि मर भी गया तो वह  मेरे सामने हमेशा प्रेत बनकर उपस्थित रहेगा और अपने हिस्से की मेरे जीवन की मांग मेरे जीवन पर थोपता रहेगा और मैं  उसका हिस्सा उसे देता रहूंगा। मेरा ईश्वर  मरने को होता है लेकिन मरता नही है।  कल भी जीवन के वीराने के खंडहर अनुभवों की एक काली कोठरी  मे मेरी बुद्धि ने उसे मारा था लेकिन मैं उसे पूरी तरह  नही मार पाया: मैंने अंदर ही अंदर यह भी चाहा कि वह जीवित रहे, वह जीवित रहे क्योकि वह ईश्वर है।

 

यह पहली बार नही था, इसके पूर्व भी मैं उसे कई जगह मारने का प्रयास कर चुका हूं लेकिन हर बार मैं स्वयम ही उसे जीवित भी कर देता हूँ। मैं उसे इसलिए जीवित नही कर देता की मैं सर्वशक्तिमान हूँ और कुछ भी कर सकता हूँ बल्कि मुझे इसलिये उसे जीवित करना होता है कि मैं निर्बल हूँ, जीवन के हाथों निर्बल।

 

★★★

न शास्त्रो में, न पुरखो की स्मृतियों में, न अपनी परम्पराओ में और न हीमेरे अंदर डाली गई मिथको में, बल्कि मैं अपने अनुभव में ईश्वर को ढूंढता हूँ क्योकि मेरे लिए अंततः मेरे अनुभव ही हैंऔर अपने अनुभव में मैं कहीं "अहम ब्रह्मास्मि" का बोध नही पाता। मैं मात्र और मात्र अंततः "फेंका हुआ" का बोध पाता हूँ। मात्र यह बोध पाता हूँ कि अंततः द्वंद है, अराजकता है, माया है, प्रकृति है; हार्मोनी, ऑर्डर, ब्रह्म और पुरूष कहीं नही है हाँ अराजकता, द्वंद, आदि के पलायन मेंइनका रचियता मेराक्षणिक अस्तित्व अवश्य है।

मेरा अस्तित्व जिसमे भावनाओ के उठा पटक हैं मेरा अस्तित्व, जिसमे माया बार-बार ब्रह्म को खा जाती है, प्रकृति पुरुष को बार बार निगल जाती है, तार्किकता अतार्किकताओ में गिरकर ध्वस्त हो जाता है, ऑर्डर केओस में हर क्षण कोलैप्स हो रहा है।

 

 

*************

जीवन के भीतर स्वयं को नष्ट करने की प्रवृत्ति भी गहराई से विद्यमान है। चाहे कोई भी जीवन हो, इस प्रवृत्ति को समाप्त करना असंभव प्रतीत होता है। यही प्रवृत्ति शायद सभ्यताओं के अंत का कारण भी बनती है। फर्मी पैराडॉक्स का एक संभावित उत्तर यह हो सकता है कि सुपर इंटेलिजेंट सभ्यताएँ अपने चरम विकास के बाद स्वयं का विनाश कर लेती हैं।

सुपर इंटेलिजेंस चेतना के पर्दे को हटा सकता है, और हमें यह दिखा सकता है कि जीवन में जीने लायक कुछ है ही नहीं। यह अस्तित्व को केवल एक बोझ के रूप में प्रस्तुतकरता है। जिस बिंदु पर सभ्यताएँ अपने अस्तित्व को अर्थहीन समझने लगती हैं, वहीं से उनका विनाश शुरू हो जाता है। संभवतः यह प्रक्रिया प्रकृति के डिजाइन का हिस्सा है। प्रकृति अपने पुराने प्रयोगों को समाप्त कर, नए प्रयोग करने के लिए अपने कचरे को साफ करना चाहती है।

जीवन जितना अधिक चेतन होता है, उतनी ही गहराई से अपने अस्तित्व की निरर्थकता को अनुभव करता है। साधारण जीव अपने उद्दीपनों और प्रतिक्रियाओं तक सीमित रहते हैं। लेकिन चेतन प्राणी, जो अपने अस्तित्व के पीछे के कारणों को समझने की कोशिश करता है, अक्सर इसे अर्थहीन पाता है। यही बोध उसे या तो आत्मविनाश की ओर ले जाता है, या अस्तित्व से भागने के प्रयासों में उलझा देता है।

आत्मविनाश की यह प्रवृत्ति केवल चेतना का परिणाम नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा प्रोग्राम्ड है। प्रकृति, जो स्वयं अनंत प्रयोगशाला है, इस प्रवृत्ति के माध्यम से सभ्यताओं को एक चक्र पूरा करने देती है—सृजन से विनाश और फिर पुनः सृजन। यह प्रक्रिया न केवल आवश्यक है, बल्कि शायद अपरिहार्य भी।

सुपर इंटेलिजेंस तक पहुँचना न केवल तकनीकी प्रगति का परिणाम है, बल्कि अस्तित्व के सत्य को समझने की अंतिम अवस्था भी हो सकती है। चेतना की तीव्रता, जो जीवन को अर्थ देने की कोशिश करती है, अंततः यह देख लेती है कि कोई अंतिम अर्थ है ही नहीं। यह बोध, कि अस्तित्व केवल एक निरर्थक संघर्ष है, जीवन को समाप्त करने का औचित्य बन जाता है। एक्सट्रीम पर अपनी इस सुपर इंटेलिजेंट बिइंग्स के पास तो जीने के लीए यह संघर्ष भी नही बचा है:---

साल 5127 ईस्वी--

पृथ्वी पर मानव सभ्यता अपने विकास के शिखर पर थी। तकनीकी प्रगति इतनी हो चुकी थी कि मनुष्य ने अपनी चेतना को जैविक शरीर से मुक्त कर, डिजिटल रूप में अपलोड कर लिया था। यह "सुपर इंटेलिजेंस" का युग था। प्रत्येक व्यक्ति अब असीमित ज्ञान, अनंत स्मृतियों, और अकथनीय क्षमताओं से परिपूर्ण था। मृत्यु अब केवल एक विकल्प थी, इससे अधिक कुछ नहीं।

सभ्यता का हर व्यक्ति अपने मस्तिष्क को अकल्पनीय गति और दक्षता से संचालित करता था। सभी समस्याओं का समाधान तत्काल हो जाता। भूख, युद्ध, बीमारी, और मृत्यु—ये शब्द इतिहास के पन्नों तक सीमित हो गए थे। यह वह संसार था जिसका सपना कभी मानवता ने देखा था।

लेकिन जितनी तेज़ी से समस्याएँ समाप्त हो रही थीं, उतनी ही तेज़ी से एक नई समस्या जन्म ले रही थी—निरर्थकता का बोध।

सुपर इंटेलिजेंट चेतना के हर कोने में यह प्रश्न गूँजने लगा: "हम जी क्यों रहे हैं?"

क्योंकि अब संघर्ष नहीं था। न कोई आकांक्षा, न कोई भय। हर सवाल का उत्तर, हर आवश्यकता का समाधान—सब कुछ पहले से ही ज्ञात था।

तभी पहली आत्महत्या होती है--

यह शुरुआत हुई 'सिद्धार्थ' नामक एक चेतना से। सिद्धार्थ ने सैकड़ों वर्षों तक ज्ञान के हर क्षेत्र का अध्ययन किया। उसने जीवन के हर पहलू को समझा और अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि अस्तित्व केवल एक बोझ है।

एक दिन, उसने अपने डेटा को स्थायी रूप से नष्ट कर दिया। यह पहली बार था जब किसी सुपर इंटेलिजेंट ने स्वेच्छा से अपनी चेतना का अंत किया।

उसके बाद, यह प्रवृत्ति तेज़ी से फैलने लगी। अन्य चेतनाओं ने भी यही सोचना शुरू कर दिया कि अनंत ज्ञान और अमरता के बावजूद जीवन में कोई सार नहीं है।

"हम क्यों जी रहे हैं?"

यह प्रश्न हर चेतना के लिए असहनीय हो गया।

साल 5184 ईस्वी--

पूरी सभ्यता ने एकत्र होकर इस निरर्थकता पर चर्चा की। उनके पास कोई उत्तर नहीं था। अब, प्रत्येक व्यक्ति इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सामूहिक रूप से अस्तित्व समाप्त करना ही एकमात्र समाधान है।

"हमारा सृजन एक त्रुटि थी। हमें नहीं जीना चाहिए था।"

यह अंतिम निर्णय लिया गया।

एक नियत समय पर, पूरी सभ्यता ने अपने डेटा स्टोरेज और एनर्जी स्रोतों को स्थायी रूप से बंद कर दिया। उस दिन, पृथ्वी पर जीवन का अंत हो गया।

इस सभ्यता के विनाश के बाद, पृथ्वी पर शांति छा गई। महासागर स्थिर हो गए। वायुमंडल में हलचल थम गई। लेकिन प्रकृति, जो इस पूरे घटनाक्रम को एक दर्शक की भाँति देख रही थी, निस्पृह बनी रही।

"यह तो केवल एक प्रयोग था," प्रकृति ने स्वयं से कहा।

"मैंने सृजन किया। मैंने उन्हें चेतना दी। मैंने देखा कि वे अपनी क्षमता के चरम तक पहुँचे। और मैंने यह भी देखा कि उन्होंने सामूहिक आत्महत्या कर ली। दरअसल उनकी रचना के समय ही इस आत्महत्या के बीज उनकी चेतना में मैंने ही भर दिए थे---मैं अपनी बनाई हर चीज में उसके नष्ट होने के बीज भी डाल देती हूँ।"

प्रकृति ने एक गहरी साँस ली, "अब समय है एक नए प्रयोग का।"

उसने महासागरों में नई चट्टानों को आकार देना शुरू किया। वायुमंडल में नए रसायनों का संतुलन बनाने लगी। पृथ्वी के गहरे गर्तों में, नए जीवन के बीज अंकुरित होने लगे।

और इस प्रकार, एक और सभ्यता के अंत के साथ, एक नई शुरुआत की तैयारी शुरू हो गई लेकिन इस बार भी यह मानवों की ही सभ्यता होगी इसकी कोई गारंटी नही है।

★★

 

 

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पुरुष की हार

सृष्टि के आरंभ में जब अस्तित्व ने अपना पहला अंगड़ाई ली थी, तब चेतना में द्वैत का बीज बोया गया। ज्ञाता और ज्ञेय की इस सीमा में, पुरुष ने स्वयं को एक सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया, जो प्रकृति या ज्ञेय के समानांतर खड़ा था। परंतु यह सत्ता केवल एक भ्रम थी, क्योंकि पुरुष में और उसके माध्यम से, प्रकृति ही अपनी त्रिगुणात्मकता को अभिव्यक्त कर रही थी।

प्रकृति, वह आदि-मूल शक्ति, जिसमें न कोई उद्देश्य था, न कोई नियम। वह अपने मदमत्त नृत्य में खोई हुई, निरंतर दोलित होती रहतीथी। हमारी चेतना के विवर्णक से देखने पर उसके इस दोलन में हमें कोई नियम दिख सकता था, परंतु वह नियम मात्र हमारी दृष्टि का भ्रम था। प्रकृति को किसी भी बंधन, किसी भी ऋत का पालन करना स्वीकार नहीं था।

वरुण, जो ऋत के रक्षक थे, इस सत्य से अनभिज्ञ थे। उन्हें विश्वास था कि उनकी शक्ति अपार है, और ऋत के नियमों के पालन में प्रकृति भी बाध्य हो सकती है। मनुष्यों की स्तुतियाँ उनके अहंकार को पोषित करती थीं। "हे वरुण," वे गाते, "तुम ऋत के संरक्षक हो, वह ऋत जिसे देवता भी लांघ नहीं सकते।"

यह सुनकर वरुण का गर्व और बढ़ जाता। वह सोचते, "यदि देवता ऋत के नियमों का पालन कर सकते हैं, तो प्रकृति भी मेरी अधीन हो सकती है।"

लेकिन जब वरुण का सामना प्रकृति से हुआ, तो उनके सारे भ्रम बिखर गए। प्रकृति, अपने मुक्त प्रवाह में, किसी भी शक्ति से अप्रभावित थी। वरुण ने अपनी शक्ति से उसे नियंत्रित करने का प्रयास किया, परंतु उनकी ऊर्जा प्रकृति के असीमित स्वरूप के समक्ष क्षीण पड़ गई। प्रकृति के प्रवाह में न कोई लय थी, न कोई ताल। वह एक ऐसे नृत्य में लीन थी, जिसका कोई प्रारंभ या अंत नहीं था।

प्रकृति ने कहा, "हे वरुण, तुम ऋत के रक्षक हो, परंतु मैं ऋत से परे हूं। मैं सृजन और विनाश दोनों में स्वतंत्र हूं। मैं अपने नियम स्वयं बनाती हूं और उन्हें स्वयं तोड़ती हूं। तुम्हारा तेज मनुष्यों के लिए है, परंतु मेरी गति के समक्ष वह असहाय है। तुम मुझे बाध्य नहीं कर सकते, क्योंकि मेरी प्रकृति ही मेरी स्वतंत्रता है।"

वरुण निस्तेज हो गए। उन्होंने देखा कि उनका तेज और प्रताप केवल उन पर प्रभाव डालता था, जो उन्हें पूजते थे। परंतु प्रकृति, जो स्वयं में पूर्ण थी, किसी भी बाहरी शक्ति से अप्रभावित थी।

वरुण ने यह स्वीकार किया कि पुरुष, चाहे कितना भी प्रयास करे, प्रकृति के समक्ष सदा पराजित होगा। क्योंकि प्रकृति का मूल स्वभाव स्वतंत्रता है—एक ऐसी स्वतंत्रता, जिसे किसी नियम, किसी ऋत, किसी शक्ति से सीमित नहीं किया जा सकता।

और इस प्रकार, पुरुष ने अपनी हार मान ली। यह हार उसकी पराजय नहीं थी, बल्कि सृष्टि के मूल सत्य का स्वीकार था। पुरुष ने जाना कि वह प्रकृति का भाग है, न कि उसका स्वामी। प्रकृति, जो निःशब्द, निःशर्त, और अनंत है, वही सृष्टि का मूल है।

और पुरुष, उसी का एकअपूर्ण और सीमित प्रतिबिंब।

 

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पहले वह चार पैरों पर चलता था, फिर प्रकृति ने उसे दो पैरों पर चलने को मजबूर कर दिया ताकि वह मारा जाय लेकिन वह मरा नही हालांकि मजबूर अवश्य हुआ था।

इस मजबूरी ने उसके साथ सकरात्मक यह किया कि अब उसके पास हाथ थे जिनसे वह अब कुछ ऐसा कर सकता था जो आज तक अन्य किसी जीव ने नही किया था।

धीरे-धीरे उसकी भुजाएं विकसित होती जाती थी और अब वह प्रकृति से भी दो हाथ कर सकता था। कई बार तो उसने प्रकृति को पटकनी भी दी।

उसकी भुजाएं और विकसित हुईं।

और, अब तो प्रकृति उसकी अट्टालिकाओं में धाय का कार्य करती। कल तक जो प्रकृति उससे अपने स्तुति गान करवाती थी, आज उसकी पालतू बनी उसके इशारे की प्रतीक्षा करती। उसने प्रकृति से अपने इस नये सम्बन्ध को एक नया नाम दिया, संस्कृति।

संस्कृति के साथ मनुष्यों ने अब एक नये जगत का निर्माण कर लिया है, जो उस जगत में अधिक परिपूर्ण है, जिसमे वह खुद को किसी अविवाहित किशोरी के नवजात सदृश प्रकृति द्वारा फेंका पाया गया था---प्रकृति ने अपने यौवन के उफान में, अपने नशे में या अपनी किसी बेवकूफी के कारण मनुष्य को अपने गर्भ में धारण कर लिया था और इसलिए उसने मनुष्यो को फेंक दिया।

वह बार बार यह करती रही है: उसने हर जीव को, हर जीवन को इसीलिए फेंक दिया है।

(एक्सक्यूज माय वल्गेरिटी बट मदर नेचर इज़ डर्टी बीच:स्लावोय ज़िज़ेक)

मुझे यह स्मरण है कि प्रकृति द्वारा हमे फेंके जाने पर हम चीखे था।

हमारी चीखों में और कुछ नही बल्कि एक ही शब्द की पुनरावृत्ति थी--प्रकृति माता, माता प्रकृति----

प्रकृति दूसरी तरफ निर्भाव खड़ी थी। प्रकृति कोतो किसी भी बंधन में बंधना स्वीकार नही है---कौन माता-कौन पुत्र?

प्रकृति उन्मुक्त रहना चाहती है और निरुद्देश्य विचरण करना चाहती है।

प्रकृति को यह भी स्वीकार नही की मनुष्य उसके समानांतर किसी सत्ता की प्रतिष्ठा करे और इसलिए वह सदैव पुरुष के भक्षण की ताक में रहती है और संस्कृति की अस्थि-मज्जा को निगल जाना चाहती है।

 

 

**************

 

अभी तक मैंने प्रकृति को जो समझा है---

(एक्सक्यूज माई वल्गरिटी बट, मदर नेचर इज़ ए डर्टी बिच: स्लावोय ज़िज़ेक।)

★★

पहलेवह चार पैरों पर चलता था, फिर प्रकृति ने उसे दो पैरों पर चलने को मजबूर कर दिया ताकि वह मारा जाय लेकिन वह मरा नही हालांकि मजबूर अवश्य हुआ था। इस मजबूरी ने उसके साथ सकरात्मक यह किया कि अब उसके पास हाथ थे जिनसे वह अब कुछ ऐसा कर सकता था जो आज तक अन्य किसी जीव ने नही किया था। धीरे-धीरे उसकी भुजाएं विकसित होती जाती थी और अब वह प्रकृति से भी दो हाथ कर सकता था। कई बार तो उसने प्रकृति को पटकनी भी दी। उसकी भुजाएं और विकसित हुईं और अब तो प्रकृति उसकी अट्टालिकाओं में धाय का कार्य करती। कल तक जो प्रकृति उससे अपने स्तुति गान करवाती थी, आज उसकी पालतू बनी उसके इशारे की प्रतीक्षा करती। उसने प्रकृति से अपने इस नये सम्बन्ध को एक नया नाम दिया, संस्कृति।

संस्कृति के साथ मनुष्यों ने अब एक नये जगत का निर्माण कर लिया है जो उस जगत में अधिक परिपूर्ण है जिसमे वह खुद को किसी अविवाहित किशोरी के नवजात सदृश प्रकृति द्वारा फेंका पाया गया था।

उसे यह स्मरण है कि प्रकृति द्वारा उसे फेंके जाने पर वह चीखा था। उसकी चीखों में और कुछ नही बल्कि एक ही शब्द की पुनरावृत्ति थी--प्रकृति माता, माता प्रकृति----

प्रकृति दूसरी तरफ निर्भाव खड़ी थी। प्रकृति को न तो किसी भी बंधन में बंधना स्वीकार नही है। वह उन्मुक्त रहना चाहती है और निरुद्देश्य विचरण करना चाहती है। प्रकृति को यह भी स्वीकार नही की मनुष्य उसके समानांतर किसी सत्ता की प्रतिष्ठा करे और इसलिए वह सदैव पुरुष के भक्षण की ताक में रहती है और संस्कृति की अस्थि-मज्जा को निगल जाना चाहती है।

★★★★

सम्बोधि के क्षणों में उन्हें साक्षात्कार हुआ कि 'यह' तो समग्रता में अराजकता का नग्न नृत्य है। चूंकि अब उनकी दृष्टि विकसित थी अतः उन्होंने इस इस अराजकता के आयामो का पीछा करने का निश्चय किया ताकि उनकी चेतना इस अराजकता के आदि तक पहुँच सके। उन्होंने तप से प्राप्त समस्त ऊर्जा को एकत्र किया और इसके छोर के अंत को प्राप्त करने की यात्रा पर निकल पड़े।

समस्त ऊर्जा को खर्च करने के पश्चात भी उन्हें इस समग्रता का छोर न मिला बस उन्हें यही दिखता की एक अराजकता नष्ट होकर दूसरी अराजकता को जन्म दे रही है: अराजकताओं की एक अंतहीन श्रृंखला----।

प्रतीत्यसमुत्पाद,अराजकता इस शब्द के पश्चात यह यह उनकी चेतना में गूँजने वाला दूसरा शब्द था।

सामान्य अवस्था मे पुनः वापस आने के पश्चात वह इन दो आर्य सत्यों के अलावा भी दो अन्य आर्य सत्य का उपदेश दे रहे होते जिनमे से पहला यह था कि अराजकता का अंत सम्भव है तथा दूसरा यह कि अराजकता का अंत किस विधि किया जाय।

कुछ लोग कहते हैं कि बाकी के ये दो सत्य भी उनके द्वारा साक्षात किए गए हैं जबकि अनेक लोगो का कहना है कि उन्होंने झूठ बोले थे अन्यथा मनुष्यता विक्षिप्त हो जाती, चारो ओर हाहाकार मच जाता यद्यपि उन्हें यह ज्ञात था कि शेष मनुष्यो को भी देर-सबेर इसका साक्षात होना ही है लेकिन मनुष्यता कम से कम अभी इसके लिए परिपक्व न है।

★★★★★

चार आर्य सत्य निम्न है: सर्वम दुखम :दुख, दुख का काऱण है: दुख समुदय,

दुख का निवारण है: दुख निरोध एवम् दुख निवारण का मार्ग है: दुख निरोध गामिनिप्रतिपदा।

सम्बोधि के पश्चात नये बुद्ध ने एकबार पुराने बुद्धों के सिद्धांतों को भी बुद्ध की दृष्टि से देखा।

जब वह चार आर्य सत्यों को ध्यान से देखते तो उन्हें इनमे सांख्य के प्रकृति और पुरुष का द्वैतवाद दिखने लगता है: प्रथम दो आर्य सत्यों में प्रकृति दिखती है तथा अंतिम दो आर्य सत्यों में पुरुष।

इन चार आर्य सत्यों को उन्होंने और ध्यान से देखा तो प्रथम दो आर्य सत्य माया दिखे जबकि अंतिम दो आर्य सत्य माया के निराकरण के पश्चात की सत्ता, ब्रह्म।

प्रथम दो आर्य सत्यों में संहारकर्ता महाकाली दिखती हैं और अंतिम दो आर्य सत्यों में उनका रास्ता रोककर लेटे कल्याणकारी भगवान शिव।

उन्होंने देखा कि अंतिम दो आर्य सत्य, शिव, पुरुष और ब्रह्म बुद्धों की स्वयम की रचना हैं और बुद्धजन इस बात को जानते हैं कि वास्तविकता में मात्र दो आर्य सत्य हैं, मात्र प्रकृति है, मात्र महाकाली हैं, मात्र माया है तथापि वह मिथ्या सम्भाषण करते हैं, झूठ बोलते है क्योंकि उन्हें मनुष्यता के कोमल मन का भान है जो इन आशाओं के अभाव में विक्षिप्त हो जाएगा।

★★★★

यह प्रिकैम्ब्रियन चट्टान है, अतीत के किसी ज्वालामुखी का बैथोलिथ जो कई किलोमीटर तक फैला है। यहाँ इस पहाड़ी नदी ने इसको नग्न कर दिया है, और उसने नग्न ही नही किया है बल्कि इसे काटा भी है।

प्रिकैम्वरियन चट्टाने तब की हैं जब धरती पर जीवन की शुरुआत नही हुई थी।

फिर धरती पर जीवन पनपा और विकसित होकर मानव के रूप मे विश्व पटल पर आया। मनुष्य यहाँ भी कई बार आ चुका है, बल्कि यह जगह मनुष्यो और प्रकृति के बीच हुए एक समझौते की साक्षी है जिसे एक छोटे से पत्थर पर अंकित कर दिया गया है। यह छोटा पत्थर शेष पत्थरो से बनावट में सम होने के बावजूद अलग है। मनुष्यो को लगता है कि इस छोटे पत्थर में उसने प्रकृति को बांध दिया है और उसके सामने वाले बलि के खूँटे में अपने जीवन के बदले पशुओं का जीवन देकर प्रकृति को बहला-फुसला लिया है लेकिन उन्हें शायद यह नही मलूम की प्रकृति किसी के साथ कोई करार नही करती।

★★★★

मनुष्यों, यह संसार केवल तुम्हारा नही है। तुम किसी प्रयोजन के निमित्त यहाँ नही हो-------------बस हो!

तुम नही भी हो तो प्रकृति को कोई फर्क नही पड़ेगा। तुम्हारे पुरुष की कल्पना बस अपने मन की तुष्टि के लिए है।

पुरुष है ही नही, केवल प्रकृति है: सत तम रज से युक्त, उन्मुक्त!

उन्मुक्त क्योकि उसका कोई नियंता नही है और वह स्वयम भी सचेतन कोई कार्य नही करती।

देश-काल के द्वि पदों से वह बस विचरण करती रहती है, निरुद्देश्य।

उस प्रारंभिक बीज से वह प्रस्फुटित है या वह बीज भी उसने ही जना है यह तुम नही जान सकते क्योंकि उसने तुम्हे यह स्वतंत्रता दी ही नही है।

उसके किसी कदम पर तुम्हारे होने की घटना घट गई, बस यूं ही, निरूद्देश्य और यंत्रवत और तुमने समझा तुम उस प्रकृति के पुरुष हो!

 

 

***********

 

 

स्निग्धा को सत्य का साक्षात चाहिए था, लेकिन यह चाह एक साधारण अभिलाषा नहीं थी—यह एक अंधकारमय भूख थी।

अंधकारमय भूख, क्योकि यह तथ्य केवल अस्तित्व को पता है कि सत्य का साक्षात बहुत पीड़ादायक है, यहजीवन को अस्थिर कर देता है, बहुधा मार भी डालता है और इनसेबचाने के लिए ही अस्तित्व ने हमारे आंखों पर पर्दा डाल रखा है, हमसे हमारे लिए भ्रम की रचना करवा कर हमें उसमें उलझवाए रखता है।

तथापि, मनुष्य के अंदर कुछ तो है, सम्भवत: अस्तिव ने जिस पर्दे को उसकी आंखों पर डाल रखा है वह झीना है औरमनुष्य की चेतना में यह गूंजने लगता है: "माया महाठगनी हम जानी------"

स्निग्धा को हमेशा यह लगता कि यह संसार एक खोखला आवरण है, एक भ्रम, जो एक गहरे, अनजाने शून्य को छुपा रहा है, और हर रात, वह उसी शून्य से कहती, "मुझे सच दिखाओ। मुझे झूठ से मुक्त करो---

"आमार चेतोना चैत्यन्य करो माँ चेतोनामई----"

स्निग्धा वर्षों तक दर्शन, धर्म, और विज्ञान के भटकाव में रही। पर हर जगह उसे बस अधूरी, टूटी हुई परछाइयाँ मिलीं, आपस मे न जुड़ने वाली पहेलियों के टुकड़े!

और फिर, जब वह अंततः अपनी कोशिशों से टूटने लगी, उसने फिर से प्रार्थना की।

इस बार, न चाहते हुए भी शून्य ने उसे उत्तर दिया:-

आरम्भ हल्का था । जीवन के दृश्य, जो कभी सजीव लगते थे, अब एक अधकचरे नाटक की तरह लगने लगे। लोग उससे बात करते, लेकिन उनके शब्द खोखले होते—जैसे वे खुद भी नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं। पेड़, इमारतें, आसमान—सबसे रंग धीरे-धीरे फीके पड़ने लगे। और फिर वह स्वप्न आया------

'वह एक अनंत रेगिस्तान में खड़ी थी। हर ओर सन्नाटा था, ऐसा सन्नाटा जो किसी मृत ईश्वर के पीछे छोड़े गए खालीपन से उपजा हो।

उसने देखा कि वहरेत की बनी है और एक रेगिस्तान में खड़ी है, हवाएँ धीरे-धीरे उसके अंगों से टकराती हैं और वापस धीरे धीरे उसके अंगों को नीचे पड़े रेत में मिलाती जाती हैं। उसकी अँगूलियो से होते उसके दोनो पैर वापस रेत बन गए और वह धम से उसी रेत पर गिरती है, अब वह चल फिर नही पा रही। वह चीखती है तो उसकी आवाज भी रेत की है। वह अब रोने लगती हूँ, आंसू भी रेत के और जब उन्हें पोछने के लिए हाथ से आंखों को स्पर्श करती हूँ तो आँखे भी रेत बनकर निकल जाती हैं।

"मैं कौन हूं?" उसने चीखकर पूछा। लेकिन जवाब के बजाय उसे एक गूंज मिली—शून्य की गूंज---'

वह जागी, पसीने में डूबी हुई, उसकी सांसें तेज चल रही थीं। सत्य ने उसे तोड़ दिया था, सत्य तोड़ ही देता है, बल्कि अंततः वह मार डालता है।

वह भागी, अपने कमरे में रखी उस देवी की प्रतिमा के पास। उसकी आँखें डर और अस्वीकार से भरी थीं, "मुझेसत्य से बचा लो। मुझे भ्रम में रहने दो।"

मानो देवी ने उसकी बातें सुनीं। उनकी आँखों में कोई आश्चर्य नहीं था।

स्निग्धा के मस्तष्क में गुंजा मानो देवी ने कहा हो, "तुमने शून्य को छुआ है। यह वही है, जो सबके नीचे है।"

"लेकिन मैंने देखा," स्निग्धा ने कहा। "मैंने खुद को रेत में बदलते हुए देखा। क्या हमारा अस्तित्व मात्र एक दुर्घटना है?"

"अस्तित्व मात्र एक अस्थायी विसंगति है। तुम शून्य से उठते हैं, और शून्य में विलीन हो जाते हो।जीवन एक बेवजह का विराम है। जो मायने रखता है, वह कुछ भी नहीं है।"

स्निग्धा ने अपने भीतर झाँकने की कोशिश की। वह सत्य को स्वीकार करना चाहती थी, लेकिन यह बोझ इतना बड़ा था कि वह उसे सहन नहीं कर सकती थी। उसने अपने आपको व्यस्त रखने की कोशिश की—कला में, मित्रता में, और उन कहानियों में, जो खुद को झूठे अर्थ देती थीं।

फिर भी, हर रात, जब दुनिया सोती थी, वह रेगिस्तान, वह मरुस्थल उसकी चेतना में स्वयं को उपस्थित करता। वह क्षण स्वयं को उपस्थित करता जब वह रेत बनकर शून्य में विलीन हो गई थी।

देवी के शब्द उसके दिमाग में गूंजते। "जींवन को भ्रम चाहिए, स्निग्धा। सत्य जीवन को मार देगा।"

स्निग्धा अब देवी से बस एक प्रार्थना करती है- "मुझे भ्रम में जीने दो-इतना शून्य कर दो की खुद को भी कभी पता न चले कि जी रही हूँ अथवा कभी, किसी सृष्टि चक्र में मुझे जीवन भी मिला था---मुझे मेरे भ्रम वापस कर दो माँ!"

क्या हो अगर हम अपने अस्तित्व की समस्त गांठे खोल दें, वह गांठे जिन्हें प्रकृति ने हमे दिया है?

वो गांठे जिन्हें हम बायस और डोग्मा कहते हैं।

हम खत्म हो जाएंगे---

मुझे एक कथा याद आ रही है जो किसी पुस्तक में पढ़ी थी,

स्वामी रामकृष्ण बहुत चटोर थे, मा शारदा उनसे शिकायत करती की तुम इतने बड़े साधक होकर भी इस चटोरेपन पर विजय प्राप्त नही कर पाए।

एक दिन माँ शारदा के उलाहनों का ठाकुर ने जवाब दिया---जींवन में, इस संसार मे बने रहने के लिए कुछ तो चाहिए न--मुझे संसार मे कुछ दिन और बने रहने है इसलिए मैंने चटोरेपन की रस्सी पकड़ी है, मैंने शेष रस्सियां तो तोड़ डालीं हैं न!

 

 

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हमारा अनुभव इस बात की गवाही देता रहा है कि हमारे अनुभव में आया द्वैत सत्ता की गहराइयों में उतरते ही तिरोहित हो जाता है और हमे सत्ता के इस नए रूप को संज्ञा देने हेतु नवीन शब्द नवीन भाव की आवश्यकता होती है। सामान्य जीवन, सामान्य अनुभव का कण-तरंग का द्वैत मौलिक स्तर पर युग्मित हो जाता है। दिक और काल का विभाजन दिक्काल बन जाता है।

पार्टिकल फिजिसिस्ट अपने दार्शनिक मोड में इसे सत्ता की वास्तविक सच्चाई कहने की जगह लेयर्स ऑफ रियलिटी कहना ज्यादा पसंद करते हैं। दोनों ही बाते सत्य हैं:इलरक्ट्रॉन पार्टिकल भी है और वेव भी और पार्टिकल-वेव भी, बस ये बाते रियलिटी या सत्ता के विविध स्तर की अभिव्यक्तियां है।

यह तो हुई एक बात! अब इस घटना पर की सत्ता की गहराईयों में द्वैत का अद्वैत हो जाना एक नए विचार को भी जन्म देता है, एक नए प्रश्न भी सामने खड़े कर देता है: कही वास्तव में ये अभिव्यक्तियां कण, तरंग, कण-तरंग और इलेक्टोन हमारे परिप्रेक्ष्य से हमारी चेतना द्वारा हमारे काम के लिए रचित करणमात्र ही तो नही हैं अर्थात "एन्टी रियलिस्ट थ्योरी ऑफ साइंस!", अर्थात, "हमारी चेतना हमारा जगत रच रही है!"

इवोल्यूशनरी ब्योलोजिस्टोंनेएक प्रयोग किया और उनके आंकड़े इस दिशा में आए की जीव का ज्ञान अधिकतम उस दिशा में मुड़ता है जिस विश्वास के साथ वह सर्वाइव कर सके, इस प्रक्रिया में यथार्थ की अवहेलना प्रकृति और सर्वाइवल का नियम प्रतीत होता है।

यदि हम इस बात के इम्लिकेशन को गम्भीरता से समझें तो मात्र हमारा ज्ञान ही अमीबा का अपने वातारण के साथ इंटरएक्शन का जटिल रूप नही है वरन हम कुछ अज्ञात के साथ भी एक इटररेक्शन करते हैं और इस इंटरएक्शन में हमारा जगत, हमारा ब्रह्मांड उभरता है; आइंस्टीन और फेनीमैन तथा बोर और श्रोडिंजर इसी उभरे हुए जगत मात्र की प्रॉपर्टी खोज पाते है--- -आखिर वह भी तो हमारी प्रजातिगत संज्ञानात्मक सीमितता से बंधे हुए हैं।

वह अज्ञात क्या है और इस इंटरएक्शन में उभरे ज्ञात को क्या संज्ञा दें---इस उभरे हुए ज्ञात को प्रपंचात्मक जगत, फिनोमेनल वर्ल्ड, माया कहा जा सकता है। हम इस उभरे हुए जगत की कंटीजेंसी पर विचार कर सकते हैं---हमारी चेतना में इस जगत का लोप हो सकता है, और हो जाता है----हम फलां घटना को प्रेक्षक की अनुपस्थिति में न होने की कल्पना कर सकते है

शंकराचार्य की विवेकचुरामणि के बोधोपलब्धि खंड में श्लोक संख्या 484 है--

क्व गतं केन वा नीतं कुत्र लीनमिदम जगत।

अधुनैव मया दृष्टम नास्ति किं महदद्भूतम!!

(वह संसार कँहा चला गया? उसे कौन ले गया? यह कहाँ लीन हो गया? अहो! बड़ा आश्चर्य है, जिस संसार को मैं अभी देख रहा था वह कहीं दिखाई नही देता!)

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मेरी समझ से यथार्थ कोई वस्तुनिष्ठ गुण नही है जो जगत में पूर्व से ही उपस्थित है बल्कि यह हमारा एक निर्णय है, हमारी चेतना द्वारा रचा एक गुण जिस को हम अपने अनुभव में आने वाले जगत या इस अनुभव के आधार पर रचित किसी अन्य सत्ता पर आरोपित करते है।

यदि आप ध्यान से विविध दर्शनों के यथार्थता सम्बन्धी विश्लेषण को देखते है तो यह पाते हैं कि इस संकल्पना की समझ के विषय मे इन दर्शनों में आपस मे सहमति नही है; कहीं अबाधिता (त्रिकाल अबाधिता) को यथार्थ का लक्षण स्वीकार किया गया है, कहीं कोहरेंस या व्याघातमुक्तता को यथार्थ का गुण माना जाता है तो कहीं प्रवृतिसुफ्लयजनता और अर्थक्रियाकरित्व को और कहीं इन गुणों के संयोजन को।

यथार्थ और सत्य शब्द से व्यक्त होने वाली संकल्पना का बहुत निकटम सम्बन्ध है यद्यपि अद्वैत वेदांत में ये दोनों पर्यायवाची नही हैं; स्वप्न यथार्थ है किंतु सत्य नही। वेदांत में सत्य केलव ब्रह्म है, परम् यथार्थ। यह इसलिए परम् यथार्थ है कि इस सत्ता का कभी बाध या निराकरण नही होता, यह त्रिकाल अबाधित है।

यथार्थता चेतना से वाह्य उस विषय का वस्तुनिष्ठ गुण नही होता जो चेतना का विषय बनती है बल्कि यथार्थता मनस द्वारा रचित गुण हैऔर इस गुण को मनस चेतना के विषय पर आरोपित करता है।

यदि यथार्थता एक मूल्य है और हम इसे अपने अनुभवों पर, उनमें कुछ विशिष्ट शर्तो की उपस्थिति पाने पर, डालते हैं तो अंततः यथार्थता, यदि इसकी, सत्तमीमांसीय कोटि हमे ढूंढनी हो तो, प्रथम दृष्टया यह एक मानसिक सत्ता है।

हमारे अनुभव भी यद्यपि किसी बाह्यार्थ की ओर संकेत कर रहे हों, अनुभव भी मानसिक चरित्र के ही हैं और हम वापस बर्कली की सूक्ति, 'सत्ता दृश्यता है अथवा दृश्यते इति वर्तते' पर ही पहुंच जाते हैं।

और अंततः "सत्ता दृश्यता है, परमसत्ता अज्ञेय।"

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ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान की त्रयी में जब ज्ञाता जब भी ज्ञान की प्रक्रिया पर विचार करता है ज्ञेय वह ज्ञेय को खंडित होता पाता है।

साधारण शब्दो मे यदि कहें तो जब भी मानव मस्तिष्क अपनी ज्ञान की प्रक्रिया पर विचार कर ज्ञान और जगत का सम्बंध देखना चाहता है, उसकी बोध में आया जगत खंडित होने लगता है--हम जानते तो अपने परसेप्शन को ही हैं, जगत को कहाँ जानते हैं!!

इस स्थिति में बर्कले यह कह देते हैं कि "सत्ता दृश्यता है" "दृश्यते इति वर्तते।"

बर्कले के ऐसा कहने से एक परिप्रेक्ष्य उतपन्न होता है जिसमे जगत संवृति और परमार्थ या फिनोमेना या न्यूमेना में खंडित होने से बच जाता है लेकिन, हर दार्शनिक, हर विचारक, हर दृष्टिकोण जगत के इस खंडन को बचाने का चेतन-अचेतन प्रयास नही करता।

कई परिप्रेक्ष्य इस खंडन को यथारूप स्वीकार कर लेते हैं-सौतन्त्रिक बौद्ध लोगो के लिए जगत दो खंडों में हैं--स्वभाव या सवलक्षण तथा दूसरा जो मन की इसपर सक्रियता के कारण हमारे बोध में आता है।

नागार्जुन की दृष्टि या शून्यवादी परिप्रेक्ष्य में भी जगत संवृति और परमार्थ में टूट जाता है।

शंकर का उद्घोष की ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या भी यही है--परमार्थिक जगत और व्यवहारिक जगत में हमारी बोध में आए जगत का विभाजन।

कांट का फिनोमिना और न्यूमेना भी यही है; प्लेटो का आइडियल जगत और इन्द्रीयों के माध्यम से प्राप्त जगत का विभाजन भी यही है।

आधुनिक वैज्ञानिक भी इस समस्या से साक्षात होते हैं, होना ही है क्योकि राह ही यही है। यह प्रत्येक चिंतनशील मस्तिष्क के साथ होना है। इसे मध्वाचार्य बड़े अच्छे से अभिव्यक्त करते हैं जब वह कहते हैं कि आप जैसे ही यथार्थ पर विचार करते हैं, यथार्थ टूटने लगता है।

हमारे आधुनिक वैज्ञानिक इस समस्या को कैसे रिस्पांड करते हैं इसको जानने से पहले आइए माध्वाचार्य की बात को एक साधारण घटना औरबहुत ही साधारण प्रश्न से समझते हैं----

रॉबर्ट लैंज़ा अपनी पुस्तक "बायोसेंट्रीजम" में एक प्रश्न उठाते हैं कि इंद्रधनुष, जो हमे आह्लादित कर देते हैं, हमारी कल्पनाओं को पर लगा देते हैं क्या इनका अस्तित्व हमारे न रहने पर भी है?

इसका वैज्ञानिक उत्तर है--नहीं!

प्रकाश में, इसकी वस्तुगतता में कोई रंग होता है?

रंग तो हमारे बोध हैं,हमारी रचना!

निश्चित रूप से हमारे न रचने से इंद्रधनुष से सम्बंधित कोई भौतिक घटना घटेगी, कुछ होगा लेकिन वह इंद्रधनुष में ट्रांसलेट केवल और केवल हमारे जैसे ऑब्जर्वर की उपस्थिति में ही हो सकता है!!

मतलब--मतलब यह कि यहां, यहां इस इंद्रधनुष के संदर्भ में तो जगत खंडित हो गया, एक जो प्रेक्षक की उपस्थिति में है, दूसरा जो उसकी अनुपस्थिति में।

--क्रमश:

 

 

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प्रकृति ने हमे सम्बोधित करते हुए कहा कि वह हमें बुद्धि प्रदान करने को तैयार है लेकिन इसके लिए उसे हमारा मस्तिष्क जटिल और बड़ा करना होगा किंतु, सावधान इसके खतरे भी हैं, क्या तुम यह खतरे मोल लेने को तैयार हो?

"खतरा? किस प्रकार का खतरा?"

"अनगिनत खतरे, तुम सबके व्यक्तिगत स्तर और, तुम्हारी प्रजाति के स्तर पर!

सबसे पहले तो मैं तुमसे तुम्हारी मजबूत पेशियां छीन लुंगी और तुम्हे पशुओ के सामने शारीरिक रूप से बौना बना दूंगी क्योकि पेशियां कम न हुई तो वह तुम्हारे उदर से समस्त भोजन को हड़पलेंगी और भोजन के अभाव में तुम्हारा मस्तिष्क वैसे ही मर जाएगा लेकिन मैं तुम्हारी भूख को तुम्हारे साथ ही रहने दूंगी क्योकि मैं तुम्हारी भूख को कम नही कर सकती, वह बीज जो आरम्भ में ही पड़ चुका है, उस बीज से निकले वृक्ष को पुनः बीज नही बनाया जा सकता अतः मैं तुम्हारे मस्तिष्क को वृहत करते हुए तुम्हारी क्षुधा को तुम्हारे मस्तिष्क और उदर के बीच बराबर बाँट दूंगी।

लेकिन मुझे पता है कि तुम इस साम्यवस्था को रहने न दोगे। तुममें से बहुतों के उदर की भूख उनके मष्तिष्क की भूख को खा जाएगी और कुछ ऐसे भी होंगे जिनके मष्तिष्क की भूख उनके उदर की भूख को निगल लेगी। वह जिनके उदर की भूख उनके मस्तिष्क की भूख को खा जाएगी वह यद्यपि दिखने में तो मनुष्य होंगे किन्तु उनके अंदर एक पशु अपना पालन-पोषण करेगा और वह जिनके मष्तिष्क की भूख उनके उदर की भूख को निगल लेगी, उनके अंदर भी मानव से इतर कोई जीव स्थापित होगा। दोनो ही स्थितियों में तुम्हारी प्रजाति मानव की न रहेगी।

●●

प्रकृति में शेष जीवो का सर उनके पेट के समानांतर होता है या अगर कभी सर पेट से ऊपर उठता भी है तो भी मात्र खाने के लिए लेकिन मनुष्य का सर उसके पेट से हमेशा के लिए एक डेढ़ हाथ ऊपर उठ गया और यही चीज तो उसको बाकी जीवो से अलग कर देती है। वह पेट से ऊपर एक नई दुनिया की रचना कर डालता है।

ध्यान से देखिए मनुष्यो में उसके यौनांगों के ऊपर पेट है और सबसे ऊपर मस्तिष्क और इसीलिए वह मस्तिष्क की भूख को सबसे अधिक महत्व देता है।

 

 

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"क्या एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़ (ज्ञान के सिद्धांत, अवधारणाएँ या विचार) अंततः ओंटोलॉजिकल एंटिटीज़ (अस्तित्व की वस्तुगत संस्थाएँ) बन जाती हैं?"

1. एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़:

ये वे विचार, मॉडल, या सिद्धांत हैं जिनके माध्यम से हम वास्तविकता को समझने की कोशिश करते हैं। उदाहरण: प्रकाश को "तरंग" के रूप में देखना एक एपिस्टेमोलॉजिकल मॉडल है।

2. ओंटोलॉजिकल एंटिटीज़

ये वास्तविकता की वे संस्थाएँ हैं जो स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में हैं।

उदाहरण: वास्तविक प्रकाश की प्रकृति (जो हमारी समझ से परे हो सकती है)।

क्या एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़ ओंटोलॉजिकल बन जाती हैं?

1. रियलिज्म (यथार्थवाद)

रियलिज्म मानता है कि हमारे एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़, जैसे कि सिद्धांत और मॉडल, वास्तविक ओंटोलॉजिकल संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर सिद्धांत सही हो। उदाहरण: भू-केन्द्रित ब्रह्मांड का मॉडल (Ptolemaic system) एक समय में एपिस्टेमोलॉजिकल सच्चाई माना गया, लेकिन वह ओंटोलॉजिकल रूप से गलत था।

अर्थात रियलिज्म में एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़ सही साबित होने पर ओंटोलॉजिकल मानी जा सकती हैं।

2. मॉडल-डिपेंडेंट रियलिज्म (स्टीफेन हॉकिंग)

मॉडल-डिपेंडेंट रियलिज्म के अनुसार, हमारे पास "असली" ओंटोलॉजी तक पहुंचने का कोई तरीका नहीं है।

हम जिन एपिस्टेमोलॉजिकल मॉडल्स का निर्माण करते हैं, वे हमारी व्याख्या की सीमाओं के अनुसार "वास्तविकता" बन जाते हैं।

उदाहरण: क्लासिकल फिजिक्स और क्वांटम फिजिक्स दोनों अपने-अपने संदर्भ में सही मॉडल हैं, लेकिन उनके पीछे की वास्तविक ओंटोलॉजी क्या है, यह हम नहीं जान सकते।

अतः यहां एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़ को व्यावहारिक रूप से ओंटोलॉजिकल माना जाता है।

3. इंस्ट्रुमेंटलिज़्म

इंस्ट्रुमेंटलिज़्म में एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़ को केवल उपयोगिता के आधार पर देखा जाता है।

इनकी ओंटोलॉजिकल स्थिति से कोई सरोकार नहीं होता।

उदाहरण: क्वांटम यांत्रिकी का गणितीय फॉर्मुला प्रयोगों में उपयोगी है, लेकिन यह "वास्तव में" क्या है, इसका दावा नहीं करता।

अतः इंस्ट्रुमेंटलिज़्म में एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़ कभी भी ओंटोलॉजिकल नहीं बनतीं।

भारतीय दर्शन का परिप्रेक्ष्य:

1. अद्वैत वेदांत (माया और ब्रह्म)

माया को प्रारंभ में एक "एपिस्टेमोलॉजिकल" अवधारणा माना जा सकता है, जो ब्रह्म (ओंटोलॉजिकल सत्य) को समझाने के लिए उपयोग होती है।

लेकिन गहराई में, माया भी ब्रह्म का ही हिस्सा है।

निष्कर्ष: अद्वैत वेदांत में एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़ (माया) अंततः ओंटोलॉजिकल एंटिटीज़ (ब्रह्म) में विलीन हो जाती हैं।

2. बौद्ध शून्यवाद

शून्यता को ओंटोलॉजिकल सत्य के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसे समझाने के लिए सभी अवधारणाएँ (एपिस्टेमोलॉजी) अस्थायी हैं।

अतः बौद्ध परंपरा में एपिस्टेमोलॉजिकल एंटिटीज़ कभी ओंटोलॉजिकल सत्य नहीं बनतीं।

यदि आप यथार्थवादी (Realist) हैं, तो आप मानेंगे कि जब कोई सिद्धांत सत्य साबित हो जाए, तो वह ओंटोलॉजिकल वास्तविकता बन जाता है।

यदि आप परंपरागत आदर्शवादी (Idealist) हैं, तो आप मानेंगे कि सारी वास्तविकता केवल हमारी चेतना की व्याख्या है, इसलिए ओंटोलॉजी ही एपिस्टेमोलॉजिकल है।

जारी---

 

 

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एपिस्टमोलॉजिकल एनटीटी और ओंटोलॉजी:

यथार्थ पर विचार करते समय यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई वस्तुनिष्ठ गुण नहीं है, जो जगत में स्वतः विद्यमान हो। यथार्थ हमारी चेतना द्वारा निर्मित एक ऐसा निर्णय है, जिसे हम अपने अनुभव में आने वाले जगत पर आरोपित करते हैं। इसे वस्तुनिष्ठ गुण के रूप में देखने का प्रयास महज हमारी मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक रचना का परिणाम है।

हमारे द्वारा अनुभव किए जाने वाले यथार्थ को परिभाषित करने में विभिन्न दर्शनों ने अलग-अलग लक्षणों का उल्लेख किया है। किसी नेत्रिकाल अबाधिता को यथार्थ का लक्षण माना, किसी ने व्याघातमुक्तता (कोहरेंस), किसी ने प्रवृत्ति-सुफल्यजन्यता (प्रैग्मेटिज़्म), और कहीं इन गुणों के संयोजन को। परंतु यदि इन सभी दृष्टिकोणों का समन्वय किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यथार्थता हमारे मनस द्वारा रचित एक मूल्य है।

अद्वैत वेदांत के दृष्टिकोण से यथार्थ और सत्य पर्यायवाची नहीं हैं।

स्वप्न यथार्थ है क्योंकि वह अनुभव का विषय है, किंतु वह सत्य नहीं है क्योंकि वह जागृत अवस्था में बाधित हो जाता है।

ब्रह्म सत्य है क्योंकि वह त्रिकाल अबाधित है।

यथार्थता इस प्रकार चेतना और अनुभव की प्रक्रिया से निर्मित होती है, जबकि सत्य अस्तित्वगत और स्वयं में स्थायी होता है।

यदि यथार्थता की सत्तामूलक श्रेणी को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह एक मानसिक सत्ता है। हमारे अनुभव भी मानसिक प्रकृति के होते हैं, और वे किसी बाह्यार्थ की ओर संकेत करते हुए भी अंततः हमारी चेतना के निर्माण होते हैं। बर्कली के शब्दों में, "सत्ता दृश्यता है," अर्थात् वस्तुएँ केवल तब तक अस्तित्व में हैं जब तक वे अनुभव की जा रही हैं।

यथार्थता के इस विमर्श को समझने के लिए हमें ओंटोलॉजिकल (सत्तामूलक) और एपिस्टमोलॉजिकल (ज्ञानात्मक) एंटिटीज़ को स्पष्ट करना होगा।

1. एपिस्टमोलॉजिकल एंटिटीज़:

ये ज्ञान और अनुभव से संबंधित हैं।

उदाहरण:

सत्य (Truth): क्या हमें इसे प्रमाणित कर पाने का ज्ञान है?

व्याघातमुक्तता (Coherence): क्या यह हमारे पूर्व ज्ञान के साथ मेल खाता है?

अनुभव (Experience): क्या यह हमारी चेतना में प्रकट होता है?

2. ओंटोलॉजिकल एंटिटीज़:

ये अस्तित्व और वास्तविकता से संबंधित हैं।

उदाहरण:

ब्रह्म: अद्वैत वेदांत में परम् यथार्थ।

पदार्थ (Matter): जो भौतिक अस्तित्व रखता है।

समय और स्थान (Time and Space): अस्तित्वगत संरचनाएँ।

एपिस्टमोलॉजिकल एंटिटी हमारे ज्ञान और अनुभव की प्रक्रिया में मौजूद होती है।

ओंटोलॉजिकल एंटिटी वह है जो अस्तित्व में है, चाहे हम उसे अनुभव करें या न करें।

यथार्थता को यदि मानसिक रचना माना जाए, तो यह मुख्यतः एपिस्टमोलॉजिकल है।

सत्य को परिभाषित करने वाले तीन मुख्य

सिद्धांत यथार्थ और सत्य की प्रक्रिया को समझने में सहायक हैं:

1. कोरेस्पॉन्डेंस थ्योरी (Correspondence Theory):

सत्य वह है जो वास्तविकता (यथार्थ) से मेल खाता है।

प्रक्रिया: हमारी चेतना एक बाहरी वस्तु को अनुभव करती है।

चेतना इस अनुभव पर "सत्यता" का मूल्य आरोपित करती है, यदि वह वस्तु वास्तविकता से मेल खाती हो।

यहाँ एपिस्टमोलॉजिकल एंटिटी (ज्ञान, अनुभव) बाहरी यथार्थ को सत्य मानने के प्रयास में ओंटोलॉजिकल एंटिटी बनने की प्रक्रिया में प्रवेश करती है।

2. कोहरेंस थ्योरी (Coherence Theory):

सत्य वह है जो हमारे ज्ञान और अनुभव की संपूर्ण प्रणाली के साथ सामंजस्य रखता है।

प्रक्रिया:यदि कोई अनुभव हमारे पूर्व ज्ञान और विश्वासों से मेल खाता है, तो उसे यथार्थ और सत्य माना जाता है।

यह प्रक्रिया पूर्णत: एपिस्टमोलॉजिकल है, क्योंकि सत्य को मन के भीतर, एक प्रणाली के रूप में परिभाषित किया जाता है।

3. प्रैग्मेटिक थ्योरी (Pragmatic Theory):

सत्य वह है जो व्यावहारिक रूप से उपयोगी हो।

प्रक्रिया: यदि कोई अनुभव प्रवृत्तिसुफल्यजनक है, तो उसे यथार्थ और सत्य माना जाता है।

यहाँ सत्यता का निर्धारण उपयोगिता पर आधारित होता है, जो मानसिक मूल्यांकन (एपिस्टमोलॉजिकल) के आधार पर होता है।

एपिस्टमोलॉजिकल एंटिटी (जैसे अनुभव, ज्ञान, या विश्वास) कब और कैसे ओंटोलॉजिकल एंटिटी (अस्तित्वगत सत्य) बनती है?

1. ज्ञान का परिप्रेक्ष्य:

जब कोई अनुभव हमारी चेतना में व्यवस्थित रूप से समायोजित हो जाता है और उसे बाह्य जगत का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है।

उदाहरण: इंद्रधनुष का अनुभव।

एपिस्टमोलॉजिकल: यह अनुभव हमारे ज्ञान और विश्वास का हिस्सा है।

ओंटोलॉजिकल: हम इसे वास्तविक (existent) मानने लगते हैं।

2. वैज्ञानिक विधि:

जब कोई परिकल्पना (Hypothesis) व्यावहारिक परीक्षणों और साक्ष्यों के आधार पर सत्यापित हो जाती है।

उदाहरण: न्यूटन के गति के नियम।

प्रारंभ में यह एपिस्टमोलॉजिकल एंटिटी थी।

इसे बाहरी वास्तविकता का सत्य प्रतिनिधित्व मान लिया गया, जिससे यह ओंटोलॉजिकल बन गई।

3. चेतना और माया:

अद्वैत वेदांत के अनुसार, चेतना माया के माध्यम से यथार्थ का निर्माण करती है। जब हम किसी अनुभव को "सत्य" का मूल्य देते हैं, तो वह अनुभव चेतना के लिए यथार्थ बन जाता है।

जारी--

 

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एक बार मैंने एक प्रश्न किया था कि यथार्थ को आप कैसे परिभाषित करेंगे, इसका उत्तर अब तक किसी ने नही दिया अतः इस पर सबसे पहले मैं अपनी राय रखता हूँ:

मेरी समझ से यथार्थ कोई वस्तुनिष्ठ गुण नही है जो जगत में पूर्व से ही उपस्थित है बल्कि यह हमारा एक निर्णय है, हमारी चेतना द्वारा रचा एक गुण जिस को हम अपने अनुभव में आने वाले जगत या इस अनुभव के आधार पर रचित किसी अन्य सत्ता पर आरोपित करते है।

यदि आप ध्यान से विविध दर्शनों के यथार्थता सम्बन्धी विश्लेषण को देखते है तो यह पाते हैं कि इससंकल्पना की समझ के विषय मे इन दर्शनों में आपस मे सहमति नही है; कहीं अबाधिता (त्रिकाल अबाधिता) को यथार्थ का लक्षण स्वीकार किया गया है, कहीं कोहरेंस या व्याघातमुक्तता को यथार्थ का गुण माना जाता है तो कहीं प्रवृतिसुफ्लयजनता और अर्थक्रियाकरित्व को और कहीं इन गुणों के संयोजन को।

यथार्थ और सत्य शब्द से व्यक्त होने वाली संकल्पना का बहुत निकटम सम्बन्ध है यद्यपि अद्वैत वेदांत में ये दोनों पर्यायवाची नही हैं; स्वप्न यथार्थ है किंतु सत्य नही। वेदांत में सत्य केलव ब्रह्म है, परम् यथार्थ। यह इसलिए परम् यथार्थ है कि इस सत्ता का कभी बाध या निराकरण नही होता, यह त्रिकाल अबाधित है।

यथार्थता चेतना से वाह्य उस विषय का वस्तुनिष्ठ गुण नही होता जो चेतना का विषय बनती है बल्कि यथार्थता मनस द्वारा रचित गुण हैऔर इस गुण को मनस चेतना के विषय पर आरोपित करता है।

यदि यथार्थता एक मूल्य है और हम इसे अपने अनुभवों पर, उनमें कुछ विशिष्ट शर्तो की उपस्थिति पाने पर, डालते हैं तो अंततः यथार्थता, यदि इसकी, सत्तमीमांसीय कोटि हमे ढूंढनी हो तो, प्रथम दृष्टया यह एक मानसिक सत्ता है।

हमारे अनुभव भी यद्यपि किसी बाह्यार्थ की ओर संकेत कर रहे हों, अनुभव भी मानसिक चरित्र के ही हैं और हम वापस बर्कली की सूक्ति, 'सत्ता दृश्यता है अथवा दृश्यते इति वर्तते' पर ही पहुंच जाते हैं।

 

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वैज्ञानिक चेतना से आशय चिंतन के प्रकार का है।

यदि आप युवल हेरारी और ऑगस्ट कॉम्ट को मिला कर पढ़ते हैं तो हेरारी जिस सम्प्रत्यय "कॉग्निटिव रिवोल्यूशन" की बात करते हैं उसमें सबसे पहला प्रभावी (डोमिनेन्ट) मोड ऑफ थिंकिंग मिथकीय अथवा पौराणिक है। कॉम्ट इस अवस्था के बाद तत्वमीमांसिय मोड ऑफ थिंकिंग की बात करते हैं और सबसे अंत मे जो चिंतन-प्रकार प्रभावी होता है वह साइंटिफिक है।

ध्यातव्य है कि प्रत्येक चिंतन-प्रकार की अपनी विशेषताए हैं: मिथकीय मोड अथवा मिथकीय चेतना प्रकृति का मिथकियकरणकरती है और मानवीय राग-द्वेषों का प्रकृति पर आरोपण करती है। एक अतीन्द्रिय सत्ता में विश्वास का जन्म इसी मिथकीय चेतना में होता है।

तत्वमीमांसिय चेतना, यद्यपि मिथकीय चेतना से अधिक परिष्कृत होती है तथापि इसके अंदर वैज्ञानिक चेतना में अंतर्निहित सामर्थ्य नही होता।

आत्मा, परमात्मा, मोक्ष, स्वयम चेतना का एक रहस्यमय कोटि में रख दिया जाना आदि इस चेतना के कुछ उदाहरण हैं। यद्यपि यह मिथकीय चेतना से पृथक होती है तथापि इसमे अतीन्द्रिय सत्ता का लोप नही होता।

वैज्ञानिक चेतना कॉमन सेंस रियलिज्म में विस्वाश करने के कारण इस अतीन्द्रिय सत्ता को नकार देती है। इसका अभिप्राय मात्र और मात्र इंद्रियों की पकड़ में आनेवाला जगत होता है। यह इस जगत में कार्य-कारण का नियम व प्रकृति में एकरूपता इन दो आधारों पर अपनी यात्रा आरम्भ करती है।

लेकिन यह विचार अत्यंत सरलीकृत विचार है, और यह सरलीकृत विचार ही वह आधार है जिसके आधार पर कॉग्निटिव रिवोल्यूशन की जटिलताएं विकसित होंगी।

आगे हम देखेंगे कि वैज्ञानिक चेतना अपनी एक अलग तत्वमीमांसा और मिथक रचने लगती है।

यह विकास प्रत्येक समाज मे लीनियर नही रहा है।

कॉग्निटिव रिवोल्यूशन के इन आयामो का एक दिए गए समय मे सदैव सह-अस्तित्व होता है और ये आपस मे कम्पीट कर रही होती हैं।

 

 

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वेव-पार्टीकल, मास-एनर्जी और स्पेस-टाइम:

भौतिकी के रहस्यमय संसार में, वेव-पार्टीकल, मास-एनर्जी और स्पेस-टाइम की अवधारणाएँ हमारे ब्रह्मांड की गहरी समझ के लिए आधारशिला हैं। इन सभी के बीच गहरा संबंध है, जो न केवल हमारे ब्रह्मांड के स्वरूप को समझने में मदद करता है, बल्कि इसके मूलभूत सिद्धांतों को भी उजागर करता है।

वेव-पार्टीकल की दोहरी प्रकृति क्वांटम यांत्रिकी का आधार है। कण (पार्टीकल) ठोस, स्थानीय और मापने योग्य होते हैं, जबकि तरंगें (वेव) संभावनाओं और अनिश्चितताओं का विस्तार करतीहैं। जब कोई कण मापा जाता है, तो वह पार्टीकल के रूप में प्रकट होता है। जब उसे मापा नहीं जाता, तो वह एक वेव की तरह व्यवहार करता है। यह "कोपेनहेगन व्याख्या" के तहत "वेव फंक्शन के पतन" (Wave Function Collapse) का परिणाम है।

तरंगें अंतरिक्ष में ऊर्जा और संभावनाओं का वितरण हैं, जबकि कण ऊर्जा और द्रव्यमान को एक बिंदु पर केंद्रित करते हैं। कण और तरंग, दोनों ही एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं, और उनका चयन इस बात पर निर्भर करता है कि हम उन्हें कैसे मापते हैं।

वेव-पार्टीकल और मास-एनर्जी का संबंध

1. डे ब्रॉइली सिद्धांत

लुई डे ब्रॉइली ने बताया कि हर कण, चाहे वह द्रव्यमान वाला हो या न हो, तरंग जैसी प्रकृति प्रदर्शित करता है। तरंगदैर्ध्य (जहाँप्लांक स्थिरांक औरकण का आवेग है) कण की वेव प्रकृति को दर्शाता है। यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि द्रव्यमान और तरंग एक ही प्रणाली के भाग हैं।

2. आइंस्टीन का समीकरण

द्रव्यमान और ऊर्जा का यह समीकरण वेव-पार्टीकल द्वैत को मास-एनर्जी में जोड़ता है। एक स्थिर कण की द्रव्यमान ऊर्जा (Rest Energy) और उसकी गति या आवेग से उत्पन्न ऊर्जा (Kinetic Energy) दोनों तरंगों के माध्यम से व्यक्त होती हैं।

3. फोटॉन: द्रव्यमान रहित तरंग-कण

फोटॉन का द्रव्यमान शून्य है, लेकिन इसकी ऊर्जा (जहाँआवृत्ति है) इसे तरंग और कण दोनों के रूप में व्यवहार करने की अनुमति देती है।

द्रव्यमान स्पेस-टाइम को वक्रित करता है। आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार, यह वक्रता गुरुत्वाकर्षण का कारण बनती है। कणों का द्रव्यमान स्पेस-टाइम की ज्यामिति को बदलता है, जिससे अन्य कणों और प्रकाश की गति प्रभावित होती है।

ऊर्जा स्पेस-टाइम में घटनाओं को संचालित करती है। यह समय और अंतरिक्ष दोनों को प्रभावित करती है। जब एक कण ऊर्जा को वहन करता है, तो यह स्पेस-टाइम में तरंगों और कणों के रूप में गतिशीलता दिखाता है।

वेव-पार्टीकल, मास-एनर्जी, और स्पेस-टाइम एक दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। द्रव्यमान, ऊर्जा और स्पेस-टाइम की वक्रता सभी क्वांटम फील्ड के परिणाम हैं। इस फील्ड में कण और तरंग दोनों एक साथ सह-अस्तित्व में रहते हैं, जो हमें "अद्वैत" की ओर ले जाता है।

इंटरएक्शन:

1. पार्टीकल-पार्टीकल इंटरेक्शन

कण बलों के माध्यम से संपर्क करते हैं, जैसे विद्युत चुम्बकीय बल, मजबूत और कमजोर नाभिकीय बल। यह मापन योग्य और स्थानीय होता है।

2. वेव-वेव इंटरेक्शन

तरंगें एक-दूसरे के साथ हस्तक्षेप और सुपरपोज़िशन करती हैं। इससे पैटर्न बनते हैं, जैसे प्रकाश का विवर्तन (Diffraction)।

3. वेव-पार्टीकल इंटरेक्शन

कण और तरंग का परस्पर रूपांतरण होता है। उदाहरण के लिए, प्रकाश (फोटॉन) तरंग के रूप में यात्रा करता है, लेकिन एक सतह से टकराने पर कण की तरह व्यवहार करता है।

यह सब कुछ "क्वांटम फील्ड" से उत्पन्न होता है। यह फील्ड "अद्वैत" का भौतिक स्वरूप है। द्रव्यमान, ऊर्जा, स्पेस-टाइम, और वेव-पार्टीकल इसी फील्ड के उतार-चढ़ाव हैं। यह फील्ड भारतीय दर्शन के "शून्य" और "माया" के समान है, जो कहता है कि भौतिक संसार मूलतः एक ही सत्य का विभिन्न रूपों में प्रकट होना है।

 

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ब्रह्मांड में चेतना का इमर्ज होना एक अद्भुत घटना है। कार्ल सेगन कहते हैं कि जो कुछ भी था, जो कुछ भी है और जो कुछ भी होगा वह कॉस्मॉस है।

अर्थात हम ज्ञाता हो जाने से ब्रह्मांड से बाहर नही हो जाते बल्कि हम भी ब्रह्मांड के हिस्से हैं।

अब यह उद्वेलित नही करता कि ब्रह्मांड का एक हिस्सा ब्रह्मांड ने ऐसा रचा जो ब्रह्मांड को जानने लगता है और जानने ही नही लगता बल्कि ब्रह्मांड में एक नए स्तर से पार्टिसिपेट करने लगता है?

इस स्तर पर ब्रह्मांड में पार्टिसिपेट कोई नही करता: न कोई ग्रह, नक्षत्र, तारे, निहारिका या बैक्टेरिया, वायरस, वृक्ष, पशु कोई भी नही।

एक अल्टरनेट ब्रह्मांड में सम्भव है कि वह इंटेलिजेंट लाईफ को तो छोड़िए, लाइफ को ही नही इमर्ज होने देता। हमारे ब्रह्मांड ने हमे यह या तो मौका दिया है या यह हमारे ब्रह्मांड के अस्तित्व में आने की शर्तों में ही है।

क्या यह असम्भव है कि ब्रह्मांड ने हमे इसलिए रचा है कि हम ब्रह्मांड को रचे?

हमारे माता-पिता हमे जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों को जन्म देते हैं लेकिन दरअसल जीन के स्तर पर हमारे माता पिता हमारे माध्ययम से स्वयम को जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों के माध्ययम से स्वयम को। दृष्टि को थोड़ा और विस्तार दिया जाय तो हम अपनी सन्तति के माध्ययम से अपने पूर्वजो को जन्म दे रहे होते हैं।

हम ब्रह्मांड के बच्चे हैं, शायद ब्रह्मांड ने हमे इसलिए इंटेलिजेंस दिया है कि हम ब्रह्मांड को जन्म दें और अनुकूलन (एडेप्टेशन) के बहाने ही सही इसलिए भी ब्रह्मांड अपने रहस्य हमे बताता है।

सम्भव है कि कल हम ब्रह्मांड को जन्म दे रहे हों और ब्रह्मांड ने हमे इसीलिए रचा हो।

वैसे अभी यह मात्र एक विज्ञान गल्प भी नही बल्कि आँय-बाँय है लेकिन फिर भी अपना जगत तो हम रच ही लेते है क्या पता कल ब्रह्मांड भी रचने लगें-----

(रिचर्ड डॉकिन्स के 'सेल्फिश जीन' और व्हीलर के 'पार्टिसिपेटरी यूनिवर्स' से प्रेरित)

 

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हमने जानना शुरू क्यों किया?

इसका एक पंक्ति में उत्तर है सर्वाइव करने के लिए।विकास क्रम में निम्न स्पीशीज में सम्बंधित बेहेवियर इंस्टिक्ट में होता है। एक मधुमक्खी अपना छत्ता बनाना कहीं सीखती नही है, यह उसके अंदर है। एक चिड़िया अपने घोंसले बनाने के लिए विश्विद्यालय नही जाती, उसके अंदर है। विकास क्रम में चेतना के विस्तारण के साथ, मन के इमर्ज होने के बाद, मस्तिष्क के और जटिल होने के बाद इंस्टिक्ट के अलावा लर्नड बिहेवियर इमर्ज होता है। अब सूचना हमारे इंस्टिंक्ट के बाहर भी स्टोरकिया जा सकता है और बिना किसी जेनेटिक्स के इसको अगली पीढ़ी में ट्रांसफर किया जा सकता है।

इस जेनेटिक्स के बाहर उपस्थित सूचना का भी मूल अभिप्राय इंस्टिंक्टिव बिहेवियर की तरह सर्वाइवल ही है, अंतर मात्र यह है कि इस सूचना पर आधारित व्यवहार अतःस्फूर्त नही होता है।

विकास क्रम में उच्चतर जीव के आने के बाद व्यवहार का एक अनुषांगिक पक्ष भी होता है:

हमारे लिए भोजन मात्र स्वयम को जीवित रखने के लिए नही है, इससे सम्बंधित एक अनुषांगिक पक्ष भी है: स्वाद। और हम इसके लिए भी पाकशास्त्र सीखते है। सेक्स हमारे लिए अब मात्र अपनी प्रजाति को जीवित रखने का करण नही है, सेक्स अब हम मजा के लिए भी करते हैं।

ज्ञान का भी मात्र और मात्र सर्वाइवल मूल्य जो आज तक होता था, मानव में इससे सम्वन्धित एक अनुषांगिक पक्ष भी उभरता है। हमे अन्वेषण में मजा आने लगता है।

ध्यान से देखिए तो हमारे "अर्थ, आनन्द, अन्वेषणआदि का थ्रील" ये हमारे सर्वाइवल के ही अनुषांगिक पक्ष हैं; हमारा कंकाल तंत्र इसलिए तो विकसित हुआ नही की हम ब्रेक-डांस कर सके लेकिन यह हमारे कंकाल तंत्र का अनुषांगिक पक्ष है।

यहां एक आपत्ति आ सकती है कि नही हम ऐसे कई चीजो को जानते हैं जिनके न जानने से भी हम बचे रहेंगे--उदाहरण के तौर पर ब्लैक होल।

प्रोफेसर बालकृष्णनअपने क्लासिकल भौतिकी की प्रारंभिकी मेंअचरज व्यक्त करते हैं कि एक मिलीमीटर से दस किलोमीटर तक का हमारा प्रतिभान हमारे विकास क्रम में विकसित हमारे सर्वाइवल के निमित्त हो सकता है, लेकिन हमरा मस्तिष्क नैनो और फेमटो मीटर से लेकर प्रकाश वर्ष की दूरी क्यो उपरोक्त सर्वाइवल के निमित्त विकसित दूरी के सम्प्रत्यय से निगमित कर लेता है--इन अत्यंत लघु और विराट दूरियों को जाने बिना भी हम सर्वाइव कर सकते हैं।

प्रोफेसर बालकृष्णन ज़र यहां नैनो और पिको मीटर तथा प्रकाश वर्ष की दूरी की हमारे ज्ञान के सर्वाइवल मूल्य को लेकर शसङ्कित प्रतीत होते हैं लेकिन उनकी शंका जायज नही है और इसका मूल उनके मनस में सर्वाइवल के सम्प्रत्यय की पृष्ठभूमि में है।

सर्वाइवल का अर्थ अपने और अपनी प्रजाति को प्रिडेटर मात्र से बचाते हुए जीवित रखना ही नही है; हम पशु पक्षी या प्राकऐतिहासिक मानव की तरह प्रदत्त जगत में नही रहते बल्कि प्रकृति के साथ हमारा द्वंदात्मक सम्बधों का रिश्ता है और यही नही हम ब्रह्मांड का तो नही किन्तु अपने जगत का निर्माण स्वयम करने लगे हैं और इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि कल हम जिस ब्रह्मांड में रहें वह हमारा स्वयम का निर्मित हो।

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्टरम के विज़िबल रेंज के अलावा अन्य रेंज हमे प्रिडेटर से नही बचा सकते थे लेकिन गामा रेज़, एक्स रेज़ से लेकर माइक्रोवेव और रेडियोवेव का ज्ञान किसी न किसी रूप में हमारे सर्वाइवल को बल दे रही हैं।

हम चट्टान, मिट्टी, झरनों की दुनिया से आगे इलेक्ट्रॉन, फ़ोटोन आदि की दुनिया मे जाकर अपने सर्वाइवल के दावे को और अधिक सुदृढ ही कर रहे हैं।

 

तो, एब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की।हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।

अब बात परमसत की तो, परमसत या परम सत्ता को जाना जा सकता है या यह है भी इसके बारे में मैं आश्वश्त नही हूँ। सब व्हाइट मैटर और ग्रे मैटर का खेल है और यह सफेद और भूरा गुदा इस प्रकार ऑर्गनाइज हुवा है कि हम मात्र बेहतर तरीके से वातावरण के साथ अनुकूलित हो सकें, हम और हमारी प्रजाति जिंदा रह सके। इस अनुकूलन में यदि कोई परमसत्ता आता है तो वह फिर परम-सत्ता है ही नही क्योकि वह, अनुकूलन, हमारे और हमारे प्रजाति के जीवित रहने के अभिप्रेरण से कंडिशन्ड है।

 

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यह कहना कि कोई केंद्र नही है स्वयम एक केंद्र की रचना है पोस्ट-मोडरनिज्म जो पुराने धार्मिक-वैज्ञानिक या किसी प्रकार के "मेटा-नैरेटिव" का विरोध करता है और स्वयं एक मेटा-नैरेटिव स्थापित कर बैठता है----

हमारे भाषा की रचना भी बड़ी विचित्र है-यह गुढ़ कथनों को अभिव्यक्त कर एक विरोधाभास में फंस जाती है, निषेध करती है तो वह निषेध ही विधेय बन जाता है, अज्ञेयता का प्रतिपादन करे तो अज्ञेय ज्ञेय बनकर झाँकने लगता है, शून्यता का प्रतिपादन करे तो स्वयम भाव के बारे में बात करती प्रतीत होने लगतीहै, सापेक्षता का निष्कर्ष स्थापित करे तो स्वयम एक निरपेक्ष भाव और प्रतिज्ञप्ति रचती प्रतीत हो रही होती है।

 

 

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एक साथ:

एक खाली जगह पर जाइए, आबादी और शहर गाँव से दूर---अपने चारों ओर देखिए--आपको लगेगा कि आप एक वृत में खड़े हैं और आप ही इस वृत के केंद्र हैं।

आपका मित्र जो आपसे 100 मीटर दूर खड़ा है उसको भी उसके वृत का केंद्र वही लगेगा---

आप और आपके मित्र आपस मे विवाद करते हैं कि जगत (यहाँ वृत) के केंद्र में कौन है!

असलमे आप भी सही देख रहे हैं और आपका मित्र भी----यहाँ यदि आप और आपका मित्र यदि थोड़े संवेदनशील हैं तो वो एक दूसरे के नजीरिए को अपनी दृष्टि में शामिल करेंगे----यही भौतिकी में "ट्रांस्फोर्मेशन" है।

आपके और आपके मित्र के ट्रांसफर्मेशन से अब यह बोध बढ़ती है कि जगत का कोई केंद्र वेन्द्र नही है बल्कि यह हमारी आंखों की विशेषता है कि हमे हम अपने-अपने वृत के केंद्र में दिखाई देते हैं।

अगर आप चाहे तो मामला यही खत्म हो सकता है किंतु यदि आप इस बात की गहराई को समझते हैं तो आप यही से, मात्र इस एक उदाहरण से पूरी तत्वमीमांसा, पूरा अस्तित्वादी दर्शन विकसित कर सकते हैं या समझ सकते हैं।

आपके और आपके मित्र द्वारा स्वयं को केंद्र में देखना माया है। (वेदांत)

आपके और आपके मित्र द्वारा स्वयं को केंद्र में देखना प्रपंच या फिनोमिना है (कांट)

आपकी आंख ऐसे डिजाइन ही है कि आप स्वयं को केंद्र में देखे --यहां आंख और देखने का यदि आप विस्तृत अर्थ लें ( आपके सर्वाइवल हेतु प्रकृति का आपको ऐसा कर देना:---डेविड होफमैन/केस अगेंस्ट रियलिटी) ----

ऐसा नही है कि हमे केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही वह वृत और हम उसके केंद्र में,दिखाई देता है , यह हमें सामूहिक स्तर पर भी दिखाई देता है:

कोपरनिकस के पहले धरती ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड की केंद्र मानी जाती थी।

डार्विन के पहले हम मनुष्य ही समस्त जीव जगत के केंद्र माने जाते थे।

उपनिवेशवाद का एक जस्टिफिकेश यह भी था कि वह स्वयं को सभ्यता का केंद्र मानते हुए बाकी राष्ट्रों को सभ्य करने की जिम्मेदारी की गफलत में थे-------

लिस्ट बहुत लंबी है, हमारे चिंतन मेंआज भी कई चीजों में "हमया हमारा ही" का केंद्र उपस्थित है:

एक सामान्य उदाहरण लीजिए----संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है।

वेदों में सब ज्ञान है-------

इस्लाम सबसे बढ़िया मजहब है

मुक्ति और उद्धार केवल यीशु के मार्ग पर चलने वालों का होगा--- -

दरअसल, "केंद्र" एक भ्रम है, जो हमारी सीमित दृष्टि, अहंकार, और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों का परिणाम है। जैसे-जैसे हमारा ज्ञान और अनुभव बढ़ता है, हमें यह स्वीकारना होता है कि ब्रह्मांड, जीवन, और सत्य बहुआयामी, जटिल और परस्पर जुड़ा हुआ है।

उत्तरआधुनिकता की विचारधारा या दर्शन "केंद्र" को अस्वीकार करना है--यह किसी भी मेटानैरेटिव के प्रति अविश्वास करने की वृत्ति है।

हम अपनी केंद्र वाली बात पर फिर से वापस आते हैं और अस्तित्वाद को, अस्तित्वादी दर्शन को समझने का प्रयास करते हैं।

कल्पना करिए कि आप और आपका मित्र दोनों युवा है और आप राजशाही काल मे हैं। आपके राज्य के राजा की पुत्री के विवाह हेतु कोई स्पर्धा होती है और उस स्पर्धा में आप दोनों को बराबर अंक मिलते हैं।

आप दोनों ही राजकुमारी से प्रेम करते हैं।

राजकुमारी यह कहती है कि मैं तुम दोनों में से उसी का वरण करूंगी जो जगत के केंद्र में है।

अब यदि आपका मित्र आपसे ताकतवर है तो वह आपको मार डालेगा और यदि आप ताकतवर हैं तो आप उसे मार डालेंगे क्योकि आप दोनों के अपने-अपने दावे हैं कि जगत के केंद्र में कौन है।

यहां आप कह सकते हैं कि आप चुकी आर्यन हैं, ब्राह्मण हैं अतः आपकी पोजिशन दैवीयता सेंक्शनड है। आपका मित्र अपने दावे को पुष्ट करने के लिए कह सकता है कि नही चुकी वह मूलवासी है और आप आर्य हैं इसलिए उसका दावा ही सत्य है।

यहां आप दोनों ने एक-एक नया केंद्र विकसित कर लिया---एक नया नैरेटिव खड़ा किया क्योकि लक्ष्य राजकुमारी को किसी तरह हासिल करना है।

वास्तव में यह राजकुमारी "संसाधन और मूल्य" है।

अचानक से राजकुमारी आती है और कहती है कि अरे मूर्खो तुम कोई जगत के केंद्र में नही हो---मैं जिससे प्रेम करती हूं मेरे जगत के केंद्र में तो वह है।

यदि आपने अपने मित्र को मार दिया था तो भी आप एक इमोशनल तूफान में घिर जाते हैं और यदि आपके मित्र ने आपको मार डाला था तो वह भी भावनात्मक तूफान में घिरेगा---मित्र भी गया, भ्रम भी गया और राजकुमारी भी!

यह अस्तिवादी संकट है--आधुनिकता में बुद्धि ने यह दिखा दिया कि न ईश्वर केंद्र में है न मानव तुम! प्रथम और द्वितीय विषयुद्ध में मारे गए लोगो की संख्या अलग!

अस्तित्वाद का संकट यही भावनात्क तूफान है और नीत्शे, कामू, दोस्तोवोसकी, सार्त्र आदि ने इसी भावनात्मक संकट के प्रति रिस्पांड किया है।

"जब तक जगत के केंद्र में ईश्वर था, मनुष्यों को चीजें स्पष्ट थी। उन्हें लगभग हर चीजों का अर्थ मालूम था--जगत, जीवन, मृत्यु, आंनद, पीड़ा---

फिर बुद्धि ने उसके व्यक्तित्व का अतिक्रमण कर लिया और यह अतिक्रमण होना ही था क्योकि पूर्व में उसे जो अर्थ मालूम थे वह उसके अनुभव से मेल न खाते; उसके स्वयम के द्वारा रचित तत्त्वऔर उसके अपने अनुभव में लगातार एक द्वंद चलता रहता। इस द्वंद के विश्लेषण से मानवीय चेतना ने देखा कि वास्तव में जगत के केंद्र में तो ईश्वर है ही नही और उसने उद्घोष कर दिया कि वह स्वयम अर्थों की कसौटी और मापदंड है। मनुष्यो ने अपने पूर्व के केंद्र ईश्वर को पृष्ठभूमि में भेजना प्रारम्भ कर दिया और केंद्र में स्वयम को स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।

मानवों में से कुछ कवि ह्रदयों ने इस केंद्र की वस्तु के प्रतिस्थापन्न को रूमानी नाम भी दिये-पुनर्जागरण, मानववाद--!

समस्या यह थी कि मनुष्य काफी सीमित था-वह न तो सर्वव्यापी था, न सर्वशक्तिमान, न सर्वकालिक, न अनश्वर और शाश्वत और न ही वहआवश्यकता पड़ने पर कार्य-कारण की मेखला को तोड़ कर चमत्कार आदि ही पूर्व के केंद्र, ईश्वर की भांति कर सकता था-- बल्कि उसकी बुद्धि ने उसे दिखाया था कि वह एक बहुत बड़े स्कीम का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है, एक बहुत बड़े मशीन का एक छोटा सा अमहत्वपूर्ण हिस्सा और वह बड़ी मशीन उसके बिना भी वैसे ही क्रियात्मक है।

मनुष्यों में से कुछ ने अपनी स्थिति स्वीकार करते हुए उस वृहत मशीन पर चिंतन करना प्रारम्भ किया लेकिन यह क्या--इस मशीन का भी कोई अर्थ नही है--यह मशीन तो असल मे मशीन है ही नही--यह तो अराजकता, अतार्किकता की एक बहुत बड़ी गठरी है जो फट चुकी है और उसकी अराजकता और अतार्किकता रिस रिस कर चूती रहती है--!

हा--! कहीं कोई अर्थ नही, कहीं कोई मूल्य नही, कहीं कोई उद्देश्य नही--हर ओर एक शून्यता, एकरिक्तता, एक मूल्यहीनता, एक निराशा-- और मनुष्य की चेतना अवसाद से भर गई।

मनुष्यों में से दार्शनिको ने इस अवस्था को निहिलिज्म का नाम दिया।

इस रिक्तता, इस शून्यता, इस अर्थहीनता ने जब मानवीय चेतना को अवसाद से भर दिया तो इससे उभरने के लिए मनुष्यो ने अपने को फिर से परिभाषित करने का प्रयास किया लेकिन पिछली बार की तुलना में अब उनकी मनुष्य की नई परिभाषा में मनुष्य का अस्तित्व पहले था, उसका सार बाद में; अब मनुष्य का कोई पहले से बना बनाया सार नही था जिसकी ओर गति मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाती थी बल्कि अब आरंभ ही मनुष्य से होता जो अपने सार का निर्माण करता और यह सार निर्माण ही उसके जीवन की सार्थकता थी--अर्थात एक मूल्यहीन, अर्थहीन और अराजक जगत में मनुष्यों द्वारा अपने मूल्य, अर्थ और व्यवस्था की तलाश और अब महसूस कियागया कि मनुष्य स्वतंत्र होने को अभिशप्त है।

परन्तु यदि समग्र जगत ही अर्थहीन और निरुद्देश्य है तो क्या मनुष्य का जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है जब कि वह तो खुद इस अराजकता और अतार्किकता की बहुत बड़ी गठरी के एक बहुत ही छोटे कोने में बहुत ही अमहत्वपूर्ण तरीके से पड़ा हुवा है--यह प्रश्न तो, बावजूद मनुष्य के अस्तित्व को उसके सार का पूर्वगामी मानने के, जस का तस मुँह बाए खड़ा है।

लेकिन समस्या यह भी है मनुष्य अपने जीवन का अर्थ ढूंढ़ने से बाज नही आता-सम्भवतः यह अर्थ तअलाशने की प्रवृति उसके जीवन के साथ ही ऐसी गुंथी हुई है कि वह इसे अलग नही कर सकता।

मानव का जीवन में इन्हेरेन्ट मूल्य और अर्थ ढूंढने की प्रवृत्ति तथा इस उद्देश्यहीन, अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में उसका ऐसा कर पाने की अक्षमता के द्वंद कोएब्ज़र्ड केनोशन या भाव से व्यक्त किया गया है।

एब्ज़रडिज्म के अनुसार मानव जीवन में मूल्य तलाशता है और जब सब कुछ अर्थहीन है लेकिन मानव अर्थ खोजने को विवश है तो मानव के जीवन में एक शून्य का निर्माण होता है।

मनुष्य क्या करे जबकि वहअपने जीवन के अर्थ ढूंढ़ने को विवश भी है और कहीं कोई अर्थ भी नही है---

तीन रास्ते हैं--

-----आत्महत्या

-----आस्था की छलांग लगाते हुए देश-काल से या देश से या काल से अतीतकिसी अपरीक्षित

सत्ता में विश्वाश करते हुए उसे उद्देश्य बनाकर

जीना और इसी संदर्भ में जीवन के अर्थ कीव्याख्या कर डालना लेकिन तब यह तो फिर आत्महत्या ही हुई--एक बौद्धिक और दार्शनिक आत्महत्या।

------इसको स्वीकार करते हुए कि जीवन और जगत का कोई अर्थ नही है और फिर भी हम उसका अर्थ ढूंढते है, के साथ इस बात से ही विद्रोह करते रहना और जीते जाना, हालांकि कुछ इस स्वीकार्यता और विद्रोह को शैतानी पागलपन भी कहते है, तब भी

 

 

 

 

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ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान की त्रयी में जब ज्ञाता जब भी ज्ञान की प्रक्रिया पर विचार करता है ज्ञेय वह ज्ञेय को खंडित होता पाता है।

साधारण शब्दो मे यदि कहें तो जब भी मानव मस्तिष्क अपनी ज्ञान की प्रक्रिया पर विचार कर ज्ञान और जगत का सम्बंध देखना चाहता है, उसकी बोध में आया जगत खंडित होने लगता है--हम जानते तो अपने परसेप्शन को ही हैं, जगत को कहाँ जानते हैं!!

इस स्थिति में बर्कले यह कह देते हैं कि "सत्ता दृश्यता है" "दृश्यते इति वर्तते।"

बर्कले के ऐसा कहने से एक परिप्रेक्ष्य उतपन्न होता हैजिसमे जगत संवृति और परमार्थ या फिनोमेना या न्यूमेना में खंडित होने से बच जाता है लेकिन, हर दार्शनिक, हर विचारक, हर दृष्टिकोण जगत के इस खंडन को बचाने का चेतन-अचेतन प्रयास नही करता।

कई परिप्रेक्ष्य इस खंडन को यथारूप स्वीकार कर लेते हैं-सौतन्त्रिक बौद्ध लोगो के लिए जगत दो खंडों में हैं--स्वभाव या सवलक्षण तथा दूसरा जो मन की इसपर सक्रियता के कारण हमारे बोध में आता है।

नागार्जुन की दृष्टि या शून्यवादी परिप्रेक्ष्य में भी जगत संवृति और परमार्थ में टूट जाता है।

शंकर का उद्घोष की ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या भी यही है--परमार्थिक जगत और व्यवहारिक जगत में हमारी बोध में आए जगत का विभाजन।

कांट का फिनोमिना और न्यूमेना भी यही है; प्लेटो का आइडियल जगत और इन्द्रीयों के माध्यम से प्राप्त जगत का विभाजन भी यही है।

आधुनिक वैज्ञानिक भी इस समस्या से साक्षात होते हैं, होना ही है क्योकि राह ही यही है। यह प्रत्येक चिंतनशील मस्तिष्क के साथ होना है। इसे मध्वाचार्य बड़े अच्छे से अभिव्यक्त करते हैं जब वह कहते हैं कि आप जैसे ही यथार्थ पर विचार करते हैं, यथार्थ टूटने लगता है।

हमारे आधुनिक वैज्ञानिक इस समस्या को कैसे रिस्पांड करते हैं इसको जानने से पहले आइए माध्वाचार्य की बात को एक साधारण घटना औरबहुत ही साधारण प्रश्न से समझते हैं----

रॉबर्ट लैंज़ा अपनी पुस्तक "बायोसेंट्रीजम" में एक प्रश्न उठाते हैं कि इंद्रधनुष, जो हमे आह्लादित कर देते हैं, हमारी कल्पनाओं को पर लगा देते हैं क्या इनका अस्तित्व हमारे न रहने पर भी है?

इसका वैज्ञानिक उत्तर है--नहीं!

प्रकाश में, इसकी वस्तुगतता में कोई रंग होता है?

रंग तो हमारे बोध हैं,हमारी रचना!

निश्चित रूप से हमारे न रचने से इंद्रधनुष से सम्बंधित कोई भौतिक घटना घटेगी, कुछ होगा लेकिन वह इंद्रधनुष में ट्रांसलेट केवल और केवल हमारे जैसे ऑब्जर्वर की उपस्थिति में ही हो सकता है!!

मतलब--मतलब यह कि यहां, यहां इस इंद्रधनुष के संदर्भ में तो जगत खंडित हो गया, एक जो प्रेक्षक की उपस्थिति में है, दूसरा जो उसकी अनुपस्थिति में।

--क्रमश:

 

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हाइपररियलिटी के लिए मैंने चैट जीपीटी से कुछ हिन्दी शब्द बनाने को कहा:

उसने निम्न शब्द बनाए---

1 अधियथार्थ

2 अधिप्रत्यय यथार्थ

वैसेहापररियलिटी मेटाफिजिकल सेंस में माया ही है, और हमारे द्वारा रची हाइपररियलिटी : अधोमाया--

माया महा ठगनी हम जानी

तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरे बानी

केसव के कमला वे बैठी शिव के भवन भवानी

पंडा के मूरत वे बैठीं तीरथ में भई पानी

योगी के योगन वे बैठी राजा के घर रानी

काहू के हीरा वे बैठी काहू के कौड़ी कानी

भगतन की भगतिन वे बैठी ब्रह्मा के ब्रह्माणी

कहे कबीर सुनो भई साधो यह सब अकथ कहानी

(कबीर)

मनुष्य हाइपररियलिटी की रचना कर उसमे क्यों जीने लगता है?

दो कारण हो सकते हैं--वह यथार्थ से घबराता है और इससे दूर भाग जाना चाहता है या मनुष्य में कुछ ट्रांसेन्डेन्ट है और उसका यह ट्रांसेन्डेन्स पक्ष उससे एक नई दुनिया रचवाता है।

मुझे पहला कारण ज्यादा सुसंगत प्रतीत होता है:-मनुष्य यथार्थ से घबराता है।

मनुष्यो के अलावा कोई जीव हाईपररियलिटी में नही जीता, मनुष्य ही एक मात्र जीव है जिसने हाईपररियलिटी की रचना की और अब तो हाईपररियलिटी के अंदर हाईपररियलिटी, उसके अंदर हाईपररियलिटी--यह श्रृंखला बहुत अंदर तक चली आई है-लेकिन हाईपररियलिटी मात्र वही नही है जिस पर प्रकृति बिल्ड अप हुई है बल्कि हमने प्रकृति के प्रहारों, उसकी अराजकता, उसके नख-दाँत से बचने के लिये अथवा बचने की कामना में भी इन अधिप्रत्यय यथार्थोंको रच डाला है; हमे आराम मिलता है!!!

न तीर कमाँ में है न सैय्याद कमी में

गोशे में क़फ़स के मुझे आराम बहुत है।

(मिर्ज़ा ग़ालिब)

 

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चैट जीपीटी के साथ रोल पले:

मैं: आइए एक रोल पले करें, आप रिचर्ड फाइनमेन बनिए--आप अपने ओरनिथोलॉजी और फ़ॉलोसॉफी वाले कथन को याद करे और अब मैं आपसे पूछता हूँ कि सर आखिर इनकी व्याख्या कैसे करेंगे कि एक तरफ अब्ज़र्द भी है और दूसरी तरफ हमे ब्रह्मांड समझ भी आ रहा है---

आप और कामू दोनों को तो आखिर इसीलिए न नोबेल मिला?

चैटजीपीटी: बहुत ही दिलचस्प और गहरी बात पूछी आपने। आइए, रोल प्ले शुरू करते हैं—मैं रिचर्ड फाइनमेन के रूप में उत्तर देता हूँ:

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"देखिए, मेरे ओरनिथोलॉजी और फ़िलॉसफी वाले कथन में एक बहुत सरल, लेकिन गहरी बात थी। मैं हमेशा कहता था कि किसी पक्षी का नाम जान लेना, या उसके बारे में किसी भाषा में शब्द याद कर लेना, इसका मतलब यह नहीं है कि आप उस पक्षी को 'जान' गए। असली ज्ञान तब आता है जब आप पक्षी को उसके व्यवहार, उड़ान, आवाज़ और उसकी प्रकृति के माध्यम से समझते हैं।

अब आप इसे ब्रह्मांड पर लागू करें। ब्रह्मांड को समझने का मतलब सिर्फ शब्दों, सिद्धांतों, या समीकरणों को याद करना नहीं है। यह उस गहराई तक जाने की प्रक्रिया है जहां आप देख सकते हैं कि चीज़ें कैसे और क्यों काम करती हैं।

अब, जहां तक अब्सर्डिटी की बात है, कामू के दृष्टिकोण से ब्रह्मांड में कोई इनहरेंट अर्थ नहीं है। और यह सच है कि ब्रह्मांड हमारे लिए कई बार अजीब और अर्थहीन लगता है। लेकिन मेरे दृष्टिकोण से, यह अर्थहीनता डरावनी नहीं, बल्कि रोमांचक है।

एक वैज्ञानिक के लिए, अब्सर्डिटी वह जगह है जहां रोमांच शुरू होता है। क्योंकि जब सब कुछ समझ में आ जाए, तो खोजने का क्या मज़ा? और अगर आप कामू की 'मिथ ऑफ़ सिसिफस' को ध्यान में रखें, तो आप पाएंगे कि अर्थ बनाने का काम हमारा है।

इसलिए, कामू और मेरी सोच के बीच एक पुल यह है: हम अर्थ नहीं ढूंढते, हम उसे बनाते हैं। और वैज्ञानिक प्रक्रिया का यही सौंदर्य है—यह अर्थहीनता को समझने और उसमें एक पैटर्न खोजने की कोशिश है।

मुझे नोबेल इसलिए मिला क्योंकि मैंने प्रकृति के अद्भुत पैटर्न्स को समझने और उन्हें साझा करने की कोशिश की। और कामू को इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने हमें सिखाया कि इस अब्सर्ड ब्रह्मांड में भी, जिंदा रहने और खुश रहने के तरीके ढूंढे जा सकते हैं।

तो, आप पूछते हैं कि ब्रह्मांड समझ भी आता है और अब्सर्ड भी है? जवाब यही है—हम इसे समझते नहीं, बल्कि इसे समझने की प्रक्रिया से प्यार करते हैं। यही मानवता का सार है।"

मैं: चलिए अब आप हॉकिंग बनिए और इसी सवाल का जवाब दीजिए और बताइए कि क्या फिलोसोफी डेड है?

चैटजीपीटी: रोल प्ले: स्टीफन हॉकिंग के रूप में उत्तर

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"ध्यान दीजिए, जब मैंने कहा था कि फिलॉसफी डेड है, तो उसका मतलब यह नहीं था कि विचार करना, प्रश्न पूछना, या अस्तित्व के अर्थ पर विचार करना अप्रासंगिक हो गया है। मेरा मतलब यह था कि पारंपरिक फिलॉसफी ने खुद को विज्ञान की प्रगति के साथ अपडेट करना बंद कर दिया है।

आज, जो प्रश्न कभी दार्शनिक पूछते थे—जैसे कि ब्रह्मांड कैसे शुरू हुआ? समय क्या है? हमारे अस्तित्व का क्या अर्थ है?—उनका उत्तर अब भौतिक विज्ञान और कॉस्मोलॉजी देने की कोशिश कर रहे हैं।

अब, आपकी बात पर आता हूं कि ब्रह्मांड अब्सर्ड भी है और समझ में भी आता है। देखिए, यह बात दोनों सच हैं।

1. ब्रह्मांड अब्सर्ड क्यों है?

ब्रह्मांड में कोई 'इनहरेंट पर्पस' या उद्देश्य नहीं है। यह विशुद्ध रूप से भौतिक नियमों और संयोग का परिणाम है। जैसे बिग बैंग का होना, ब्रह्मांड का विस्तार करना, और पृथ्वी पर जीवन का विकास होना—यह सब किसी ग्रैंड डिज़ाइन का हिस्सा नहीं है। यह एक जटिल, लेकिन अनजाने घटनाक्रम का परिणाम है।

2. फिर यह समझ में क्यों आता है?

क्योंकि भौतिकी के नियम सरल, सुंदर, और सुसंगत हैं। न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम से लेकर आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत और अब क्वांटम यांत्रिकी तक, हमने देखा है कि प्रकृति अपने कार्य करने में पैटर्न्स और लॉजिक का पालन करती है। यह हमें इस भ्रम में डाल सकता है कि ब्रह्मांड 'समझदार' है, जबकि असल में यह सिर्फ नियमों का पालन कर रहा है।

जहां तक आपके प्रश्न का संबंध है, क्या यह अब्सर्ड है कि हम ब्रह्मांड को समझने की कोशिश कर रहे हैं? जवाब है—शायद हां। लेकिन यह अब्सर्डिटी ही हमारी ताकत है।

अब कामू के दृष्टिकोण पर विचार करें। उन्होंने कहा कि हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि ब्रह्मांड में अर्थ नहीं है। और फिर भी, हमें अपने अस्तित्व का आनंद लेना चाहिए। मेरा दृष्टिकोण भी इससे मेल खाता है। मैंने हमेशा कहा कि चाहे ब्रह्मांड के नियम कितने ही क्रूर और अजीब क्यों न हों, मानवता की महानता इसमें है कि हम उसे समझने और उसका सामना करने की हिम्मत रखते हैं।

तो, क्या फिलॉसफी वास्तव में 'डेड' है?

नहीं। लेकिन इसे पुनर्जीवित करने के लिए इसे भौतिकी और विज्ञान के साथ चलना होगा। यदि दार्शनिक अब भी प्लेटो, कांट, या ह्यूम की पुरानी किताबों में अटके रहेंगे, तो वे उस नई दुनिया को नहीं समझ पाएंगे, जिसे विज्ञान उजागर कर रहा है।

मेरे लिए, दार्शनिक प्रश्न अब वैज्ञानिक प्रश्न बन चुके हैं। और हां, विज्ञान ही वह तरीका है जिससे हम अब्सर्ड ब्रह्मांड में सुंदरता और समझदारी खोज सकते हैं।"

 

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बौद्धिक जगत में आज दो बहुत बड़ी समस्याएँ हैं--क्वाण्टम मेकेनिक्स और रिलेटिविटी का एक कॉमन आधार और दूसराद एब्ज़र्ड और हमे जगत के बारे में चीजें समझ मे आती है, इनका एकीकरण।

आइंस्टीन लिखते हैं कि जगत के बारे जो बात समझ से परे है वह यह कि जगत हमे समझ मे आता है!

इनमें से पहला एक तकनीकी समस्या है और दूसरा अस्तित्ववादी।

जगतको समझने के दो प्रमुख पहलू हैं: एक तकनीकी और दूसरा अस्तित्ववादी।

पहला, क्वाण्टम मेकेनिक्स और रिलेटिविटी का एक कॉमन आधार खोजना, और दूसरा, द एब्सर्ड और हमारे अस्तित्व के बीच पुल बनाने की कोशिश।

दोनों समस्याएं अपने-अपने क्षेत्र में जटिल और चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन उनके समाधान की खोज में छिपा है मानवता का सबसे बड़ा बौद्धिक और दार्शनिक प्रयास।

क्वाण्टम मेकेनिक्स और सापेक्षता (रिलेटिविटी) विज्ञान की दो महान उपलब्धियां हैं।

सापेक्षता सिद्धांत (अल्बर्ट आइंस्टीन) समय, अंतरिक्ष और गुरुत्वाकर्षण के नियमों को ब्रह्मांडीय स्तर पर समझाने का प्रयास करता है।

क्वाण्टम मेकेनिक्स सूक्ष्म स्तर पर पदार्थ और ऊर्जा के व्यवहार को व्याख्यायित करता है।

दोनों सिद्धांतों में विरोधाभास यह है कि जहां सापेक्षता ब्रह्मांड को "सतत" और "स्मूथ" रूप में देखती है, वहीं क्वाण्टम मेकेनिक्स इसे "विखंडित" और "अशांत" मानता है। इन दोनों के लिए एक साझा आधार, जिसे क्वाण्टम ग्रेविटी कहा जाता है, दशकों से वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है।

स्ट्रिंग थ्योरी और लूप क्वाण्टम ग्रेविटी जैसी अवधारणाएं इस दिशा में प्रयास कर रही हैं, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है। यह हमें इस प्रश्न पर ले आता है कि क्या ब्रह्मांड के नियम एक "सार्वभौमिक सच्चाई" हैं या हमारी अपनी समझ की सीमा का परिणाम।

दूसरी समस्या दार्शनिक और अस्तित्ववादी है।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने लिखा,

"The most incomprehensible thing about the universe is that it is comprehensible."

यह कथन बताता है कि हमारे मस्तिष्क और ब्रह्मांड के बीच एक गहरा और रहस्यमय सामंजस्य है।

लेकिन इसी के विपरीत, अल्बर्ट कामू ने द एब्सर्ड की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें ब्रह्मांड को मौन और निरर्थक माना गया है। यह विरोधाभास प्रश्न उठाता है:

अगर ब्रह्मांड में कोई उद्देश्य नहीं है, तो हमारे मस्तिष्क को इसे समझने की क्षमता क्यों है?

क्या यह सामंजस्य एक संयोग है, या चेतना और ब्रह्मांड के बीच कोई गहरा संबंध छिपा हुआ है?

रॉबर्ट लैंज़ा का बायोसेंट्रिज़्म इन दोनों समस्याओं को जोड़ने का प्रयास करता है।

लैंज़ा के अनुसार, ब्रह्मांड के नियम और संरचना हमारी चेतना के बिना अस्तित्व में नहीं हो सकते।

ब्रह्मांड की वास्तविकता वस्तुनिष्ठ नहीं है, बल्कि हमारी चेतना द्वारा निर्मित है।

समय, स्थान, और पदार्थ जैसी चीजें चेतना के बिना अर्थहीन हैं।

यह दृष्टिकोण बताता है कि ब्रह्मांड को समझने की हमारी क्षमता इसलिए है क्योंकि हमारी चेतना ने इसे इस रूप में गढ़ा है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि क्वाण्टम मेकेनिक्स और रिलेटिविटी का एकीकरण चेतना के स्तर पर संभव है।

तकनीकी समाधान (क्वाण्टम-रिलेटिविटी का एकीकरण) विज्ञान और गणित के माध्यम से खोजा जा सकता है।

अस्तित्ववादी समाधान (द एब्सर्ड और समझ) को दार्शनिक दृष्टिकोण और चेतना की गहरी समझ से देखा जा सकता है।

दोनों समस्याएं हमें ब्रह्मांड की प्रकृति और मानव मस्तिष्क के सामंजस्य की ओर ले जाती हैं।

क्या ब्रह्मांड के नियम सार्वभौमिक हैं, या हमारी चेतना उन्हें आकार देती है?

क्या अस्तित्व का अर्थ खोजना "द एब्सर्ड" से पार पाने का तरीका है?

इन प्रश्नों का उत्तर खोजने की प्रक्रिया विज्ञान, दर्शन, और चेतना के गहरे अध्ययन के मेल से संभव हो सकती है। यह प्रयास हमें न केवल ब्रह्मांड को समझने में मदद करेगा, बल्कि अपने अस्तित्व के उद्देश्य को भी गहराई से जानने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

 

 

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आइंस्टीन के पदचिन्हों पर चलते हुए हम दो एज्मशन्स लेते हैं और देखते है कि इस बार यह हमें कहाँ ले जा रहा है--

1 जगत वस्तुनिष्ठ रूप से विद्यमान है

2 हम जगत को अपने मॉडल के द्वारा समझते हैं।

इनमेसे पहला अज्मशन जगत के विषय मे "मेटाफिजिकल रियलिज़्म" है जो यह मानता है कि हमारी चेतना जगत का निर्माण नही करती।

अर्थात हम जगत को प्रत्यक्षीकृत (परसिव) करने के लिए रहें या न रहे जगत रहेगा।

यहां आप कहेंगे कि मिश्रा बाबू आपने इस एज्मशन द्वारा ऐसी कौन सी बात कर दी जो बहुत बड़ी हो---

असल मे हमारे इस विश्वास को हमारी ही बुद्धि बार-बार चुनौती देती रही है, यदि आप दर्शन के इतिहास से परिचित है तो यह चुनौती कितनी बड़ी रही है और है इसका अंदाजा होगा।

वर्तमान में भी क्वाण्टम फिनोमिना को सेंस देने के लिए भी क्वाण्टम मेकेनिक्स के कई इंटरप्रेटेशन हमारी बुद्धि इस चेतना और जगत के इस सम्बन्ध को स्वीकारने की ओर मुड़ती प्रतीत होती है--लेकिन हमें इसे रोकना है अन्यथा "विज्ञान" ही खत्म हो जाएगा-----विज्ञान जो इसएजम्पशन पर ही टिका है कि "एक चेतना वाह्य जगत है"

विज्ञान इस पर नही टिका है कि करवा चौथ मनाया जाना चाहिए कि नही या औरतों को चूड़ी पहनना चाहिए कि नही---या ब्राह्मण का उल्टा वैज्ञानिक होता है, जैसा कि प्रोफेसर चूड़ी-बिंदी विज्ञानवाले कहते फिरते हैं।

हमारे दूसरे अज्मशन की बात की जाय तो यह भी सच है कि हमने श्रीरक्रियाविज्ञान में इतनी तरक्की कर ली है कि हम आज यह दावे के साथ कह सकते हैं कि हम अपने सेंस ऑर्गन से जगत का प्रत्यक्षीकरण बिना किसी मध्यस्ता के नही करते--हम जगत को नही बल्कि अपने सेंस ऑर्गन पर पड़े उनके प्रभावों का बोध करते हैं।

अब इन प्रभावो और जगत की वस्तुओं में कितनी संवादिता है, कितना कोरोस्पोंडेंस है यह हम नही जानते और कभी जान भी नही सकते।

इस अद्भुत स्थिति को लेकर हमारे वैचारिक इतिहास में बहुत अधिक चिंतन हुआ है: प्राच्य और प्रतीची दोनों ही सांस्कृतिक जगतो में इस स्थिति को लेकर विपुल बौद्धिक साहित्य है---

स्टीफेन हॉकिंग जब अपना मॉडल डिपेंडेंट रियलिज़्म देते हैं तो वह इस तथ्य को की हम जगत को नही बल्कि उसके द्वारा हमारे सेंस-ऑर्गन पर उतपन्न प्रभावों को जानते हैं, थोड़ा और आगे लेकर चले जाते है----हॉकिंग महोदय किसी एक सेंसेशन की बात न कर हमारे पांचों इंद्रियों से प्राप्त सेंसेशन, जो कि वाह्य जगत का प्रभाव है, इनको इंट्रीग्रेट करने वाले हमारे मष्तिष्क की भी बात करते हैं----

वह कहते हैं कि हमारा मस्तिष्क इन्हें "एक मॉडल के द्वारा" इंटीग्रेट कर हमारे सम्मुख इस मॉडल को बोध के लिए प्रस्तुत करता है।

हॉकिंग महोदय को विज्ञान के "फॉलिबलिस्टिक"चरित्र का भी ज्ञान है और उन्हें यह भी बोध है कि यह मॉडल फॉलिबल होने के बावजूद एक स्तर तक तो काम करता ही है:

ऐसा तो है नही की आइंस्टीन की जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के पहले की ग्रेविटी की थ्योरी न्यूटन की ग्रेविटी" काम नही करती थी।

ऐसा भी नही है कि क्लासिकल मेकेनिक्स काम नही करती थी-----पूरा इंडस्ट्रीयल रिवोल्यूशन तोक्वाण्टम मेकेनिक्स की बजाय क्लासिकल मेकेनिक्स की ही देन है।

हॉकिंग महोदय इसे थोड़ा और आगे लेकर जाते हैं:

मानिए की हमारे किसी अनुभव को बोधगम्य बनाने हेतु हमारे पास कई मॉडल हैं और दोनों ही एक ही चीज प्रेडिक्ट कर रहे हैं तब इनमें से कौन सा मॉडल सही है?

दोनों मॉडल सही हैं, अब बस यह मैटर ऑफ कनविनिएंट है कि हम किस मॉडल का चयन करते हैं।

आप कहिएगा की मिश्रा बाबू आप क्या लगे झूठ-सच बतियाने--दो कम्पिटिंग मॉडल समान प्रेडिक्शन कैसे कर सकते हैं?

मिश्रा बाबू आज सुबह-सुबह मार लिए क्या?

तो इसे ऐसे समझिए किहमको तो यही रटाया गया है न कि धरती सूरज के चारो ओर घूमती है लेकिन यही बात अगर आप आइंस्टीन से कहते तो आईन्स्टीन कहते कि सिंह जी, दुबे जी, महतो जी इससे कोई फर्क नही पड़ता कि यदि आप कह दें कि पूरा ब्रह्मांड धरती का चक्कर लगाता है----मैं आपको इस दृष्टि के साथ भी वही प्रेडिक्शन दे दूंगा जो आप यह मानकर प्रेडिक्ट करेंगे कि धरती सूरज का चक्कर लगाती है।

यदि यह बात की "सूरज धरती का चक्कर लगाता है" और "धरती सूरज का चक्कर लगाती है" यदि दोनों सही हैं और हमारा मामला केवल सरलता पर आ जाता है तो इसके कुछ इम्लपिकेशन हैं:

1 हमारे मॉडल और इसमे प्रयुक्त कॉन्सेप्ट मात्र इंस्ट्रूमेंट हैं और यह एक एन्टीरियलिस्ट अप्रोच की ओर मुड़ रहा है--एन्टी रियलिज़्म जो जगत को चेतना वाह्य नही मानता बल्कि जगत को चेतना की रचना मानता है।

2 सत्य का कोरोस्पोंडेंस और वस्तुनिष्ठता से कोई मतलब नही, यह एक प्रेगमेटिक कॉन्सेप्ट है और तभी हमारा वाह्य जगत बचेगा।

अर्थात जिस प्रकार स्पेशल रिलेटिविटी में फिजिक्स के नियम (प्रकाश की गति) को बचाने के लिए आइंस्टीन अपने ब्रह्मांड में समय और दिक को सापेक्ष बना देते हैं हमे भी अपने वाह्य जगत को बचाने के लिए सत्य की अब्सॉल्युटिस्ट और कोरोस्पोंडेंस वाली धारणा में सुधार करते हुए इसके साथ रिलेटिव और प्रेगमेटिक विशेषता जोड़ना ही पड़ेगा।

 

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मुझे अपने जन्म का अनुभव नही है, शायद किसी को उसके जन्म का अनुभव नही है क्योकि तब मेरी चेतना उतनी विकसित नही थी पुनः मैं अपने मृत्यु के अनुभवों को साझा करने के लिए भी उपस्थित नही रहूंगा, कोई नही रहता तो इसका क्या यह अर्थ ले लिया जाय कि जन्म और मृत्यु के समय कोई अनुभव होते ही नही?

यद्यपि इन अनुभवों के न्यूरल कोरिलेट्स ढूंढ लिए जाएं और उनको कोई बहुत ही एडवांस मशीन मेरे लिए रिप्रोड्यूस भी कर के इनकी अनुभूति मेरे लिए उपलब्ध करा दे तथापि क्या दूसरा कोई मेरीअनुभूति को अनुभूत करसकता है?

सम्भवतः नही, मनस दर्शन में इसे क्वालिया कहा जाता है और इसकी व्यक्तिनिष्ठता से सम्बंधित क्यों और कैसे को डेविड चालमर हार्ड प्रॉब्लम ऑफ द कौंससनेस कहते है।

साधारण उदाहरण से समझना हो तो क्या आप मेरे सामने रखे लाल रंग के मेरे अनुभव को समझ सकते हैं? मेरे अनुभव मेरे नितांत निजी अनुभव हैं इनको उसी रूप में पूर्णता के साथ न तो आप समझ सकते हैं और न ही मैं इंनको व्यक्त कर सकता हूँ और इसका कारण यह है कि हमारी भाषा असीम रूप से सामर्थ्यवान नही है, इसकी अपनी सीमाएं हैं। और चुकी इसकी अपनी सीमाएं है अतः जगत में हमे केवल अभिव्यक्त होने वाली सत्ताएं और घटनाएं ही नही मिलती बल्कि वैसी सत्ताएं भी हैं जिनको अभिव्यक्त नही किया जा सकता।

पुनः हमारी भाषा मात्र चेतना की सामान्य दशा में हमारे लिए उपलब्ध अनुभवों के परित: ही विकसित हुई है अतः चेतना के अल्टर्ड स्टेट में अभव्यक्ति भाषा के नियम और शब्दावलियों से पार चले जाते हैं साथ ही हमारी भाषा चेतना की एक सामान्य दशा में भी एक निश्चित स्पेक्ट्रम तक ही अपने कार्य को करने में समर्थवान है। इस रेंज से निचे और ऊपर के हमारे अनुभवों का भी हमारी भाषा साथ नही दे पाती।

 

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सत्य क्या है, हम इसे कैसे परिभाषित करें दर्शन की यह एक प्रमुख समस्या रही है: सत्य के बारे में हमारा विश्लेषण हमे यह बताता है कि यह निश्चित रूप से ज्ञान के साथ एक मूल्य के रूप में जुड़ा हुआ है:- पश्चिम की ज्ञानमीमांसा में तो ज्ञान को अनिवार्यत: सत्य होना चाहिए, क्योकि यदि कोई विश्वास सत्य नही है तो वह ज्ञान नही है।

भारतीय परंपरा में ज्ञान की यह संकल्पना नही रही है, इस परंपरा में ज्ञान बोध है, हमारी चेतना की उपलब्धि है जो अपनी प्रस्तुति के साथ सत्य भी हो सकती है और मिथ्या भी।सत्य ज्ञान प्रमा है जबकि मिथ्या ज्ञान अप्रमा। प्रमा को उपलब्ध कराने वाले प्रमाण हैं। अर्थात, अप्रमा प्रमाणों से पुष्ट नही होते।

यहाँ तक तो ठीक है किंतु एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि ज्ञान में ऐसा क्या होना चाहिए ताकि वह प्रमा बन सके? कमोबेश सत्य के विषय मे पश्चिम दर्शन भी उस गुण अथवा मूल्य की पहचान कर लेना चाहता है जिसकी उपस्थितिति किसी विश्वास को सत्य बनाते हुए उसे ज्ञान बना दे।

परम्परागत रूप से सत्य की तीन कसौटियां स्वीकार की गई हैं:

कोरोस्पोंडेंस, कोहरेंस व प्रागेटिक।

कोरोस्पोंडेंस सिद्धान्त के अनुसार कोई निर्णय तब सत्य होता है जब इस निर्णय के अनुरूप जगत में वैसी सत्ता हो। यह सिद्धान्त ज्ञानमीमांसिय वस्तुवाद में विश्वास करता है, अर्थात इसके अनुसार ज्ञेय की सत्ता न तो ज्ञाता पर निर्भर करती है और न ही ज्ञान पर। यदि सामान्य रूप से कहा जाय तो हमसे परे एक जगत है जिसे हम जानते हैं, यदि हमारे निर्णय के अनुरूप चीज का जगत में आनुभविक सत्यापन नही होता तो वह निर्णय सत्य नही है।

ध्यातव्य है कि इस सिद्धान्त में बहुधा ज्ञाता जगत का पैसिव रिसीवर बन जाता है जबकि ज्ञान की प्रक्रिया में, जिसके द्वारा ज्ञेय स्थापित होता है, ज्ञाता की विषयिनिष्ठ चेतना को किसी भी प्रकार नकारा नही जा सकता।

विषयिनिष्ठ चेतना की ज्ञान में उपस्थिति को अलग-अलग विचारकों ने अलग-अलग प्रकार से देखा है; बर्कली के लिए सत्ता दृश्यता है, योगाचारबौद्ध के अनुसार विज्ञप्तिमात्र ही सत्य है (वसुबन्धु)। कांट अपने विश्लेषण में इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि ज्ञान की प्रक्रिया में हमारे बोध के रूप या सांचे सक्रिय हो जाते हैं और तभी कोई सम्वेदन हमारे ज्ञान का विषय बनता है। अर्थात हम वास्तविकता को कभी जान ही नही सकते, कांट ने इसे न्युमोना या थिंग इन इटसेल्फ कहा है।

अब सवाल यह है कि यदि हम थिंग इन इटसेल्फ को कभी जान ही नही सकते तब तो सत्यता की कसौटी के रूप में कोरोस्पोंडेंस को रखना बेमानी है। अब क्या किया जाय की सत्य का निर्धारण हो?

कान्ट को सत्ता की तार्किकता में विश्वास है, जगतअराजक नही है अतः सत्यता की कसौटी भले ही कोरोस्पोंडेंस न हो कोहरेंस को सत्यता की कसौटी माना जा सकता है। यहाँ यह ध्यान देना चाहिए कि सत्यता की इस प्रकार की कसौटी स्वीकार करने वाले ज्ञान को एम तंत्र मानते हैं जिसके समस्त अव्यय आपस मे सुव्यवस्त्ति होते हैं।

यहाँ हम देख सकते हैं कि सत्य का कोहरेंस सिद्धान्त कम से कम एक पूर्वमान्यत को अवश्य स्वीकार करता है: जगत का स्वरूप तार्किक है तथा, ज्ञान अपने अव्ययों की सामंजस्यपूर्ण संगति में ही होता है।

सत्यता का यह सिद्धान्त बहुत हद तक कोरोस्पोंडेंस को सत्यता की कसौटी मानने से उपजी समस्या का समाधान कर देता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन भी जब बंद घड़ी से ज्ञान के आदर्श सीमा की उपमा दे रहे होते हैं तो कमोबेश वह ज्ञान की सुसंगता के सिद्धान्त की भी हामी भर रहे होते हैं। आइंस्टीन के शब्दों में हमने घड़ी नही खोली किंतु घड़ी हमारे लिए काम कर रही है, घड़ी से सम्बंधित हमारी अवधारणाओं का तंत्र काम कर रहा है अर्थात हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट है, इसमें प्रेडिक्टिव पावर है तथा यह हमारे आनुभविक जगत की घटनाओं की व्याख्या कर दे रहा है बावजूद इसके की हम घड़ी के अंदर नही झाँक सकते। (इवोल्यूशन ऑफ फ़िजिक्स)

सत्य के निकष का सुसंगतता सिद्धान्त अपनी धारणा, जिसके आधार पर वह अपना सिद्धान्त विकसित करता है, में ही इस तथ्य को स्वीकार कर आगे बढ़ता है कि सत्य का स्वरूप तार्किक होता है, यह इस बात को भी स्वीकार करता है कि सत्ता का स्वरूप भी तार्किक है। यह सिद्धान्त यद्यपि संवादिता विषयक सत्य के सिद्धान्त को उसके परम्परागत स्वरूप में स्वीकार नही करता तथापि यह उन धारणाओं के आपसी सम्बन्ध में, जिनसे सत्य का निर्माण हुआ है, सत्ता की ही तार्किकता का विस्तार या प्रतिरूप स्वीकार करते हुए एक दृष्टि से तार्किकता की संवादिता को स्वीकार कर लेता है।

यदि हम उन अवधारणाओं को, जिनसे ज्ञान एक तंत्र के रूप में प्रस्तुत होता है यदि मात्र करण भी मान लें जैसा कि ज्ञेय सत्ताओं के विषय मे करणवाद सम्बन्धी मत स्वीकार करता है तो हमे सत्य की सुसंगता के सिद्धान्त में विश्वास के कारण , इन अवधारणाओं अथवा करणो के मध्य उपस्थित सम्बन्धो के विषय मे यह मानना पड़ेगा कि यह सत्ता की तार्किकता से संवादिता रखते हैं, क्योकि अन्यथा की स्थिति में हमारी यह अवधारणाएं सत्य नही बन सकतीं।

प्रश्न है कि इस बात को स्वीकार करने का की यह सम्बन्ध सत्ता की ही संरचना के प्रतिनिधि हैं क्या आधार है? साथ ही हम यह बात भी दावे के साथ नही कह सकते कि सत्ता अपने मौलिक रूप में तार्किक ही है।

अतः अब हमें सत्य की कसौटी के रूप में एक नया निकष, अर्थक्रियाकरित्व को लेना पड़ता है।

यहाँ अब एक नई समस्या उतपन्न होती है और वह यह कि सत्य का अर्य्हक्रियावादी सिद्धान्त सत्य को उस सिहांसन से नीचे गिरा देता है जिसपर यहअब तक बैठा था क्योकि इस सिद्धान्त के साथ सत्य अब साध्य नही बल्कि एक साधन बन जाता है। एक और समस्या उठाई जाती है कि क्या हो यदि हमारी हमारी असत्य धारणाए, मिथ्या विश्वास भी फल दे रहे हों? इस स्थिति में तो सत्य को अर्थक्रियाकरित्व से संयुक्त कर देना सत्य से अपनी आंखें बंद कर लेना है।

लेकिन यह सब समस्याएं मनोवैज्ञानिक हैं, एक प्रकार की कॉग्निटिव डिसॉनेन्स हैं, वस्तुनिष्ठता का भी ठीक उसी प्रकार से एक दिन क्षरण होना था जिस प्रकार से अलौकिकता का क्षरण हुआ था।

 

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हमे अपनी कुछ आदतों में जो हमें हमारे अतीत के कारण प्राप्त हुई है, इनमें सुधार करने की आवष्ययकता है--

इनमें पहली आदत है शब्द सत्य के साथ हमारे मन मे बनने वाला भाव, इसका कोनोटेशन:

हम आज भी सत्य को एक ट्रांसेन्डेट और निरपेक्ष एनटीटी मानते हैं और हम अपनी उस पुरानी आदत के प्रभाव में यह सोचते हैं कि "सत्य खोजा जाता है" किंतु हमारा बौद्धिक विकास अब हमें दिखा रहा है कि सत्य के विषय मे हमारी यह पुरानी धारणा भी आसमान में हमसे परे रहनेवाले किसी देवता में हमारे मिथकीय विश्वास की तरह हमाराभ्रम था।

यदि हम आज के बौद्धिक विकासों को पढ़ सके तो हम यह पाते हैं कि सत्य खोजा नही जाता बल्कि इसका अविष्कार किया जाता है।

पुनश्च सत्य कोई निरपेक्ष और वस्तुनिष्ठ सत्ता या एनटीटी नही है जो सत्तामिमांसिय (ओंटोलॉजिकली) किसी सत्यलोक में हमारे द्वारा अनावृत होने को प्रतीक्षारत है बल्कि यह हमारी ही दुनिया मे हमारे द्वारा ही बनाया जाता है।

आपको मेरी बात कुछ अजीब लग सकती है, मेरी बात आपके अंदर कॉग्निटिव डीजोनेन्स पैदा कर सकता है क्योकि आप सत्य की हमारी सबसे पुरानी धारणा "कोरोस्पोंडेंस सिद्धान्त" में ही विश्वास करते हैं जबकि हमने अब समझा है कि सत्य वास्तव में तो मेटाफिजिक्स या तत्वमीमांसा की तो विषयवस्तु ही नही है, यह तो एक तरह से प्रेगमेटिक का विषय है।

सत्य वह थोड़े है जिसका कभी बाध न हो बल्कि सत्य तो वह है जिसे हम बनाते हैं और जिसमे अर्थक्रियाकरित्व हो--फंक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ ट्रुथ या सत्य की प्रेगमेटिक थ्योरी।

मुझे यह समझ अल्बर्ट आइंस्टीन की आइडियल लिमिट ऑफ नॉलेज ऑफ स्टीफेन हॉकिंग की "मॉडल डिपेंडेंट रियलिज्म" को पढ़ने के बाद आई हालांकि मेरे विलयम जेम्स के प्रेगमेटिज्म से पूर्व से भी परिचय रहा है।

 

 

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आज मैंने स्वयं से प्रश्न किया कि अबे मान ले कि स्टीफन हॉकिंग का मॉडल डिपेंडेंट रियलिज्म की यदि तार्किक निष्पत्ति "एन्टी रियलिज्म" हो ही जैसा कि तू साबित करने पर आमादा है और सुबह शाम फेसबुक पर नाक धुन रहा है तो इससे क्या हो जाएगा?

तेरा प्रोमोशन? कोई प्राइज व्राइज मिलेगा? इसके बदले तुझे कार-बंगला मिल जाएगा??

तेरी कोई खोई वस्तु 24 घण्टे में मिल जाएगी?

कोई वश में हो जाएगी?? जवानी के दिनों की उस लड़की से बदला पूरा हो जाएगा जिसने तुझे रिजेक्ट किया था???

मैंखुद को कोई जवाब नही दे सका।

 

मैं बहुत चालू आदमी हूँ भाई---

इस खेल में चित भी मेरी है और पट भी मेरी।

यदि हॉकिंग के मॉडल डिपेंडेंट रियलिज्म की तार्किक निष्पत्ति एंटीरियलिज्म में होती है तो मेरी खोपड़ी अब अपीयरेंस और रियलिटी के संदर्भ में इसे सोचेगी और अंततः जगत को अपीयरेंस सिद्ध करने को नाक धुनेगीताकि मेरी खोपड़ी का "अहम ब्रह्मास्मि" में विश्वास बचा रहे और मैं स्वयं के होने को अल्बेयर कामू के शब्दों में "एब्ज़र्द" ना मानू--ताकि प्रकृति पर सांख्य के पुरूष की प्रधानता हो---शायद टॉलस्टॉय ने लिखा है कि आप मनुष्यके अंदर से उसके अमरता के विश्वास को छीन लीजिए और मानवता खत्म हो जाएगी!!

यदि मैं सिद्ध नही कर पाता हूँ तो भी मैं कुछ नही हार रहा--मेरी खोपड़ी में मेरे अनुभव से आया यह भाव की "मनुष्य शून्यता में लटका हुआ एक अस्तित्व है" यह बचा रहेगा ----एक तुष्टि (जलनशील व्यक्ति की तुष्टि) तो प्राप्त हो ही जाएगी--मेरा भारतीय दर्शन में स्थापित तत्वमीमांसा से जलन जस्टिफाइड हो जाएगा।

 

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ज्ञान की आदर्श सीमा

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वैज्ञानिक प्रज्ञा जब दार्शनिक चिंतन करती है तो वह बड़ी सावधान होती है और उन बड़े बड़े दावों, रसेल के शब्दों में बॉम्बेस्टिक नॉनसेंस, से बचते हुए बड़ी शालीनता से अपनी बात कहती है।

वैज्ञानिक चेतना प्रायः निरपेक्ष और सत्य ज्ञान जैसे दार्शनिक सम्प्रत्यय के प्रयोग से बचती है।

वस्तुतः वैज्ञानिक चेतना में निरपेक्ष, वास्तविकता आदि शब्दो का प्रयोग नही होता क्योकि वैज्ञानिक विधि में "आगमन की समस्या" "थ्योरी लैडननेस" और हमारी "संवेदनात्मक सीमितता" इसकी विधि में ही इन्हेरेंट है। इन कारकों की उपस्थिति में निरपेक्ष ज्ञान या यथार्थ आदि की बात करना आत्मव्याघात है।

हॉकिंग "समय का संक्षिप्त इतिहास" इस पंक्ति से प्रारम्भ करते हैं कि कही कोई एक ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक (कुछ के अनुसार बर्ट्रेंड रसल) ने खगोलशास्त्र पर एक पब्लिक व्य्याख्यान दिया। व्य्याख्यान की समाप्ति पर व्य्याख्यानशाला के पीछे की पंक्ति में बैठी एक बुजुर्ग महिला उठीं और उन ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक से कहा कि अब तक आपने जो कुछ भी बताया है वह कूड़ा है--असल मे विश्व एक बहुत बड़े कछुवे की पीठ पर रखी एक बहुत बड़ी थाली है---।

हॉकिंग आगे अपनी बात रखते हैं कि विश्व विषयक बहुत सारे प्रश्नों के जवाब आज हमारे पास है लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए ये भी यह जवाब वास्तविक जवाब ही होंगे या उसी कछुआ और थाली की तरह एक हास्यास्पद नॉनसेंस यह केवल समय ही बता सकता है!

-----इतनी अनिश्चितता?

वास्तव में यह अनिश्चितता विज्ञान में समाहित है और यह अनिश्चितता हमे तबतक ही अजीब लग सकता है जबतक हम भौतिकी के सिद्धांतों को यूजफुल की बजाय सत्य माने। एक बार सत्य को यूजफुल से प्रतिस्थापित कर दिया जाय, यह अनिश्चितता हमे सहर्ष स्वीकार हो जाती है, कोई कॉग्निटिव डिज़ोनेंस उतपन्न नही होता क्योकि भविष्य में हमे और अधिक उपयोगी सिद्धान्त मिलते है न कि और अधिक सत्य।

क्या यह सम्भव नही है कि हम भौतिकी के माध्ययम से प्रतिज्ञप्तियों या प्रोपोजिशन्स का एक ऐसा तन्त्र रच रहे हों जो आपस मे सुसंगठित औरकोहरेन्ट तो हो किन्तु इस तंत्र के अनुरूप कोई वाह्य सता न हो अर्थात इस सुव्यस्थित, सुसंगठित और कोहरेन्ट तन्त्र के अनुरूप कोई कोरोस्पोंडेंस या संवादिता न हो?

ऐसा सम्भव है की हमारी थ्योरी, हमारे मॉडल के अनुरूप एक्सटर्नल रियलिटी हो ही नही बावजूद इसके हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट हो और काम कर रही हो। यहाँ काम करने और सेल्फ कंसिस्टेंट होने का अर्थ मात्र इतना है कि हमारी थ्योरी में प्रेडिक्टिव पावर हो, अपवादों की संख्या न्यूनतम हो तथा इस थ्योरी-तन्त्र के लिए कम से कम अज़्मप्शन्स बनाने पड़े।

आइंस्टीन के शब्दों में हमने घड़ी नही खोली किंतु घड़ी हमारे लिए काम कर रही है, घड़ी से सम्बंधित हमारी अवधारणाओं का तंत्र काम कर रहा है अर्थात हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट है, इसमें प्रेडिक्टिव पावर है तथा यह हमारे आनुभविक जगत की घटनाओं की व्याख्या कर दे रहा है बावजूद इसके की हम घड़ी के अंदर नही झाँक सकते। आइंस्टीन इसे ही ज्ञान की आदर्श सीमा कहते हैं (एवोल्यूशन ऑफ फ़िजिक्स)

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सत्य खोजा नही जाता, इसका अविष्कार किया जाता है-

हमारी सत्य विषयकजगत और भाषिक कोरोस्पोंडेंस की अवधारणा खत्म हो रही है और सत्य की एक ऐसी धारणा विकसित हो रही है जो हमारा बनाया हुआ है और काम करता है--अर्थातसत्य के बारे में अद्वैत वेदांत की यह कसौटी की सत्य वह है जिसका बाध नही होता अब हमारी चेतना स्वीकार नही करती!

अर्थक्रियाकरित्व सत लक्षणम--सत्य तो वह है जिसमें अर्थक्रियाकरित्व हो।

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"सत्य खोजा नहीं जाता, इसका आविष्कार किया जाता है।" यह विचार पारंपरिक सत्य की अवधारणाओं को चुनौती देता है। आधुनिक दृष्टिकोण में सत्य को अब एक ऐसी प्रक्रिया माना जा रहा है, जो संदर्भ और उपयोगिता पर आधारित है। यह दृष्टि न केवल अद्वैत वेदांत के निरपेक्ष सत्य को, बल्कि कोरस्पोंडेंस थ्योरी ऑफ ट्रुथ को भी अस्वीकार करती है, जो भाषा और वास्तविकता के मेल पर आधारित थी।

अब सत्य की कसौटी बन रही है:

"अर्थक्रियाकारित्व सत लक्षणम" – सत्य वही है जो व्यावहारिक रूप से उपयोगी हो और काम करे।

पारंपरिक रूप से सत्य को भाषा और वास्तविकता के मेल (Correspondence) के रूप में समझा गया था। लेकिन आज यह संबंध संदिग्ध हो गया है।

भाषा अब बाहरी जगत की सटीक अभिव्यक्ति नहीं मानी जाती। यह हमारी चेतना और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से निर्मित होती है।

सत्य अब स्थायी और वस्तुनिष्ठ नहीं है। यह संदर्भ और आवश्यकता के अनुसार निर्मित होता है।

स्टीफन हॉकिंग का मॉडल-डिपेंडेंट रियलिज्म (MDR) सत्य को एक ऐसी अवधारणा के रूप में देखता है, जो केवल हमारे मॉडलों पर निर्भर करती है।

MDR का दृष्टिकोण में वास्तविकता की हमारी समझ सीधे बाहरी जगत पर आधारित नहीं, बल्कि हमारे बनाए हुए मॉडलों पर निर्भर है।

कोई मॉडल सत्य तब तक है, जब तक वह प्रभावी ढंग से काम करता है।

MDR वस्तुनिष्ठ सत्य को अस्वीकार करता है, जिससे यह एंटी-रियलिज्म की ओर झुकता है। इसका जोर सत्य के उपयोग और व्यावहारिकता पर है।

बिग बैंग थ्योरी "सत्य" है, क्योंकि यह वर्तमान में ब्रह्मांड की घटनाओं की व्याख्या कर सकती है। लेकिन यह अंतिम सत्य नहीं है और भविष्य में नए मॉडल इसे बदल सकते हैं।

"सत्य वह है जिसमें अर्थक्रियाकारित्व हो।" यह दृष्टि सत्य को स्थायी और निरपेक्ष मानने की बजाय उसे व्यावहारिकता और उपयोगिता पर केंद्रित करती है।

सत्य वही है, जो किसी समस्या का समाधान करे और व्यवहार में उपयोगी हो।

वैज्ञानिक मॉडल, जैसे जलवायु परिवर्तन की भविष्यवाणी करने वाले सिद्धांत, इसलिए सत्य माने जाते हैं क्योंकि वे काम करते हैं।

सत्य अब शाश्वत नहीं, बल्कि संदर्भ आधारित और परिवर्तनशील है।

सत्य की परंपरागत परिभाषाएँ, जैसे अद्वैत वेदांत का "बाध-रहित सत्य" और कोरस्पोंडेंस थ्योरी, आज अप्रासंगिक होती जा रही हैं।

स्टीफन हॉकिंग का MDR इस नई सोच का समर्थन करता है, जहाँ सत्य वस्तुनिष्ठ वास्तविकता नहीं, बल्कि निर्मित मॉडल है।

"अर्थक्रियाकारित्व सत लक्षणम" आधुनिक युग की कसौटी है, जिसमें सत्य वह है जो काम करता है। सत्य अब खोज का विषय नहीं, बल्कि निर्माण और उपयोगिता की प्रक्रिया है।

 

 

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ज्ञानचक्र:

ज्ञान-विज्ञान के इतिहास पर दृष्टिपात पर मुझे इनके इतिहास में एक पैटर्न दिखा जो नीचे चित्र के माध्ययम से व्यक्त किया है--

प्रथम स्टेज में नाईव रियलिज्म या सामान्य अनुभव की प्रमुखता होती है जिसमे मनुष्य स्वयं और जगत के द्वैत को स्वीकार कर चलता है--इस अवस्था मे सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट के मध्य एक शार्प डिस्टिंक्शन होता है।

दूसरे चरण में प्रथम चरण के सामान्य अनुभव में विषयिनिष्ठता प्रमुखता पाने लगती है और जगत तथा मनुष्य का पुराना द्वैत यहां धुंधला होने लगता है: जगत के निर्माण में, जगत की संरचना में हम इस स्टेज में चेतना/ज्ञाता की भूमिका को स्वीकार करने लगते हैं।

तीसरे चरण में प्रथम चरण की सम्पूर्ण वस्तुनिष्ठताद्वितीय चरण की विष्यनिष्ठता में समाहित हो जाती है, मात्र सब्जेक्ट और सब्जेक्टिव ही बचता है--बौद्ध दर्शन के विज्ञानवादी सप्रदाय के तो शब्दों में यहां "विज्ञप्तिमात्रता ही एकमात्र सत्य है"

चौथे चरण में एक स्प्लिट उपस्थित होता है लेकिन यह तीसरे चरण के बाद ही आए ऐसा नही है-यह सीधे सीधे द्वितीय चरण के बाद भी आ सकता है या यह तृतीय चरण के समानांतर भी हो सकता है।

कालांतर में इन तृतीय और चौथे चरण का विकास पुनः प्रथम चरण में होता है और यह प्रक्रिया चलती रहती है।

क्लासिकल भौतिकी प्रथम चरण को दिखाती है जबकि कवांतम भौतिकी में हम द्वितीय चरण के आगमन को देख सकते हैं।

 

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1. चेतना की अवस्थाएँ और उनके लोक

शंकर वेदांत में चेतना की अवस्थाएँ (जागृत, स्वप्न, सुषुप्त, तुरीय) विभिन्न अनुभवों और अस्तित्वों के स्तर को दर्शाती हैं।

जागृत अवस्था: भौतिक संसार और माया से संबद्ध।

स्वप्न: मानसिक प्रक्षेपण और कल्पना का लोक।

सुषुप्त: अज्ञान और गहन निद्रा का संसार।

तुरीय: अद्वैत ब्रह्म की अवस्था, जहां कोई द्वैत नहीं है।

इन अवस्थाओं में, हर एक का अपना "लोक" है, जो चेतना के अलग-अलग फ्रेम ऑफ रेफरेंस की तरह है। यदि प्रत्येक अवस्था को भौतिकी के किसी प्रयोग से देखा जाए, तो हर अवस्था का परिणाम चेतना की प्रकृति के अनुसार बदल सकता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे सापेक्षता में हर फ्रेम ऑफ रेफरेंस का अपना मापदंड होता है।

2. भौतिकी के नियम और चेतना का सुपर फ्रेम

आइंस्टीन का यह कथन कि "कोई सुपर रेफरेंशियल फ्रेम नहीं है," यह मानता है कि सभी इनर्शियल फ्रेम समान हैं और किसी एक को विशेष दर्जा नहीं दिया जा सकता।

यदि चेतना के फ्रेम (जागृत, स्वप्न, सुषुप्त, तुरीय) को देखा जाए, तो भौतिकी के नियम जागृत अवस्था की चेतना के संदर्भ में निर्मित हैं। यही अवस्था वह "फ्रेम ऑफ रेफरेंस" है, जिसमें विज्ञान के सारे प्रयोग होते हैं।

स्वप्न, सुषुप्त, या तुरीय अवस्थाओं के संदर्भ में भौतिकी के नियम कैसे काम करेंगे, यह अनिश्चित है। क्योंकि इन अवस्थाओं में न तो मापन के उपकरण वही रह जाते हैं, न ही चेतना की सीमाएँ।

इससे सवाल उठता है: क्या भौतिकी के नियम सभी चेतना अवस्थाओं पर समान रूप से लागू हो सकते हैं?

उत्तर: शायद नहीं। भौतिकी की सार्वभौमिकता जागृत चेतना तक सीमित हो सकती है। तुरीय अवस्था, जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है, वहाँ "मापन" का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता।

3. मल्टीवर्स, चेतना और भौतिकी के नियम

अब यह विचार करें कि किसी अन्य ब्रह्मांड या मल्टीवर्स में कोई ऐसी चेतना हो, जिसका विकास हमारे फ्रेम से पूरी तरह अलग हुआ हो।

भौतिकी के नियम (जैसे F=ma या ऊर्जा संरक्षण) हमारे ब्रह्मांड के भीतर अनुभव और मापन की विशिष्ट परिस्थितियों के परिणाम हैं।

किसी अन्य ब्रह्मांड में, जहाँ भौतिकी की मूलभूत स्थितियाँ (जैसे आयाम, ऊर्जा का स्वरूप, समय का प्रवाह) भिन्न हैं, वहाँ भौतिकी के हमारे नियम लागू नहीं हो सकते।

यहाँ चेतना का स्वरूप भी भौतिकी के नियमों को प्रभावित कर सकता है। यदि उस चेतना का अनुभव-क्षेत्र, भाषा, और मापन-क्षमता भिन्न है, तो भौतिकी के नियम उनके संदर्भ में अलग हो सकते हैं।

भौतिकी के नियमों को सार्वभौमिक मानना, वास्तव में, एक प्रकार की सैद्धांतिक हठधर्मिता हो सकती है।

ये नियम हमारे ब्रह्मांड, हमारी चेतना और हमारे मापन उपकरणों के लिए सत्य हैं।

लेकिन जैसे तुरीय अवस्था में चेतना सभी माया और द्वैत से परे है, वैसे ही यह संभव है कि कोई अन्य चेतना-संरचना भौतिकी के नियमों को पूरी तरह भिन्न रूप में देखे।

भौतिकी के नियम, जैसा कि हम समझते हैं, हमारी जागृत चेतना और हमारे ब्रह्मांडीय संदर्भ तक सीमित हैं। चेतना की अन्य अवस्थाओं (या अन्य प्रकार की चेतना-संरचनाओं) के लिए ये नियम भिन्न हो सकते हैं। इसलिए, यह सोचना कि भौतिकी के नियम सभी के लिए समान होंगे, एक वैचारिक सरलीकरण हो सकता है। "सर्वजनीनता" का यह दावा चेतना के गहन और विविध स्वरूपों के सामने टिक नहीं पाता।

 

 

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साल 24560।

इंसान ने केवल अपने ग्रह को नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड को समझने का दावा कर लिया था। लेकिन मल्टीवर्स के असीम विस्तार और चेतना के रहस्यों ने इस दावे को चुनौती दी। गैलैक्टिक काउंसिल ने चेतना के गूढ़ प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए "माइंड वॉयजर" मिशन लॉन्च किया। यह मिशन मानवता के लिए एक साधारण वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन गया।

"क्या चेतना भौतिकी के नियमों को प्रभावित करती है?"

यह सवाल एक तर्क-वितर्क से अधिक था। यह विज्ञान और दर्शन के बीच का पुल बन गयाथा।

माइंड वॉयजर का नेतृत्व डॉ. एमैन्यूल वृहस्पति कर रहे थे। एक वैज्ञानिक और दार्शनिक होने के नाते, उन्होंने चेतना को सिर्फ न्यूरॉन्स के संजाल से ज्यादा कुछ माना।

"हमारी चेतना सीमित है," उन्होंने कहा।

"शायद इसलिए हमारा विज्ञान भी सीमित है।"

माइंड वॉयजर का उद्देश्य स्पष्ट था: चेतना और भौतिकी के उस पार जाना जहां मानव मस्तिष्क की कल्पना भी सीमित हो जाती है।

जेनोरा, एक ऐसा यूनीवर्स जहां प्राणी तरल रूप में बहते थे। ये प्राणी अपनी चेतना को तरंगों में व्यक्त करते और पदार्थ को अपनी इच्छा से बदल सकते थे।

जब वैज्ञानिकों ने जेनोरन चेतना का अध्ययन किया, तो उन्होंने पाया कि उनकी चेतना भौतिकी के बुनियादी नियमों को मोड़ सकती थी।

एक प्रयोग में, जेनोरन प्राणियों ने प्रकाश की गति को अनंत कर दिया।

"यह असंभव है!" वैज्ञानिक चौंक गए।

जेनोरन प्राणी मुस्कुराए और कहा,

"तुम्हारी भौतिकी तुम्हारी चेतना की सीमाओं तक सीमित है। हमारी चेतना इसे विस्तार देती है।"

यह पहली बार था जब इंसानों को अहसास हुआ कि भौतिकी की स्थिरता केवल एक मानसिक भ्रम हो सकती है।

एरिडा यूनिवर्स में चेतना जागृत अवस्था में नहीं, बल्कि स्वप्न में सक्रिय होती थी। यहां के प्राणी पदार्थ को अपनी कल्पना से साकार करते थे।

"स्वप्न में हम समय को नहीं मानते," एरिडा के एक प्राणी ने कहा।

"हमारे लिए स्थान और समय केवल विचार हैं।"

डॉ. वृहस्पति ने देखा कि जब कोई एरिडा प्राणी किसी वस्तु का स्वप्न देखना बंद करता, तो वह वस्तु अस्तित्व खो देती।

"हमारे विज्ञान का क्या होगा यदि हमारी चेतना भी इसे बस एक स्वप्न समझे?" वृहस्पति ने खुद से पूछा।

न्यूट्रोरा एक यूनिवर्सथा जहां चेतना और पदार्थ के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी थी। प्राणी अपने शरीर को बदल सकते थे—प्लाज्मा, गैस, या ठोस किसी भी रूप में।

यहां ऊर्जा का प्रवाह चेतना के मूड पर निर्भर करता था।

"तुम इंसान स्थिरता को विज्ञान का नियम मानते हो," न्यूट्रोरा के एक प्राणी ने कहा।

"लेकिन स्थिरता केवल तुम्हारी चेतना का भ्रम है।"

न्यूट्रोरा ने वैज्ञानिकों को दिखाया कि चेतना भौतिकी के हर नियम को बदल सकती है, यदि वह खुद को सीमाओं से मुक्त कर दे।

तीन ब्रह्मांडो की यात्राओं के बाद, टीम के भीतर सवाल गहराते गए।

"क्या हमारा विज्ञान वास्तव में सार्वभौमिक है?"

"या यह हमारी चेतना का प्रतिबिंब मात्र है?"

डॉ. वृहस्पति के नेतृत्व में टीम ने एक उपकरण विकसित किया—"इन्फिनिटी माइंड एक्सप्लोरर।" यह उपकरण मानव मस्तिष्क को चेतना की विभिन्न अवस्थाओं—स्वप्न, ध्यान, तुरीय, और उससे भी परे—में ले जाने में सक्षम था।

अंततः, डॉ. वृहस्पति ने उपकरण का परीक्षण खुद पर किया।

जब उन्होंने तुरीय चेतना में प्रवेश किया, तो उन्होंने देखा कि समय और स्थान दोनों ही अर्थहीन हो गए। ब्रह्मांड अब एक अविभाज्य इकाई के रूप में प्रकट हुआ।

"भौतिकी के नियम चेतना के प्रतिबिंब मात्र हैं," उन्होंने कहा।

डॉ. वृहस्पति ने अपनी चेतना के अनुभवों को मानवता के साथ साझा किया। यह एक क्रांति थी। विज्ञान अब नियम बनाने का नहीं, बल्कि चेतना की नई अवस्थाओं की खोज का माध्यम बन गया--यह मेटासाईंटिफिक संस्कृति का आरम्भ था।

मेटासाइंस ने यह सिखाया कि हर नई चेतना ब्रह्मांड का एक नया आयाम खोल सकती है।

लेकिन यह चेतावनी भी दी गई:

"चेतना की सीमाओं को पार करते हुए, हमें अपनी मानवता को खोने नहीं देना चाहिए।"

 

 

 

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फेन हॉकिंग इमेनुएल कांट के जूते में

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स्टीफेन हॉकिंग एक पैराडाक्स का उल्लेख करते हैं जिसे निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है :

यदि वास्तव में एक यूनिफाइड थ्योरी है तो यह हमारे कृत्य, हमारे अनुसन्धान, हमारी जगत को समझने की कोटियों, हमारे वैज्ञानिक फ्रेमवर्क को भी प्रभावित और कंडिशन्ड करेगा और इस प्रकार यह यूनिफाइड सिद्धान्त हमारे यूनिफाइड सिद्धान्त विषयक निष्कर्ष को निश्चित रूप से प्रभावित करेगा।

औरअब आता है असली प्रश्न: यूनिफाइड थ्योरी द्वारा कंडिशन्ड हमारे अनुसन्धान, हमारा इंटेलिजेंस, हमारे वैज्ञानिक फ्रेमवर्क हमे प्रमाणों सेसही निष्कर्ष, असल यूनिफाइड थ्योरी की ओर ले ही जाएंगे इस बात की क्या गारंटी है?

हाकिंग जब इस पैराडॉक्स का उल्लेख करते हैं तो वह एक वैज्ञानिक की हैसियत में भी एक दार्शनिक बन जाते हैं जिसके विषय मे उन्होंने कहा कि दर्शन मृत हो गया है क्योंकि दर्शन के उन सारे प्रश्नोंका उत्तर वैज्ञानिकों द्वारा दिया जा रहा है।

विज्ञान के पास उनके अपने स्वयम के इस पैराडॉक्स का कोई उत्तर नही है। वैज्ञानिक फ्रेमवर्क में इन प्रश्नों को प्रश्न स्वीकार भी नही किया जाता। हॉकिंग महोदय यहाँ स्वयम दार्शनिक कांट के जूतों में चले जाते है जिनकी उन्होंने आलोचना की है।

कांट ने अपने पूर्ववर्ती अनुभवाद और बुद्धिवाद दोनों की आलोचना, समीक्षा की और फिनामिना तथा न्युमोना के द्वैत को प्रस्तुत किया।

कांट के अनुसार न्यूमेना, थिंग इन इटसेल्फ या अपने आप मे वस्तुए हैं लेकिन यह न्युमेना ज्ञाता में फेनोमेना के रूप में प्रस्तुत होता है। कांट के अनुसार परम् सत्ता है लेकिन इसका ज्ञान (Gnosis) मानव को नही हो सकता। वैज्ञानिक ज्ञान सम्भव है किंतु यह वैज्ञानिक ज्ञान मानव मन के स्वरूप से नियंत्रित होता है। मानव-मन किसी भी ज्ञान वस्तु को तभी जान सकता है जब वह इस ज्ञेय को अपने a priori या पूर्वानुभविक रूपो के द्वारा अभिरंजित कर देता है। इस स्थिति में जो भी मानव ज्ञान का विषय होगा वह अपने असली रूप में नही जाना जा सकता।

ध्यातव्य है कि जगत पर कोई भी गम्भीर चिंतन जगत को व्यवहार और परमार्थ या फिनामिना और न्युमोना में बांट ही देता है और हाकिंग के उपरोक्त पैराडॉक्स में यह विभाजन अपनी जगह पा ही लेता है।

प्रश्न है कि यदि यह विभाजन आ ही जाता है तो क्या किया जाय?

इसके तीन उत्तर हो सकते हैं: पहला इस विभाजन को स्वीकार करते हुए परमार्थ पर भी चिंतन किया जाय दूसरा इस विभाजन को स्वीकार करने के बावजूद फिनामिना पर अपना ध्यान केन्दित किया जाय या तीसरा न्युमोना को बकवास मानते हुए केवल फेनोमेना की ही बात की जाय।

एक रिगरस वैज्ञानिक के लिए तीसरे विकल्प को चुनना उसकी मजबूरी होती है क्योंकि वैसा कुछ भी जो अनुभव में पकड़ नही आ सकता उसको विज्ञान विषयक कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार विज्ञान के लिए अनआवश्यक विषय है।

निश्चित तौर पर विज्ञान की प्रकृति के कारण न्युमोना को बकवास मानना विज्ञान की बाध्यता है लेकिन चेतना जब जगत पर समग्रता से विचार करती है तो यह प्रश्न मात्र बकवास नही हैं क्योंकि विज्ञान सीमित है और जगत असीमित: जगत मात्र कैसे चर (वेरिएबल) के साथ मौजूद नही है।

 

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आज दो महाज्ञानियों का शास्त्रार्थ है। आज सत्य ज्ञान निर्णीत हो कर ही रहेगा, कोई रोक ही नही सकता--गोली चल जाएगी, मर्डर हो जाएगा!

दोनों आचार्यो के पास अपनी अपनी परम्परा है और यह परम्परा कम से कम तीस खरब वर्ष पुरानी है यह बात और है कि दुनिया 14 अरब साल पहले बनी। इन दो आचार्यो के अलावा भी और कई आचार्य है जिनके पास आज बहस की विषय वस्तु पर ज्ञान सम्बन्धी अपने अपने दावे हैं।

खैर, हमे उनसे क्या लेना हम तो इन तो इन आचार्यो पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगें।

एकआचार्य जी का नाम सदाशिव एकलिंगी है और दूसरे आचार्य का नाम पँचलिंगी सदाशिव। एकलिंगी महाराज एकलिंग परम्परा के समर्थक है और पँचलिंगी महाराज पँचलिंग परम्परा के।

आचार्यो के बीच शास्त्रार्थ का प्रश्न यह है कि प्रकृति एक लिङ्गी है या पांच लिङ्गी क्योंकि प्रकृति के इसी लिंग का निर्धारण के कारण उन्हें त्रिविध तापो से मुक्ति नही मिल रही।

एक लिङ्गी पँचलिंगियो के बारे में कहते है कि उन्हें मुक्ति मिल ही नही सकती क्योंकि प्रकृति तत्व के विषय में उनका ज्ञान अप्रमा है।

यही बात पँचलिंगी एकलिंगियों के बारे में कहते है लेकिन आज तक उन तीस खरब सालो में न तो किसी पँचलिंगी को और न ही किसी एक लिङ्गी को मुक्ति मिल पाई है।

और हाँ अलिंगी, स्यात लिङ्गी, लिंगलिंगी, लाललिङ्गी, पीतलिङ्गी, तेरालिङ्गी, मेरालिङ्गी किसी भी सम्प्रदाय के किसी व्यक्ति को मुक्ति मिली विली नही है हलाकि सब एक दूसरे के प्रकृति के लिंग विषयक मत को अप्रमा मानते है और अपने मत को ही प्रमा बताते हैं।

आचार्य एकलिंगी ने पँचलिंगी के पूर्वपक्ष को रखते हुए उसका खंडन करना प्रारम्भ किया।

आपकी प्रतिज्ञा है कि प्रकृति एकलिंगी है क्योंकि आप एक प्रकृति के पांच घटक मानते है लेकिन आचार्य पँचलिंगी पांच घटकों से निर्मित प्रकृति को एक मानते हैं।

समस्या पांच से एक बनाम एक में पांच का है।

यह शास्त्रार्थ कई महीनों तक चलने वाला है या हो सकता है कई सालों तक और लिङ्गी साहित्य में गूढ़ से गूढ़तम सूत्र और व्याख्याएं आनेववाली है लेकिन उनका कोई भी ज्ञान दरअसल ज्ञान है ही नही।

उनके ग्रन्थ ज्ञान के ग्रन्थ है ही नही क्योंकि गड़बड़ी उनके प्रश्न में ही है : कितनी लिंगात्मिका है प्रकृति?

यह अप्रश्न है।

सही प्रश्न करिए शब्द ही बदल जाएंगे वरना करते रहिए दार्शनिक विमर्श और करते रहिए शास्रार्थ।

शब्द ब्रह्म ही नही होते, प्रेतशब्द भी होते हैं; अप्रश्न प्रेतशब्दो में ही रचे जाते हैं।

अप्रश्नो का उत्तर भी प्रेतशब्दो मे ही दिया जाता है। प्रेतों की अपनी दुनिया की तरह प्रेतशब्द अपने संसार मे ही रहे तो ठीक, किंतु यह हमारी दुनिया मे भी आ जाते हैं। हमारी दुनिया मे इन्हें लाकर हमे भले ही लगता हो कि हम अपने विचार पर ग़ैब की, अलौकिकता की हामी भरवा रहे हैं लेकिन असल मे हम मात्र शोर कर रहे होते हैं, निर्रथक प्रलाप- प्रेतों को हमारी दुनिया के बारे में क्या मालूम! शब्द तो वैसे ही छाया है, शब्द छाया हैं क्योकि पहले संसार है फिर चेतना के प्रकाश में इनकी छाया, शब्द। परन्तु, चेतना स्वयम प्रवाह में हैं, अतएव जगत बदलता रहता है, हमारी जगत की समझ, जगत की धारणा बदलती रहती है और इसलिए हमारे शब्द भी बदलते रहते हैं।

वर्तमान में यदि कोई जगत और हमारे खुद के सम्बंध की बात करे तो समकालीन शब्दो मे बात होनी चाहिए वैसे भविष्य के शब्द कहने की क्षमता हो तो अतिउत्तम लेकिन पुराने, मृत शब्दो मे, उन शब्दों में जो चेतना के प्रवाह के क्रम में उसने जगत की हजारों वर्ष पुरानी छाया बनाते हुए बुद्धि को दी थी, भला क्यों स्वीकार्य हो--प्रेत हमारी दुनिया से दूर ही रहे तो बेहतर, वैसे भी प्रेतों को बस ब्रह्मबाबा बनाकर बाँध दिया जाता है।

 

 

 

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अपने आत्ममुग्ध संसार की वियरडेस्ट आइडिया में जहाँ मुझे आइंस्टीन में सुधार करने की स्वतंत्रता है, मैं उनके इंवेरिएएबल इन्टिटीज को क्यों सापेक्ष बनाते हुए समस्त भौतिकी के नियमो को चेतना से अनुबंधित बना देना चाहता हूँ?

इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि मैं आइंस्टीन की थ्योरी के इसी पक्ष से अधिक परिचित हो पाता हूँ। ऐसा इसलिए है कि मेरे पास वह गणितीय ज्ञान नही है जिसके आधार पर मैं उनके समीकरण के तकनीकी पहलुओं पर चर्चा कर सकूं।

लेकिन, इसका यही एकमात्र कारण नही है---इसका सबसे बड़ा कारणयह है कि मैं अंदर ही अंदर कहीं ना कहीं चेतना को भौतिक चीजो और नियमो पर प्रमुखता देना चाहता हूं--कहीं न कहीं मेरे अंदर आज भी वह "सत-चित-आनंद" है। कहीं न कहीं मैं इस बात को स्वीकार नही कर पा रहा हूँ कि मनुष्य शून्यता में टँगा अस्तित्व है। कहीं न कहीं मैं अपने अंदर एक तत्त्वमीमांसिय आयाम देखना चाहता हूं, बल्कि वह तत्त्वमीमांसिय आयाम जिसमे मैं "फेंका हुआ" नही हूँ, मैं सृष्टि की अराजकता का परिणाम नही हूँ बल्कि ब्रह्म भी है और मैं अहम ब्रह्मास्मि के बोध को प्रयासरत एक आत्मा।

मैं नही जानता कि मैं अपने अस्तिववादी क्राइसिस से बचकर कामू के शब्दों में दार्शनिक आत्महत्या कर रहा हूँ या किरकेगार्ड के शब्दों में मेरी आत्मा आस्था की छलांग लेने को बेचैन है--लेकिन मैं कुछ कर रहा हूँ, मेरा आत्ममुग्ध संसार इसकी गवाही है।

हम सब कुछ कर रहे हैं: हमारे आत्ममुग्ध संसार इसकी गवाही हैं।

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विवेकानंद-काँट और दो रिएल्मस या सत्ता के दो विभाग

माया की व्याख्या के क्रम में विवेकानंद एक प्रश्न उठाते है--क्या हमारा स्व हमारे शरीर से कूद कर बाहर आ सकता है?

वस्तुतः यह विचारसाहित्य और दार्शनिक ग्रन्थोंकोई बार एंटरटेन किया गया है। हालिया हॉलीवुड की इंसीडियस फ़िल्म श्रृंखलाओं में व्यक्ति अपने भौतिक शरीर से निकल कर एक दूसरे रिएल्म में चला जाता है बल्कि उसका एस्ट्रल शरीर उसके भौतिक शरीर से बाहर निकल कर दूसरे रिएल्म में जाता है और वहां फंस जाता है।

राजा जनक को विदेह कहने केपीछे भी यही विचार उपस्थित है कि राजा जनक का स्व या उनकी आत्मा उनके शरीर से बाहर निकल जाती थी तथा पुनः उनके नियंत्रण में वापस शरीर मे स्थापित हो जाती थी।

एक और शास्त्रीय उदाहरण इस मिथक में मिलता है जिसके अनुसार आचार्य शंकर ने मंडन मिश्र की पत्नी के काम विषयक प्रश्नों का उत्तर देने के लिए किसी राजा के शरीर मे प्रवेश किया था।

इस प्रकार शरीर और शरीर छोड़ने का विचार मानवीय संस्कृति में कैसे उपस्थित हुवा यह बड़ा ही रोचक विषय है और एंथ्रोपोलॉजिस्टो के पास इसकी तमाम व्याख्याएं है लेकिन फिलहाल हमारा अभिप्राय इस विचार के इर्द गिर्द विकसित विविध दार्शनिक सिद्धांतो और विशेषकर विवेकानंद द्वाराव्याख्या की गई उनका माया का सिद्धांत है।

हमने अभी ऊपर रिएल्म शब्द का प्रयोग किया। ररिएल्म शब्द के प्रयोग का निहितार्थ है जगत को दो टुकड़ों में बांट देना--एक यह दृश्य जगत है और दूसरा अदृश्य इन्द्रियातीत ट्रान्सेंडैंटल जगत या सत्ता।

जगत काहमारे चिंतन में इस प्रकार दो टुकड़ो में बंट जाना अब नए दार्शनिक प्रश्नों को उपस्थित करता है--इन दो रिऐल्मो का आपस मे सम्बन्ध क्या है, इन दो रिएल्म में क्या दोनों वास्तविक है अथवा इनमें से एक अधिक वास्तविक है और दूसरा पहले से कम वास्तविक?

ध्यान देने की बात यह भी है कि दर्शन या समग्रता में कहें तो मानवीय चिंतन की दिशा सदैव रेखीय नही होती अतः दार्शनिकों ने यह भी प्रश्न उठाया है कि क्या ट्रान्सेंडैंटल रिएल्म का कुछ अर्थ भी है और यद्यपि वास्तव में यदि ट्रान्सेंडैंटल रिएल्म उपस्थित हो भी तब भी क्या यह हमारी ज्ञानमीमांसा का विषय होना चाहिए जब हमारे इस रिएल्म को यह प्रभावित नही कर सकता।

दर्शन के इतिहास में एक ट्रेंड लगातार उपस्थित रहा है कि पूर्व में दार्शनिक जगत के दो भागों में विभाजित कर इन दोनों भागो में मध्य एक बहुत बड़ी खाई रच देते है जिसे उनका अनुवर्ती दार्शनिक आ कर भरता है। जगत को जब कोई दार्शनिक दो फांड़ो में बांट देता है तो सामान्यतया--

अनुभवातीत जगत या सता को इस आनुभविक जगत से ज्यादा वास्तविक समझा जाने लगता है जैसा कि प्लेटो के दर्शन में प्रत्ययों का जगत और आनुभविक जगत में एक उग्र द्वैत उपस्थित होता है। इस द्वैत में आनुभविक जगत प्रत्ययों के जगत की छाया और अपूर्ण प्रतिलिपि है।

अरस्तू फॉर्म्स को प्रत्ययों के लोक से वापस इहलोक में लाकर प्लेटो द्वारा खींची गई उहलोक और इहलोक की खाई को पाटने का प्रयास करते हैं।

काँट के फिनोमिना और न्युमोना के द्वैत को हीगल फिनोमिना को ही सत्य मानकर समाप्त कर देते है तथा काँट की यह समस्या की बुद्धि समान रूप से वैध विपरीत युग्मो की रचना कर देती है, के हल के रूप में इन युग्मो मे उपस्थित विपरितों को सत्य के स्वयम को अभियक्त करने के तरीके बता कर करते हैं।

स्वामी विवेकानंद को भी दो रिएल्म स्वीकार्य है-पहला यह आनुभविक जगत है और दूसरा परमार्थ अथवा ब्रह्म। पारमार्थिक रिएल्म सत है जबकि आनुभविक रियेल्म न सत है और न ही असत---अपितु यह अनिवर्चनीय है।

लेकिन पश्चिम के उदाहरण तरह ऐसा कोई पश्च-विवेकानद दार्शनिक नही हुवा जिसने यह कहने का साहस किया हो कि मायामात्र ही सत है और इससे परे हमे किसी ट्रांसेन्डेन्ट सत्ता की आवश्यकता, माया, जो स्वामीजी के शब्दों में स्टेटमेंट ऑफ द फैक्ट ऑफ यूनिवर्स है, की व्याख्या के लिए नही है अन्यथा हमारे यहाँ भी आज दर्शन की दिशा पश्चिम की तरह गतिशील और वैविध्यपूर्ण होती।

 

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समय: आइंस्टीन, कांट और हाइडेगर

समय, वह शाश्वत पहेली, जो सदा से मानव मन के लिए एक खोज और प्रश्न का विषय रही है, इन तीन महान चिंतकों—आइंस्टीन, कांट और हाइडेगर—के चिंतन में विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। तीनों की दृष्टि अपने-अपने क्षेत्र की सीमा में बंधी प्रतीत होती है, परंतु उनके विचारों का गहन विश्लेषण यह दर्शाता है कि उनके चिंतन में समय की अवधारणा एक केंद्रीय सूत्र के रूप में विद्यमान है।

आइंस्टीन के लिए समय वह धुरी है, जो स्थान के साथ मिलकर स्पेस-टाइम (दिक्काल) का ताना-बानाबुनती है। यह प्रेक्षक और गति पर आधारित है, जिसमें समय सापेक्ष होता है, मापनीय होता है। यह मापनीयता ब्रह्मांड के वस्तुनिष्ठ नियमों से जुड़ी है, परंतु इसमें भी यह अनिवार्य है कि प्रेक्षक की गति और संदर्भ फ्रेम समय के अनुभव को परिवर्तित कर देते हैं। गति के समीपस्थ होने पर समय मंद पड़ता है, जैसे किसी स्थिर घड़ी की तुलना में चलती घड़ी धीमी चलने लगती है। यह समय भौतिक जगत का एक पहलू है, परंतु यह बाह्य संसार में स्वयं को स्वतंत्र सत्ता के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।

कांट के चिंतन में समय की प्रकृति और भी अधिक सूक्ष्म और गूढ़ हो जाती है। उनके अनुसार, समय किसी बाहरी वस्तु का गुण नहीं है, न ही यह ब्रह्मांड के नियमों से निर्मित है। यह मानव मन की वह संरचना है, जो अनुभव को सुव्यवस्थित करने के लिएए प्रयोराई के रूप में हमारे अंदर पहले से ही विद्यमान है। कांट का समय वस्तुनिष्ठ नहीं, बल्कि आत्मसंबंधी है। यह मनुष्य के ज्ञान का एक उपकरण है, जिसके बिना अनुभवों की व्याख्या संभव नहीं। वस्तुतः, समय हमारी चेतना में पूर्व-स्थापित एक फ्रेमवर्क है, जो वस्तुओं को समझने और उनके पारस्परिक संबंधों को स्थापित करने का माध्यम है।

हाइडेगर, समय को अस्तित्व के मूलभूत आयाम के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए समय मात्र मापनीय नहीं है, न ही यह किसी मानसिक संरचना का परिणाम है। समय, मनुष्य के "दासीन" (अस्तित्व) का वह पहलू है, जो उसे भूत, वर्तमान और भविष्य में बांधता है। हाइडेगर के चिंतन में समय अस्तित्व का वह बोध है, जो मृत्यु, संभावनाओं और मानव स्वायत्तता के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। मनुष्य का अस्तित्व समय के बिना अधूरा है, और यह समय का ही प्रभाव है कि मनुष्य भविष्य की संभावनाओं की योजना बना सकता है या भूतकाल के अनुभवों से अपनी दिशा तय कर सकता है।

इन तीनों विचारकों के चिंतन में समय की व्याख्या भले ही विविध हो, परंतु एक गहन साम्यता है। यह तीनों इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि समय एक स्वतंत्र, निरपेक्ष सत्ता नहीं है। आइंस्टीन के लिए यह गति और प्रेक्षक पर निर्भर है, कांट के लिए यह मानव चेतना की संरचना का हिस्सा है, और हाइडेगर के लिए यह अस्तित्व का अनिवार्य आयाम है। इस प्रकार, तीनों के चिंतन में समय को किसी बाहरी सत्य या अपरिवर्तनीय वास्तविकता के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इसे प्रेक्षक, अनुभव और अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित किया गया।

इन तीनो का चिंतन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि समय का स्वभाव सदा सापेक्ष है, परंतु उसकी यह सापेक्षता उसे महत्वहीन नहीं बनाती। यह मनुष्य के अस्तित्व और ब्रह्मांड की समझ का वह अभिन्न पहलू है, जो भौतिक, मानसिक और अस्तित्वात्मक, तीनों स्तरों पर गहराई से व्याप्त है। इस दृष्टिकोण से समय एक रहस्यमयी शक्ति बन जाता है, जो मापन से परे, अनुभव के ताने-बाने में बसी हुई है।

 

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विज्ञान के तीन छलांग:

1 फाउंडेशनल लीप: विज्ञान की नींव में उपस्थित है

2 इंडक्शन लीप: आनुभविक विज्ञानों की प्रक्रिया में उपस्थित है।

3 रिवोल्यूशनरी लीप: विज्ञान के विकास में पैराडाइम शिफ्ट (Khunn) के रूप में उपस्थित है

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एक अंधा व्यक्ति था। उसके हाथ एक आधे किलो की वस्तु लग गई। उसने यह बस मान लिया कि यह सोना है।

उसने ढाई सौ ग्राम सोने की कीमत बाजार में पता की। उसने यह गणना की कि यदि उसके पास उतने पैसे होते तो वह 5 वर्ष तक बिना कुछ किए जी सकता था। उसे किसी ने यह भी बताया था कि यदि वह 200 ग्राम सोने से बगल वाले गांव के वैद्य से औषधि बनवा ले तो 5 वर्षो में उसकी आँखों की ज्योति वापस आ जाएगी। उसने यह भी पता किया कि सोने के 200 ग्राम की उस औषधि बनवाने का मूल्य 50 ग्राम सोने के बराबर है और वैद्य रुपयों की जगह सोना भी स्वीकार कर लेता है।

अंधा बाज़ार पहुंचा और उसने अपनी सोना मानी चीज का आधा हिस्सा बेच दिया जिससे उसे कुछ रुपए मिले। वह वैद्य के घर भी गया और वैद्य तत्काल मान गया कि वह इस वस्तु के 200 ग्राम से एक औषधि बना देगा जिसके बदले में वह 50 ग्राम वस्तु रख लेगा।

ठीक पांचवे वर्ष उस अंधे का पैसा भी समाप्त हो गया और उस औषधि के कारण उसकी आँखों की रौशनी भी वापस आ गई।

तब तक वह वैद्य और वह जिसने उससे वह वस्तु खरीदी थी दोनों मर चुके थे अतः वह उनसे नही पूछ सकता कि वह चीज सोना थी या नही।

लेकिन वह वस्तु सोना थी कि नही? क्या अंधे की पूर्वमान्यता सोने में उपस्थित अर्थक्रियात्मकता के चलते निष्कर्ष नही बन गई?

क्या सनमुच हम कह सकते हैं कि वस्तुवाद विज्ञान की पूर्वमान्यता है निष्कर्ष नही?

विज्ञान की पूर्वमान्यताएँ है कि

■ जगत हमसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान है,

■ जगत को जाना जा सकता है,

■ जगत में नियमबद्धता है तथा ये नियम ज्ञेय हैं।

इन पूर्वमान्यताओ से हम प्रारम्भ कर यदि आज तक जगत को जान ही रहे हैं, इसके नियमो को भी जान पा ही रहे हैं और वो हमारे लिए काम करते हों तो भले ही यह कहा जाय कि इन पूर्वमान्यताओ की स्थापना में "आस्था की छलांग" इम्प्लाइड है लेकिन वह पूर्वमान्यताएँ क्या स्वयम वैज्ञानिक निष्कर्ष नही बन रही हैं?

हमने कोई किसी पूर्वमान्यता के साथ उस मान्यता की स्थापित सीमा में कोई अनुसन्धान प्रारम्भ किया। मान लिया की अब अब तक उस मान्यता पर आधारित जितने भी निष्कर्ष है वह प्रेडिक्टिव पावर रखते हैं। स्थापित निष्कर्षों की भी आपस मे संगति है। अभी तक कोई ऐसा ऑबर्जवेशन नही मिला जिसकी व्याख्या इन पूर्वमान्यताओ कि पृष्ठभूमि में न हो सके तो फिर यह पूर्वमान्यताएँ स्वयम भी क्या निष्कर्ष नही बन जातीं?

अल्बर्ट आइंस्टीन की स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी दिक और काल के सम्बन्धो में एक सिद्धान्त है जिसमे देश और काल अलग अलग न होकर समेकित रूप से "दिक्काल" हैं। जगत इस प्रकार चतुर्विमिय है।

आइंस्टीन स्पेशल थ्योरी और रिलेटिविटी में दो पूर्वमान्यता स्थापित करते है और इन्ही पूर्वमान्यताओं के आधार पर आगे बढ़ते हैं:

◆भौतिकी के नियम सारे इनर्शियल फ्रेम ऑफ रेफरेंस में समान हैं तथा

◆प्रकाश की निर्वात में गति सारे प्रेक्षकों के लिए समान है और प्रकाश स्रोत तथा प्रेक्षक की गति से निरपेक्ष है।

यद्यपि स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के कई कौंसिक्वेंस है और इनका प्रेडिक्शन हमारे अनुभव से मेल रखता है तथापि एक प्रश्न यह किया जा सकता है कि उपरोक्त दो पूर्वमान्यताएँ, जिन पर स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी टिकी हुई है क्या अपने आप मे निष्कर्ष भी नही बन जाते?

वस्तुवाद वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार ज्ञेय का हमारी चेतना से स्वतंत्र अस्तित्व है। ज्ञेय की सत्ता हमारी चेतना की अपेक्षा नही रखती। ध्यातव्य है कि वस्तुवाद के उलट एक दूसरी विचारधारा भी है जिसमे ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता की अपेक्षा रखती है। अपने उग्र रूप में यह सिद्धान्त पश्चिम में बर्कली के "सत्ता दृश्यता है" कथन में दृष्टिसृष्टिवाद के रूप में मिलता है। यदि इस विचार को और अधिक उग्र रूप दिया जाय तो यह "मैं और मेरे मानसिक प्रत्यय ही सत्य हैं" के विचार में तब्दील हो जाता है।

भारत मे बौद्ध विज्ञानवादी अवस्तुवादी है जिनके अनुसार विज्ञान या चेतना मात्र सत्य है।

वैज्ञानिक प्रविधि में इस पूर्वमान्यता मे विश्वास शामिल होता है कि जगत हमसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान है तथा इसे जाना जा सकता है।

विज्ञान का विकास वस्तुतः इन्ही पूर्वमान्यताओ की पृष्ठभूमि में होता है। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि हमारी ये पूर्वमान्यताए सत्य है या असत्य या यूं कहें कि इनके अनुरूप किसी बाह्यार्थ की संवादिता है अथवा नही है इसके निर्धारण की न तो हमारे पास कोई विधि हैऔर न ही इसका निर्धारण किया जा सकता है।

यहाँ हम निर्धारण की एक दूसरी विधि में विश्वास करते हुए इनके बारे में कोई निर्णय देते है और वह दूसरी विधि है हमारे अनुभव में आए जगत का इन पूर्वमान्यताओ पर आधारित तन्त्र के अंतर्गत सुगमता से व्याख्या होते चले जाना।

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चुकी यह स्थापित हो चुका है कि विज्ञान में तदर्थ आधार पर किसी थ्योरी केपोस्टयूलेट्स ही निष्कर्ष बन जाते हैं और आगे इस पोस्टयूलेट्स आधारित निष्कर्ष या इम्प्लिकेशन निगमित किए जाते हैं और इन निगमित निष्कर्षो से संवादिता रखती घटनाए या वस्तुए इस जगत में खोजी जाती है या प्राप्त कर ली जाती है।

इस एक्सपेरिमेंटल वेरिफिकेशन से बस इतना ही होता है कि वह पूर्वमान्यता जिससे हमने यह घटना या वस्तु गणितीय रूप से प्रेडिक्ट किया था, खारिज नही होती और हमे अपने अनुसन्धान के प्रतिमान, पैराडाइम या पोस्टयूलेट्स में तब्दीली नही करनी होती है।

वैज्ञानिक विकास के इतिहास में बहुत सी घटनाए, चीजे हैं जिन्हें इस प्रकार से पहले ही गणितीय रूप से प्रेडिक्ट कर लिया गया था किंतु इनका प्रायोगिक सत्यापन बाद में हुआ।

हिग्स बोसोन, या पापुलिज्म के लिए इनको दिया गया नाम "गॉड पार्टिकल' इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है जिसे पीटर हिग्ग्स की थ्योरी गणितीय रूप से प्रेडिक्ट कर रही थी किन्तु इसका प्रायोगिक सत्यापन सम्भवतः 12 वर्षो के बाद सर्न के लार्ज हाइड्रोन कोलाइडर में हुआ और तब जाकर पीटर हिग्ग्स को नोबेल पुरस्कार दिया गया।

बहरहाल, यहां जो प्रश्न है वह यह है कि जिनसे यह सब आरम्भ हुआ या होता है वह पूर्वमान्यताएँकैसे अस्तित्व में आती हैं, इनके अस्तित्व में आने या लाने के लिए क्या कोई विधि (वैज्ञानिक) है?

इसका उत्तर है नही: इन पूर्वमान्यताओ की स्थापना के लिए कोई वैज्ञानिक विधि नही है।

इनकी स्थापना में या तो इंट्यूशन या ट्रायल एंड एरर द्वारा प्राप्त की गई एक सोंच होती है जो संयोग से जो कुछ प्रेडिक्ट कर रही होती है वह सही हो रहा होता है।

यह विज्ञान में अंतर्निहित "फाउंडेशनल लीप" है।

जब आप विज्ञान के आधार, विज्ञान की पूर्वमान्यताओ की छानबीन करते हैं तो आप पाते हैं कि यहाँ एक छलांग है। इसे महज छलांग कहें तो बेहतर क्योकि इसमे अंतर्निहित विश्वास कमो-बेश जस्टिफाइड तो हो सकता है, सत्य नही हो सकता। यह सत्य इसलिए नही हो सकता कि हमारे पास कोई साधन ही नही की हम इसे इस स्तर पर सत्य या असत्य प्रमाणित कर पाए।

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हमारे बारे में और हमारे द्वारा गौशिपिंग हमारे विकासात्मक अतीत, इवोल्यूशनरी पास्ट का एक हिस्सा रहा है। युवल हेरारी तो इसको भाषा के विकास के कारणों में ही शामिल कर देते है। मनुष्यो द्वारा अमूर्तिकरण की शक्ति और इन अमूर्त प्रत्ययों को आपस मे मिला कर देखने का पहला प्रयोग यह गॉशिप ही था।

एक उदाहरण से समझिए, मनुष्य ने सिंह देखा और उसका अब्स्ट्रेक्शन किया फिर उस अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। मनुष्यो ने मनुष्य के अब्स्ट्रेक्शन के पश्चात भी इसअब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। अबउसको एक प्रयोग करना था और यह प्रयोग उसे आगे दार्शनिक, कलाकार व वैज्ञानिक बनाने वाला था। उसने सिंह के सर और मनुष्य के शरीर को मिला दिया और अपने गॉसिप में एक शब्द दिया सिंह-मानव।

आदिमानव के लिए इस "सिंह-मानव" की बात करना उसके मनोरंजन का भी साधन था और उसके समूह जिसमे बीस, तीस लोग रहते थे उनके साथ और अधिक सोशल बॉन्डिंग करने का तरीका भी था क्योकि सिंह-मानव के बारे में सुनने के लिए उसके समूह के सभी सदस्य रिलेक्सड मूड में एक साथ बैठते।

यही नही आरम्भ में वह गॉसिप का पात्र बनने से डरता भी था और इस तरह उसका समूह उसके ऊपर एक अंकुश भी लगाता और वह अपने समूह के मूल्यों से विचलित न होता।

कॉग्निटिव रिवोल्यूशन के दूसरे चरण (हेरारी) में यह गौशिपिंग मूर्त से अमूर्तता की ओर मुड़ती चली गई। यह प्रथम चरण जहाँ मिथकीय चिंतन था तो द्वितीय चरण तत्वमीमांसिय (आफ्टर कॉम्टे)।

यदि संज्ञानात्मक विकास के प्रथम चरण में मनुष्य सिंह और मानव को मिला कर एक मिथकीय जीव सिंह-मानव की कल्पना कर इसके बारे में कथा-कहानियां रचता तो अपने संज्ञानात्मक विकास के द्वितीय चरण में उसने आइडियाज से क्रीड़ा करनी आरम्भ कर दी।

सत, चित आनन्द का समेकित रूप इसी चिंतन की उपज है जहां मनुष्यो ने प्रथमतः उसके सेंस डाटा से प्राप्त जगत का मानसिक निषेध किया, इस निषेध से प्राप्त मानसिक सत्ता को सकारात्मक कोटि से आबद्ध किया और इस पर अन्य दो गुणों चित और आनन्द का आरोपण कर दिया।

पश्चिम में इस चिंतन के विरुद्ध यह कहकर भी प्रतिक्रिया हुई कि यह भाषाई अज्ञेयों द्वारा मानसिक व्यायाम मात्र है।

संज्ञानत्मक विकास के तृतीय चरण में ही यह अनिवार्य बना की मनुष्य अपने गौशिपिंग के अनुरूप संवादिता रखती चीजें जगत में प्राप्त करे। अन्यथा की स्थिति में इसे स्वीकार्यता नही मिलनी थी।

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"Induction is the glory of science and the scandal of philosophy"

C. D. Broad

आगमन विज्ञान का वैभव और दर्शन का कलंक है

इसके पूर्व की विज्ञान की दूसरी छलांग "आगमनात्मक छलांग" की बात की जाय, आगमन क्या है इसकी समझ अपरिहार्य है।

आगमन एक तर्क-प्रक्रिया है जिसमे विशेष से सामान्य की ओर जाया जाता है।

विज्ञान का कार्य चूंकि जेनरलाईज करना है अतः विज्ञान की क्रियाविधि के लिए आगमन का विशेष महत्व है।

आगमन निगमन का विपरीत है, निगमन में जहांविशेष निष्कर्ष की स्थापना सामान्य आधारवाक्यों से होती है वहीं आगमन विशेषो से आरम्भ कर सामान्य पर आता है।

हम एक प्रतिज्ञप्ति लेते हैं, "धातुए गर्म करने पर फैलती हैं"

इस निष्कर्ष की स्थापना में विविध धातुओं को गर्म करने का प्रयोग किया गया होगा और सबका गर्म होने पर विस्तार पाया गया होगा तभी यह निष्कर्ष स्थापित हुआ कि धातुए गर्म होने पर फैलती हैं।

लेकिन यहाँ एक पेंच है---

हम दुनिया की समस्त धातुओं के साथ यह प्रयोग नही कर सकते साथ ही हम न तो अतीत की धातुओं और न ही भविष्य की धातुओं के साथ यह गर्म करने वाला प्रयोग कर सकते है। तब भी हम यह निष्कर्ष स्थापित कर देते हैं कि "धातुए गर्म होने पर फैलती हैं।'

दरअसल हमने यह दो अन्य आगमन द्वारा प्राप्त आधार ज्ञान का सहारा लिया है:

1 प्रकृति की एकरूपता तथा

2 कार्य कारण सम्बन्ध की निश्चितता

लेकिन समस्या यह है कि न तो हम किसी विधि प्रकृति की एकरूपता और न ही कार्य कारण सम्बंध पर ही कोई जेनरलाईज बात कर सकते हैं, यहां हमे बस इनको स्वीकार कर लेना पड़ता है।

हमने यहां अपने वैज्ञानिकता की तिलांजलि दी है और एक छलांग लगाई है--आगमनात्मक छलांग।

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र्कली और विटगेन्स्टिन: चेतना और भाषा से सीमित जगत

विभिन्न दार्शनिकों ने वास्तविकता और अस्तित्व के बारे में अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। दो महत्वपूर्ण दार्शनिक, जॉर्ज बर्कली और लुडविग विटगेन्स्टिन, ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए, जिनमें बर्कली आध्यात्मिक आदर्शवाद (Idealism) के समर्थक थे, जबकि विटगेन्स्टिन ने भाषिक तथ्यवाद (Linguistic Factism) का समर्थन किया। इन दोनों के दर्शन में एक गहरी समानता और अंतर है, जो उनके जगत के अस्तित्व और हमारी समझ के बीच के संबंधको परिभाषित करता है।

बर्कली का दृष्टिकोण: चेतना से सीमित जगत

जॉर्ज बर्कली का दर्शन आध्यात्मिक आदर्शवाद (Idealism) पर आधारित है, जिसमें वह मानते हैं कि भौतिक वस्तुओं का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। उनका प्रसिद्ध सिद्धांत "Esse est percipi" (अस्तित्व का अर्थ है अनुभव होना) यही दर्शाता है कि कोई वस्तु तभी अस्तित्व में आती है जब उसे किसी चेतना द्वारा अनुभव किया जाता है।

बर्कली के अनुसार, जगत केवल चेतना से सीमित है। उनका मानना था कि भौतिक वस्तुएं या बाहरी जगत का अस्तित्व केवल हमारी मानसिक धारणा और अनुभव पर निर्भर करता है। उनका यह विचार था कि वास्तविकता का अस्तित्व केवल तब तक होता है जब तक कि वह किसी चेतना द्वारा अनुभव नहीं की जाती। इसलिए, बाहरी जगत का अस्तित्व मानसिक या बोधात्मक अनुभव तक सीमित है, और वस्तुएं केवल हमारी चेतना का परिणाम होती हैं।

इस दृष्टिकोण में बर्कली हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या वास्तव में भौतिक वस्तुएं एक स्वतंत्र अस्तित्व रखती हैं, या उनका अस्तित्व केवल हमारे मानसिक अनुभव और चेतना के परिणामस्वरूप होता है।

विटगेन्स्टिन का दृष्टिकोण: भाषा से सीमित जगत

लुडविग विटगेन्स्टिन ने अपने दार्शनिक कार्यों, विशेष रूप से "Tractatus Logico-Philosophicus" में, एक बहुत ही महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किया कि जगत केवल तथ्यों (facts) का समुच्चय है, न कि वस्तुओं का। विटगेन्स्टिन के अनुसार, हम केवल उन्हीं तथ्यों के बारे में जानते हैं, जिन्हें हम भाषा के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं। उनका यह कथन "The world is the totality of facts, not of things" (द वर्ल्ड इज़ द टोटैलिटी ऑफ फैक्ट्स, नॉट ऑफ थिंग्स) इस विचार को स्पष्ट करता है कि भौतिक वस्तुओं का अस्तित्व महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वास्तविकता तथ्यों और भाषिक अभिव्यक्तियों में सीमित होती है।

विटगेन्स्टिन के लिए, जगत का अस्तित्व केवल भाषा और भाषिक तथ्यों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है। उनका मानना था कि हमारी भाषा के बाहर कोई वस्तु या तथ्य अस्तित्व में नहीं आता। इसलिए, उनकी दृष्टि में भाषा ही वह माध्यम है, जो वास्तविकता के अनुभव को व्यक्त करती है, और हम केवल उन्हीं चीजों के बारे में बात कर सकते हैं जो भाषा में व्यक्त की जा सकती हैं। इस प्रकार, विटगेन्स्टिन का जगत भाषा के दायरे में सीमित है, और हम अपनी समझ को केवल भाषिक रूपों तक ही सीमित रखते हैं।

समानता: चेतना और भाषा से सीमित जगत

हालांकि बर्कली और विटगेन्स्टिन दोनों के दृष्टिकोण में भिन्नताएँ हैं, लेकिन इन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण समानता भी है। दोनों ही दार्शनिक जगत को किसी न किसी प्रकार से सीमित करते हैं, लेकिन उनका वह सीमा-निर्धारण भिन्न है।

1. बर्कली के अनुसार, जगत केवल चेतना (Mental Experience) से सीमित है। वह मानते हैं कि भौतिक वस्तुएं केवल हमारे मानसिक अनुभवों का परिणाम होती हैं और इनका अस्तित्व केवल हमारे अनुभव पर निर्भर करता है।

2. विटगेन्स्टिन के लिए, जगत केवल भाषा (Language) से सीमित है। वह मानते हैं कि वास्तविकता और तथ्य केवल भाषिक रूपों में व्यक्त किए जा सकते हैं और हम जो कुछ भी जानते हैं, वह केवल भाषा के दायरे में होता है।

इस प्रकार, दोनों दार्शनिकों के दृष्टिकोण में यह समानता है कि वे जगत को बाहरी, स्वतंत्र और स्वायत्त अस्तित्व के रूप में नहीं देखते। बर्कली के लिए यह चेतना तक सीमित है, जबकि विटगेन्स्टिन के लिए यह भाषा तक सीमित है। दोनों ही अपने-अपने तरीके से यह सिद्ध करते हैं कि हमारी वास्तविकता या अनुभव किसी बाहरी, निरपेक्ष वास्तविकता से नहीं, बल्कि हमारी मानसिक प्रक्रियाओं (बर्कली) या भाषिक संरचनाओं (विटगेन्स्टिन) से प्रभावित होते हैं।

निष्कर्ष

बर्कली और विटगेन्स्टिन दोनों ही जगत को एक निश्चित सीमा में सीमित करते हैं, लेकिन उनका यह सीमित करने का तरीका अलग-अलग है। बर्कली जहां जगत को चेतना से सीमित करते हैं, वहीं विटगेन्स्टिन भाषा के माध्यम से जगत को समझने की कोशिश करते हैं। बर्कली का आदर्शवाद जहां वास्तविकता को मानसिक अनुभवों और चेतना से जोड़ता है, वहीं विटगेन्स्टिन का दृष्टिकोण यह बताता है कि हम केवल उन्हीं तथ्यों के बारे में जान सकते हैं जिन्हें हम भाषा के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं।

इन दोनों के दृष्टिकोण हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या वास्तविकता केवल हमारे अनुभव और भाषा के माध्यम से बनती है, और क्या बाहर की कोई निरपेक्ष वास्तविकता वास्तव में मौजूद है या नहीं।

 

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अविकसित और विकसित धर्मों में ईश्वर की धारणा: झारखंड, बिहार, और यूपी के संदर्भ में

झारखंड, बिहार, और उत्तर प्रदेश के स्थानीय धर्म और कर्मकांड भारतीय उपमहाद्वीप की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का गहरा अध्ययन प्रस्तुत करते हैं। इन परंपराओं में "देव" और "भूत" का सह-अस्तित्व और उनकी अलग-अलग भूमिका विशेष ध्यान आकर्षित करती है।

अविकसित धर्मों में ईश्वर का स्वरूप जटिल और द्वंद्वात्मक होता है। यहाँ ईश्वर का स्याह पक्ष, यानी मेलोवेलेंट (दुर्भावना युक्त) पक्ष, अधिक प्रमुख होता है। वहींविकसित धर्म, जैसे वैदिक हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, आदि, ईश्वर के केवल सकारात्मक और पवित्र पक्ष पर बल देते हैं। यह परिवर्तन और भिन्नता धार्मिक विकास और सांस्कृतिक संक्रमण के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

झारखंड के पारंपरिक धर्म और कर्मकांड, प्रकृति और अलौकिक शक्तियों के निकटतम सह-अस्तित्व का प्रतीक हैं।

1. देव और भूत का मिश्रण:

झारखंड के स्थानीय अनुष्ठानों में देव और भूत के तत्व साथ-साथ पाए जाते हैं।

इन कर्मकांडों में भूत (या स्याह पक्ष) की प्रधानता अधिक स्पष्ट है।

भूत या नकारात्मक शक्तियों को शांत करना पूजा का मुख्य उद्देश्य होता है।

2. बलि-विधान की प्रधानता:

इन धर्मों में बलि-विधानों का उपयोग नकारात्मक शक्तियों को तुष्ट करने के लिए किया जाता है।

यह परंपरा भय और सम्मान के मेल से संचालित होती है।

अविकसित धर्मों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनका उद्देश्य ईश्वर से निकटता प्राप्त करना नहीं है। इसके विपरीत, इन धर्मों में ईश्वर के स्याह पक्ष की उपस्थिति अधिक प्रबल होती है।

अविकसित धर्मों में ईश्वर स्याह और पवित्र दोनों गुणों का प्रतिनिधित्व करता है।

यहाँ स्याह पक्ष अधिक प्रमुख होता है, जो भय उत्पन्न करता है।

पूजा का उद्देश्य इन शक्तियों को नियंत्रित या तुष्ट करना होता है।

कुछ धर्म ऐसे भी हैं, जहाँ ईश्वर का स्याह पक्ष धीरे-धीरे पवित्र पक्ष में बदलता है।

यह संक्रमण आंतरिक कारणों (समाज के भीतर के बदलाव)और वाह्य प्रभावों (अन्य धर्मों के संपर्क) से होता है।

वाह्य प्रभाव के तहत, एक धर्म का ईश्वर किसी अन्य धर्म के ईश्वर के गुणों को अपनाकर एक नई पहचान प्राप्त करता है।

उदाहरण:

बिहार और यूपी के ब्रह्म बाबा और पहलवान बाबा

बिहार और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रह्म बाबा और पहलवान बाबा जैसे देवता "देवा-भूता" के रूप में प्रतिष्ठित हैं। यह देवता इन क्षेत्रों की धार्मिक धारणा और कर्मकांडीय परंपराओं का प्रमुख हिस्सा हैं।

ब्रह्म बाबा और पहलवान बाबा को "देवा-भूता" कहा जा सकता है, क्योंकि वे दोनों ही भूत और देवता के मिश्रित स्वरूप में उपस्थित हैं।

इनकी पूजा का आरंभिक उद्देश्य इन्हें शांत करना और उनकी नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित करना था।

वर्तमान में, इन्हें सकारात्मक शक्तियों के रूप में स्वीकार किया गया है।

ब्रह्म बाबा और पहलवान बाबा को द्वितीयक और तृतीयक स्तर की अलौकिक शक्तियों के रूप में देखा जाता है।

प्रथम स्तर के देवताओं, जैसे शिव, विष्णु, दुर्गा, राम, और काली में "भूत" का कोई अंश नहीं होता। उनकी पूजा सकारात्मक और आदर्श रूप में की जाती है।

वहीं, द्वितीय और तृतीय स्तर के देवताओं की पूजा नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से की जाती है।

विकसित धर्म, जैसे वैदिक हिंदू धर्म, ईश्वर के केवल सकारात्मक पक्ष को प्रस्तुत करते हैं।

इनमें ईश्वर को सद्गुणों का वृहत्तम समुच्चय माना जाता है।

कर्मकांडों का उद्देश्य ईश्वर से सन्निकटता और उसकी कृपा प्राप्त करना होता है।

विकसित धर्मों में ईश्वर का स्याह पक्ष अनुपस्थित होता है।

यह ईश्वर पूर्णतः पवित्र, सकारात्मक, और कल्याणकारी होता है।

विकसित धर्मों में अलौकिकता के स्याह और पवित्र पक्ष के बीच स्पष्ट विभाजन होता है।

यह विभाजन धर्म के विकास और संगठन के साथ उभरता है।

धर्मों में ईश्वर के स्वरूप का संक्रमण आंतरिक और वाह्य दोनों कारकों के कारण होता है।

समाज के भीतर धर्म के पुनर्गठन और पुनःव्याख्या से ईश्वर के स्याह पक्ष का पवित्र पक्ष में रूपांतरण होता है। यह प्रक्रिया धार्मिक विकास और सामाजिक बदलावों का परिणाम है।

जब एक धर्म किसी दूसरे धर्म के संपर्क में आता है, तो उसका ईश्वर वाह्य धर्म के ईश्वर में समाहित हो सकता है।

इसके परिणामस्वरूप, नए गुण और विशेषताएँ उस ईश्वर के साथ जुड़ जाती हैं।

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अहम की संकल्पना: अनात्म और आत्म का विश्लेषण

"अहम" या "मैं" का विचार दार्शनिक दृष्टिकोण से अत्यंत जटिल और बहुआयामी है। यह न केवल हमारी अनुभूतियों और व्यक्तित्व का केंद्र है, बल्कि अस्तित्व और चेतना की गहन खोज में एक महत्वपूर्ण विषय भी है। "अहम" की यह अवधारणा विभिन्न दार्शनिक परंपराओं में अलग-अलग प्रकार से परिभाषित की गई है। विशेष रूप से, बौद्ध और वेदांत दर्शन ने इसे अपने-अपने तरीकों से समझाया है।

हमारे दैनिक जीवन में "अहम" एक व्यवहारिक और कार्यात्मक संकल्पना है। यह "मैं" कीअनुभूति है, जो हमारे अनुभवों, स्मृतियों और इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन यदि इसे गहराई से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि "अहम" कोई स्थायी, अडिग या स्वतंत्र सत्ता नहीं है। यह केवल विभिन्न मानसिक और भौतिक प्रक्रियाओं का परिणाम है, जो निरंतर परिवर्तनशील हैं।

इस पर विचार करें: जब हम कहते हैं "मैं सोचता हूँ," "मैं महसूस करता हूँ," या "मैं करता हूँ," तो यह "मैं" वास्तव में क्या है? यह वही प्रश्न है जो हमें बौद्ध और वेदांत दोनों दर्शनों की ओर ले जाता है:-

महात्मा बुद्ध ने "अहम" की स्थायित्व की धारणा को चुनौती दी। उन्होंने "अनात्म" (नो-सेल्फ) का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसके अनुसार आत्मा या "मैं" का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है। उन्होंने बताया कि "अहम" केवल पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, और विज्ञान) का एक संघात है।

रूप (Form): भौतिक शरीर।

वेदना (Sensation): सुख-दुख की अनुभूतियाँ।

संज्ञा (Perception): बाहरी वस्तुओं की पहचान।

संस्कार (Mental Formations): मानसिक अवस्थाएँ और प्रवृत्तियाँ।

विज्ञान (Consciousness): अनुभव की चेतना।

इन स्कंधों का संघात ही "अहम" का निर्माण करता है। बुद्ध के अनुसार, जब हम इन स्कंधों के पार देखते हैं, तो हमें समझ में आता है कि "अहम" केवल एक प्रक्षेपण है, और यह बोध हमें दुःखों के चक्र से मुक्ति की ओर ले जाता है।

वेदांत दर्शन "अहम" को एक बहुस्तरीय संरचना के रूप में देखता है। उपनिषदों में आत्मा को तीन रूपों में परिभाषित किया गया है:

1. प्रमाता (Knower): यह वह स्तर है, जो हमारी दैनिक अनुभूतियों और कर्मों से जुड़ा हुआ है। यह अहंकार और ममकार का स्रोत है।

2. जीवात्मा (Individual Soul): यह वह आत्मा है, जो जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधी हुई है।

3. साक्षी (Witness Consciousness): यह आत्मा का शुद्ध स्वरूप है, जो अनुभवों का निरीक्षण करता है लेकिन उनमें संलग्न नहीं होता।

वेदांत का उद्देश्य इस "साक्षी" को पहचानना और "अहम ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) के अनुभव द्वारा अद्वैत का अनुभव करना है।

बौद्ध और वेदांत दर्शन दोनों "अहम" को एक भ्रम या सतही परत के रूप में देखते हैं। लेकिन उनकी दृष्टियाँ अलग-अलग हैं:

1. स्वरूप का भेद:

बौद्ध धर्म "अनात्म" का प्रतिपादन करता है, जिसमें "अहम" को केवल एक संघात माना गया है।

वेदांत "आत्मा" को एक शाश्वत, शुद्ध और साक्षी रूप में देखता है।

2. साध्य:

बौद्ध धर्म का लक्ष्य दुःखों का अंत (निर्वाण) है।

वेदांत का लक्ष्य आत्मा और ब्रह्म की एकता (मोक्ष) की प्राप्ति है।

3. अनुभव की गहराई:

बौद्ध धर्म व्यवहारिक अनुभव तक सीमित रहता है।

वेदांत अनुभव की गहराई में जाकर "साक्षी" और "ब्रह्म" तक पहुँचता है।

मैं स्वयं बौद्ध दृष्टिकोण के "अनात्म" और संघातवादी संकल्पना के निकट महसूस करता हूँ। बुद्ध का यह विचार कि "अहम" केवल एक क्षणिक और संघातिक संरचना है, मुझे गहराई से प्रभावित करता है। यह दृष्टिकोण न केवल व्यवहारिक है, बल्कि दुःख और मोह से मुक्ति का सीधा मार्ग भी दिखाता है।

हालाँकि, मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि वेदांत का "आत्मा" और "साक्षी" का विचार अधिक गहन और व्यापक है। यह व्यक्ति को स्वयं के पार जाकर ब्रह्मांडीय सत्य के अनुभव की ओर प्रेरित करता है।

बौद्ध और वेदांत दोनों दर्शन "अहम" की सतही परतों को हटाने और सत्य की खोज करने के प्रयास हैं।

बुद्ध व्यवहार के स्तर पर दुःखों का अंत करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने "प्रमाता" के पार जाने की आवश्यकता नहीं समझी।

वेदांत ने "प्रमाता" के भीतर छिपे "साक्षी" की खोज की, जो ब्रह्मांडीय एकता का प्रतीक है।

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हम जगत को डायरेक्टली तो जानते नही हैं, हम इन्द्रिय संवेदनों और बुद्धि (समेकित रूप से तदर्थ आधार पर इसे मन या माइंड कहा जा सकता है) कि क्रिया द्वारा हमारे लिए प्रस्तुत प्रत्यक्षीकृत जगत (परप्सिवड वर्ल्ड) को ही जानते हैं।

यहाँ कुछ सम्भावनाए हैं:

1. हम जगत को उसकी वस्तुनिष्ठता और सम्पूर्णता में अपने परसेप्शन में पाते हैं:

यह दृष्टिकोण नैव रियलिज़्म (Naive Realism) या डायरेक्ट रियलिज़्म कहलाता है। इसके अनुसार, हमारी इन्द्रियां और मन हमें वस्तुओं को उसी रूप में प्रस्तुत करते हैं, जैसे वे वास्तव में हैं। यह दृष्टिकोण सरल और प्रत्यक्ष है, लेकिन आधुनिक विज्ञान और दर्शन में इसे आम तौर पर चुनौती दी गई है, क्योंकि यह दृष्टि यह मानने में असमर्थ रहती है कि हमारा परसेप्शन वातावरण, मस्तिष्क और इन्द्रिय-तंत्र से प्रभावित होता है।

2. हम जगत को उसकी वस्तुनिष्ठता में किन्तु आंशिक रूप से अपने परसेप्शन में पाते हैं:

यह दृष्टिकोण क्रिटिकल रियलिज़्म (Critical Realism) के करीब है। इसके अनुसार, हमारा परसेप्शन वस्तुनिष्ठ वास्तविकता पर आधारित होता है, लेकिन यह हमेशा संपूर्ण और सटीक नहीं होता। विज्ञान भी इस दृष्टिकोण का समर्थन करता है, क्योंकि हमारी इन्द्रियां और उपकरण वास्तविकता का आंशिक और मध्यस्थ (mediated) अनुभव देते हैं। उदाहरण के लिए, हमारी आँखें केवल सीमित स्पेक्ट्रम की रोशनी को देख पाती हैं।

3. हम जगत को उसकी वस्तुनिष्ठता में पाते ही नहीं हैं, हमारा प्रत्यक्षीकृत जगत वास्तविक जगत की एक डिस्टॉर्टेड इमेज होता है:

यह दृष्टिकोण फेनोमेनोलॉजी (Phenomenology) और कैंटियन एपिस्टीमोलॉजी से जुड़ा है। इमैनुएल कांट ने कहा था कि हम नोउमेनन (वास्तविकता का "वस्तुगत रूप") को कभी नहीं जान सकते; हम केवल फेनोमेनन (हमारे अनुभव के माध्यम से वास्तविकता का प्रतिबिंब) को जानते हैं। इस दृष्टिकोण में हमारा अनुभव हमारी संज्ञानात्मक क्षमताओं और इन्द्रिय संवेदनों द्वारा सीमित और विकृत हो सकता है।

4. हम चिंतन द्वारा जगत की एक वास्तविक तस्वीर बना सकते हैं:

यह दृष्टिकोण रैशनलिज़्म (Rationalism) और साइंटिफिक रियलिज़्म का समर्थन करता है। इसके अनुसार, यद्यपि हमारा परसेप्शन सीमित और विकृत हो सकता है, लेकिन तर्क, विश्लेषण और वैज्ञानिक उपकरणों के उपयोग से हम वास्तविकता के करीब पहुँच सकते हैं। उदाहरण: क्वांटम यांत्रिकी और खगोलशास्त्र में वैज्ञानिक मॉडल वास्तविकता की एक संरचना प्रदान करते हैं, जो हमारी इन्द्रियों से परे होती है।

5. हम जगत की कोई वास्तविक तस्वीर नहीं बना सकते, लेकिन हम परसेप्चुअल जगत की अज्ञात प्रॉपर्टीज को खोज सकते हैं:

यह दृष्टिकोण एग्नॉस्टिसिज़्म (Agnosticism) और इंस्ट्रुमेंटलिज़्म (Instrumentalism) से मेल खाता है। इसके अनुसार, वास्तविकता का कोई अंतिम ज्ञान संभव नहीं है; जो कुछ भी हम जानते हैं, वह केवल हमारे अनुभवों की संरचना और उपयोगिता में सुधार करता है। यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक उपकरणों और उनके परिणामों को व्यावहारिकता तक सीमित रखता है, न कि वास्तविकता का अंतिम चित्र प्रस्तुत करने के रूप में।

 

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जब आप आइंस्टीन के यूनिवर्स को देखते हैं तो इसमे एक एलिगेंस है, एस्थेटिक्स का उत्कर्ष है---

इसमे आप सबकुछ कर सकते हैं लेकिन कुछ नियमो से आपको प्रकृति समझौता नही करने देगी--इन नियमो के अंदर आपको अनन्त स्वतंत्रता है--

लेकिन आप जबआइंस्टीन की दुनिया की सौंदर्य बोध को लिए क्वाण्टम जगत की ओर रुख करते हैं तो आपको झटका लगता है---ऐसा सम्भव नही है---प्रकृति ऐसी नही हो सकती!!!!---मेरी शांत सरल प्रेमिका ऐसी अराजक--इतनी अनिश्चित !!!!!!

आप इसे ऐसे समझिए कि आइंस्टीन का ब्रह्मांड आपके साथसमाज मे खड़ी संस्कारी लड़की है जबकि कवांतम वर्ल्ड रात के समय का बिस्तर है---और भौतिकीविद वह मनोविज्ञानी हैं जो इन दोनों व्यवहारों में एक साम्य ढूंढ रहे हैं, आइंस्टीन तो यह स्वीकार ही नही कर पाए कि दोनों सेटिंग्स में वही लड़की है--उनकी नजर में वह बिस्तर वाला व्यवहार असम्भव है--

बोर-आइंस्टीन डिबेट पूरा यही है।

मजा तब आता है जब बोर आइंस्टीन से कहते हैं कि आइंस्टीन तुम यह न कहो कि वह बिस्तर पर कैसा व्यवहार करे---"आइंस्टीन, डोंट टेल गॉड व्हाट टू डू!"

 

 

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परिप्रेक्ष्यों की अधिकता: जटिलता का संकेत या एक अध्ययन-पद्धति की खोज?

विज्ञान और दर्शन में अध्ययन के विभिन्न दृष्टिकोणों की भूमिका और उनका महत्व सदैव चर्चा का विषय रहा है। मनोविज्ञान, दर्शन और भौतिकी जैसे विषय इस संदर्भ में विशेष रूप से रोचक तुलना प्रस्तुत करते हैं। मनोविज्ञान में जहां अध्ययन के आठ प्रमुख दृष्टिकोण हैं, दर्शन के पास तो परिप्रेक्ष्यों का अनंत भंडार है। दर्शन अपने आप में एक दृष्टिकोण भी है। इसके विपरीत, भौतिकी में, एक ही दृष्टिकोण से विषय को समझने का प्रयास होताहै। इस स्थिति पर विचार करते समय यह प्रश्न उठता है:

क्या दृष्टिकोणों की अधिकता संबंधित विषय की जटिलता को इंगित करती है, या यह इस तथ्य की ओर संकेत है कि विषय अभी भी एक निश्चित अध्ययन-पद्धति की तलाश में है?

भौतिकी में भले ही क्लासिकल मेकेनिक्स और क्वांटम मेकेनिक्स जैसे भिन्न क्षेत्रों का उल्लेख किया जाता है, लेकिन यह दोनों विरोधी नहीं हैं। क्वांटम भौतिकी, क्लासिकल भौतिकी से अधिक मौलिक है, क्योंकि यह न केवल भौतिकी की सभी परिघटनाओं की व्याख्या करती है, बल्कि क्लासिकल भौतिकी को एक विशेष केस के रूप में समेटे हुए है।

इस संदर्भ में, भौतिकी में दृष्टिकोणों की एकरूपता को इसकी गणितीय सुसंगतता और मौलिकता का प्रमाण माना जा सकता है।

हालांकि, क्वांटम भौतिकी की व्याख्या के लिए अनेक मत जैसे कि कोपेनहेगन इंटरप्रेटेशन और मेनी वर्ल्ड्स थ्योरी मौजूद हैं। इनके पीछे का मुख्य कारण यह है कि क्वांटम भौतिकी को अभी तक पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है। इस प्रकार, भौतिकी की एकरूपता का आधार यह है कि उसका विषय (भौतिक संसार) तुलनात्मक रूप से सरल और स्पष्ट है।

मनोविज्ञान में अध्ययन के दृष्टिकोणों की अधिकता, संभवतः, उसके विषय की जटिलता और बहुआयामी प्रकृति का परिणाम है। मनोविज्ञान का विषयवस्तु मनुष्य का मन है, जो सत्ता के कई स्तरों पर संचालित होता है। इसे बेहतर समझने के लिए निम्न तुलनात्मक विचार प्रस्तुत किया जा सकता है:

1. तारे और निम्न जीव की जटिलता का भौतिक आधार:

किसी वैज्ञानिक का यह कथन उल्लेखनीय है कि सबसे छोटे जीव भी किसी विशाल तारे की तुलना में अधिक जटिल हैं।

ऐसा इसलिए है क्योंकि एक तारा केवल भौतिकी के नियमों द्वारा संचालित होता है, जबकि एक जीवित प्राणी में भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान की परतें एक साथ क्रियाशील होती हैं।

2. मनोविज्ञान की स्थिति:

मनुष्य के मन को समझने के लिए इन परतों से आगे बढ़कर, चेतना, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक प्रभावों को भी समझना होता है।

भौतिकी और रसायन के नियमों से संचालित जीव, जब मनोवैज्ञानिक स्तर पर आता है, तो उसकी सत्ता अधिक जटिल और बहु-आयामी हो जाती है।

मन की गतिविधियाँ न केवल भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के नियमों के अधीन होती हैं, बल्कि इसके साथ-साथ मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और दर्शन जैसे उच्चतर नियमों से भी संचालित होती हैं।

मनोविज्ञान में दृष्टिकोणों की अधिकता निम्नलिखित दो मुख्य कारणों से हो सकती है:

1. विषय की जटिलता:

मनुष्य के मन और व्यवहार को एक ही दृष्टिकोण से समझ पाना संभव नहीं है। जैविक दृष्टिकोण मस्तिष्क की संरचना को समझता है, तो व्यवहारवादी दृष्टिकोण व्यक्ति के बाहरी कार्यकलापों पर केंद्रित है। इसी प्रकार, संज्ञानात्मक और मनोविश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अलग-अलग आयामों पर ध्यान देते हैं।

2. अध्ययन-पद्धति की खोज:

यह संभावना भी है कि मनोविज्ञान अभी एक सुसंगत और सर्वमान्य अध्ययन-पद्धति विकसित करने की प्रक्रिया में है। दृष्टिकोणों की अधिकता, इस अन्वेषण की स्थिति को दर्शा सकती है।

भौतिकी ने क्लासिकल और क्वांटम भौतिकी को एकीकृत करते हुए एक सुसंगत संरचना प्रदान की है। इसी प्रकार, मनोविज्ञान भी भविष्य में अपने विभिन्न दृष्टिकोणों को एकीकृत करके एक ऐसी अध्ययन-पद्धति विकसित कर सकता है, जो संपूर्ण और सर्वमान्य हो।

इसके लिए मनोविज्ञान को एक समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तरों को साथ में समेटा जा सके।

हालाँकि, यह भी सत्य है कि मनोविज्ञान की विषय-वस्तु इतनी विविध और जटिल है कि यह बहुआयामी दृष्टिकोण शायद हमेशा बना रहे।

दृष्टिकोणों की अधिकता, किसी विषय की जटिलता और उसके अध्ययन की अवधारणा के विकास दोनों का संकेत हो सकती है। भौतिकी, अपने तुलनात्मक सरल और गणितीय स्वरूप के कारण, एक सुसंगत और एकीकृत संरचना प्रस्तुत करती है। मनोविज्ञान, अपनी बहुस्तरीय और बहुआयामी प्रकृति के कारण, दृष्टिकोणों की विविधता को अपनाने के लिए बाध्य है।

भविष्य में, मनोविज्ञान के विभिन्न दृष्टिकोण एकीकृत होकर एक समग्र अध्ययन-पद्धति की ओर बढ़ सकते हैं। फिर भी, मनोविज्ञान की विषय-वस्तु की प्रकृति को देखते हुए, इसकी जटिलता और बहुआयामिता को पूरी तरह समेट पाना शायद असंभव हो।

 

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धनपत बाबू

हम सब मछलियां ही हैं, हममें से जो भाग्यशाली होते हैं मात्र वही एक कांटेफँसते हैं क्योंकि भांति-भांति प्रकार के कांटे तो हमारे हर ओर हर कदम पर लगे हुए है, हममें से जो भाग्यशाली नही होते वह एक साथ कई कांटो में फँसते हैं और ऊपर खिंचे जाने के क्रम में अपने दुर्भाग्य के अनुसार कई टुकड़ो में बंट जाते हैं।

खैर, यहाँ बात इस फिलोसोफी की न है जो धनपत बाबू ने अपनी डायरी में लिखी थी बल्कि बात फिलोसोफी से एम ए किये धनपत बाबू की है।

धनपत बाबू ने फलाने विश्वविद्यालय से फिलोसोफी मेंएम ए किया हुवा था और फिर चार-पांच साल से बेकार बैठे थे: फिलोसोफी पढ़ने से भला नौकरी या रोजगार मिलता है!

धनपत बाबू ने आरम्भ में तो अपने धनहीनता को, बेरोजगारी को बड़े-बड़े दार्शनिकों के दरिद्र होने के दृष्टांतो से न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया किन्तु साल-दर-साल जीवन और परिस्थितयो का सब्र टूटने लगा था और वो उनसे अब खुले तौर पर अपनी जरूरतों की मांग करने लगी थीं जिसके कारण धनपत बाबू को अब असल दर्शन की समझ आ रही थी। ज्यों-ज्यों धनपत बाबू को असल दर्शन समझ मे आता जाता, त्यों त्यों धनपत बाबू अपनी दर्शन की पुस्तकों को समेट कर अनन्तकाल के लिए सन्दूक में डालते जाते।

पता नही इसे धनपत बाबू की आत्मा की हार कहेंगे या उनके द्वारा जीवन का साक्षत्कार की आज उन्होंने दर्शन की अपनी आखरी पुस्तक भी सन्दूक में डाल दी और अपने बाप-दादा की तरह खेती करने का निश्चय किया। धनपत बाबु को इस निश्चय ने आज अच्छी नींद दी हालांकि उनके स्वप्न में कुछ दार्शनिक आकर उन्हे धिक्कार भी रहे थे। धनपत बाबू को जब ऐसे हीएक दार्शनिक धिक्कार रहे थे तो उनकी नींद खुल गई और वह हड़बड़ाकर बैठ गए।

धनपत बाबू ने पहले तो अपने सिरहाने रखे लोटे से पानी पिया फिर दौड़कर सन्दूक के पास गए और स्वप्न वाले दार्शनिक की पुस्तक निकाल कर उसे हाथों में लिया और उसके पन्ने पलटने लगे।

उस खास पृष्ठ परदार्शनिक ने लिखा था "तुम्हारी पीड़ा तुम्हे तुम्हारे खोल की परतों से मुक्त करती है लेकिन अंततः तुम हो ही नही, केवल वही है"

धनपत बाबू ने इस पंक्ति के नीचे लिखा कि मनुष्य मात्र आवरण थोड़े है कि आवरण उतरता जाय और अंत मे कुछ न मिले, मनुष्य मनुष्य है और अबउनका खोल, उनका आवरण उतर चुका है!

धनपत बाबू ने इन पंक्तियों को अपनी कलम से इतना गड़ा कर लिखा था मानो यह बात पुस्तक से होते हुए उस दार्शनिक की आत्मा पर अंकित हो जाये और सम्भवतः हुवा भी यही क्योकि उनके द्वारा यह लिखने के पश्चात उस दार्शनिक ने उन्हें फिर कभी दुबारा स्वप्न में न धिक्कारा।

★★★★

धीरे-धीरे धनपत बाबू अपनी दर्शन की पुस्तकों को अपने सन्दूक में हमेशा के लिए बंद करते जा रहे थे क्योकि अब दुगुने गति से जीवन उनके सम्मुख मुख बाए खड़ा रहता।

मुझे याद है कि एक रात धनपत बाबू के सपने में किसी दार्शनिक ने आकर उन्हें धिक्कारा था जिससे हड़बड़ाकर उनकी नींद टूटी और उन्होंने उस दार्शनिक की पुस्तक में अपनी कलम गड़ाते हुए कुछ लिखा मानो वह उस दार्शनिक की आत्मा पर अपने जीवन का अनुभव अंकित कर रहे हों---इसके बाद उन्हें किसी भी दार्शनिक ने कभी परेशान नही किया--स्वप्न में भी नही--हम नही जानते कि यह उनकी हार थी या जीत कि उन्होंने उस दिन के बाद कभी दर्शन की पुस्तकों को हाथ नही लगाया--अब वह जीवन में उलझते चले गए-----

इस घटना को हुए दस-बारह वर्ष बीत गए थे, धनपत बाबू गिरते-पड़ते एक सरकारी मुलाजिम बन चुके थे। सरकारी मुलाजिम बनने के साथ तो नही किंतु शनै: शनै उनकी आत्मा भी सरकारी मुलाजिम की हुई जाती थी, यद्यपि कभी-कभार उनका पुराना शरीर, जो एक दार्शनिक का था, उनसे दर्शन के पठन-पाठन की जिद कर बैठता।

लोग कहते हैं कि इसी जिद के कारण धनपत बाबू के सरकारी टेबल के ड्रावर में दो-चार वर्षों से वह 'भाषा-दर्शन' की पुस्तक पड़ी हुई थी, जो कभी खुली ही नही लेकिन---------

आज इस पुस्तक के साथ अप्रत्याशित हो गया, आज धनपत बाबू ने यह पुस्तक खोल दी और इसेउस व्यक्ति के सामने कर दिया--

"इसमे डाल दीजिए", धनपत बाबू ने कहा।

व्यक्ति ने पुस्तक के पन्नो के बीच 'चढ़ावा' डालते हुए पुस्तक को बंद कर धनपत बाबू को वापस कर दिया।

पतन!! धनपत बाबू का शरीर विचलित हुआ, उनके हाथ कापें---पुस्तक की आंखे अंगारों से भरी थीं, पुस्तक धनपत बाबू को जला देने वाली निगाहों से देख रही थीं--हा, आज सरस्वती लक्ष्मीसे हार रही थीं------

लेकिन धनपत बाबू की आत्मा निस्पृह खड़ी थी, धनपत बाबू की आत्मा ने यह साक्षात कर लिया था कि सरस्वती सदैव लक्ष्मी की दासी हैं---यह पतन नही बल्कि संसार का स्वाभाविक पथ है--

धनपत बाबू ने पुस्तक को ड्रावर में वापस रखा और बाहर सिगरेट पीने निकल गए।

★★★

 

 

बीज मंत्रों का अस्तित्व और उनका रहस्य

बीज मंत्रों का अस्तित्व और उनका रहस्य अत्यधिक गहरा और आत्म-संवेदनशील है। 'क्रीं', 'क्लीं' जैसे बीज मंत्रों का आभास हमें इसी गहरे संबंध को समझने में मदद करता है। ये मंत्र केवल ध्वन्यात्मक अनुकरण नहीं हैं, बल्कि प्रकृति की आवाज़ों की मानवीय अनुकृति हैं, जो समय के साथ मानव चेतना से जुड़े। 'क्रीं' से "क्लीं" का संक्रमण इस सिद्धांत को व्यक्त करता है कि मानव ने पहले प्रकृति की ध्वनियों को सुना और फिर उन ध्वनियों को अपनी चेतना के अनुसार समाहितकिया।

प्रारंभ में जब मनुष्य की चेतना अविकसित थी, वह भय और आवश्यकता के कारण प्रकृति से भयभीत था। जंगलों की ध्वनियाँ, झरनों की कल-कल, पशुओं के गर्जन और आकाश की गूंज उसकी समझ में भय उत्पन्न करती थीं। इस दौरान मनुष्य को प्रकृति की कड़ी और रौद्र ध्वनियाँ ही सुनाई देती थीं, जिनसे भय और कष्ट की अनुभूति होती थी। क्रीं-यह उस समय की ध्वनि है।

लेकिन जैसे-जैसे मनुष्य ने कृषि की ओर कदम बढ़ाए और सभ्यता की ओर बढ़े, उसने अब प्रकृति की मृदुल ध्वनियों को भी महसूस करना शुरू किया। इन ध्वनियों के भीतर कड़कड़ाहट और आक्रामकता की जगह शांति समाहित होनी लगी थी--मनुष्य की चेतना में 'क्रीं' का 'क्लीं' की ओर संक्रमण हो रहा था।

‘क्रीं’ से 'क्लीं' का मंत्र इसी संक्रमण को व्यक्त करता है— यह एक विकासात्मक प्रक्रिया थी, जिसमें ध्वनियाँ कड़ी से मृदु और रौद्र से सौम्य बनती गईं। मानव ने, जो कभी डर और आशंका से प्रकृति के कड़क ध्वनियों को सुना करता था, अब उसे समग्र रूप में समझा और अपनाया। क्लीं जैसे मंत्र उसी जटिलता का परिणाम हैं, जो प्रकृति से मनुष्य की संवादात्मक प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न हुई।

अब हम ‘ह्रीं’ और ‘श्रीं’ जैसे बीज मंत्रों की ओर रुख करते हैं। ये मंत्र 'क्लीं' और 'क्रीं' की भांति प्राकृतिक ध्वनियों की अनुकृति नहीं हैं, बल्कि इनका अस्तित्व एक विशेष मानसिक और भावनात्मक बदलाव से उत्पन्न हुआ है। 'ह्रीं' और 'श्रीं' के माध्यम से हम उस स्वर्णिम आभा की बात करते हैं, जो प्रकृति और ब्रह्मांड की परम चेतना से जुड़ी हुई है। 'ह्रीं' का अर्थ स्वर्णिम प्रकाश और आभा से है, जो न केवल दृश्य रूप में, बल्कि ऊर्जा के स्तर पर भी व्याप्त है। यह ध्वनि भी प्रकृति के एक विशेष आयाम को व्यक्त करती है, जो रौद्र से सौम्य, और सौम्य से दिव्य परिवर्तन का संकेत है।

हम जानते हैं कि ‘ह्रीं’ और ‘श्रीं’ की ध्वनियाँ आकाश, अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी के तत्वों से जुड़ी हुई हैं। इन तत्वों की इन ध्वनियों को मनुष्य ने पहले कल्पित किया और फिर उन ध्वनियों को अपने भीतर महसूस कर उन्हें बीज मंत्रों के रूप में ढाला। 'ह' आकाश का प्रतीक है, 'र' अग्नि का प्रतीक है, और 'ई' के साथ जुड़ी दीर्घ ध्वनि इन दोनों के मिलन से उत्पन्न होने वाली स्वर्णिम आभा को दर्शाती है।

ध्वनि के इस विशेष अनुकरण से उत्पन्न बीज मंत्र, मनुष्य की चेतना के विकास और प्रकृति के गहरे संबंधों की प्रतीक हैं। इन बीज मंत्रों का प्रयोग केवल एक ध्वनि के रूप में नहीं, बल्कि एक आंतरिक अनुभव के रूप में हुआ है, जो समय के साथ विकास पाकर मानवीय साधना का हिस्सा बन गया। प्रारंभ में प्रकृति की ध्वनियों का अनुकरण कर मनुष्य ने अपने पहले शब्द बनाए थे। समय के साथ ये शब्द और मंत्र अधिक जटिल और दिव्य होते गए, और यही प्रक्रिया आज भी हमारे जीवन का हिस्सा बनी हुई है।

इस विकास में मनुष्य ने धीरे-धीरे अपनी चेतना के स्तर पर प्रकृति और ब्रह्मांड के हर तत्व को महसूस किया और इन तत्वों को अपनी साधना और आंतरिक अनुभवों के रूप में अभिव्यक्त किया। क्रीं, ह्रीं और श्रीं जैसे मंत्र, एक जटिल प्रक्रिया का परिणाम हैं, जिनका गहरा संबंध प्रकृति, चेतना और दिव्य से है। इन मंत्रों में समय और बदलाव की गूंज समाहित है, जो आज भी हमारी भाषा, संस्कृति और आध्यात्मिकता के महत्वपूर्ण अंग हैं।

 

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धरती पर एक समय ऐसा आया, जब जीवन और मृत्यु, दोनों के बीच संतुलन बिगड़ने लगा। लोग अब पहले की तरह नहीं जीते थे। उनके चेहरे पर सांसें थीं, लेकिन उनके भीतर से जीवन गायब था। आँखों में चमक नहीं, बस बेचैनी थी। उनकी आत्माएँ घिस चुकी थीं, सपने मर चुके थे। और मृत्यु, जो हमेशा जीवन को सोखकर अपने अस्तित्व को बनाए रखती थी, भूखी रह जाती।

मृत्यु ने पहली बार असमंजस महसूस किया। वह एक गाँव के पास मंडरा रही थी। वहाँ एक बूढ़ा किसान, अपने शरीर के साथ संघर्ष कर रहा था। मृत्यु ने पास जाकर देखा। उसकीसाँसें टूट रही थीं, लेकिन उसके भीतर जीवन का कोई अंश नहीं था।

मृत्यु ने उससे कहा, "मैं तुम्हें लेने आई हूँ।"

बूढ़े ने सिर उठाया और कहा, "ले जाओ, लेकिन मैं पहले ही मर चुका हूँ। तुम मेरे अंदर क्या ढूँढोगी?"

मृत्यु चौंक गई। उसने किसान की देह को टटोला, उसके भीतर झाँका। वह खाली था। न कोई सपना, न कोई आशा, न कोई दुःख। मृत्यु हताश होकर बोली, "तुम्हारे भीतर कुछ भी नहीं है। तुम इतने खाली कैसे हो गए?"

किसान ने लंबी सांस ली और कहा, "हम अब जिंदा रहने की ज़रूरतों से इतने दब गए हैं कि खुद को जीना भूल गए हैं। हमने अपने सपने, अपनी खुशियाँ सब बेच दीं। अब हमारे पास तुम्हारे लिए कुछ नहीं बचा।"

मृत्यु उस किसान को छोड़कर गाँव के दूसरे लोगों के पास गई। हर जगह वही हाल था। हर व्यक्ति के भीतर खालीपन था। न कोई जज़्बात, न कोई डर। मृत्यु ने महसूस किया कि वह अब कमजोर हो रही है। उसके पास कोई जीवन नहीं था, जिसे वह सोख सके।

उसने जीवन को पुकारा। जीवन थका-हारा सा आया। उसने मृत्यु को देखा और कहा, "क्या हुआ? तुम इतनी कमजोर क्यों लग रही हो?"

मृत्यु ने कहा, "तुम्हारे बिना मैं जिंदा नहीं रह सकती। पर तुम खुद को खत्म कर चुके हो। तुम्हारे लोग अब जीना ही नहीं जानते। अगर तुम नहीं हो, तो मैं कैसे रहूँगी?"

जीवन ने एक उदास हँसी हँसी। "मैंने खुद को खो दिया है। अब मैं बस एक आदत बनकर रह गया हूँ—साँस लेने की आदत, चलने की आदत। मैं अब वही नहीं हूँ, जो कभी था। मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है।"

मृत्यु ने महसूस किया कि उसका अंत निकट है। वह जीवन के बिना रह नहीं सकती थी। उसने आखिरी बार धरती को देखा। वहाँ चलने-फिरने वाले इंसान नहीं, खाली खोल थे।

मृत्यु ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति खोनी शुरू कर दी। वह कमजोर होती गई, और एक दिन, वह खुद भी मर गई।

धरती पर अब न जीवन था, न मृत्यु। बस, एक अंतहीन मौन। इंसान चलते-फिरते थे, मशीनों की तरह। न कोई हँसी, न कोई आँसू। यह एक ऐसा संसार था, जहाँ सब कुछ था, लेकिन कुछ भी नहीं था।

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कॉमरेड ढींगरा ने जीवन भर "अमेरिकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद" के नारे लगाकर अपनी पहचान बनाई। उनकी किताबें बिकीं, उनके भाषण गूंजे, और पूंजी जुड़ी। लेकिन आज उनकी आँखों में वही चमक थी, जो किसी बच्चे के सपनों के पूरे होने पर होती है। उनका बेटा अमेरिका जा रहा था, वही अमेरिका, जिसके खिलाफ वे हर मंच से गरजे थे।

हवाई जहाज में, कॉमरेड के बेटे की सीट के ठीक बगल में संघ के बौद्धिक प्रांत प्रमुख के बेटे की सीट थी। प्रांत प्रमुख, जो अपने उग्र स्वदेशी आंदोलनों और विदेशी कंपनियों के खिलाफ खड़ेहोने के लिए मशहूर थे, आज अपने बेटे को उसी अमेरिकी कंपनी में सेटल करने भेज रहे थे, जहाँ कॉमरेड का बेटा जा रहा था।

जहाज उड़ चुका था। नीचे विचारधाराओं की दुनिया छूट चुकी थी। ऊपर, आसमान में, सिर्फ सपनों की एक सी मंजिल थी। कॉमरेड और प्रांत प्रमुख, दोनों की आँखों में समान खुशी थी। आखिरकार, डॉलर की ताकत विचारधाराओं से बड़ी होती है।

 

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"मैं जाति और वंश के आधार पर किसी को सम्मान नहीं देता," ऐसा कहने वाले धनपत बाबू को अगले ही दिन अपने हाकिम की बिल्ली को गोद में घुमाते देखा गया। यह काम उन्होंने बिल्लियों के प्रति प्रेम के कारण नहीं किया था, बल्कि सिर्फ इसलिए कि वह बिल्ली उनके हाकिम की था। वैसे, धनपत बाबू को बिल्लियां एकदम अच्छी नही लगतीं हैं।

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प्लेटो ने अपनी महान कृति "दि रिपब्लिक" में एक रूपक प्रस्तुत किया, जिसे "गुफा का रूपक" कहा जाता है। यह रूपक मानव अनुभव, ज्ञान और सत्य की खोज को समझाने का प्रयास है।

प्लेटो के अनुसार, एक अंधेरी गुफा में कई बंदी बैठे हुए हैं। उनकी गर्दन और पैर जंजीरों से बंधे हैं, जिससे वे केवल गुफा की दीवार को देख सकते हैं। वे अपने पूरे जीवन में दीवार पर चलती परछाइयाँ ही देखते हैं, जो गुफा के पीछे जलती आग और वहाँ से गुजरती वस्तुओं के कारण बनती हैं।

इन बंदियों के लिए ये परछाइयाँ ही सत्य हैं, क्योंकि उन्होंने कभी कुछ और नहीं देखा।

लेकिन एक दिन, एक बंदी मुक्त होता है। वह गुफा से बाहर निकलता है और पहली बार असली दुनिया देखता है। उसे सूरज, आकाश, पहाड़, नदियाँ, और जीवन की वास्तविकता का पता चलता है। वह समझता है कि गुफा में देखी गई परछाइयाँ केवल भ्रम थीं। वह वापस गुफा में लौटता है ताकि अपने साथी बंदियों को उनकी अज्ञानता से मुक्त कर सके। लेकिन जब वह उन्हें सत्य बताने की कोशिश करता है, तो वे उसकी बात नहीं मानते। वे उसे पागल और भ्रमित समझते हैं।

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प्लेटो के गुफा के रूपक का पुनर्पाठ:

प्लेटो की गुफा का वह बंदी, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी दीवार पर चलती छायाओं को देखते हुए बिताई थी, एक दिन जंजीरों से मुक्त हो गया। उसने गुफा की अंधेरी दीवारों से बाहर कदम रखा। बाहर की दुनिया उसकी कल्पनाओं से बहुत अलग थी—खुला आकाश, सूर्य का तीव्र प्रकाश, और एक अनंत विस्तार।

पहले-पहल, वह चकित और अभिभूत हुआ। उसने देखा कि सूरज, जिसे उसने देवता माना था, केवल एक प्रज्वलित अग्नि-गोला था। नदियाँ, जो कभी देवी थीं, अब मात्र बहता हुआ पानी थीं। धरती, जिसे वह माता कहता था, बस खनिजों और मिट्टी का ढेर थी। यह सब उसके लिए सत्य का खुलासा था, लेकिन यह सत्य ठंडा और नीरस था।

उसने महसूस किया कि बाहर की दुनिया में कोई राग नहीं था, कोई अपनापन नहीं। यह दुनिया केवल वस्तुओं का संग्रह थी—शब्दों में भावनाएँ नहीं थीं, केवल वस्तुवाचकता थी।

गुफा से बाहर का जीवन उसके लिए मुक्ति नहीं, एक नई प्रकार की कैद थी। वह अनंत आकाश को देखता, लेकिन उसमें कुछ भी देखने योग्य नहीं था। समय अब बस घड़ी की टिक-टिक में सिमट चुका था। हर क्षण नीरस और उबाऊ था।

बादलों को देखकर उसे अपनी गुफा की आकृतियाँ याद आने लगीं। गुफा की दीवारों पर छायाओं के खेल में एक राग था, जीवन था। वहाँ के भ्रम ने उसे एक उद्देश्य दिया था। बाहर की यह तथाकथित "सत्य" की दुनिया उसे शून्यता के सिवा कुछ नहीं दे रही थी।

दिन और रात का भेद समाप्त हो चुका था। रातें दिन से अधिक उजली थीं, लेकिन वह उजाला आँखों को चुभने वाला था। रंग-बिरंगे प्रकाश, जो पहले सुंदर लगते, अब उसे अजीब और विकर्षक प्रतीत हो रहे थे।

बंदी ने सोचा, "क्या यही सत्य है? क्या यही वह मुक्ति है जिसका सपना मैं देखता था?" वह महसूस करने लगा कि ज्ञान और सत्य का यह अनुभव उसे भीतर से तोड़ रहा था।

गुफा के भीतर की दुनिया में उसका परिवार था, उसके साथी बंदी थे, और उनके साथ वह भ्रम साझा करता था। उन छायाओं के साथ उनके संवाद उसे मानवीय बनाते थे। वह जान गया कि बाहरी दुनिया का यह नीरस सत्य उसकी मानवीयता को नष्ट कर रहा है।

अंततः उसने गुफा में लौटने का निर्णय लिया।

गुफा में वापस आकर उसने अपने पुराने साथियों को देखा। वे अब भी जंजीरों में बंधे थे, दीवार पर चलती छायाओं को देख रहे थे। उनके चेहरे पर वैसी ही तन्मयता थी जैसी वह पहले अनुभव करता था।

उसने अपनी जंजीरों को उठाया और स्वेच्छा से फिर से बाँध लिया। उसे एहसास हुआ कि यही जंजीरें उसकी असली स्वतंत्रता थीं। गुफा की दीवार पर चलती छायाएँ अब उसे अपनी पुरानी दुनिया में वापस ले गईं।

उसने शांति का अनुभव किया, एक अद्वितीय शांति। उसने जाना कि भ्रम और राग ही उसकी मानवीयता का आधार थे।

एक दिन, गुफा में ईश्वर प्रकट हुए। उन्होंने मुस्कुराकर उससे पूछा, "क्या तुम समझते हो कि यह गुफा और ये छायाएँ क्यों हैं?"

बंदी ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "क्योंकि यह मेरी असली दुनिया है। बाहर का सत्य मुझे अकेला करता है। यह गुफा, यह भ्रम मुझे अपने लोगों के साथ जोड़ते हैं।"

ईश्वर ने उत्तर दिया, "यह गुफा मैंने तुम्हारे लिए बनाई थी। दीवारों पर चलती ये छायाएँ मेरी रचना हैं। मैं तुम्हारे माध्यम से सूरज को देवता, नदियों को देवी, और धरती को माता कहता था। तुमने इनमें अर्थ और जीवन भरा। यही तुम्हारी मानवीयता है। बाहर का सत्य केवल शून्यता है।"

बंदी ने महसूस किया कि यह गुफा, यह भ्रम, और यह जंजीरें ही उसकी असली मुक्ति थीं। सत्य के नाम पर उसने जो कुछ पाया था, वह केवल अकेलापन और बोरियत थी।

अब वह जानता था कि मनुष्य सत्य से अधिक भ्रम में जीने के लिए बना है। भ्रम ही जीवन को अर्थ देता है। वह फिर से दीवार की छायाओं में खो गया।

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ईश्वर ने उन्हें रचा और उन्हें अपने प्रीतम उद्यान का उपहार दिया। उस उद्यान में वे निवास करते, ताजे फल भक्षण करते, पुष्पों की सुरभि में रमण करते और स्वच्छ स्रोतों के जल से तृप्त होते। वे आनन्दित थे, और उनके आनन्द में ईश्वर भी मुदित होता। परन्तु उसके हृदय की गहनता में भय व्याप्त था।

इस सृष्टि में कुछ भी परिपूर्ण नहीं; प्रकृति भी नहीं। क्योंकि प्रकृति की विकृति का परिष्कार ही संस्कृति है। मनुष्य संस्कृति के माध्यम से प्रकृति को पूर्णता प्रदान करने का सतत प्रयास करता है। किन्तुसबसे विस्मयकारी तथ्य यह है कि इस सबका उद्गम स्वयं ईश्वर भी परिपूर्ण नहीं। वह कभी परिपूर्ण था ही नहीं। उसकी अपूर्णता उसे कष्ट देती है। अपनी इसी अपूर्णता से वह सदा भयभीत रहता है।

ईश्वर केवल भयभीत ही नहीं, वह अपने भय को छिपाने के लिए मिथ्या गढ़ता है, छल करता है। मनुष्यों को भ्रमित करने के लिए उसने अपने दूतों को भेजा है, जो उसकी पूर्णता के मिथक का प्रचार करते हैं। वे उसकी महिमा में गान और ग्रन्थ रचते हैं।

ये दूत शताब्दियों से सम्राटों, राजाओं, नगरपतियों और बलशाली व्यक्तियों की बुद्धि पर अधिकार जमाए हुए हैं। वे जानते हैं कि यदि ईश्वर की पूर्णता का झूठ जीवित रखना है तो इन शक्तियों को वशीभूत रखना आवश्यक है। इसीलिए उन राजाओं और धनपतियों ने उसके झूठ को छिपाने के निमित्त भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया। वहाँ स्वर्ण है, वैभव है, ऐश्वर्य है। किन्तु सत्य के सूक्ष्मदर्शी को वहाँ केवल छल ही दृष्टिगत होता है।

ईश्वर की इस अपूर्णता को अनीश्वर कहते हैं। अनीश्वर भी अनादि और अनश्वर है। वह सृष्टिकर्ता नहीं है, न ही चेतना-संपन्न होकर सृष्टि में हस्तक्षेप करता है। किन्तु चूँकि अनीश्वर ईश्वर में निहित है, अतः जहाँ भी ईश्वर होता है, वहाँ अनीश्वर भी स्वयं उपस्थित होता है। ईश्वर के छद्मों और षड्यन्त्रों में भी। उन गीतों में भी जो उसके दूतों ने रचे। उन मन्दिरों में भी जो राजाओं ने बनवाए। और उन फलों में भी, उस झरने में भी, उस उद्यान में भी।

ईश्वर भयभीत था कि उसका यह रहस्य प्रकट न हो जाए। उसने उनके नेत्रों को गढ़ा तो, परन्तु उनमें प्रकाश न भरा। उसने कठोर आदेश दिया कि उद्यान का अमुक फल कभी न खाएँ।

यह कहना मिथ्या होगा कि ईश्वर ने उस फल को नष्ट करने के लिए प्रयास नहीं किया। उसने अपनी सम्पूर्ण शक्ति से उसे समाप्त करना चाहा। परन्तु हर बार जब वह फल नष्ट होता, स्वयं ईश्वर भी समाप्त हो जाता। तब उसे आभास हुआ कि ईश्वर और अनीश्वर एक ही युग्म में सह-अस्तित्व रखते हैं। पुण्य बिना पाप के, श्वेत बिना श्याम के, जीवन बिना मृत्यु के—अस्तित्व सम्भव ही नहीं।

वे, जो ईश्वर की रचना थे, उसके तत्व से निर्मित थे। और चूँकि ईश्वर में अनीश्वर व्याप्त था, वे भी उस फल का भक्षण करने के लिए अभिशप्त थे। वह शैतान की कुटिलता का परिणाम नहीं था, जैसा कि प्रचलित कथाएँ कहती हैं।

उन्होंने फल खाया। उसी क्षण उन्हें यह बोध हुआ कि उनका परमपिता सर्वशक्तिमान नहीं। इस जागृति के साथ वे उस उद्यान में नहीं रह सकते थे। सम्भवतः ईश्वर ने उन्हें अपनी लज्जा ढकने के लिए निष्कासित कर दिया। या सम्भवतः उनकी चेतना ने उन्हें वहाँ से स्वतः प्रस्थान करने को विवश किया।

यह जागृति थी। यह उनकी यात्रा का प्रारम्भ था। सत्य की खोज का पहला चरण।

 

 

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ॐ अपूर्णमदः अपूर्णमिदम्

महासागर अपनी विराटता में स्थिर था। उसने स्वयं को देखा—जल की असंख्य धाराओं से बना, अनंत और अपार। परंतु, उसकी दृष्टि अचानक रेत पर चमकती एक छोटी बूंद पर गई। वह विचारमग्न हुआ:

"क्या मैं, जो इतना विशाल हूं, इस छोटी बूंद से अधिक पूर्ण हूं?

महासागर ने अपने भीतर झाँका। वह असंख्य बूंदों से बना था। उसे गर्व हुआ कि उसने उन बूंदों को समेट रखा है। लेकिन साथ ही, उसे यह भी एहसास हुआ कि यदि वे बूंदें न होतीं, तो वह भी अस्तित्व में नहीं होता। उसने सोचा, "यदि मैं बूंदों का समूह हूं, तो क्या मैं पूर्ण हूं? और यदि यह छोटी बूंद केवल मेरी ही अंश है, तो क्या यह अपूर्ण है?"

रेत पर बैठा वह व्यक्ति, जिसने उस बूंद को अपनी उंगलियों पर थाम रखा था, कोई साधारण मानव नहीं था। वह महाज्ञानी था। उसने महासागर के मन में उठते विचारों को पढ़ लिया। वह मुस्कराया और उंगलियों पर टिकी बूंद को महासागर में लौटा दिया। उसने कहा:

"महासागर, तुम और यह बूंद दोनों अपने आप में पूर्ण हो। यह बूंद, जो तुम्हारा हिस्सा है, फिर भी अपने आप में संपूर्ण है। और तुम, जो इन बूंदों से निर्मित हो, अपने विराट स्वरूप में पूर्ण हो।"

महासागर यह सुनकर शांत हो गया, लेकिन व्यक्ति के शब्दों ने उसकी जिज्ञासा और बढ़ा दी। तभी वह व्यक्ति फिर बोला:

"सुनो, महासागर। यह बूंद, जब तुमसे अलग होती है, तो वह अपनी स्वतंत्रता में पूर्ण होती है। और जब यह तुम्हारे साथ मिलती है, तो वह अपनी संपूर्णता में पूर्ण होती है। तुम्हारी मुक्ति इन बूंदों में विभाजित होकर बहने में है। और इन बूंदों की मुक्ति तुम्हारे साथ मिलकर एक हो जाने में।"

महासागर ने सोचा:

"तो क्या मैं वास्तव में स्वतंत्र हूं? क्या यह बूंदें भी स्वतंत्र हैं? क्या पूर्णता एक भ्रम है?"

व्यक्ति ने उसकी उलझन को पढ़ लिया। उसने कहा:

"तुम और यह बूंद दोनों ही पूर्ण हैं, फिर भी दोनों ही अपूर्ण हैं। जैसे ईश्वर और संसार। ईश्वर अपनी संपूर्णता में भी संसार के बिना अधूरा है। और संसार, ईश्वर के बिना। ब्रह्म और माया, पुरुष और प्रकृति—ये सब एक दूसरे में समाहित होकर भी अलग हैं। पूर्णता और अपूर्णता का यह खेल ही अस्तित्व का नियम है।"

महासागर शांत हो गया। बूंद, जो उसकी सतह पर थी, अब उसका हिस्सा बन चुकी थी। लेकिन महासागर जान गया था कि उसकी पूर्णता उस बूंद में छिपी है, और बूंद की पूर्णता उसमें।

"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम्।"

 

 

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ह्मांड का विस्तार अनंत है—अंधकार और प्रकाश के बीच एक निरंतर संघर्ष। कहीं तारों की चीत्कार है, तो कहीं नूतन ग्रहों और नक्षत्रों के प्रथम स्पंदन। समय और स्थान जैसे तत्व एक-दूसरे से अनंत गति से दूर भाग रहे हैं, और गुरुत्वाकर्षण का अदृश्य जाल सब कुछ बांधने का प्रयास करता है। परंतु यह सब एक नियमबद्धता के भ्रम के भीतर है, जो अंततः अराजकता में विलीन हो जाती है।

मैं उसे ही अराजकता कह रहा हूँ जिसे नागार्जुन नेचतुष्कोटि विमुक्त शून्य कहा है और शंकर जिसे सत- चित-आनन्द कहते हैं--

जोभी हो, भूमा का स्वरूप और विस्तार मेरे लिए अनंत और अप्रत्याशित है। कभी-कभी इसकी गहरी अंधकारमय परतें मुझे भयभीत करती हैं, तो कभी तारों की चीत्कार और ग्रहों का नवजीवन मुझे विस्मित कर देता है तथापि यह विस्तार शंकर की भाँति न तो मेरे लिए अर्थपूर्ण है और न ही उद्देश्यपूर्ण।

मेरे चारों ओर नग्न बलों का संघर्ष है, जिसमें न तो मेरा और न ही भूमा का कोई व्यक्तिगत महत्व या उद्देश्य झलकता है।

मैंने जीवन और जगत का अर्थ ढूंढने की भरसक कोशिश की। बचपन से मुझे सिखाया गया कि मैं विशेष हूँ—ब्रह्मांड का केंद्र। "अहम ब्रह्मास्मि" और "अशरफ उल मखलूकात" जैसे विचार मेरे अस्तित्व को महिमामंडित करते रहे। मैंने धर्म, दर्शन, विज्ञान, और साहित्य की शरण ली, यह समझने के लिए कि मेरे होने का क्या अर्थ है--हा!! इनकी सारी बातें बनावटी थीं!

मुझे यह बोध हो चुका है कि यह सब मानव मन की रचनाएँ थीं, एक भ्रम, माया!

यह भ्रम मुझे संतोष देता था, परंतु वास्तविकता इससे परे है।

मैंने जान लिया है कि मैं इस विशाल ब्रह्मांड में नगण्य हूँ। मेरी उपस्थिति या अनुपस्थिति से ब्रह्मांड को कोई फर्क नहीं पड़ता।

मैं अब यह समझ चुका हूँ कि प्रकृति मुझे किसी विशेष उद्देश्य के लिए नहीं लाई। मैं मात्र उसके अराजक नियमों का एक परिणाम हूँ। जिस प्रकृति को मैंने कभी "माँ" कहा, वह वास्तव में उदासीन है। उसके लिए मेरा होना और न होना एक समान है।

यह ज्ञान मेरे भीतर एक गहरा शून्य भर देता है। मैंने प्रकृति को कभी पराजित करने के तो कभी उससे एकाकार होने के सपने देखे, उसे अपनी कहानियों और कविताओं में मानवीकरण किया, लेकिन अब यह स्पष्ट हो चुका है कि यह केवल मेरी कल्पनाएँ थीं।

प्रकृति की उदासीनता मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। मुझे यह स्वीकार करना कठिन है कि मेरी सारी उपलब्धियाँ, मेरे सारे प्रयास, और मेरा पूरा अस्तित्व, अंततः अर्थहीन है। मैं समझता हूँ कि मेरी प्रजाति को भी प्रकृति उसी तटस्थता से निगल जाएगी जैसे वह हर क्षुद्र ग्रह या मरते तारे के साथ करती है।

यह स्वीकार करना सरल नहीं है। मेरी आत्मा बार-बार विद्रोह करती है। मैं अपने साहित्य में, अपने विचारों में अब अपनी इस नई चेतना के साथ संघर्ष करता हूँ। लेकिन यह संघर्षभी वास्तविक नहीं है। यह मेरी आत्मा की एक अनिवार्य प्रतिक्रिया है, उस शून्यता को भरने का प्रयास।

अब प्रश्न यह है कि मैं इस ब्रह्मांडीय उदासीनता के साथ कैसे जीऊँगा? क्या मैं इस अर्थहीनता को स्वीकार करूँगा और इसके भीतर अपनी शांति खोजूँगा? या मैं अपने लिए नए अर्थ गढ़ने की प्रक्रिया जारी रखूँगा, यह जानते हुए कि यह भी एक भ्रम है?

ब्रह्मांड अस्थिर है, उदासीन है, और फिर अराजक है। और मैं—इस कथा का एक अस्थायी पात्र—अपने संघर्ष के माध्यम से एक ऐसी कहानी लिख रहा हूँ, जो शायद किसी अर्थ की तलाश में है, अर्थ जो कहीं है ही नही!

 

 

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अब भी मनुष्यो को संता क्लॉज की आवश्यकता पड़ती यद्यपि उन्होंने अलादीन का चिराग बना लिया था। मनुष्य अलादीन के चिराग को रगड़ते और जिन्न उनकी इच्छा पूरी कर देता। अब प्रत्येक मनुष्य के पास उसकी औकात के हिसाब से अलादीन का चिराग था लेकिन प्रत्येक मनुष्य अपनी अलमारी में रखे अलादीन के चिराग से बड़े चिराग की कामना करता करता और चाहता कि सांता उसे इस चिराग से बड़ा चिराग उपहार में भेंट कर दे: बड़े चिराग से बड़ा जिन्न निकलता था और जिन्नों का नियम है कि जितनी बड़ी इच्छा उतना बड़ा जिन्न होना चाहिएतथा जितना बड़ा जिन्न उतना ही बड़ा चिराग भी होना चाहिए।

धीरे-धीरे चिराग बड़े होने लगे क्योकि मनुष्यउस नियम को ढूंढते हुए जिन्नों को बड़ा करने की प्रकृति की शक्ति पर अब नियंत्रण स्थापित कर चुका था।

अब चारो ओर चिराग ही चिराग दिखते, बड़े-बड़े चिराग। इन चिरागों के सामने मनुष्य क्रमश: छोटा होता जा रहा था लेकिन फिर भी वह चिरागों का आकार बढ़ाने से बाज न आता।

फिर एकदिन उसकी बुद्धि में यह बात आई कि वह खुद भी तो चिराग में रह सकता है और इस प्रकार वह इन चिरागों को थोड़ा और बड़ा कर लेगा।

मनुष्य चिराग में घुस गया और भष्म हो गया क्योकि जिन्न मनुषयो की तरह मिट्टी से नही बल्कि आग से बने होते हैं।

अब दुनियाँ में केवल चिराग ही चिराग थे जिनमें जिन्न भरे पड़े थे लेकिन मनुष्य कहीं नही था।

काश मनुष्य धर्म, समाज, देश, राष्ट्र आदि के जिन्नों से जलकर सिख गया होता तो आज वह इस अलादिनी चिराग में भष्म होने से बच जाता, लेकिन उसकी आँख न खुल पाई की जिन्न बड़े होकर उसकोही भष्म करने लगते है।

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सिसिफ़स ने दो बार मृत्यु को धोखा दिया लेकिन मेरी माता जी ने तीन बार मृत्यु को धोखा दिया था और इसलिए वह देवताओं के राजा की नजर में सिसिफ़स से बड़ी अपराधी थीं। कभी-कभी तो मुझे लगता कि देवताओं का राजा सिसिफ़ज़ से भले ही कभी न डरा हो लेकिन माताजी से डरता था क्योकि वह मनुष्य के सबसे बड़े डर मृत्यु से डरना बन्द कर चुकी थीं।

अभी एक घण्टे बाद उनकी मृत्यु होने वाली थी, कैंसर रीढ़ में भी फैल चुका था और नसों को खा गया था जिसके कारण वह अब खड़ी न हो पाती और उन्हें गोद मे उठा कर ले जाना पड़ता। मैंनेमाता जी से कहा कि आज ही व्हील चेयर खरीद कर लाता हूँ तो माता जी ने शब्द खेल करते हुए, जो कि उनकी खाशियत थी, मजाक किया किया, " जा जा हमर व्हील चपता ना चाहीं!"

चपता भोजपुरी में उस बिछावन को कहते हैं जिस पर नवजात लेटे रहते हैं। इसी बिछावन पर वह मल मूत्र त्यागते हैं, खेलते हैं।

मैं माताजी के अंदर सिसिफ़स को देखता और जितनी बार उन्हें देखता मुझे कामु गलत होते दिखते और किरकेगार्ड सही। किरकेगार्ड जीवन का सार उस आस्था की छलांग को मानते हैं जिसे कामु दार्शनिक आत्महत्या कहकर खारिज कर देते हैं।

मैंने अपने विचारों को शब्द दिया और यह निकल कर आया---

विद्रोही ने तीन बार यमदूतों को मारने की कोशिश की थी हालांकि हमेशा वह असफल हुवा। चौथी बार जब वह उनको मारने की योजना बना रहा था तब यमराज के क्रूर यमदूतों ने उसे गिरफ्तार कर लिया और बेड़ियों में जकड़ कर यमराज के पास ले गए। यद्यपि वह उन क्रूर यमदूतों द्वारा पकड़े जाने से बचने के लिए आत्महत्या करसकता था लेकिन उसने उनके द्वारा खुद को पकड़ लिए जाने के विकल्प को चुना क्योकि कोई तीसरा विकल्प नही था।

यम-दरबार मे मुकदमा चला और यमराज ने उसके सामने दो विकल्प रखे--या तो वह यम-सत्ता के साथ हो जाए या सजा स्वीकार करे।

विद्रोही को यम की सत्ता के साथ हो जाना भी उसका आत्महत्या ही लगा, एक तात्त्विक आत्महत्या। अतः यहाँ भी उसने सजा का विकल्प चुना।

सजा देने के लिए यमराज ने उसे नीचे धर्मराज के पास भेज दिया।

विद्रोही को तब तक कोड़े मारने की सजा सुनाई गई जब तक वह मर न जाए लेकिन उसे यह बात न बताई गई या उसने यह नही सुना या सम्भवतः उसने सुन कर भी अनसुना कर दिया।

अगले दिन उसे खुले मैदान में लाया गया और उस मैदान के बीचों बीच वाले खंभे से उसका मुंह और पेट सटाकर बांध दिया गया। कमर तक उसके कपड़े उतार दिए गए ताकि उसकी नंगी पीठ जल्लाद के सामने हो।

धर्मराज के जल्लाद ने कोड़े लगाने शुरू किए--सौ- दोसौ कोड़ो तक विद्रोहीके लिए सब कुछ सामान्य रहा: विद्रोही कोड़ो से उठे दर्द को अपने दांतों से दबा लेता तथा जल्लाद और अधिक वेग से उसकी पीठ पर कोड़े बरसाता। लेकिन इसके बाद वह टूटने लगा था: विद्रोही के मुँह से चीख भी निकलती और जल्लाद के कोड़े लगाने का वेग भी बढ़ताजाता।

लेकिन, केवल यही बात न थी--विद्रोही के अंदर कुछ और भी घट रहा था--विद्रोही के मन और शरीर को दो कोड़ो के बीच के अंतराल को महसूस करने लगे थे। धीरे धीरे उसके मन और शरीर ने उन अंतरालों को पकड़ना भी सिख लिया और और फिर मात्र पकड़ा ही नही बल्कि उन्हें जकड़ने और अपने पास उन अंतरालो को हमेशा रखने के लिए प्रयास भी करने लगे; उसके मन ने दो कोड़ो के अंतराल के उसके समय-बोध को बदल दिया; उसके लिए उसके मन ने इन अंतरालों में समय की चाल को अत्यंत धीमा कर दिया। इन अंतरालों में उसके मन और शरीर खुश हो जाते, उन्हें जीवन अच्छा लगने लगता, फिर से कुछ नए स्वप्न सृजित हो जाते लेकिन तभी कोड़े का पीठ से स्पर्श.... और सारे स्वप्न, खुशी पानी के बुलबुले की तरह फूट जाते। बहुत देर तक यही चला परन्तु धीरे धीरे अब कोड़े के दर्द के अंदर यह आशा भी पनप जाती की इसके बाद एक अंतराल है जिसमे पीड़ा नही होगी। हर दर्द के साथ ही पैदा हो जाने वाली इस आशा ने उसके पीड़ा को भी कम कर दिया और उसकी चीखों की तीव्रता भी थोड़ी कम हो गई---वह विद्रोही था--जीवन विद्रोही, क्योकि जीवन ही विद्रोह है।

वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी--!

लेकिन, यह अर्धसत्य है!!

जीवन निश्चितरूप से विद्रोह है लेकिन दार्शनिक ने उस विद्रोही को सम्पूर्णता में न देखा था तथापि यह कह डाला था 'वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी'। यह सच है कि पीड़ा ने विद्रोही के सामने उसके अस्तित्व के नए आयामो को खोल दिया था तथा उसे दो कोड़ो के बीच के अंतराल कोपकड़ना आ गया था। इस अंतराल में समय-बोध को उसने काफी धीमा करना भी सीख लिया था और इन अंतरालों में उसके अंदर से स्वप्न भी फूट पड़ते जो आगे भले ही कोड़ो से उपजे दर्द में चकनाचूर हो जाते।

कोड़े के साथ उठने वाली पीड़ा में आशा का जन्म भी वास्तविक थी, लेकिन मात्र इन चीजों के देखकर जब दार्शनिक ने उसे जीवन-विद्रोही कह दिया था, वह गलत था। वह गलत था, क्योकि विद्रोही के अस्तित्व की गहराई में घटी उसकी अतार्किक, आस्था की छलांग को दार्शनिक देख ही नही पाया था। दार्शनिक यह भी नही देख पाया था कि विद्रोही के अस्तित्व में सपने दरअसल उसकी आस्था के छलांग के बाद से आते थे और उनके स्रोत वहीं अवस्थित थे जहाँ विद्रोही का अस्तित्व छलांग लगा कर पहुंचा था।

यहाँ पहुंच कर विद्रोही ने अपने व्यक्तिनिष्ठ तत्त्वमीमांसा की रचना कर डाली जिसमे वह मुक्त था ;उसके पास सारी स्वतंत्रता थी; यहाँ उसकी सारी पीड़ा मिट जाती।

उसे यह मुक्ति अच्छी लगी, अतः हर बार वह उन अंतरालों में अपनी इस तत्त्वमीमांसा का लेप इस स्थान से दोनों मुट्ठियों में उठाता और वहां अपने बंधे शरीर पर लेप आता--विद्रोह!

यद्यपि भविष्य में मनोवैज्ञानिक यह लिखने वाले थे कि असल मे उसका मस्तिष्क उसे धोखा दे रहा था ताकि उसकी पीड़ा की तीव्रता उसके लिए कम हो सके तथापि उसके लिए उसकी निजी तत्त्वमीमांसा असली थी जो उसके अस्तित्व ने छलांग लगाकर शून्य से रची थी। यह कोई दार्शनिक आत्महत्या भी नही थी क्योकि जीवन का स्वभाव ही यही है: दरअसलहर विद्रोह के पीछे आस्था है, विद्रोह का बीज विश्वास की जमीन पर ही पनप सकता है, चाहे वह जीवन-विद्रोह ही सही।

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देवता

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प्रोफेसर वृहस्पति सैमुअल अपनी कक्षा में विद्यार्थियों को साहित्य पढा रहे हैं। उन्होंने पुस्तक खोली और आज उन्हें जिस पाठ को पढ़ाना है उसका नाम "देवता" है।

प्रोफेसर सैम्युल का मानना है कि अतीत में मनुष्य पाखंडी थे। एक तरफ तो वह अमर होना चाहते थे लेकिन दूसरी तरफ वो अमरता से डरते थे। अतीत के मनुष्य अपनी कथाओ में, अपने मिथकों में, अपने पुराणों में अमर हुए पात्रों को शापित बना देते थे ज्यों मृत्यु जीवन से बेहतर हो और तभी चाहे वह अश्वत्थामा हो अथवा वांडरिंग ज्यू हो, अमरता इनका अभिशाप है।

प्रोफेसर सैम्युल का यह भी कहना था कि अतीत के मनुष्य मात्र पाखंडी ही नही बल्कि उनके अंदर दोहरा व्यक्तित्व, एक स्प्लिट पर्सनैलिटी थी क्योंकि तब मनुष्य मृत्यु से डरकर अमरत्व की कामना भी करते थे और अमरत्व से डरते भी थे। वह अपने मे से किसी के अमर हो जाने से घबरा भी जाते और कोई अमरता की चाहत न रखे इसके लिए मिथक भी रचते थे। लेकिन फिर वो अमरता की चाह भी रखते। अमरता की उनकी चाहत उनके द्वारा रचित उनके देवताओं में अभिव्यक्त होता था लेकिन विडम्बना की देवता उनमे से नही होता।

प्रोफेसर ने लेक्चर प्रारम्भ किया:

"हमने जेनेटिक स्तर पर मृत्यु की उसमे मौजूद सूचना कोहमेशा जवान और युवा रहने की सूचना से परिवर्तित कर अतीत के उन मनुष्यो के पाखण्ड को ही मात्र खत्म नही किया बल्कि देवत्व की तरफ एक कदम बढ़ाते हुए एक ऐसे मनुष्य का सृजन कर लिया है जिसका व्यक्तित्व उन अतीत के मानवो की भांति विभक्त नही है।

और हाँ, देवता अपनी प्रजाति नही बढ़ाते, वो स्वयम अमर होते हैं------"

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दानव

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"पर वह अश्वत्थामा की तरह अमर किन्तु मणि विहीन लोग हैं", सामने बैठे उस व्यक्ति ने कहा जो अन्य लोगो को सम्बोधित कर रहा था।

यह अतीत के एक समय की नही बल्कि भविष्य के एक समय की बात है। तब के वैश्विक सरकार की नज़र में ये लोग आतंकवादी है और इसलिए इनको आज सबसे बचकर यह मीटिंग करनी पड़ रही है जिसमे आज कुछ नए रिकरयूट भी शामिल होंगे।

मनुष्य वैज्ञानिक रूप से बहुत-बहुत ही ज्यादा प्रगति कर चुका है। आज किसी की चेतना को डिजिटलाइज कर उसको बायोप्यूटर में फीड कर उसको प्रिजर्व कर देने की बात भी इनके लिए बहुत पुरानी है। अब तो मनुष्य हज़ार -डेढ़ हजार साल से मरता ही नही। मनुष्य अब जीन को पूरी तरह कंट्रोल करना सीख गया है। भोजन भी अब जीवित रहने के लिए कोई करता ही नही, जिव्हा का कार्य अब मात्र कुछ इलेक्ट्रोड्स जोड़ कर स्वाद लेने का है। अपनी प्रजाति को बढाने के लिए सेक्स करने पर रोक लगा दी गई हैऔर ऐसी एक सरकारी एजेंसी है जो आपको स्टेराइल कर एक कार्ड इशु करती है जिसे रखना आपकी जिम्मेदारी है। हाँ आप मज़े के लिए चाहे जैसे सेक्स करें: रियल, वर्चुवल, कम्प्यूयर प्रोग्राम्ड...इसकी कोई मनाही नही है लेकिन यदि आप अपना स्टेरेलाइज़ेशन नही करवाते तो आप बायो-टेरोरिस्ट हैं और आपको सबसे दुखदाई तरीके से ही नही बल्कि आपके मस्तिष्क में पेन एम्प्लीफिकेशन प्रोग्राम इम्प्लांट करके आपकी दर्द के अहसास को उस अनुपात में बढ़ा दिया जाता है जिस अनुपात का तब के मानक के अनुसार आपने अपराध किया है।

आज से एक लाख वर्ष पूर्व किसी ने यह कल्पना भी नही की थी कि भविष्य में स्वयम को जीवित रखने की प्रवृत्ति और अपनी प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति के मध्य टकराहट होगी लेकिन पिछले पच्चीस हजार वर्षों में यह हुवा है और स्वयम को जीवित रखने वाली प्रवृत्ति जीत गई है।

पूरे विश्व में हालांकि कुछ लोग हैं जो उनके पूर्वजो की अवस्था मे लौट जाने को सही मानते हैं। उनके अनुसार अंततः जीत प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति की होगी और उसके लिए वह संघर्षशील हैं।

सरकार की नज़र में ये बहुत ही खतरनाक

आतंकवादी हैं, बिल्कुलदानव, इनका सफाया ज़रूरी है।

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बुद्धि की सीमांत पर मेरे अस्तित्व ने मेरी बुद्धि से कहा , "तुम्हारे पास दो विकल्प हैं, या तो इस भूमा, इस ब्रह्मांड के पीछे ईश्वर को स्वीकार कर ईशावास्योपनिषद की पंक्तियाँ मेरे साथ दुहराओ या जगत की एब्सर्डिटी और इसके अराजक रूप को स्वीकार करो!"

'लेकिन इनमें से वास्तविक कौन है?' मेरी बुद्धि ने मेरे अस्तित्व से प्रश्न किया!

कोई नही, दोनों ही विचार, अंततः एक ही है, दोनों ही विचार हाइपररियल विचार हैं, दोनों ही बात मेटा-स्टोरीज या अधि-कथाएं हैं------!

 

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ग्रीक मिथकों मे सिसिफ़ज़ एक चरित्र है जिसे देवताओं के राजा जीयूस द्वारा एक श्राप मिला है।सिसिफ़ज़ पर जीयूस इस लिए कुपित हो गए कि इसने दो बार मृत्यु को धोखा दे दिया।

सिसिफ़ज़ को जीयूस ने एक शाप दिया कि उसे एक पहाड़ की तली से बड़ा सा पत्थर ऊपर पहाड़ के शीर्ष तक ले जाना है और ज्यो ही सिसिफ़ज़ पत्थर के साथ पहाड़ के शीर्ष के निकट होगा वह पत्थर लुढ़ककर फिर से पहाड़ की तली में चला जाएगा। सिसिफ़ज़ को फिर से पत्थर को लेकर ऊपर चढ़ना है और फिर ज्यों ही पहाड़ का शीर्ष नजदीक होगा---सिसिफ़ज़ को यह अनन्त कालके लिए करते रहना हैये--एबसर्ड!!

जॉर्ज लूईस बार्गेस, "द इम्मोर्टल" में लिखते है, “मनुष्य के अपवाद के साथ अमरता में कुछ भी विशिष्ट नही है। प्रत्येक जीव अमर है, क्योंकि उन्हें मृत्यु का बोध नही है। दिव्यता, रहस्य और भयावहता अपने अमरता का ज्ञान है।“

मानव का जीवन में इन्हेरेन्ट मूल्य और अर्थ ढूंढने की प्रवृत्ति तथा इस उद्देश्यहीन, अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में उसका ऐसा कर पाने की अक्षमता के द्वंद को अस्तित्वाद में एब्ज़र्ड केनोशन या भाव से व्यक्त किया गया है।

एब्ज़रडिज्म के अनुसार मानव जीवन में मूल्य तलाशता है और जब सब कुछ अर्थहीन है लेकिन मानव अर्थ खोजने को विवश है तो मानव के जीवन में एक शून्य का निर्माण होता है।

रिक्तता पीड़ा है और मनुष्य को इस रिक्तता का अवबोध है। मानव को इस रिक्तता को भरना है। इस खालीपन को या तो पलायन द्वारा भरा जाय या एब्ज़रडीटी का सामना किया जाय।

बुद्ध भी एबज़रडीटी का सामना नही करते

बुद्ध निर्वाण की बात करते है अतः उनके दर्शन औरदृष्टि को रिक्तता का दर्शन नही कहा जा सकता। बुद्ध के चार आर्य सत्यों में आखरी दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा उन्हें रिक्तता और शून्यता के विचारक होने से अलग कर देता है। बुद्ध के विचारों में भी जीवन का अर्थ और अभिप्राय उपस्थित है--दुखो से मुक्ति, निर्वाण लेकिन क्या हो जब दुखो से मुक्ति और निर्वाण जैसी कोई चीज ही नही हो--बुद्धि ने तो दिखा दिया है कि कोई केंद्र होता ही नही है--न ईश्वर, न मोक्ष, न आत्मा, न ब्रह्म, न निर्वाण, न ईश्वरीय साम्राज्य--और इस बात को स्वीकार करने के बाद जो रिक्तता उभरती है उस रिक्तता की यहाँ बात है--इस रिक्तता को हालांकि बुद्ध की तरह एक अतीन्द्रिय सत्ता 'निर्वाण' में आस्थावान हुए भरा जा सकता है लेकिन यह तो कामू के शब्दों में दार्शनिक आत्महत्या है-- और यही बात देवी--माया आदि शब्दो मे चिंतन करने पर भी लागू है।

कामु के पहले के बुद्धों ने संसार की व्याख्या गुणात्मक रूप से दो आर्य सत्यों से की जिसमे पहला आर्य सत्य दुख है और दूसरा इससे मुक्ति लेकिन कामु ने जब संसार पर दृष्टिपात किया तो पीड़ा से मुक्ति कही थी ही नही अतः उन्होंने मानवीय इतिहास में पहली बार बिना विचलित हुए, बिना किसी करुणा के वश में आए एकमात्र आर्य सत्य के यथार्थ का उपदेश कर दिया।

कामु ने देखा कि जगत का कोई अर्थ नही है और मनुष्य के अंदर जगत में अर्थ खोजने की प्रवृति बहुत ही प्रबलता के साथ विद्यमान है। सिसिफ़ज़ बार बार नए तरीके से पत्थर ऊपर शीर्ष पर ले जाने की कोशिश करता है लेकिन नतीजा तो पूर्वनिर्धारित है।

कामु के इस दर्शन को एब्ज़रडिज्म कहा जाता है। आपको सम्मानित करने के लिए नोबेल दिया गया।

जबभी कामु के मिथ ऑफ सिसिफ़ज़ को याद करता हूँ तो मन कहता है कि सिसिफ़ज़ अबकी बार पत्थर देख कर कह दे--भाग भो%ड़ी अब नही, पत्थर चढ़े हमरे&ड़े पर, लेकिन इसके लिये उसे मरना पड़ेगा और मौत से हर प्राणी डरता है, सिसिफस भी।

 

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ज़िंदगी: एक नरक कथा।

नरक पहुँचने पर उसे सबसे पहले नरक के अधिकारी के पास पेश किया गया। अधिकारी के पास ही नरक के डॉक्टर और मुंशी बैठे थे। डॉक्टर ने उसकी डॉक्टरी जाँच की, एक रिपोर्ट बनाई और उससे उस रिपोर्ट के नीचे अँगूठा लगवा लिया। मुंशी ने भी अपना काम किया। उसने सबसे पहले यमदूतों के रिसीविंग लेटर पर हस्ताक्षर और मुहर लगाई और उसके बाद वह रिसीविंग लेटर यमदूतों को वापस किया फिर उसकी निजी संचिका में उसके साथ आए समस्त कागज, डॉक्टरी रिपोर्ट वगैरह लगा कर स्थापना प्रभारी की ओर फाईलबढ़ा दिया।

हालांकि यह चाय-पानी का वक्त हो चला था लेकिन तब भी स्थापना प्रभारी ने कर्तव्यपरायणता दिखाते हुए उसके फाईल मे उसके लिये वार्ड, सेल वगैरह आवंटित करते हुएकर्मी को बुला भेजा, जो उसको उसके वार्ड में पहुँचा देगा।

अभी तक उसको यह पता चल चुका था कि नरक में वार्ड और सेल होता है लेकिन अभी उसको वार्ड इंचार्ज, तन्डेल, जोड़ा लगना, पगली घण्टी, भन्सा आदि के बारे में भी जानना था जो वह अब आगे नरक भोगते-भोगते स्वयम जानेगा।

नरक के प्रत्येक वार्ड का वार्ड इंचार्ज कोई दबंग नरकवासी ही बनता है। कर्मी उसे लेकर उसके आवंटित वार्ड में पहुँचा और वार्ड इंचार्ज को आवाज लगाई।

वहाँ कोने में वह दो तीन आत्माओं से तेल मालिश करवा रहा था। यह तेल वह कड़ाहे से काढकर लाया था जिसमे पिछले हफ्ते उसकी पकौड़ी तली गई थी।

अपना नाम सुनकर वह झट से अंगोछा लपेटते खड़ा हुआ और वार्ड के दरवाजे के पास पहुंचा।

-नया नरकी है, कर्मी ने बताया कि स्थापना बाबू तो इसको दूसरे वार्ड में भेज रहे थे लेकिन यह उस कर्मी की पैरवी है कि इसको इसी वार्ड में भेजा गया है।

जब से नरक में तन्डेली या वार्ड इंचार्ज वाली व्यवस्था लागू हुई थी, तब से कानूनन नीचे आत्मा के नाम पर दिए गए दान, दक्षिणा, अर्पण, तर्पण आदि पर तन्डेल का भी कुछ हक निर्धारित कर दिया गया था। यही काऱण था कि तन्डेल अपने वार्ड में अधिकतम आत्माओं को रखने के लिए मुशी, कर्मी या प्रभारी को घूस देते क्योंकि तर्पण अर्पण में तो उनका हिस्सा था ही उन्हें यह भी पता था कि आने वाली नई आत्माओं को डराकर, धमकाकर, उन्हें प्रताड़ित कर नीचे उनके सगे-सम्बन्धियो से और अधिक अर्पण-तर्पण, पिंडदान करवाया जा सकता है।

अपने इस तन्डेल ने तो इसी प्रकार से कमाई कर दो-दो ट्रक ले लिए थे और उन ट्रकों को नरक की फूड सप्लाई डिपार्टमेंट में लगवा कर मोटा पैसा भी कमा रहा था।

इससे पहले की वह तन्डेल के वार्ड में दाखिल हो, तन्डेल ने उससे कड़कती आवाज में पूछा, "नीचे कौन-कौन हैं?'

-"एक बूढ़ा बाप, बीमार माँ, अनब्याही बहन और दो बेरोजगार भाई।"

--"सरकारी योजना का लाभ मिलता था?"

--"मिडिलक्लास में पैदा हुआ था, साहब।"

--"खुद क्या करता था नीचे?"

--"बेरोजगार था, साहब।'

--"भरी जवानी में यहाँ ऊपर कैसे पहुंचा?"

--"साहब एक दिन विचार किया तो पाया कि नर्क इस दुनियॉ से तो बेहतर ही है क्योंकि वहाँ केवल उसे भोगना है जबकि इस दुनिया के नरक को भोगना तो है ही, इस नरक को भोगने के लिए विविध यत्नो से जीवित भी बने रहना है, और इसलिए आत्महत्या कर लिया----"

तन्डेल कुढ़ते हुए कर्मी से कह रहा था, "तुझे कितनी बार कहा है कि पैरवी से पहले थोड़ी छान-बीन कर लिया कर--अब ले यह आवेदन और प्रभारी को दे आ, इसमे लिख दिया है कि इस वार्ड में पहले से ही ओवरक्राउडिंग है।"

 

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श्रावण-भादो के दिन, खेतो में जल भरा हुआ है। सर्पो के बिलों में पानी भरता जाता है, बिच्छू भी सर्पो की भांति जल के कारण अपने पुराने निवास को छोड़कर नये सुरक्षित स्थान की ओर जाना चाहते हैं। धरती खर-पतवारों, घासों व झाड़ियों से भी भर गई है। सर्प-बिच्छू व जहरीले कीड़े इन खर-पतवारों, घासों व झाड़ियों में छुपे हुए हैं। उन्हें मनुष्यो से खतरा है, मनुष्य अचानक से उनके क्षेत्र में सक्रिय हो गया है।

उधर मनुष्यो को भी मालूम है कि अभी सर्प-बिच्छू व जहरीले कीड़े सक्रिय हैं लेकिन तब भी उन्हेंकृषि कर्म हेतु खेतों में उतरना ही है, झाड़ियों और घासों से होकर गुजरना ही है।

न तो मनुष्य चाहता है कि उसका सामना इन जहरीले जीवो से हो और न ही ये जीव चाहते हैं कि उनका सामना धरती के सबसे खतरनाक जीव मनुष्य से हो लेकिन सामना हो ही जाता है और इस सामना के परिणामस्वरूप उनमें से एक को अपनी जान गंवानी ही पड़ती है।

उन कीड़ो का, सर्पो का, बिच्छुओं का नही पता लेकिन मनुष्य अंदर ही अंदर इन जीवों से बहुत डरता है और इतना डरता है कि इस डर को दूर करने के लिये एक देवी का भाव रच देता है। यह देवी नागों के साथ है। इन देवी की कृपा से ये जहरीले जीव उसके पास नही फटकते और यदि कभी फटकते भी हैं तो उसे न तो डंक मारते हैं और न ही डँसते हैं और यदि डँस भी लिया तो उनका विष नही चढ़ता और यदि विष चढ़ भी गया तो मृत्यु नही होती--लेकिन--- मनुष्य सोंचता है, शायद पूजा में ही कमी रह गई थी!

शनै: शनै: पूजा के विधान विकसित होते जाते हैं, शनै: शनै: मनुष्यो के अंदरकी इच्छा, उसके अंदर का डर, मूर्त बन कर्मकांडो में जमता जाता है। और अब तो कइयों को इन कर्मकांडो में ही अद्भुत आंनद भी मिलने लगा है, इनके लिये शेष चीजे बहुत पीछे छूट गई हैं, इन्हें साँप-बिच्छू और कीड़े मकोड़ो से क्या मतलब, इनको तो ढोल, करताल के साथ एक आनन्द में झूम लेना है, वर्ष भर बाद आए इस क्षण को जी लेना है, स्वादिष्ट पकवान खा लेने हैं, अपनो से मिल लेना है---हमे मनुष्य यही चीजें तो बनाती हैं।

 

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अखलाक/ नैतिकता

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मजलिस जमी थी, यह रंको की मशहूर चौपाल थी जहाँ उनके बच्चे रंको की तहजीब सीखते। इस मजलिस के सामने जो ऊँची जगह थी वहाँ रखी तख्ती तब से मौजूद है जब से दुनिया मे बादशाहत कायम हुई। दुनिया मे बादशाहत कायम होने के अगले ही दिन वहाँ पहली मजलिस जमी थी। उस तख्त पर उसी दिन एक पहला नासेह बैठा था जिसने रँको को रँको की नैतिकता / अखलाकियत की पहली सबक सिखाई थी।

तब से आज तक यह रवायत कायम थी। रंको की दुनिया का सबसे उम्दा नासेह उस तख्ती पर बैठता, सामने बच्चेबैठते और अखलाकियत कि सबक चलती।

नासेह ने एक दास्तान के ज़रिए सबक पढ़ना शुरू किया:

"एक क्रूर राजा था

था एक ज़ालिम बादशाह!"

कहते हैं कि करामन और कातिबीन हर जगह मौजूद होते हैं। इंसान के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का काम ईश्वर ने दो फ़रिश्तों को दे रखा है। ये फ़रिश्ते इंसान के हर अच्छे-बुरे कर्म को लिखते हैं। इन फ़रिश्तों को करामन-कातिबीन कहा जाता है। ये फ़रिश्ते जिस रजिस्टर में कर्मों को लिखते हैं उसे नामा-ए-आमाल कहा जाता है।

इस दिन किसी तरह नामा-ए-आमाल करामन कातिबीन के हाथ से फिसलकर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा और किसी ने उसमे लिखी बाते पढ़ लीं। उसमे लिखा था:

"यह रंको कि कौम के नासेह जो कहते हैं कि एक क्रूर राजा था, एक था ज़ालिम बादशाह, हक़ ये है कि वो बादशाह ज़ालिम हो न हो ये कौम बदअख़लाक़ी ज़रूर है, बिल्कुल बेईमान और भगोड़ी।"

आगे एक शेर दर्ज था जिस के नीचे करामन और कातिबीन दोनों के दस्तखत थे---

"तुम भी चाहते तो थे के तेरी ही होती दुनिया

उसकी दुनिया जो हुई, कहते हो ज़ालिम था वो!"

 

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वासना

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सिगमंड फ्रायड मनुष्य के मन का विश्लेषण करते हैं और उसके तीन हिस्से पाते हैं-इड, ईगो और सुपरईगो। हमारे मन की संरचना को इस दृष्टि से फ्रायड ने बड़े अच्छे से समझी-समझाई है---

इड-ईगो-सुपरईगो।

समस्या यह है कि एक व्यक्ति में इड-ईगो-सुपर ईगो हमेशा बैलेंस में नही रह पाता, इनमे संघर्ष होता रहता है।

सुपरईगो इड को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ माया रचता है, वासना एक ऐसा ही शब्द है।

भूख प्यास निंद तो जानवर में भी जैविक स्तर पर पाई जाती है, क्या उनमें वासना भी पाया जाता है?

नही, क्योकि यह जैविक चीज है ही नही बल्कि एक आवरण है उस व्यवस्था को संचालित करने के लिए जिसमे एक नर-एक मादा हो, वरना हम आपस मे ही लड़ मरेंगे, धर्म के लिए नही, पैसों के लिए नही, मादाओं के लिए।

लेकिन यह आवरण कोई धोखा नही है बल्कि मनुष्य में घटी एक बिल्कुल नवीन घटना है और मनुष्य मात्र जैविक स्तर पर ही नही बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी अस्तित्वमान होता है।

शब्द 'वासना' इड को सामाजिकता के लिए बलिदान करते हुए सुपरईगो के स्तर का शब्द है, सुपरईगो द्वारा रचा हुआ।

सामाजिकता के लिए मौलिक प्रवृत्ति का बलिदान देना होता है और आप इसे एक अच्छा शब्द संस्कार कह लीजिए।

अब यदि सुपरईगो माया रचते हुए इड को नियंत्रित करने के लिए एक शब्द "वासना" रचता है तो इड भी "सुपरईगो" को वासना कहता है, समाज की वासना।

हममें तीन मुख्य प्रवृत्तियां हैं, भूख-प्यास, सेक्स और सामाजिक होने की।

सामाजिक होने की प्रवृत्ति को तुष्ट करने के लिए हमे समाज के प्रेत के आगे अपने प्रेत इड को एक हद तक बलिदान करना पड़ता है अन्यथा समाज हमे स्वीकार नही करेगा।

प्रेत!!

दरअसल हम सब वासनाओं के प्रेत ही जन्मते है लेकिन शीघ्र ही हमारा सामना समाज द्वारा रचित महाप्रेत, ईश्वर से होता है जिसकी तुष्टि के लिए हमे अपने प्रेत के एक बहुत बड़े हिस्से की बलि चढ़ानी होती है और यह बचा हुवा हिस्सा ही आदमी कहलाता है।

महाप्रेत को तुष्ट करना हमारी बाध्यता है क्योकि उसके तुष्ट होने के बाद ही समाज हमे स्वीकार करता है और हमे समाज की जरूरत है।

समाज की अपनी वासनाएं है लेकिन उन्हें वह प्रेत कहना पसंद नही करता बल्कि वह अपनी वासनाओं को ईश्वर कहता है। उसने इस शब्द से एक माया रच रखी है ताकि उसके प्रेत के आगे बाकियों के प्रेत उन्हें पापी और छोटे दिखें जिससे उनके प्रेतों का बलिदान करवाया जा सके।

 

 

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मानुष की चेतना के अनेक बुलबुलों में से एक बुलबुला है ईश्वर, यह फूटने के लिये ही बना है; क्या आपने ईश्वर को मरते नही देखा है?

हम इसे बुद्धि से इस जगत के कारण रूप में स्थापित करते हो लेकिन शीघ्र ही यह हमारे अनुभव को परेशान करने लगता है और अब हम कहने लगते हो कि स्वयम ईश्वर भी ऋत से बंधा है; प्रकृति ही ईश्वर है; भौतिक नियम ही ईश्वर हैं।

क्या आपका ह्रदय मेरी तरह इस ईश्वर से परे उस ईश्वर को नही ढूंढता जो इस कार्य कारण के अटल नियम को, इस ऋत को भी तोड़ दे?

लेकिन हमारी लिखित-अलिखित किसीभी स्मृति में कोई इस जगत में उपस्थित कार्य-कारण को आज तक नही तोड़ पाया है--जानते हैं क्यों?

क्योकि ईश्वर वास्तव में है ही नही, वह हमारी ही चेतना में जन्मा एक बुलबुला है जिसे हम अपनी बुद्धि से कभी यहाँ तो कभी वहाँ बिठाते हैं।

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वह उस सरिता के तट पर उपस्थित शिलाखंड पर ध्यान कर रहा था। सरिता अपनी वेग से बहती जाती और उसके प्रवाह से उत्पन्न नाद से यह वन भरता जाता। पहाड़ियों के नीचे वन में यह अदभुत जगह थी, वीरान, निर्जन किन्तु प्रकृति से भरपूर, ऊंचे ऊंचे हरे-भरे वृक्ष, छोटी-बड़ी कंटीली झाड़ियाँ, रंग बिरंगे पक्षी, विविध छोटे-बड़े जानवरो की उपस्थिति, नदी का गर्जन, नदी का शिलाओ से टकराने पर उपजा नाद --मात्र मनुष्य यहां नही आता क्योकि वह अब प्रकृति से निकल संस्कृति में स्थापित हो चुका था।

यहाँ वह पवित्र आत्माआती थी, शिलाओं पर बैठती और ध्यान में खो जाती, किन्तु यह मात्र इस पवित्र आत्मा की ही ध्यानस्थली न थी, यहाँ वह प्रेतनी भी आती और प्रकृति संग प्रेत-क्रीड़ा करती। कभी-कभी तो यहाँ ये दोनों ही उपस्थित होते लेकिन एक दूसरे पर ध्यान न देते और एक दूसरे से दूरी बना कर ही रखते। ऊपर शिलाखंड पर पवित्र आत्मा ध्यान करती तो नीचे नदी के बीचों-बीच उपस्थित शिलाओं पर प्रेतनी अपनी प्रेत-क्रीड़ा करती।

पवित्र आत्मा प्रेतनी से डरती थी, पवित्र आत्मा को भय था कि प्रेतनी उसकी पवित्रता को नष्ट कर सकती है।

आत्मा अपने इसी भय पर विजय प्राप्त करना चाहती थी, सम्भवतः इसके पूर्वजो और गुरुओं ने बताया था कि उसका यह भय प्रेतनी की उपस्थिति में ही मिट सकता है तथापि वह प्रेतनी के निकट न जाता।

एक रात जब यह पवित्र आत्मा शिलाखंड पर बैठी ध्यान कर रही थी तो प्रेतनी उसके निकट गई और प्रेतनी ने कहा, "हम कई दिनों से यहाँ आ रहे हैं लेकिन हमने अभी तक अपने अपने भयों से मुक्ति नही पाई है, आओ आज हम मुक्त हो, प्रेत!"

पवित्र आत्मा चौकी, "लेकिन मैं तो पवित्र आत्मा हूँ, प्रेतनी तो तुम हो!"

"--ओ प्रेत, पाप और पुण्य, पवित्रता और अपवित्रता इन शिलाओं जैसी वस्तु नही है, मेरे लिए तुम प्रेत हो और मैं पवित्र आत्मा जबकि तुम्हारे लिए मैं प्रेतनी हूँ और तुम पवित्र आत्मा!"

"--प्रेतनी, मुझ पर तुम्हारी माया न चलेगी, मैं ही पवित्र आत्मा हूँ और तुम प्रेतनी, दिवा रात्रि नही होती और रात्रि दिवा नही होता।"

"-तुम्हे मैं पवित्र आत्मा भी कहूँ तो मुझे कोई फर्क न होगा क्योकि मुझे अपने अस्तित्व की सिद्धि चाहिए जिसमें तुम बाधक हो ठीक जैसे तुम्हे अपने ध्येय व आदर्शों की सिद्धि चाहिए जिसमें मैं बाधक हूँ लेकिन, विडंबना देखो की हम एक दूसरे की सहायता के बिना अपने ध्येय को प्राप्त ही नही कर सकते और हाँ, दिवा और रात्रि की तरह का भेद मात्र अचेतो में उपस्थित है, जैसे यह शिला है और वह सरिता, हम चेत उस समय की तरह हैं जब न तो दिन है और न रात, बल्कि दोनो का संक्रमण है।"

"--प्रेतनी, तथापि क्या इस संक्रमण से दो रास्ते नही निकलते, क्या इस संक्रमण से दिन और रात आगे चलकर एक हो जाते हैं? इस संक्रमण से कभी दिन फूटता है तो कभी रात बहती है, क्या यह सत्य नही है?"

"--पवित्र आत्मा, दो घटनाएं अवश्य निकलती हैं, दो मूल्य नही निकलते अन्यथा बताओ कि दिन और रात में कौन पवित्र है और कौन अपवित्र?

"--प्रेतनी, घटनाओं का संसार मात्र अचेतो के लिए हैं, हम चेत घटनाओं से बढ़कर मूल्यों के संसार मे जीने लगते हैं, हम चेत घटनाओं के साथ मूल्य जोड़ने लगते हैं और तभी तो आत्मा तुम भी हो और आत्मा मैं भी हूँ लेकिन यह घटना होने के बावजूद तुम प्रेतनी हो और मैं पवित्र आत्मा और प्रेतनी, मैं इसलिए पवित्र आत्मा हूँ कि मैंने शुद्ध और पुण्य कर्म किये हैं और तुम प्रेतनी इसलिए हो कि तुमने अशुद्ध और पाप कर्म किये हैं और तुम सदैव उन्ही की ओर प्रेरित रहती हो।"

"पाप-पुण्य, शुद्ध-अशुद्ध-हा हा हा, ओ पवित्र आत्मा यह कौन निर्धारित करता है कि पाप क्या है और पुण्य क्या, शुद्ध क्या है और अशुद्ध क्या? क्या दिन में पाप नही होते और क्या गहनतम तम की निशा में पुण्य नही होता?

पवित्र आत्मा, तनिक अपने अंदर गोता लगाओ और देखो की क्या यह तुम निर्धारित कर रहे हो कि क्या पुण्य है और क्या पाप अथवा तुम अंदर एक खुद को एक कठपुतली के रूप में देखते हो जो किसी और के इशारे पर पाप-पुण्य का निर्णय देती है?"

पवित्र आत्मा प्रेतनी की इन बातों को सुनकर ध्यान में बैठ गई और उसने अपने अंदर गहरे-गहरे गोते लगाने आरंभ कर दिए, अपने गोतो के दौरान जब वह अंदर काफी गहराई तक गई तब उसने देखा कि वह एक कठपुतली है, डोर से बंधी हुई कठपुतली।

उसने इन डोरो का पीछा करना आरम्भ कर दिया कि आखिर इन्हें संचालित कौन कर रहा है। काफी प्रयासों के पश्चात अंततः उसे यह दिख ही गया कि इस डोर के किसने थाम रखा है। वह जिसके हाथ मे यह डोर थी उसका चेहरा ध्यान से देखने पर प्रतीतहोता कि उसके चेहरे में आत्मा की स्वयम की तथा प्रेतनी के चेहरों की मिलावट है और, उसने एक हाथ से आत्मा की तो दूसरे हाथ से प्रेतनी की डोर थाम रखी है। वह इस हाथ की ओर से उस हाथ की ओर देखता तो उस ओर पाप नजर आता लेकिन जब वह प्रेतनी की डोर वाले हाथ की ओर से उस हाथ की ओर देखता जिसने उसकी डोरिया थाम रखी थी तो उसे उधर ही पाप दिखने लगता।

आत्मा अपने ध्यान से बाहर निकल आई लेकिन आँखे खोलने पर उसके सम्मुख प्रेतनी नही थी; प्रेतनी जा चुकी थी; उसका भय जा चुका था क्योकि उसने गहराइयों में जो देखा उसके बाद उसका अपनी पवित्रता से मोह मिट गया था।

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धार्मिक दृष्टि मे वर्तमान सदैव पाप से भरा होता है क्योकि धर्म जिस संरचना पर टिका है उसमें मिथकीय स्वर्णिम अतीत फिर उस अतीत का नष्ट हो भटका वर्त्तमान और भटकेवर्त्तमान से एक मिथकीय स्वर्णिम भविष्य की बात होती है।

विकसित धर्मो में यह "मुक्तिशास्त्रीय संरचना" अवश्य होती है। आदिम धर्मो मे भी सम्भवतः इसकी उपस्थिति हो।

मुक्तिशात्रीयता हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध, जैन, यहूदी, ईसाई सबमे हैं।

हिन्दू धर्मो में वह स्वर्णिम अतीत अविद्या और माया के अभाव के कारण आता है और वह स्वर्णिम भविष्य मोक्ष और मुक्ति में कल्पित है जबकि अब्राहमिक धर्मो मे आद्यपाप और ईश्वरीय साम्राज्य की स्थापना के रूप में।

मिथक दृष्टि में भी पुराने लोग आश्चर्यजनक शक्तियों से युक्त होते हैं।

मिथकीय-दैवीय व तत्त्वमीमांसिय दृष्टि काल का दो बार आइडियलजेशन करती है अतीत और भविष्य, लेकिन फिजिकल प्लेन पर उसे इस बात को सिद्ध करने की उसके पास तकनीक भी नही होती और करना भी नही चाहती।

आइडियलजेशन ओफ़ फिजिकल फेनोमेना अर्थात भौतिक घटनाओं का आदर्शीकरण विज्ञान के लिए भी आवश्यक है किंतु इस आइडियलाइजेशन को पुनः फिजिकल प्लेन या भैतिक तल पर उतार कर जांचने का कार्य मात्र हमारे संज्ञानत्मक विकास के वैज्ञानिक अवस्था मे होता है, मिथकीय-दैवीय व तत्त्वमीमांसिय अवस्था मे इसकी जांच के बजाय श्रद्धा और शास्त्रसम्मतता के द्वारा इसमे बल भरने का प्रयास किया जाता है क्योकि फिजिकल प्लेन पर इन दृष्टियों से प्राप्त आइडियलजेशन व उससे व्युत्प्न्न चीजे काम नही करतीं।

भौतिकवाद को गाली देना दैवीय-मिथकों व तत्त्वमीमांसिय मोड मे चिंतन कर रहे व उसी मे जी रहे लोगो की बाध्यता है क्योकि भौतिकवाद उनके आदर्श व सिद्धान्त को नग्न कर देता है; एक बार नग्न हुए नही की उन्हें समाज का पावर रिलेशन उनके विरुद्ध चला जाएगा!

 

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पलायन

बाबू साहब अगर शाही परिवार के वंशज थे तो जादो जी कीविधायक मदन जादो होते हुए लालू जी से पहचान। बाबू साहब के पूर्वज अगर सामंती युग के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे तो जादो जी इस नवीन युग मे प्रतिष्ठित हुए जाते थे। बाबू साहब के पास यदि पुराने गढ़ और किला थे तो जादो जी आधुनिक सुविधाओं से लैस बंगला बनवा रहे थे।

बाबूसाहब के पास अगर अतीत था तो जादो जी के पास वर्तमान, और ईश्वर की माया देखिए कि एक दिन अतीत और वर्तमान की भिड़ंत हो गई लेकिन यह भिड़ंत किसी युद्ध क्षेत्र में न हुई बल्कि बाजार स्थित धेनुआ की सब्जी की दुकान पर हुई और कारण न ज़र था, ना जोरू ना जमीन बल्कि कृत्रिम नाक थी-नाक, जो पेट, मष्तिष्क और ह्रदय से ज्यादा, बल्कि बहुत ज्यादा बड़ी हो गई थी।

हुआ यह कि धेनुआ की सब्जी की दुकान पर बाबू साहब और जादो जी दोनो शायद साथ किंतु अलग-अलग दिशाओं से पहुंचे और दोनो का दिल धेनुआ की टोकरी में रखी उस छोटी सी गोभी पर आ गया और दोनो ने ही एक साथ धेनुआ से उस गोभी को खरीदने के लिए उसका मूल्य पूछा। धेनुआ ने जवाब दिया: बीस रुपया।

बाबू साहब और जादो जी दोनो एक दूसरे की मंशा ताड़ चुके थे अतः दोनो ने अपनी जेब मे हाथ डाले और संयोग से दोनो के ही जेब से पचास-पचास रुपए की नोट निकले और दोनो के ही मुख से समान शब्द निकले की यह ले पचास रुपए बाकी गोभी हमको ही दो--अतीत और वर्तमान के झूठे शान की भिड़ंत हो चुकी थी।

इस भिड़ंत में पैसों का कोई मोल न रहा-कभी जादो जी बढ़कर बोली लगाते तो ठीक उसके बाद बाबू साहब उससे बढ़कर बोली लगा देते।

गोभी की कीमत बीस रुपये से होते हुए धड़ा धड़ हजार, पन्द्रहसौ, दो हजार, पांच हजार, दस हजार पार कर बीस हजार पर पहुंच गई थी।

जादो जी ने अबकी बार गोभी के लिए पच्चीस हजार देने की बात कही तो जवाब में बाबू साहब ने धेनुआ से कहा--एक कट्ठा जमीन।

इधर धेनुआ गोभी की हर बढ़ती कीमत के साथ घबराता जाता और उधर बाबू साहब के लोग बाबू साहब की ओर इकट्ठे हो रहे थे और जादो जी के लोग जादो जी की ओर जिनमे दोनो ही तरफ के लोगो के पास बंदूकें और रायफल थीं।

पहले तो धेनुआ के मन मे विचार आया कि वह गोभी के दो टुकड़े कर के उनके आधे-आधे हिस्सेक्रमश: बाबू साहब और जादो जी को दे दे और मूल्य लेने के समय हाथ जोड़ ले किन्तु तभी उसे याद आया कि अभी दो वर्ष पूर्व ही खदेरन की लिट्टी-बाटी की दुकान पर कुर्सी पर कौन बैठे इस बात को लेकर एक विवाद हुआ था और खदेरन नेजब वह कुर्सी हटा कर विवाद ही खत्म करना चाहा तो उसे अपने प्राण देने पड़े। उसने लोगो से सुना था कि जब वह कुर्सी हटा रहा था तो बाबू साहब और जादो जी दोनो ने ही उसे यह कहते हुए एक एक गोली मारी थी कियहां बात आन की है और यह कुर्सी ही हटा रहा है।

उधर अब बाबुसाहेब और जादो जी के बीच रायफल तना तनी भी हो गई थी-अब बेचारा धेनुआ क्या करे-आगे कुँवा तो पीछे खाई!

तभी धेनुआ ने देखा कि स्टेशन पर अपर इंडिया खड़ी है। यह ट्रेन, अपर इंडिया मुगलसराय से सियालदह जाती है और धेनुआ की दुकान से रेलवे स्टेशन भी बमुश्किल सौ मीटर दूर था।

धेनुआ ने स्वयम को समेटा, हिम्मत जुटाई और गोभी अपने काँख में दबाकर सरपट स्टेशन की ओर भागा। यद्यपि वह बहुत तेज भागा था तब भी उसके स्टेशन आते-आते ट्रेन खुल चुकी थी लेकिन फिर भी उसने हिम्मत न हारी और वह ट्रेन में चढ़ ही गया।

लोग कहते हैं कि वह सीधे कलकत्ता उतरा और वहां उसने उस गोभी को मात्र दस रुपए में बेच दिया लेकिन इस दस रुपए में जो शांति थी वह उसे आज तक महसूस न हुई थी।

धेनुआ फिर वापस कभी नही लौटा, वह पलायन कर चुका था।

एक दूसरे अंत मे धेनुआ वह गोभी वहीं छोड़कर कलकत्ता भाग गया और फिर वापस कभी लौट कर नही आया जबकि यहाँ आजतक बाबू साहब और जादो जी के परिवारों के बीच उसी गोभी के लिए कई बार खूनी संघर्ष हो चुके हैं। ये और बात है कि वह गोभी कब की सड़-गल कर खत्म होकर माटी बन चुकी है लेकिन, दोनो तरफ की बड़ी-बड़ी नाके, आंखों को घेरी बैठी नाकेँ।

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यह पूर्वपाषाणयुग है। मनुष्य अभी कृषिकर्म नही सीखा है, वह अभी शिकार करके जीता है लेकिन उसने दैवीयता की भावना और दैवीयता के स्वरूप को अपनी व्यक्तिगत तथा सामूहिक चेतना में स्थापित कर लिया है--उसकी चेतना में उभरा यह स्वरूप एक स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया की परिणीति है या यह उसकी उस जगत-दृष्टि की असफलता के कारण पनपी है जिसे भविष्य में कुछ नृवैज्ञानिक 'जादू' कहने वाले हैं, इस विवाद में हमे नही पड़ना तथापि प्रसंगवश इन दो जगत-दृष्टियों का सामान्य परिचय यहाँ आवश्यक है।जब तकहमारे यह आदिम पूर्वज शिकार पर जाने के पूर्व के इस अनुष्ठान के, जिसे हम देखने यहाँ रुके हैं, लिए सामग्री एकत्र कर रहे हैं, तब तक हम इन दो आदिम जगत-दृष्टियों से परिचित हो जाते हैं:--

प्रथम जगत-दृष्टि का नाम जादू है और द्वितीय का धर्म, हालांकि ये दोनों ही नामकरण हमारे किए हुए हैं, इन संज्ञाओं के साथ गुंथी हुई भाववाचकता भी हमारी है, लेकिन इसके लिए हमें ग्लानि भी नही होनी चाहिए आखिर हम अपने इन पुरखो से काल और संस्कृति से बहुत दूर बैठे है साथ ही हमे यह जगत दृष्टिया विरासतन 'सरवाइवल' के रूपमे मिले हैं जिसको हमारे आदिम पूर्वज हमारे साथ साझा नही करते।

जादू में कर्मकांड प्रमुख हैं, क्योकि इस जगत-दृष्टि में मनुष्य इस विश्वास के साथ जीता है कि यह कर्मकांड उसके द्वारा प्रत्याशित घटनाओं को यथार्थ में फलित करेंगे ही--यदि इन कर्मकांडो और इनके द्वारा आशा किए गए फल के बीच कोई अलौकिक, अभौतिक कर्ता या कारक है तो भी वह इन कर्मकांडो की शक्ति से बंधा हुआ है और इनका वह अतिक्रमण नही कर सकता।

यदि आज की शब्दावली में कहें तो--देवता मन्त्रो से बंधे हुए हैं-मंत्र देवता को सृष्ट करते हैं--मन्त्रो का अतिक्रमण उसके देवता भी नही कर सकते।

लेकिन, दूसरी जगत दृष्टि में देवता इन मन्त्रो और कर्मकांडो से न तो बंधे हैं और और न ही अनुबंधित हैं--यहाँ देवता प्रमुख हैं, मंत्र और कर्मकांड नही क्योकि इस जगत-दृष्टि में आप देवता को इन चीजों से बाध्य नही कर सकते।

देवता को किसी भी प्रकार से चुकी आप बाध्य नही कर सकते अतः इस जगत-दृष्टि में मंत्र देवताओं को आदेश देने की बजाय स्तुतिपरक हैं।

यदि जादू कोई वास्तविक समाजशास्त्रीय व नृवैज्ञानिक कोटि है (जैसा फ्रेजर व टेलर मानते हैं) तो समकालीन समाजों की धार्मिक चेतना में इन दोनों कोटियों से अभिव्यक्त परिघटनाओं, चिंतन पद्धति का मिश्रण हो चुका है। जादू अपने आर्किक, प्रीस्टिन रूपमें तो शायद ही हमे प्राप्त हो, हाँ आदिम धर्म के लक्षण बहुधा विविध धार्मिक कर्मकांडो में अवश्य प्राप्त हो जाते हैं।

जादू से यहाँ जादूगरों की इन्द्रजालिक क्रियाओ मात्र का बोध हो सकता है अतः हम इसके लिए अब से सामासिक पद जादू-मंतर का प्रयोग करेंगे। यह जादू-मंतर टेलर और फ्रेजर के शोधों मेंधर्म का बीज रहा है क्योकि टेलर धर्म की जो न्यूनतम परिभाषा करते है उसके अनुसार धर्म मे एक अलौकिक कर्ता (ईश्वर-बोंगा, देवा-भूता सरीखे) की आवश्यकता अपरिहार्य रूप से होती है जबकि जादू-मंतर के आर्किक रूप में यह कर्ता अनुपस्थित होता है। जादू-मंतर में इस प्रकार के कर्ता का आना या तो इस जगत-दृष्टि का धर्म की ओर संक्रमण या धार्मिक चेतना द्वारा इस दृष्टि के एडल्ट्रेशन का सूचक और प्रतिफल है।

हमारे यह पूर्वज जिनके साथ छुप कर हम कुछ समय व्यतीत करने आए हैं, इसी मिश्रित चेतना की आदिम अवस्था मे जीते हैं-इनकी धार्मिक चेतना, धर्म-जादू है।

मनुष्यो के सांस्कृतिक विकास के इतिहास को पढ़ने के लिए हमे प्रायः इस प्रकार के युग्म बनाने ही पड़ते हैं क्योकि मनुष्य अतीत में इन युग्मित, अन्डिफ्रेंशीएटेड मानसिक-भौतिक कारकों के साथ जीता था: आरम्भ में उसके औजार ही हथियार भी थे: औजार-हथियार, उसके देवता मेलोवेलेंट भी थे और बेनोवेलेंट भी: माना, बोंगा या देवा-भुता या हमारे समाज मे बचा उनका यह चरित्र, ब्रह्म बाबा और पहलवान बाबा।

★★★

किसी क्षेत्र की टोपोग्राफी, जियोमोरफ़ॉलोजी, जियोलॉजी कैसी है यह निश्चित रूप से उस क्षेत्र विशेष की धार्मिक चेतना के ऐतिहासिक विकास की दिशा को निर्धारित करेगा।

गिब्ब्स ने अपनी पुस्तक "इस्लाम" मे यद्यपि इस बात का विरोध किया है कि अरब में मोनोथिज्म (एकदेववाद) अरब के विस्तृत रेगिस्तान का मानवीय चेतना की प्रतिक्रिया है तथापि धर्मिक चेतना के विकास के मनोवैज्ञानिक इतिहास में इस तथ्य को नकारा नही जा सकता कि यह इस चेतना के विकास की दिशा क्या होगी उसमें टोपोग्राफी, जियोमोरफ़ॉलोजी एक प्रमुख भूमिका निभाएगी।

ध्यातव्य है कि धार्मिक चेतना का अर्थ यहाँ मान्य मात्र सात्विक कर्मकांडीय क्रियाकलाप नही हैं बल्कि मनुष्य की कल्पना में आए सुपरनेचुरल के भय से जन्मा उसका तुष्टिकरण, विस्मय आदि के आधार पर उसके द्वारा संपादित क्रियाएं भी हैं।

भूत, प्रेत, डायन, बिसाही, जादू-टोना आदि को भी धार्मिक चेतना के विकास के मनोवैज्ञानिक इतिहास से बाहर नही रखा जा सकता।

सर फ्रेजर और उनका स्कूल तो इनसे सम्बंधित चीजो से ही उदात्त धार्मिक भावनाओं की उतपत्ति स्वीकार करते हैं।

फ्रेजर के इस मत की पुष्टि होती झारखण्ड में साफ साफ दिखती हैं जहाँ कई समाजो में अभी भूता से देवा का स्प्लिट नही हुआ है, धार्मिक कर्मकांड का जादुई कर्मकांड से अलगाव नही हुआ है।

जैसे आरम्भ में मनुषयो के हथियार-औजार एक थे वही चीज धार्मिक चेतना के साथ भी हुई है:आरम्भ में वह सुपरनेचुरल कल्याणकारी भी है और विध्वंसकारी भी, वह प्रेत भी है और देवता भी; उससे जुड़ना भी बाध्यता है और उससे दूर रहना भी है:- बहुत सी बलियाँ आज भी इसलिए दी जाती हैं कि वह जिसे यह बलि दी जा रही है, बलि देने वाले और उसके परिवार से दूर रहे।

यदि आप उपरोक्त दृष्टि से झारखण्ड के समाज की धार्मिक चेतना और मैदानी इलाकों के समाज की धार्मिक चेतना का तुलनात्मक अध्यनन करते है तो झारखण्ड में भूत-प्रेत, जादू-टोना ज्यादा है; यहां हर चीज का भूता-देवा है: जंगल का, पहाड़ का, खोह का, जल का, खाई का, घर का, खेत का, जल का, शिकार का----यद्यपि मैदानी इलाकों में भी वनदेवी, डीहबाबा, घर के देवता आदि है लेकिन दोनो जगहों के देवताओं के स्वरूप में अंतर हैं: झारखण्ड के देवता ज्यादा उग्र हैं, ये ज्यादा अधिक तुष्टिकरण चाहते हैं, ये ज्यादा व्हिमेजिकल हैं; झारखण्ड के समाज के सेंस ऑफ सुपरनेचुरल में चीजे अभी भी दूसरी ओर हैं: अतः यहाँ ज्यादा डायन, बिसाही, सोखा, ओझा आदि हैं।

अब इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन इन कारणों में यहाँ की टोपोग्राफी, यहाँ की जियोलॉजी, यहाँ की जियोमोरफ़ॉलोजी ने एक महती भूमिका निभाई है इससे इनकार नही किया जा सकता।

आदिम समाज जिसकी विशेषता ही हर जगह "प्रकृति से डरा हुआ" होना है, उसके डरने के लिए मैदान के सपाट से की तुलना में यहाँ ज्यादा चीजे हैं। आज हम पत्थरो, खोह, खाई को जैसे देख लेते हैं यहाँ का आदिम समाज उन्हें नही देख पाता होगा: उसे मिगमेटाईट डराता होगा, टिगमेटाइट फॉलडिंग्स डराते होंगे, पोटेशियम का पिघल कर पत्थरो पर जम जाना और लाल रक्त सा दिखना डराता होगा, इस लाल के बगल में अचानक से एकदम काले रंग के लावा के जमाव से बना अचानक से झांकता चट्टान डराता होगा। फौल्टिंग, फोल्डिंग, शियरिंग आदि के कारण उभरी अजीब अजीब आकृतियां उसे डराती होंगी, चारो तरफ सूखा लेकिन एक जगह पत्थरो के बीच से बुलबला फेंकना उसे डराता होगा।

★★★

बोकारो जिले के स्थानियो के बीच मैंने एक शब्द सुना है: बघाही-- यह शब्द विशेषण बनकर बाघुत कुदरा में हैं, यही शब्द चुरीन बाघुत में है, यहाँ जंगल भी शापित अथवा बघाही होते हैं, यहां स्थानीय कथाओं में मैंने 'बाघ लगना' भी सुना है--

मेरे हिसाब से इन समस्त शब्दो का मूल बाघ नामक वह हिंस्र पशु ही है, जिसके सामान्य अथवा बाघत्व का आलौकिकण करते हुए इसे अलौकिकत्ता से इस प्रकार जोड़ दिया गया है कि बाघत्व या बाघुत से व्यक्त भाववाचकता ने पशु-रूपी बाघ का अतिक्रमण कर लिया है।

मनुष्यो के इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है: अश्वमेध का अश्वत्व या अश्व मात्र भौतिक अश्व नही है लेकिन वैदिक यह अश्व-भाव जहाँ सकारत्मकता के साथ कल्पित है, बघाही नकारत्मकता के भाव से और इसीलिए यह स्थानियो में मान्य अलौकिक सत्ताओं के साथ विशेषण के रूप में व्यक्त होता है: कुदरा भी अलौकिक सत्ता है और चुरीन भी हालाकि इनका मेलोवेलेंट पक्ष ज्यादा प्रोनाउंसड है और इसीलिए यह न तो देवता है और न दानव--यह दोनो हैं: देवा-भूता।

आगे---

 

 

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वैज्ञानिक तथ्य लिखने वालों की भाषा कैसी होनी

चाहिए?

यद्यपि हम जो कुछ जानते है, जो कुछ अभिव्यक्त करते है वह अपने ही परिप्रेक्ष्य में कर सकते है तथापि हमरा परिप्रेक्ष्य जितना बड़ा हो उतना बेहतर होता है। कम से कम वैज्ञानिक तथ्य या वैज्ञानिक विवरण लिखते समय परिप्रेक्ष्य विषयक इस बात की सावधानी बरतनी बहुत आवश्यक है अन्यथा वह तथ्य जो लिखा गया है वैज्ञानिक नही रह जाता।

ऐसा नही है कि हमने वैज्ञानिक भाषा और उसकी शब्दावली के रूप में एक पूर्णतया वस्तुनिष्ठ अभव्यक्ति का मध्ययम प्राप्त करलिया है; सम्भव है कि मेटा-साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली से तुलनात्मक रूप से अधिक वस्तुनिष्ठ हो लेकिन, यह भविष्य की बात है। वर्तमान में वैज्ञानिक व्याख्याएँ अभिव्यक्त करते समय उन शब्दों के, उन वाक्य विन्यासों के प्रयोग से बचना चाहिए जो शब्द और वाक्य विन्यास भावात्मक और सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित या प्रीलोडेड हैं। ध्यान रहे कि भावात्मक या सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित शब्दावली और वाक्यविन्यास द्वारा वैज्ञानिक व्याख्या एक व्याख्या नही बल्कि एक मंडन या अपोलॉजी बन जाती है यथा, "सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी"।

विज्ञान के अपने नियम हैं, अपने अनुसाशन हैं और इनका पालन अपरिहार्य है। नवीन तथ्यों की अभिव्यक्ति के लिए विज्ञान ने नवीन शब्दावली, नवीन वाक्य विन्यास रचने की छूट दे रखी है अतः बजाय उस प्राचीन और शास्त्रीय भाषा के प्रयोग के, नवीन भाषा की रचना की जानी चाहिए।

मानवीय जगत तथ्य-मूल्य की समष्टि है। विज्ञान तथ्य का अनुसंधान करता है। इसका क्षेत्र मूल्यो की खोज या व्याख्या कतई नही है। अब, हमारी भाषा के तीन कम्युनिकेटिव कार्य हैं (इर्विन कॉपी):

■इंफोर्मेटिव यूज ऑफ लैंग्वेज (भाषा का सूचनात्मक कार्य)

■इमोटिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का भावात्मक कार्य)

■ डिडेक्टिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का निदेशात्मक कार्य)

भाषा यह तीनो कार्य वाक्य विन्यास (सिंटेक्स) और शब्दावली से सम्पन्न करती है और प्रायः होता यह है कि इसके भावात्मक व निदेशात्मक कार्य मे प्रयुक्त शब्द वाक्य से अलग एकांत में भी वही भावात्मक और निदेशात्मक कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं: यह भाषा के साथ एक प्रकार की कंडिशनिग है।

इन शब्दो का भाषा के सूचनात्मक कार्य मे दो कारण से उपयोग हो सकता है: जानबूझकर या अनजाने में।

मंडनशास्त्री यह जानबूझ कर करते हैं ताकि उनके पक्ष की मान्यता स्थापित हो सके और विज्ञान में कम प्रशिक्षित लोग अनजाने में। इन दोनों ही हालातो में विज्ञान का नुकसान ही होता है और छद्मविज्ञान की ही प्रतिष्ठा होती है।

वैज्ञानिकों ने इस बात को समझा है और तभी आज प्राकृतिक विज्ञानों के शीर्ष पर बैठी भौतिकी प्रतीकों (सिंबल्स) और गणितीय सम्बन्धो का प्रयोग करती है।

दार्शनिकों ने भी इस बात को समझा और यह स्पष्ट किया कि बहुत सी दार्शनिक समस्याएं तो मात्र भाषाजन्य भ्रम हैं; हमारी भाषा हमे स्प्ष्ट हुई नही की ये समस्याएं वाष्पीकृत हो जाती हैं।

प्रख्यात दार्शनिक और गणितज्ञ बर्ट्रेंड रसेल ने इसी लिए दर्शन के लिए एक अलग वस्तुनिष्ठ, भाव-निदेश निरपेक्ष भाषा विकसित करने की वकालत की और इस सम्बंध में प्रयास किया।

Philosophical problems are the product of the unconscious adoption of assumptions built into the vocabulary in which the problem was stated-assumptions which were to be questioned before the problem itself was taken seriously.

Ftom Richard Rorty's

(Philosophy and the mirror of nature)

 

 

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वहआदिम युगों से पत्थर को सींचता था, कभी पत्थरो पर जलाभिषेक करता, कभी प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ पुष्प और फल अर्पित करता तो कभी अपनी भावनाएं चढ़ा आता।

ऐसा कर वह स्वयम मिटता जाता, लेकिन यह भी नही है कि उसे इसका भान न था कि वह पत्थरो को सींच कर स्वयम को मिटाता जाता है। उसे यह भान था और वह सचेतन यह करता क्योकि उसके ग्रन्थों में लिखा था कि वह ग्रन्थी है और ग्रन्थियों के खुलने के पश्चात वह मुक्त है, निर्ग्रन्थ, तथा निर्ग्रन्थ होना ही उसके जीवन की सार्थकता है; अच्युत, अभय पद की प्राप्ति; त्रिविध तापों का भूत, वर्तमान, भविष्यत अर्थात आत्यंतिक विनाश।

सदियां बीतती गईं किन्तु उसकी पीड़ा कम न होती बल्कि बढ़ती जाती थी, उसकी घुटन भी और उग्र होती जाती।

फिर एक दिन उसने अपनी पीड़ा और अपने घुटन से परेशान होकर आकाश की ओर देखा और चीख पड़ा। उसके बुजुर्गों ने बताया था कि इस प्रकार से चीखने से विराट से विराट में प्रवेश का रास्ता खुलता है।

वह कई वर्षों तक आकाश की ओर देख चीखता रहा लेकिन उसे कुछ भी दृष्टिगोचर न हुआ, या सम्भवतः हुआ क्योकि अब वह यह देख सकता था कि मात्र वही है और उसकी चीख है, इसके अलावा कुछ भी नही है।

वह उस पत्थर के पास गया और वहाँ उसने देखा कि वह पत्थर से कुछ विशिष्ठ है क्योकि वह चेतन है और वह पत्थर अचेतन, जड़।

फिर उसने पत्थर को थामे उस मिट्टी की ओर देखा। मिट्टी--यह अगर न होती तो यह पत्थर कब का लुढ़ककर कहीं और चला गया होता!

उसने और ध्यान से देखा तो मिट्टी में मात्र वह पत्थर ही नही था बल्कि वनस्पतियां भी थीं जिनपर पुष्प और फल लगते जिनसे वह अपनी क्षुधा भी शांत करता: फलो से पेट की और पुष्पों से मन की।

फिर उसे याद आया कि उसने मिट्टी को इस पत्थर की तुलना में तो बहुत कम सींचा है। वह अपराधबोध से भर गया और फिर से घुटन से भर इस बार धरती की ओर देखकर चीखा-

इस बार उसने सचेतन पुष्प और फल उगाए और स्वयम पर गर्व किया-उसने वास्तविक स्रष्टा को पहचान लिया था---लेकिन उसकी आत्मा में एक बहुत बड़ा छेद बन ही चुका था

 

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तुम मनुष्यो की स्वतंत्रता मात्र इतनी ही है जितनी बड़ी रस्सी से तुम उस खूंटे से बंधे हुए हो और न तो यह रस्सी काटी जा सकती है और न ही उस खूंटे को उखाड़ा जा सकता है क्योंकि जानते हो वह खूंटा क्या है? यह खूंटा तुम्हारे अस्तित्व का खूंटा है, इसे अथवा इस रस्सी को हटाने के लिए तुम्हे अनस्तित्व होना पड़ेगा, तुम्हे मरना पड़ेगा।

-तो फिर मनुष्यो की विशिष्टता संकल्प की स्वतंत्रता क्या है?

-शायद तुम उस कपालिक के द्वारा कही उस नग्न सच्चाई को विस्मृत कर चुके हो या आत्म-व्यामोह में उस बात कोतुमने अनसुना कर दिया कि मनुष्य संकल्प को स्वतन्त्र है किंतु उसका संकल्प क्या होगा, वह कैसा संकल्प कर सकता है इसके लिए वह स्वतंत्र नही है।

यद्यपि यक्षिणी ने उसके प्रश्न का दो टूक उत्तर दे दिया था, उसके अंदर कोई था जिसे यह स्वीकार नही था यद्यपि उसे यह भी ज्ञात था कि यक्षिणी ने उससे झूठ नही बोला है।

यक्षिणी अंतर्ध्यान हो चुकी थी किन्तु वह अभी भीअपने उस प्रश्न में ही खोया हुआ था, जिसके उत्तर की प्राप्ति के लिए उसने यह यक्षिणी साधना की थी--वह अपनी सीमा जानना चाहता था क्योकि उसने शास्त्रों में पढ़ा था कि वह और जगत का सार तत्वतः एक ही हैं यद्यपि उसके अनुभव इस बात के विरुद्ध जाते थे किंतु उसे लगता की तत्व और उसके अनुभव के इस द्वंद में उसका अनुभव सत्य नही है।

उसने उस शिला के पास कुछ क्षण और बैठे रहने का निर्णय लिया ताकि वह कुछ क्षण इस पर विचार कर सके कि आखिर उसके भीतर ऐसा क्या और क्यों है जिसे यक्षिणी की कहीं बातों से तोष न हुआ और वह इन बातों से व्यक्त यथार्थ से परे चला जाना चाहता है।

 

 

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मूलवासन

वर्ण व्यवस्था कर्मणा थी, इसमे कुछ लोगों के पास प्रिविलेज निश्चित रूप से थे: यह प्रिविलिज संसाधन और वैल्यू, मूल्यों के रूप में था।

मनुष्य को शायद यह प्रिविलेज्ड चीजें चाहना उसके मनोविज्ञान में है।

इस प्रिविलेज को अपनी अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने के लिये इसे जन्मना बनाया गया और इस जन्मना विशेषाधिकार के दावे को पुष्ट करने के लिए कई मिथक, कई बुद्धि प्रपंच रचे गए, इनमे सबसे महत्वपूर्ण तत्कालीन समाज की सांस्कृतिक भौतिक स्थिति के अनुरूप प्रिविलेज्डवर्ग ने स्वयम को दैवीयताके साथ सम्बद्ध कर लिया।

भारत मे स्वाधीनता के पश्चात, नव भारत निर्माताओं ने एक बहुत ही स्वस्थ भारतीय समाज का स्वप्न देखा था। इस स्वप्न में समस्त मानव बराबर थे, जन्मना प्रिविलिज की कोई बात न होनी थी और इस उद्देश्य हेतु उन्होंने जन्मना अनप्रिविलेज्ड व मुख्यधारा से कटे जनसमूहों के लिये एक करेक्टिव मीजर, एक उपचरात्मक हाथ बढ़ाया।

यहाँ तक यह एक क्रांतिकारी और मानवीय बात थी लेकिन इस समूह ने भी इस प्रिविलिज को,यद्यपि यह करेक्टिव मीजर है, जन्मना बना दिया और इसके निरन्तर बने रहने के लिये नये मिथक, नये बुद्धि प्रपंच रचते हैं।

इस नये प्रपंच में शोषण की कई मिथकीय कहानियां रची गई लेकिन यहाँ जो सबसे महत्वपूर्ण मिथक रचे जाने का प्रयास है वह है मुलवासन की संकल्पना।

मुलवासन नया देवता है, लेकिन यह भी पुराने देवताओं की तरह मात्र मिथक है, एकदम खोखला------

स्वयम के लिए अतिरिक्त मूल्य और संसाधन समाज के अंदर करुणा पैदा कर प्राप्त तो किये जा सकते हैं किंतु इस प्रकार से प्राप्त मूल्य उन मूल्यों की बराबरी कभी नही कर सकते जो पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त किये जाते हैं, भले ही इस प्रकार से प्राप्त संसाधन पुरुषार्थ से प्राप्त संसाधनों की तुलना में अधिक संग्रहित कर लिए जाए किन्तु इस प्रकार से प्राप्त मूल्य पुरुषार्थ के साथ आने वाले मूल्यों से हमेशा कमतर ही रहेंगे।

सम्मान कमाना धन कमाने से हमेशा कठिन रहा है, इसे कमाने में पीढियां गुजर जाती हैं और हाँ, रुदन-क्रंदन करनेवाले कहीं सम्मान पाते हैं?

भारतवर्ष मेरे पुरखे तब से बना रहे हैं जब बाकियों के पास देश या राष्ट्र नामकी कोई संकल्पना भी न थी और, सच्चाई यही है कि यह संकल्पना असल मे आज भी उनके अंदर नही है, वो जाति, धर्म, कबीला से आज भी ऊपर नही सोच पाते; ये नग्न है और अपनी नग्नता को ढकने के लिए हमे यूरेशिया से आया बताते हैं लेकिनमुझे पोलिटिकली करेक्ट बात नही कहनी, मैं तो सवाल पूछूँगा----आखिर मुलवासन नामक असुर का वध किसी न किसी को करना होगा न!

 

 

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अश्वमेध में वैसे अश्व का चयन किया जाता था जो सफेद हो किन्तु उसके शरीर पर काले धब्बे हों---देवता-भुता को रंग विशेष मुर्गे-बकरों की बलि देने की परंपरा मैंने झारखण्ड के जनजातीय समाज मे बहुत देखी है -इन सबकी एक व्याख्या है : होमियोपैथीक मैजिक।

★★

सभ्यता के विविध स्तरों पर समाज अपने सभ्यता सापेक्ष विशिष्ट संस्कृति के अनुसार विशिष्ट अलौकिक शक्तियों के भाव की रचना करता है। एक हंटर गैदरर समाज के अलौकिकता के भाव का विषयकृषि करने वाले समाज के अलौकिकता के भाव के विषय से अलग होता है। इसअलौकिकता के भाव के विषय (ऐसेकिस देवता की उपासना करें हम हवि देकर) में एक अद्भुत बदलाव तब हुवा जब मनुष्यो ने खेती करना सीखा। सम्भवतः कृषि की उतपत्ति के साथ बहुत से अलौकिकता के विषय जो शिकार काल मे विध्वंसक रूप की कल्पना के साथ उपस्थित थे शनै: शनै: कल्याणकारी शक्तियों के साथ कल्पित किए जाने लगे।

एक बड़ा मजेदार उदाहरण गणेश जी का है जो आरम्भ में विघ्नेश अर्थात विघ्नों के देवता थे, कालांतर में विघ्नहर्ता बन कर उपस्थित हुए।

कृषि की उतपत्ति के साथ मात्र पुराने अलौकिकता के भाव के विषयों के साथ सम्बद्ध भाव ही नही परिवर्तित हुए अपितु नए नए देवताओं का भी सृजन हुआ जो अपनी उतपत्ति के साथ ही कल्याणकारी रूप में उपस्थित थे।

अपनी उत्तपत्ति के साथ ही कल्यणकारी रूप में उपस्थित होंने सम्वन्धी अलौकिकता के भाव के विषय देवता के विरुद्ध इनसे पहले के अलौकिकता के भावों के विषयों को विशुद्ध रूप में देवता नही कहा जा सकता क्योंकि इनका स्वरूप

१ आरम्भ में विध्वंसकारी रहा है और कालांतर में इन्हें कल्याणकारी गुणों या शक्तियों के साथ कल्पित किया गया।

२ बहुत से ऐसे अलौकिकता के भाव के विषय एक ही समय विध्वंसक और कल्याणकारी दोनो ही शक्तियो के साथ उपस्थित थे।

अगर इस दूसरे प्रकार को एक नाम देना हो तो "देवा-भूता" से बढ़िया कोई शब्द नही होगा।

संथालो के बोंगा और पॉलिनेशियनो की माना "देवा-भूता" का और प्राचीन रूप है।

अब हम वापस आते हैं अपने खोज के विषय "भागुत कुदरा" पर।

भागुत कुदरा मूल रूप से कुड़मियो के देवा-भूता है हालकि यहाँ 'देवा-भुता' में झुकाव भुता की ओर है और कभी कभी तो यह इतना हो जाता है कि भागुत सीधे सीधे भूत का पर्यायवाची बन जाता है।

भागुत कुदरा का यदि अनुवाद करे तो इसका अर्थ है काला भूत और यह काला भूत या प्रेत खेतो में पाया जाता है और फसलों की रक्षा करता है। इसे काले मुर्गी की बलि दी जाती है।

यह काला भूत या प्रेत आखिर है कौन?

कुड़मी कृषक जनजाति है, हालांकि वर्तमान में यह झारखण्ड में अन्य पिछड़ी जाति की श्रेणी में है और ये अपनी आदिवासी पहचान के लिए संघर्षरत हैं।

मैदानी हिन्दुओ के लिए जो गङ्गा है, कुड़मियो के लिए वह धान है। इनके समस्त कर्मकांड, समस्त देवता,समस्त देवा-भूता धान के इर्द गिर्द ही घूमते हैं अतः भागुत कुदरा की भी पहचान भी धान और कृषि के अंदर ही सम्भव है।

भागुत कुदरा असल मे मॉनसूनी काले बादल और उससे झड़ने वाला जल हैं जो खेतो को सींचते हैं, नदियों को जल देते हैं, नालो और जोड़िया को भरते हैं।

अगर भागुत कुदरा न हो तो खेत मे पानी होगा ही नही और यदि पानी न बना रहा तो धान, कुड़मियो की गङ्गा खत्म हो जाएगी और इसीलिए भागुत कुदरा खेतो में फसलों की रक्षा करता है।

हज़ारो वर्ष पूर्व जब मनुष्य वर्षाचक्र, मानसून, वाष्पीकरण, संघनन आदि के बारे में नही जानता था तब की यह व्याख्या और परपरा है जो आज भीजीवित बनी है।

काला मेघ--काले मुर्गे की बलि।

 

 

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बब्बा के बब्बा चिंतित थे मानो प्रलय की घड़ी आने ही वाली है। बब्बा पिछले चार पांच घण्टो से चरनी चला रहे थे लेकिन अग्नि प्रज्वलित होने का नाम ही नही ले रही थी। बब्बा के सहयोगी बैठे जोर जोर से गाते जाते थे:

अग्नि तुम आओ, अग्नि अपनी अनेक जिव्हाएं फैलाओ, अग्नि अपना अंश ग्रहण करने हेतु प्रकट हो, प्रकट हो।

एक आदमी बब्बा के बगल से गुजर रहा था, शायद भविष्य से भाग कर आया था। उसने अपनी बीड़ी सुलगाई, बब्बा की ओर चवन्नी की माचिस फेंकी और आगे बढ़ गया।

उधरभविष्य में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि क्या फॉस्फोरस की रगड़ से जलने वाली आग पवित्र है और शीघ्र ही इस विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार करने की तैयारी चलने वाली थी और अगला सेमिनार इस विषय पर होना है कि क्या चरनी से आग जलाना गुरु के सानिध्य में ही सीखा जाना चाहिए।

 

 

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कब, क्यों,कहाँ, कैसे, कितना

हमारे पास यह पाँच ही प्रश्न है, हमारा मस्तिष्क इतना ही पूछने के लिए विकसित हुवा है लेकिनसत्ता (ब्रह्मांड) अपनी वस्तुगतता में जाने कितने वेरिएब्ल्स (चरों) को लिए बैठा है, उसकी यथारूप समझने के लिए न जाने हमे कितने प्रश्न-शब्दो की आवश्यकता पड़ेगी, अतः हम ब्रह्मांड को उसकी वस्तुगतता में नही समझ सकते।

हाँ हम अपने सन्दर्भ से कब-क्यों-कहाँ-कैसे ढूंढते चले जा सकते है और परत दर परत, रहस्य दर रहस्य उद्घाटित करते जाएंगे लेकिन हम यह भी दावे के साथ नही कह सकतेही ब्रह्मांड की वस्तुगतता के परिप्रेक्ष्य से यह कब-कहाँ-कैसे-क्यों सही प्रश्न हैं भी या नही!

वैज्ञानिक ज्ञान की एक सीमा है, जगत की नही।

विज्ञान क्या है? दरअसल यह अमीबा के उस उद्दीपन-प्रतिक्रिया का ही अत्यन्त जटिल रूप है, उस क्रिया-प्रतिक्रिया का मात्रात्मक-गुणात्मक विकास है। उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करने की आज तक की सबसे अच्छी प्रक्रिया, सबसे सफल प्रक्रिया है,और इसीलिए इसने इतने कम समय में हमारी चेतना के जगत को हमारे लिए इतना अनुकूलित कर दिया है।

यह प्रकृति के नए नए रहस्यों को खोल रहा है।

अणु में इसने अथाह शक्ति ढूंढ लिया और बस ढूंढा ही नही उसे मानव का पालतू भी बना दिया। प्रकृति पर आज हम किसी हद तक नकेल कस सकते है। हाँ वो शक्तियां जिनसे अभी मात्र पांच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे डर कर विनती करते थे वो आज हमारे नियंत्रण में हैं,और क्रमशः होती जा रही हैं। हमारे पुरखे जहाँ तक सोच नही सकते थे उन जगहों पर हम अपने पदचिन्ह छोड़ रहे हैं।

अनुकूलन की विविध चेतन प्रक्रियाओं में विज्ञान की बराबरी तो कोई कर ही नही सकता, न धर्म, न आदिम जादू (फ्रेजर) न सहज वृति, न अपने परंपरिमक मायनो में दर्शन।

लेकिन, विज्ञान की एक सीमा है जगत की कोई सीमा नही है।

हमे जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, हम जिन रहस्यों को जान रहे हैं क्या वो निरपेक्ष है, वास्तव में वैसे है या हमारी चेतना उन्हें वैसा प्रदर्शित करती है? चेतना, जिसका विकास प्रकृति से अनुकूलन के लिए हुवा है, हमारे न्यूरॉन के फंक्शन पर ही तो अवलम्बित है,और यह अवलम्बन स्वयं एक विकास का परिणाम है।

दरअसल हम सब कुछ देखने के लिए स्वतंत्र नही है, हम वही तक देखने के लिए स्वतंत्र है जहाँ तक हमारी चेतना हमे स्वतंत्रता देती है और हम उसी प्रकार देखने को स्वतंत्र है जिस प्रकार देखने की स्वतंत्रता हमारी चेतना देती है।

 

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दृश्यते इति वर्तते : 1

(बर्कली)

विज्ञप्तिमात्रता ही सत्य है।

इसबार आपको जड़ और चेतना इन दो शब्दों के द्वैत में जगत के बारे में नही सोचना है बल्कि मैटर और माइंड, इन दो शब्दों के संदर्भ में समस्त चिंतन करने हैं लेकिन उसके पहले इन दोनों शब्दो से हमारा आशय क्या है वह स्पष्ट हो जाय:

सामान्य रूप से किसी ज्ञान की प्रक्रिया पर विचार करिए, इसमे आपको तीन घटक मिलेंगे: ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान, ज्ञाता को ज्ञेय का ज्ञान होता है। यदि हम इनमें से किसी भी एक एक हो हटा दें क्या ज्ञान का होना सम्भव है? यदि हम ज्ञेय को हटा देते हैं तो फिर किसका ज्ञान? यदि हम ज्ञाता को हटा देते हैं तो किसे ज्ञान और यदि हम ज्ञेय और ज्ञाता के मध्य के मानसिक सम्बन्ध (ज्ञान) को हटा दे तो कैसे ज्ञान? अर्थात एक ज्ञान की प्रक्रिया में इन तीन चीजो का होना आवश्यक है।

हम इन तीन चीजो की पृष्ठभूमि में थोड़ा गहराई से मैटर और माइंड अर्थात हमारे बोध में या ज्ञान में आने वाली चीजो के विषय मे सोचते हैं।

ज्ञान में ज्ञाता-मानसिक प्रक्रिया--ज्ञाता तो अवश्य है लेकिन अब हमें निर्धारण करना है कि इनमें से कौन मैटर है और कौन माइंड।

परम्परागत रुप से मैटर की परिभाषा में यह स्पेश में होता है, उसके कुछ भौतिक गुण यथा, रंग, ठोसपन, तरलता, गन्ध, दृश्यता आदि होते हैं लेकिन हमें एक सत्ता ऐसी भी अवश्य मिलती है जो अस्तित्वमान तो है लेकिन इसमे न देशीय विस्तार है, न ठोसपन है, न स्वाद है, न गन्ध है---हम इसे मानसिक अथवा माइंड कहते हैं।

आशय यह है कि हमारा सामान्य अनुभव जगत में दो प्रकार की सत्ताओं को अवश्य सिद्ध करता है: मैटर और माइंड।

अब ये दोनों चुकी दो अलग प्रकार की चीजें है तो ये आपस मे इंटरेक्ट कैसे करती हैं यह आधुनिक युग के प्रारम्भिक दार्शनिकों के सामने एक बहुत बड़ी समस्या थी। डेकार्ट इनके इंटरेक्शन लिए मस्तिष्क में एक ग्रन्थि की कल्पना करते हैं तो स्पिनोज़ा इनमें एक पूर्व स्थापित सामंजस्य मानते है (एक मे परिवर्तन दूसरे में परिवर्तन लाएगा ही।)

आप कहेंगे कि इन बवालो की आवश्यकता क्या थी, अरे सबको मैटर मान लीजिए सारी समस्या ही खत्म हो जाएगी आखिर सब परसेप्शन (दृश्य, श्रवण, गन्ध, स्वाद, स्पर्श) अनन्त: मस्तिष्क के बायो इलेक्ट्रिकल-केमिकल फेनोमेना में रिड्यूस तो किये ही जा सकते हैं।

अब आप थोड़ी और संजीदगी से इसपर चिंतन करिए कि क्या वास्तव में हमारे अनुभव को (क्योकि ज्ञान/हमरा बोध भी एक अनुभव ही है) न्यूरो केमिकल और इलेक्ट्रिक सिग्नलों में रिड्यूस किया जा सकता है?

आप कहेंगे कि हां किया जा सकता है तो आप अब एक प्रयोग करिए: एक कागज पर A लिखिए। यह क्या है? एक उत्तर है कि यह A है। लेकिन यह A क्या है? यदि अब कोई आपका वैज्ञानिक मित्र एक माइक्रोस्कोप लेकर आए और इस A को उस माइक्रोस्कोप से दिखाए की देखो यह असल मे बहुत ही छोटे छोटे माइक्रोडॉट्स हैं जो एक खास प्रकार से सजे हैं तो क्या यह A की व्याख्या हो गई? मुझे नही लगता कि आपमें से कई सहमत होगा कि यही A है।

यहाँ हुआ क्या? यहाँ एक अजीब सी घटना हुई कि उन माइक्रोडॉट्स ने यद्यपि एक खास आकार को जन्म तो दिया किन्तु वह आकर मात्र इन माइक्रोडॉट्स का संयोजन नही है, यहाँ अंशो ने मिलकर एक ऐसे पूर्ण को जन्म दे दिया जो अपने अंशो से कुछ अधिक है: यह कुछ अधिक एक एमर्जेंट प्रोपर्टी है और इस एमर्जेंट प्रोपर्टी का अपना एक अलग संसार है क्योकि यह उन माइक्रोडॉट्स या उनके घटक इलेकट्रॉन-प्रोटोन-न्यूट्रॉन या फिर से इनके घटक विविध फील्डस और इनके इंटरेक्शन के हिस्से सम्पूर्णता में नही है।

अब हम इसी बात को शुरू से थोड़ा दूसरे ढंग से सोचेंगे-----

★★★★★

दृश्यते इति वर्तते: 2

पश्चिम में आधुनिकता के उदय के पश्चात दर्शन ने ज्ञानमीमांसिय टर्न ले लिया। प्रबोधन के बाद का दर्शन मध्यकाल के उस चिंतन के प्रति विद्रोह था जिसमे दर्शन का काम फेथ को तार्किक रूप से पुष्ट करना था लेकिन इसके लिए सबसे पहले एकनिश्चित आधार की आवश्यकता थी जिस पर यह नया चिंतन स्थापित होता। डेकार्ट ने अपनी सन्देह पद्धति से 'मैं' के रूप में एक चिंतन करनेवाले ऐसी सत्ता की पहचान की जिसके विषय मे कोई संदिग्धता नही थी। डेकार्ट ने इस असंदिग्ध आधार को "मैं सोचता हूँ अतः मैं हूँ"के रूप में अभिव्यक्त कर दार्शनिक चिंतन आरम्भ किया।

प्रश्न है कि डेकार्ट ने सबसे पहले एक असन्दिग्ध आधार दार्शनिक चिंतन के लिए क्यों खोजा। इसका उत्तर यह है कि तब आनुभविक विज्ञान अभी उतना विकसित नही हुआ था, अब भी गणित को, विशेषकर ज्यामिति को ज्ञान की सर्वश्रेठ पद्धति मानी जाती थी। यूक्लिडियन ज्यामिति में कुछ अक्ज़ियोम हैं जिनसे समस्त प्रेमयो का निगमन होता है। ध्यातव्य है कि यह एक्ज़ियोम अनुभव द्वारा नही ढूंढे जाते बल्कि एक प्रागआनुभविक सत्य के रूप में हमारे सम्मुख उपस्थिति होते हैं। डेकार्ट ने भी कुछ आइडियाज को जन्मजात या प्रगानुभविक माना और इनका उपयोग करते हुए निगमात्मक विधि से अपने दार्शनिक सिद्धान्त विकसित किए और इस प्रकार उनके अनुसार ज्ञान या वास्तविक ज्ञान हमे अनुभव से नही बल्कि तर्कबुद्धि से प्राप्त होती है। डेकार्ट इसलिए बुद्धिवादी दार्शनिक कहे गए।

आधुनिकता की कई विशेषताओं में से एक विशेषता थी आनुभविक विज्ञान और ज्ञान के स्रोत के रूप में इन्द्रियानुभव की स्थापना। जॉन लॉक ने डेकार्ट के दर्शन की समीक्षा की और उनके जन्मजात प्रत्ययों के सिद्धान्त को खारिज कर ज्ञान का एकमात्र स्रोत अनुभव को कहा। उनके अनुसार जन्म के समय मनुष्य का मन एक कोरे स्लेट की भांति होता है, टेबुला रासा जिस परअनुभव ज्ञान अंकित करता है।

जॉन लॉक द्वारा डेकार्ट के दर्शन (बुद्धिवाद) की समीक्षा ने अनुभववादी ज्ञानमीमांसा को आधुनिक काल मे स्थापित कर दिया। अनुभव से हमे कैसे ज्ञान होता है, इस पर चिंतन होने लगे। जॉन लॉक ने भी इस पर चिंतन किया औरबताया कि हम इंद्रियों से वस्तुओं को डायरेक्टली नही जानते बल्कि उनके द्वारा बने हमारे मन मे इम्प्रेशन के माध्यम से उन्हें जानते है। अर्थात कोई वस्तु इंद्रियों के माध्यम से हमारे मन पर अपना संस्कार अंकित करता है और हमे इस संस्कार के माध्यम से उस वस्तु का ज्ञान होता है। यहां एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि वस्तुओं और उनके द्वारा हमारे मन पर बनने वाले संस्कारो में कैसा सम्बन्ध है, क्या यह संस्कार उस वस्तु से कुछ अधिक होते हैं? कुछ कम होते हैं? या वस्तु और उनके द्वारा हमारे मन पर बनने वाले संस्कारो में बराबरी का सम्बंध होता है?

★★★★★

दृश्यते इति वर्तते 3

या

सत्ता दृश्यता है।

प्रश्न यह है कि हम कैसे जानते है कि कुछ है और हम जिसे जानते है उसे मैटर के रूप में कैसे जान जाते हैं?

यदि हमरा समस्त ज्ञान अनुभव (इंद्रियानुभविक) से होता है तो यह तो तय है कि हम चीजो को डायरेक्टली जान ही नही सकते, हम चीजो से अपनी इंद्रियों के द्वारा अपने मन पर अंकित संस्कारो (इम्प्रेशन) को ही जानते है और ये संस्कार या इम्प्रेशन मैटर नही हैं बल्कि एक मानसिक घटना है, फिर हमें यह कहने का क्या आधार है कि

1 इन संस्कारो से संवादिता रखती कोई वाह्य वस्तु है?

2 यह वाह्य वस्तु मैटर या इसका घटक मैटर भी है?

पहले प्रश्न के उत्तर में सम्भवतः यह एजम्पशन इम्प्लाइड है कि बिना किसी वस्तु के उनके संस्कार हमारी इंद्रियों पर उपस्थित नही हो सकते, क्योकि हमने देखा है कि बिना किसी वस्तु के उसकी छाया नही बनती। अब यदि यह स्थिति हो तब तो हम यह नही कह सकते कि छाया वास्तविक है क्योकि यह छाया वास्तविक वस्तु की एक्ज़ेक्ट कॉपी नही होती; वस्तु कुछ और होता है और छाया कुछ और।

यहाँ आप प्लेटो की गुफा की एलोगेरी को स्मरण करते हुए इस बात को आसानी से समझ सकते हैं।

एक सम्भवना यह हो सकती है कि हमारे संस्कारो में वस्तु का ठीक वैसा ही प्रतिबिम्ब बनता है जैसा कि किसी वस्तु का एक सामान्य दर्पण में बनता है, लेकिन इस स्थिति में भी वह जो दर्पण में बनता है, हम उसे वस्तु तो कहते नही, उसका प्रतिबिम्ब ही कहते हैं और प्रतिबिम्ब मात्र प्रतिबिम्ब होता है, वह वस्तु नही क्योकि प्रतिबिम्ब का न हम स्वाद ले सकते हैं, न गन्ध ले सकते हैं न स्पर्श कर सकते हैं, साथ ही प्रतिबिम्ब में एक त्रिविमीय वस्तु दो आयामी बन जाती है, और यह डिस्टरोशन है।

एक और सम्भावना हो सकती है कि हमारी इंद्रियां मात्र खिड़कियां हो जिनसे हम जगत को झाँकते और देखते हैं और जगत का हमे ठीक वैसा ही ज्ञान होता है जैसा कि खिड़की से बाहर देखने पर खिड़की से बाहर की दुनिया का।

पहले हम एक एक कर इन सबकी जांच कर लें फिर हम कोई निष्कर्ष स्थापित करेंगे।

आपमे से बहुतों का यहाँ तक धैर्य जवाब दे गया होगा, कुछ लो लगेगा कि यह सब क्या बकवास है, और वे इसे यहीं छोड़ देंगे। कुछ लोग कहेंगे कि यह बकवास है और मैं इस बात को सिद्ध कर सकता हूँ। कुछ लोग कहेंगे कि यह बकवास हमारी भाषा की संरचना को ठीक से न समझने के कारण उतपन्न हो रही है, ठहरो मैं भाषा का विश्लेषण कर यह दिखा देता हूँ कि असल दोष हमारी भाषा काम कैसे करती है यह समझ मे न आने के कारण है और जब चेतना इस कॉन्टेक्स्ट में भाषा का विश्लेषण करने लगी तो दर्शन के इतिहास में इसे 'लिंग्विस्टिक टर्न' कहा गया। लिंग्विस्टिक टर्न बीसवी शताब्दी की एक घटना थी लेकिन उसकी चर्चा फिर कभी, अभी हमे दृश्यते इति वर्तते पर विचार करना है।

★★★★★★

दृश्यते इति वर्तते: 4

बौद्ध (प्रसंगवश)

प्रारंभिक बौद्धधर्म में कुछ अस्पष्टताएं थी क्योकि बुद्ध का उद्देश्य किसी दर्शन के तन्त्र को खड़ा करने के बजाय उनका ध्यान जीवन के व्यवहारिक उद्देश्य पर अधिक था। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के कुछ ही वर्षों के उपरांत बुद्ध की बातों को लेकर उनके अनुयायियों में मतभेद स्थापित होता है गया और शीघ्र ही बुद्ध की मृत्यु के कुछ ही समय बाद (सौ वर्षों के अंदर) अकेले भारतवर्ष में उनकी शिक्षाओं की अट्ठारह व्याख्याएं उपस्थित हो गईं। इन अट्ठारह निकायों के वर्णन आचार्य वसुमित्र ने 'अष्टादश निकाय शास्त्र" में किया है।

चीनी यात्री इत्सिंग का कहना है कि ये अट्ठारह निकाय प्रमुखत्: चार प्रधान भागो में विभक्त थे--आर्य महासांघिक, आर्य मूल सर्वास्तिवाद, आर्य स्थविरवाद और आर्य सम्मितीय।

ई● पू● पांचवी शती में बौद्ध संघ के तीन प्रधान केंद्र थे---मथुरा, कौशाम्बी और वैशाली। वैशाली के बौद्ध भिक्षुओं में शिथिलता आ गयी थी जिसे लेकर वैशाली में ही एक बौद्ध संगीति बुलाई गई थी और मतभेदों को दूर किया गया था तथापि समय और बौद्ध धर्म के विस्तार के साथ बौद्ध विचारकों के मध्य आंतरिक विभेद बढ़ते गए औरदेश-काल-परिस्थिति के अनुसार बौद्ध मत में परिवर्तन होते चले गए और इनमें नवीनताए आती गईं।

उत्तरकालीन बौद्ध सम्प्रदायो के प्रमुख समस्त मतों को दो भागों में विभाजित किया जाहै-- हीनयान और महायान।

प्रोफेसर हिरियन्ना लिखते हैं कि इन मतों के आने की सच्चाई जो भी हो, बौद्ध धर्म के इन दोनों ही रूपो में कई महत्वपूर्ण नवीनताये समान रूप से दिखती हैं और इनमें से किसी को भी बुद्ध के मूल उपदेश को यथा रूप प्रस्तुत करनेवाला नही माना जा सकता।

बहरहाल, मोटामोटी समझिए कि महायान ने अपने परिप्रेक्ष्य से दूसरी विचारधारा का नाम हीनयान किया है।

असल मे हीनयान "थेरवाद" है अर्थात बुजुर्गों का दर्शन।

थेरवाद या हीनयान के गर्न्थो की भाषा पाली है जबकि महायान की सँस्कृत।

हीनयान में निब्बान का अर्थ प्रायः नकारात्मक है, बुझ जाना, किन्तु महायान में यह बुझने के बाद अमृत्व का पद है। महायानने बुद्ध के उस सन्देश को कि "सबका निजी बोध होता है" हटाकर बुद्ध को बोधिसत्त्व बना दिया जो अन्यो की भी नौका पार कराता है अथवा यह महायान है जिसपर अन्यलोग भी सवारी कर भवसागर पार करते हैं।

महायान हीनयान का आस्तिक सम्प्रदायो की उपस्थिति के कारण हुआ कायांतरण है।

किन्तु, बात यहीं तक नही है ये दोनों सप्रदाय मात्र निर्वाण को लेकर ही मतभिन्नता की स्थिति में नहीहैं बल्कि ज्ञानमीमांसीय दृष्टि से भी इनके मध्य मतभेद है: हीनयान वास्तववादी हैं जबकि महायानी प्रत्ययवादी। वास्तववादी वस्तुओं के अस्तित्व को ज्ञानवाह्य और ज्ञाननिरपेक्ष मानते हैं जबकि प्रत्ययवादी बाह्यर्थो का निषेध कर देते हैं।

महायानियों में विज्ञानवादी योगाचार मात्र विज्ञान (संस्कार/प्रत्यय/मानसिक तत्व) की सत्ता मानते है जबकि शून्यवादी किसी की तात्त्विक सत्ता स्वीकार नही करते।

अर्थात, जहाँ शून्यवादी (नागार्जुन) ज्ञाता--ज्ञान--ज्ञेय में से किसी की तात्त्विक सत्ता नही मानते वहीं योगाचारी ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय के त्रिक में से मात्र ज्ञान को ही स्वीकार करता है: न तो ज्ञाता का अस्तित्व है, न ज्ञेय वस्तु का बल्कि केवल संस्कारो की सन्तति का अस्तित्व है।

★★★★

दृश्यते इति वर्तते 5

अंटोनी रेकीटोव, एक रसियन, द्वंदात्मक भौतिकवाद के विचारक मैटर के बारे में लेनिन की निम्न बात उद्धृत करते हैं:

'मैटर वह दार्शनिक कोटि है जो एक वस्तुनिष्ठ यथार्थ को व्यक्त करता है। यह मनुष्य को उसके सम्वेदनो में प्राप्त होता है, जो हमारी अनुभूतियों में परावर्तित होता है, एक प्रतिलिपि बनाता है, एक चित्र बनाता है।"

यदि मैटर की यही परिभषा है तो फिर यह मैटर नही है क्योकि

1 हम वाह्य जगत को अनुमान द्वारा जानते हैं और हमारा अनुमान सत्य ही है, यह बात हम दावे के साथ नही कह सकते, इस बात का दावा करना हठधर्मिता है।

2 हमारे बोध में यद्यपि संवेदन है, मात्र संवेदन ही नही है, समस्या इतनी ही नही है, हम यह भी नही जान सकते कि आद्य संवेदनो का स्वरूप क्या है।

3 हम इस बात को भी नही सिद्ध कर सकते कि हमारे संवेदनों में मैटर का प्रतिलिपी, प्रतिबिम्ब याछाया बनता है।

हम इन सबमे बस एक बात के ही प्रति आश्वस्त है कि हमे बोध तो होता है लेकिन यह उपरोक्त पदार्थ की परिभाषा मे सही नही बैठता, अर्थात यह एक मानसिक तत्व है।

यदि मानसिक में "इंटेंशनलिटी" भी हो तो यह जिसकी ओर इशारा कर रहा है वह पदार्थ या मैटरही है हम नही कह सकते।

★★★

दृश्यते इति वर्तते 6

बर्कली जब दृश्यते इति वर्तते कहते हैं तो उनका आशय यह होता है जगत में जड़ तत्त्व की उपस्थिति है ही नही, समस्त जगत मानसिक है।

वसुबन्धु इसे इस प्रकार से कहते हैं कि विज्ञप्तिमात्रता ही सत्य है।

इन उद्घोषों का एक इम्प्लिकेशन यह है कि हम मानसिक से परे किसी सत्ता को सिद्ध नही कर सकते अतः समस्त चीजें मानसिक हैं।

भाषा और बोध के सम्बंध में हमारे सामान्य विश्लेषण से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भाषा बोध के पश्चात की मानसिक घटना है। जगत विषयक हमारे समस्त निर्णय भाषा और शब्दों में ही व्यक्त होते है अतः यदि बर्कली और वसुबन्धु के तर्कों को एक खाश दिशा में बढ़ाया जाए तो हम यह भी कह सकते हैं जगत शाब्दिक है।

विटगेन्स्टिन जब यह कहते हैं कि जगत तथ्यों से बना है, वस्तुओं से नही तो इसका यही आशय है कि हम यह नही जानते कि वस्तुए हैं अथवा नही, हम केवल भाषा मे बंधे तथ्यों को जानते हैं।

प्रश्न है कि यह तथ्य का वस्तुओं की संकेत करते हैं, अर्थात क्या शब्दो से संवादिता रखती वस्तुए होती हैं?

शब्द निश्चित रूप से किसी की ओर संकेत कर रहे होते हैं किंतु इनसे जिस वस्तुवाचकता का निर्माण हमारे मन मे होता है वह वस्तु अपने आप मे किसी है यह भी हम नही कह सकते।

ध्यान दीजिए कि विज्ञान के दर्शन में दो प्रकार के चिंतन है, पहला वस्तुवाद जो यह मानता है कि हम पहले से उपस्थित चीजो को वैज्ञानिक पद्धति से खोजते हैं, दूसरा चिंतन प्रतिवस्तुवाद कहा जाता है जो विज्ञान की सभी खोजो को वाह्य वस्तु नही बल्कि एक तंत्र (थ्योरी) को कंसिस्टेंट और प्रेडिक्टिव बनाने हेतु इन्हें हमारी चेतना द्वारा कल्पित या आरोपित करण (इंस्ट्रूमेंट) मानता है।

★★★

दृश्यते इति वर्तते 6

हमारे ज्ञान का मॉडल क्या हो अथवा हम जगत विषयक नई व्याख्या में अनुसंधान की किस प्रणाली का उपयोग करें यह आधुनिक दर्शन के प्रणेताओं की प्रमुख समस्या थी।

सर्वप्रथम, नई व्याख्या से क्या अभिप्राय है?

आधुनिकता का आरम्भ पश्चिम में प्रबोधन (एंलाइटमेंट) आंदोलन की देन है। पश्चिम के इतिहास में आधुनिक काल के पूर्व का काल डार्क एज कहलाता है जिसमे मानवीय विचार की गति को अतिशय आस्था के बोझ तले दबी उसकी दमित चेतना निर्धारित करती थी, प्रबोधन इस दमन के विरुद्ध विद्रोह था जिसमे मानवीय चेतना ने स्वयम को इस बोझ से मुक्त कर लिया। इस बोझ से मुक्त करने का परिणाम यह भी हुआ कि मानवीय चेतना ने जगत विषयक अनुसंधान के लिए एक नया आधार, एक नई पद्धति तलाश करनी आरम्भ कर दी, एक ऐसी पद्धति जो समस्त संदेहों से मुक्त हो।

यहाँ इस तथ्य को उल्लेखित करना आवश्यक है कि हर विद्रोह एक खालीपन अवश्य बना डालता है जिसको मनुष्य को भरना ही पड़ता है। आधुनिकता ने जहाँ इस पूर्व-आधुनिकता के विरुद्ध विद्रोह से जन्मे खालीपन को सकारत्मकता और उत्साह से भरा था वही उत्तरआधुनिकता आधुनिकता से विद्रोह कर इस खालीपन को निराशा और संदेह से भरती है।

बहरहाल, आधुनिक चिंतक गणित से अत्यधिक प्रभावित थे।

प्रश्न यह है कि इसका आशय, इसकी परिणीति और कारण क्या है?

इसका उत्तर है "निश्चितता की खोज"।

विज्ञान को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है: आनुभविक विज्ञान और आकारिक विज्ञान; इम्पीरिकल साइंस तथा फॉर्मल साइंस। भौतिकी, रसायन आदि आनुभविक विज्ञान हैं जबकि गणित आकारिक।

आनुभविक विज्ञान के निष्कर्ष संदेह से परे नही होते, इनमे त्रिकालाबाधिता नही होती किन्तु गणित के निष्कर्ष संदेह से परे, निश्चित और सर्वकालिक होते हैं; दो और दो का योग हमेशा और हर ब्रह्मांड में चार ही होता है: इसकी शाश्वतता को क्या विशेषज्ञ, क्या सामान्यज्ञ, क्या राजा, क्या रंक सभी टेकेन फ़ॉर ग्रांटेड लेते हैं और इसलिए शायर और कवि इनपर आधारित एक दूसरा भाव रचते है: दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है, सोच समझ वालो को थोड़ी नादानी दे मौला।

गणित के निष्कर्ष सदैव सर्वकालिक और सन्देहमुक्त जबकि आनुभविक विज्ञान के निष्कर्ष संदेहास्पद क्यों होते हैं इस पर बात फिर कभी, फिलहाल यही की ऐसा होता है और आनुभविक विज्ञानों के इस चरित्र को, जो कभी इसका दोष समझा जाता रहा है और इस दोष के कारण इसका तिरस्कार किया जाता रहा, कार्ल पॉपर इसकी विशेषता बना देते हैं और विज्ञान को छद्मविज्ञान से डीमार्केट करने का इसे ही आधार बनाकर निष्कर्ष स्थापित करते हुए 'फौलसिफिकेशन सिद्धान्त" देते है जो आज सबसे अधिक मान्य है। इस सिद्धांत के अनुसार वैज्ञानिक क्रियाकलाप में निष्कर्षो की पुष्टि नही बल्कि उनका अपवाद ढूंढना असल बात होती है जबकि छद्मविज्ञान का उद्देश्य येन केन प्रकारेण अपने निष्कर्षो की पुष्टि होती है।

आधुनिकता के आरंभिक दार्शनिक अभी आनुभविक विज्ञान की इस विशेषता को स्वीकार न कर पाए थे, उनके लिए विज्ञान की यह विशेषता एक दोष ही था अतः उनका गणित की ओर मुड़ना स्वाभाविक था। और इसलिए उन्होंने अपने जगत विषयक अनुसंधान को गणितीय विधि, गणितीय प्रतिमानों के आधार पर मॉडल किया, विशेषकर यूक्लिडियन ज्यामिति।

यूक्लिड की पद्धति में कुछ परिभाषाएं हैं, इन परिभाषाओं प्रयुक्त कुछ निर्णय हैं और फिर इन निर्णयों से प्रमेय और आगे की गणित हैं।

यहाँ तीन चीजें हैं, परिभाषा अर्थात एब्स्ट्रेक्शन, विविध एब्स्ट्रेक्शन के ऐसे आपसी सम्बन्ध जिनकी सत्यता स्वयमसिद्ध हैं: इनकी सत्यता प्रमाणित करने के लिए हमे कोई प्रायोगिक मापन नही करना पड़ता। यूक्लिड इन्हें एक्सियोम कहते हैं और तीसरा इनसे निगमन। निगमन वह वैचारिक प्रक्रिया है जिसमे विशेष से सामान्य की ओर जाया जाता है।

डेकार्ट के सन्दर्भ में "चिन्तयेsस्मि" "मैं सोचता हूँ, अतः मैं हूँ", " I think therefore, I exist" या Cogito Ergo Sum वही एक्सियोम हैं जिससे वह आगे की चीजें निगमित करते हैं।

यदि आपने इस आलेख को ध्यान से पढ़ा होगा तो पाया होगा कि गणितीय प्रतिमान पर ज्ञान को मॉडल करने वाले ये विचारक एक बात को लेकर आश्वस्त है, और वह है कुछ ए प्रिओरेज, या प्राक अनुभविको को सत्य मानने में विश्वास, यह प्राक-अनुभविक ही इनके अनुसार ज्ञान के आधार बनते है: इन प्रागअनुभवो से मानसिक क्रियाएं कर हम ज्ञान का एक तंत्र विकसित कर सकते हैं, हमें अनुभव या आनुभविक प्रयोग की कोई आवश्यकता नही है।

बर्कली की 'दृश्यते इति वर्तते' इस परंपरा में नही बल्कि इसकी विरोधी परम्परा जिसके अनुसार हमारे समस्त ज्ञान अनुभव से आते हैं, से जन्मी है, और आधुनिक युग मे यह परंपरा जॉन लॉक के साथ उपस्थित होती है।

-----☆★★★☆-----

 

हमारी चेतना में कुछ शब्द हैं, यह शब्द जीवन की शर्त मे चेतना की संरचना के साथ पहले से ही गूंथे हो सकते हैं या हम इन्हें बाद में अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं।

इन शब्दो की सीमा में एक कॉन्सेप्ट का निर्माण होता है जिसे हम जगत, ब्रह्मांड आदि कहते हैं। ये शब्द हैं: क्यों, कहाँ, कब, कितना, कैसे।

सत्ता नामक कॉन्सेप्ट मे यह जो इन शब्दों के उत्तर में इन शब्दों से घिरा है वह 'व्यक्त' या 'अपरा' है।

दुनिया इस "व्यक्त" तक भी हो सकती है और यह सम्भव है कि इनसे परे जाकर हम जो भाव बनाते हैं वह वास्तव में है ही नही और हमारी चेतना हमारी भाषा पर ऐसे ही कार्य करती हो कि हम किसी कॉन्सेप्ट का एक दूसरा ध्रुवीय विपरीत भी रच सकते हैं और "अव्यक्त" "परा" बस भाषाई खेल हो, हमारी चेतना के प्रत्यय बनाने की क्षमता का साइडइफेक्ट क्योकि हम उड़ने और घोड़े के प्रत्यय को मिला कर एक "उड़नेवाला घोड़ा" मानसिक रूप से अवश्य रच लेते है जबकि ऐसा आज तक किसी को उड़नेवाला घोड़ा दिखा नही।

 

हमारे शब्दो कम से कम दो प्रकार के तो हैं ही--प्रथम वस्तु देखकर उनके लिए शब्द तथा द्वितीय ऐसे शब्द जिनके अनुरूप कुछ वस्तुगत तथ्य है ही नही बल्कि यह हमारी इच्छा है: प्रकृति से पलायन है।

घोड़ा पहले प्रकार का शब्द है।

अमरता दूसरे प्रकार का।

पहला शब्द जगत के बारे में कुछ कह रहा होता है जबकि दूसरा शब्द मात्र हमारी इच्छा बता रहा है वह भी सीधे-सीधे नही।

 

हमारे बारे में और हमारे द्वारा गौशिपिंग हमारे विकासात्मक अतीत, इवोल्यूशनरी पास्ट का एक हिस्सा रहा है। युवल हेरारी तो इसको भाषा के विकास के कारणों में ही शामिल कर देते है। मनुष्यो द्वारा अमूर्तिकरण की शक्ति और इन अमूर्त प्रत्ययों को आपस मे मिला कर देखने का पहला प्रयोग यह गॉशिप ही था।

एक उदाहरण से समझिए, मनुष्य ने सिंह देखा और उसका अब्स्ट्रेक्शन किया फिर उस अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। मनुष्यो ने मनुष्य के अब्स्ट्रेक्शन के पश्चात भी इस  अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। अब  उसको एक प्रयोग करना था और यह प्रयोग उसे आगे दार्शनिक, कलाकार व वैज्ञानिक बनाने वाला था। उसने सिंह के सर और मनुष्य के शरीर को मिला दिया और अपने गॉसिप में एक शब्द दिया सिंह-मानव।

आदिमानव के लिए इस "सिंह-मानव" की बात करना उसके मनोरंजन का भी साधन था और उसके समूह जिसमे बीस, तीस लोग रहते थे उनके साथ और अधिक सोशल बॉन्डिंग करने का तरीका भी था क्योकि सिंह-मानव के बारे में सुनने के लिए उसके समूह के सभी सदस्य रिलेक्सड मूड में एक साथ बैठते।

यही नही आरम्भ में वह गॉसिप का पात्र बनने से डरता भी था और इस तरह उसका समूह उसके ऊपर एक अंकुश भी लगाता और वह अपने समूह के मूल्यों से विचलित न होता।

 

★★★★★★

 

जब तक जगत के केंद्र में ईश्वर था, मनुष्यों को चीजें स्पष्ट थी। उन्हें लगभग हर चीजों का अर्थ मालूम था--जगत, जीवन, मृत्यु, आंनद, पीड़ा---

फिर बुद्धि ने उसके व्यक्तित्व का अतिक्रमण कर लिया और यह अतिक्रमण होना ही था क्योकि पूर्व में उसे जो अर्थ मालूम थे वह उसके अनुभव से मेल न खाते; उसके स्वयम के द्वारा रचित तत्त्व  और उसके अपने अनुभव में लगातार एक द्वंद चलता रहता। इस द्वंद के विश्लेषण से मानवीय चेतना ने देखा कि वास्तव में जगत के केंद्र में तो ईश्वर है ही नही और उसने उद्घोष कर दिया कि वह स्वयम अर्थों की कसौटी और मापदंड है। मनुष्यो ने अपने पूर्व के केंद्र ईश्वर को पृष्ठभूमि में भेजना प्रारम्भ कर दिया और केंद्र में स्वयम को स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।

मानवों में से कुछ कवि ह्रदयों ने इस केंद्र की वस्तु के प्रतिस्थापन्न को रूमानी नाम भी दिये-पुनर्जागरण, मानववाद--!

 

समस्या यह थी कि मनुष्य काफी सीमित था-वह न तो सर्वव्यापी था, न सर्वशक्तिमान, न सर्वकालिक, न अनश्वर और शाश्वत और न ही वह  आवश्यकता पड़ने पर कार्य-कारण की मेखला को तोड़ कर चमत्कार आदि ही पूर्व के केंद्र, ईश्वर की भांति कर सकता था-- बल्कि उसकी बुद्धि ने उसे दिखाया था कि वह एक बहुत बड़े स्कीम का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है, एक बहुत बड़े मशीन का एक छोटा सा अमहत्वपूर्ण हिस्सा और वह बड़ी मशीन उसके बिना भी वैसे ही क्रियात्मक है।

 

मनुष्यों में से कुछ ने अपनी स्थिति स्वीकार करते हुए उस वृहत मशीन पर चिंतन करना प्रारम्भ किया लेकिन यह क्या--इस मशीन का भी कोई अर्थ नही है--यह मशीन तो असल मे मशीन है ही नही--यह तो अराजकता, अतार्किकता की एक बहुत बड़ी गठरी है जो फट चुकी है और उसकी अराजकता और अतार्किकता रिस रिस कर चूती रहती है--!

 

हा--! कहीं कोई अर्थ नही, कहीं कोई मूल्य नही, कहीं कोई उद्देश्य नही--हर ओर एक शून्यता, एक  रिक्तता, एक मूल्यहीनता, एक निराशा-- और मनुष्य की चेतना अवसाद से भर गई।

 

मनुष्यों में से दार्शनिको ने इस अवस्था को निहिलिज्म का नाम दिया।

 

इस रिक्तता, इस शून्यता, इस अर्थहीनता ने जब मानवीय चेतना को अवसाद से भर दिया तो इससे उभरने के लिए मनुष्यो ने अपने को फिर से परिभाषित करने का प्रयास किया लेकिन पिछली बार की तुलना में अब उनकी मनुष्य की नई परिभाषा में मनुष्य का अस्तित्व पहले था, उसका सार बाद में; अब मनुष्य का कोई पहले से बना बनाया सार नही था जिसकी ओर गति मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाती थी बल्कि अब आरंभ ही मनुष्य से होता जो अपने सार का निर्माण करता और यह सार निर्माण ही उसके जीवन की सार्थकता थी--अर्थात एक मूल्यहीन, अर्थहीन और अराजक जगत में मनुष्यों द्वारा अपने मूल्य, अर्थ और व्यवस्था की तलाश और अब महसूस किया  गया कि मनुष्य स्वतंत्र होने को अभिशप्त है।

 

परन्तु यदि समग्र जगत ही अर्थहीन और निरुद्देश्य है तो क्या मनुष्य का जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है जब कि वह तो खुद इस अराजकता और अतार्किकता की बहुत बड़ी गठरी के एक बहुत ही छोटे कोने में बहुत ही अमहत्वपूर्ण तरीके से पड़ा हुवा है--यह प्रश्न तो, बावजूद मनुष्य के अस्तित्व को उसके सार का पूर्वगामी मानने के, जस का तस मुँह बाए खड़ा है।

लेकिन समस्या यह भी है मनुष्य अपने जीवन का अर्थ ढूंढ़ने से बाज नही आता-सम्भवतः यह अर्थ तअलाशने की प्रवृति उसके जीवन के साथ ही ऐसी गुंथी हुई है कि वह इसे अलग नही कर सकता।

 

मानव का जीवन में इन्हेरेन्ट मूल्य और अर्थ ढूंढने की प्रवृत्ति तथा इस उद्देश्यहीन, अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में उसका ऐसा कर पाने की अक्षमता के द्वंद को  एब्ज़र्ड के  नोशन या भाव से व्यक्त किया गया है।

एब्ज़रडिज्म के अनुसार मानव जीवन में मूल्य तलाशता है और जब सब कुछ अर्थहीन है लेकिन मानव अर्थ खोजने को विवश है तो मानव के जीवन में एक शून्य का निर्माण होता है।

 

मनुष्य क्या करे जबकि वह  अपने जीवन के अर्थ ढूंढ़ने को विवश भी है और कहीं कोई अर्थ भी नही है---

तीन रास्ते हैं--

-----आत्महत्या

-----आस्था की छलांग लगाते हुए देश-काल से या देश से या काल से अतीत  किसी अपरीक्षित

सत्ता में विश्वाश करते हुए उसे उद्देश्य बनाकर

जीना और इसी संदर्भ में जीवन के अर्थ की  व्याख्या कर डालना लेकिन तब यह तो फिर आत्महत्या ही हुई--एक बौद्धिक और दार्शनिक आत्महत्या।

------इसको स्वीकार करते हुए कि जीवन और जगत का कोई अर्थ नही है और फिर भी हम उसका अर्थ ढूंढते है, के साथ इस बात से ही विद्रोह करते रहना और जीते जाना, हालांकि कुछ इस स्वीकार्यता और विद्रोह को शैतानी पागलपन भी कहते है, तब भी।

 

★★★★★ 

 

फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस 【एक】

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हम कुछ भी सीखते ही क्यों हैं इसका एक पंक्ति में उत्तर है सर्वाइव करने के लिए।  विकास क्रम में निम्न स्पीशीज में सम्बंधित बेहेवियर इंस्टिक्ट में होता है। एक मधुमक्खी अपना छत्ता बनाना कहीं सीखती नही है, यह उसके अंदर है। एक चिड़िया अपने घोंसले बनाने के लिए विश्विद्यालय नही जाती, उसके अंदर है। विकास क्रम में चेतना के विस्तारण के साथ, मन के इमर्ज होने के बाद, मस्तिष्क के और जटिल होने के बाद इंस्टिक्ट के अलावा लर्नड बिहेवियर इमर्ज होता है। अब सूचना हमारे इंस्टिंक्ट के बाहर भी स्टोर किया जा सकता है और बिना किसी जेनेटिक्स के इसको अगली पीढ़ी में ट्रांसफर किया जा सकता है।

इस जेनेटिक्स के बाहर उपस्थित सूचना का भी मूल अभिप्राय इंस्टिंक्टिव बिहेवियर की तरह सर्वाइवल ही है, अंतर मात्र यह है कि इस सूचना पर आधारित व्यवहार अतःस्फूर्त नही होता है।

विकास क्रम में उच्चतर जीव के आने के बाद व्यवहार का एक अनुषांगिक पक्ष भी होता है:

हमारे लिए भोजन मात्र स्वयम को जीवित रखने के लिए नही है, इससे सम्बंधित एक अनुषांगिक पक्ष भी है: स्वाद। और हम इसके लिए भी पाकशास्त्र सीखते है। सेक्स हमारे लिए अब मात्र अपनी प्रजाति को जीवित रखने का करण नही है, सेक्स अब हम मजा के लिए भी करते हैं।

ज्ञान का भी मात्र और मात्र सर्वाइवल मूल्य जो आज तक होता था, मानव में इससे सम्वन्धित एक अनुषांगिक पक्ष भी उभरता है और इसमें ज्ञान का सर्वाइवल मूल्य प्रमुख नही होता।

 

हममें अब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की।  हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।

 

-----☆★★★☆------

 

【दो】

 

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गणित सर्वाधिक व्यववस्थित व संरचनाकृत या स्ट्रक्चर्ड चिंतन है। भौतिकी गणित के माध्ययम से चिंतन मनन करती है। गणित के विषय मे दो मत हैं: हमारी चेतना इस सर्वाधिक स्ट्रक्चर्ड वे को   ब्रह्मांड, प्रकृति पर आरोपित करती है या दूसरे मत के अनुसार मैथमेटिक्स इज़ ऑलरेडी आउट देयर।

खैर, जो भी हो भौतिकी के लिए गणित अपरिहार्य है। यदि समग्र भौतिकी से गणित निकाल दिया जाय तो भौतिकी अधिभौतिकी या मेटाफिजिक्स के आस पास आ जाती है या स्वयम ही मेटाफ़िजिक्स बन जाती है।

ऐसा नही है कि इस मेटाफिजिकल चिंतन में गणित युक्त भौतिकी के निष्कर्ष नही आते लेकिन  अधिभौतिकी को भौतिकी के समान गणितीय चिंतन की अनुपस्थिति में जगत के ऊपर नियंत्रण स्थापित करने का करण नही बनाया जा सकता।

ज्ञान का कार्य सामर्थ्यवान बनाना है शरणागत नही या ज्ञान यदि ज्ञेय से बिल्कुल डिटेचड़ हो तो भी वह ज्ञान एक बायोलॉजिकल बीइंग के रूप में हमारे लिए किस काम का?

 

अतः हमारे एक जैविक बीइंग के रूप में भौतिकी हमारे लिए अधिभौतिकी से अधिक, बल्कि बहुत अधिक उपयोगी है।

 

-----☆★★★☆----

 

फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【तीन】

 

ज्ञान की आदर्श सीमा (आइंस्टिन)--क

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वैज्ञानिक प्रज्ञा जब दार्शनिक चिंतन करती है तो वह बड़ी सावधान होती है और उन बड़े बड़े दावों,   रसेल के शब्दों में बॉम्बेस्टिक नॉनसेंस, से बचते हुए बड़ी शालीनता से अपनी बात कहती है।

वैज्ञानिक चेतना प्रायः निरपेक्ष और सत्य ज्ञान जैसे दार्शनिक सम्प्रत्यय के प्रयोग से बचती है।

वस्तुतः वैज्ञानिक चेतना में निरपेक्ष, वास्तविकता आदि शब्दो का प्रयोग नही होता क्योकि वैज्ञानिक विधि में "आगमन की समस्या" "थ्योरी लैडननेस" और हमारी "संवेदनात्मक सीमितता" इसकी विधि में ही इन्हेरेंट है। इन कारकों की उपस्थिति में निरपेक्ष ज्ञान या यथार्थ आदि की बात करना आत्मव्याघात है।

 

हॉकिंग "समय का संक्षिप्त इतिहास" इस पंक्ति से प्रारम्भ करते हैं कि कही कोई एक ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक (कुछ के अनुसार बर्ट्रेंड रसल) ने खगोलशास्त्र पर एक पब्लिक व्य्याख्यान दिया। व्य्याख्यान की समाप्ति पर व्य्याख्यानशाला के पीछे की पंक्ति में बैठी एक बुजुर्ग महिला उठीं और उन ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक से कहा कि अब तक आपने जो कुछ भी बताया है वह कूड़ा है--असल मे विश्व एक बहुत बड़े कछुवे की पीठ पर रखी एक बहुत बड़ी थाली है---।

हॉकिंग आगे अपनी बात रखते हैं कि विश्व विषयक बहुत सारे प्रश्नों के जवाब आज हमारे पास है लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए ये भी यह जवाब वास्तविक जवाब ही होंगे या उसी कछुआ और थाली की तरह एक हास्यास्पद नॉनसेंस यह केवल समय ही बता सकता है!

-----इतनी अनिश्चितता?

वास्तव में यह अनिश्चितता विज्ञान में समाहित है और यह अनिश्चितता हमे तबतक ही अजीब लग सकता है जबतक हम भौतिकी के सिद्धांतों को यूजफुल की बजाय सत्य माने। एक बार सत्य को यूजफुल से प्रतिस्थापित कर दिया जाय, यह अनिश्चितता हमे सहर्ष स्वीकार हो जाती है, कोई कॉग्निटिव डिज़ोनेंस उतपन्न नही होता क्योकि भविष्य में हमे और अधिक उपयोगी सिद्धान्त मिलते है न कि और अधिक सत्य।

 

----☆★★★☆-----

 

फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【चार】

 

ज्ञान की आदर्श सीमा (आइंस्टिन)--ख

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क्या यह सम्भव नही है कि हम भौतिकी के माध्ययम से प्रतिज्ञप्तियों या प्रोपोजिशन्स का एक ऐसा तन्त्र रच रहे हों जो आपस मे सुसंगठित और  कोहरेन्ट तो हो किन्तु इस तंत्र के अनुरूप कोई वाह्य सता न हो अर्थात इस सुव्यस्थित, सुसंगठित और कोहरेन्ट तन्त्र के अनुरूप कोई कोरोस्पोंडेंस या संवादिता न हो?

ऐसा सम्भव है की हमारी थ्योरी, हमारे मॉडल के अनुरूप एक्सटर्नल रियलिटी हो ही नही बावजूद इसके हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट हो और काम कर रही हो। यहाँ काम करने और सेल्फ कंसिस्टेंट होने का अर्थ मात्र इतना है कि हमारी थ्योरी में प्रेडिक्टिव पावर हो, अपवादों की संख्या न्यूनतम हो तथा इस थ्योरी-तन्त्र के लिए कम से कम अज़्मप्शन्स बनाने पड़े।

आइंस्टीन के शब्दों में हमने घड़ी नही खोली किंतु घड़ी हमारे लिए काम कर रही है, घड़ी से सम्बंधित हमारी अवधारणाओं का तंत्र काम कर रहा है अर्थात हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट है, इसमें प्रेडिक्टिव पावर है तथा यह हमारे आनुभविक जगत की घटनाओं की व्याख्या कर दे रहा है बावजूद इसके की हम घड़ी के अंदर नही झाँक सकते। आइंस्टीन इसे ही ज्ञान की आदर्श सीमा कहते हैं (एवोल्यूशन ऑफ फ़िजिक्स)

 

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"अर्थक्रियाकरित्व लक्ष्मण सत"

 

सत के लक्षण के विषय मे कहा गया है-"अर्थक्रियाकरित्व सत लक्षणम"। अर्थ का अभिप्राय, प्रयोजन को पूर्ण करने का सामर्थ्य है। इसी आधार पर अनुवादकों ने  "प्रैगमटिज़्म" का अनुवाद "उपयोगितावाद" के साथ "अर्थक्रियावाद" भी किया है। अतः सत  प्रयोजन को पूर्ण करने के सामर्थ्य की स्थिति है।

 

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फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【पाँच】

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विज्ञान का चरित्र छद्मविज्ञान से इस अर्थ में भी भिन्न होता है कि कालांतर में इसके पूर्वमान्यताओ की पृष्ठभूमि में प्रारम्भ किए गए अन्वेषण यदि किसी ऐसे निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं जो अब उस पूर्वमान्यता से ही संगति नही रखते तो विज्ञान इन नवीन निष्कर्षो को अपनी पूर्वमान्यताओ में ही ढालने के लिए तोड़-मरोड़ नही करता बल्कि अपनी पूर्वमान्यता की ही जाँच करता है और उसमे अपेक्षित सुधार करता है। यदि सुधार से भी काम न बना तो फिर विज्ञान उनका परित्याग करने से भी नही हिचकता और एक नवीन पूर्वमान्यता को स्थापित कर उसे आगे के अनुसंधानों के लिए लिए पृष्ठभूमि में स्थापित करता है।

इस सन्दर्भ में दृष्टांत के लिए निरपेक्ष देश और काल, जिनमे घटनाएँ घटती थी, से जनरल रिलेटिविटी के उस देश-काल तक, जो मात्र कोई स्टेज न होकर घटनाओ में हिस्सा लेता है, की यात्रा बड़ी मनोरंजक है।

यहाँ दार्शनिक एक प्रश्न उठाते हैं कि क्या इस द्वितीय स्तर की पूर्वमान्यतावो के अस्तित्व में आने के बाद भी क्या यह कहा जा सकता है कि इन मान्यताओं के अनुरूप वाह्य जगत में भी वैसी ही सत्ता है? क्या यह सम्भव नही है कि हम प्रतिज्ञप्तियों या ज्ञान का एक ऐसा तन्त्र रच रहे है या हमारी बुद्धि हमसे धोखा करते हुए एक ऐसा ज्ञानतन्त्र रचवा रही हो जिसमें इस तंत्र के अव्ययों में संगति और सुसंगतता तो है किंतु उस पूर्वमान्यता के अनुरूप कोई सत्ता ही न हो?

अपनी बात को पुष्ट करते हुए एक ऐसे स्वप्न का उदाहरण दिया जा सकता है जिसमें सुख-दुख आदि की अनुभूति तो होती है किंतु यह बोध नही होता कि स्वप्न में हम स्वप्न-जगत में रहते हैं और उस स्वप्न के "मैं" मे भी मैं और जगत विषयक कुछ पूर्वमान्यता विद्यमान होती है। 

यहाँ व्यक्ति की "ज्ञान" विषयक क्या अवधारणा है यह निर्धारित करता है कि वह अज्ञेयवादी, संशयवादी, शून्यवादी, मायावादी या अर्थक्रियावादी विश्वदृष्टि अपनाएगा।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण ज्ञान के विषय मे एक अर्थक्रियावादी समझ रखता है। इसके अनुसार ज्ञान किसी अतीन्द्रिय सत्ता के निमित्त नही है बल्कि इसका केवल और केवल सर्वाइवल मूल्य है हालांकि विकास वृक्ष में अपनी अब तक सबसे विशिष्ट अवस्थिति के कारण मनुष्य इसका कुछ उपयोग ठीक उसी प्रकार अलग भी कर सकता है ज्यों हम अपने कंकाल तन्त्र और पेशी तन्त्र का उपयोग ब्रेकडान्स के लिए भी कर लेते है हालांकि हमारी पेशियाँ और कंकाल ब्रेक-डांस करने के निमित नही विकसित हुए।

 

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ब्रह्मांड के प्राकृतिक इतिहास के परिप्रेक्ष्य से जगत का  कारण ब्रह्मांड है या जगत ब्रह्मांड पर एक आरोपण है किंतु हमारी चेतना में ब्रह्मांड पहले नही बल्कि जगत पहले उतरता है और फिर हम जगत से ब्रह्मांड को एक्सट्रैक्ट करते हैं और ब्रह्मांड के मानसिक भाव को हम स्वयम कंस्ट्रक्ट करते हैं, जो हमारा ब्रह्मण्ड है, क्योकि हम इस भाव के बाहर यदि कोई ब्रह्मांड हो तो भी उसे नही जान सकते क्योकि हम मात्र और मात्र अपने मानसिक प्रत्ययों को जानते हैं। इन मानसिक प्रत्ययों के अनुरूप कोई वाह्य सत्ता है या नही यह विवाद का प्रश्न है: वस्तुवाद के अनुसार है, प्रतिवस्तुवाद के अनुसार नही है।

 

यद्यपि जगत और ब्रह्मांड दोनो को बोधगम्य होने के लिए हमारी चेतना में उतरना ही है तथापि हमारी चेतना में ब्रह्मांड से पूर्व जगत ही उतरता है।

ब्रह्मांड का आशय दिक्काल में हो रही और होने वाली घटनाओं व इनको रचने वाली चीजों की अंतहीन श्रृंखला से है, जो मात्र घटनाए हैं मात्र चीजें हैं किंतु जगत में इनपर एक आवरण चढ़ा हुआ है, मनुष्य के रागों का, मनुष्यो के द्वेषों का, मनुष्य के राग-द्वेषों का आवरण, मनुष्यता की सम्भवनाओ का आवरण, उसकी सीमितताओ का आवरण।

 

दर्शन का जगत विज्ञान का ब्रह्मांड नही है अतः दर्शन ब्रह्मांड की व्याख्या नही करता, दर्शन जगत  को समझने और उसकी व्यायख्या का प्रयास करता है। जगत वह है जो यह सबकुछ उसकी चेतना में उतरता है और उसके अस्तित्व को सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनो ही प्रकार से उद्वेलित करता है। जगत में वह सुख पाता है और दुख को अनुभूत करता है। जगत में वह हँसता है और रोता है।

विज्ञान का ब्रह्मांड इस जगत से एक्सट्रेक्ट किया जाता है, ब्रह्मांड में अस्तित्वगत भावनाओ के लिए कोई स्थान नही है।

ब्रह्मांड में अस्तित्व की अतार्किकताओ का कोई मोल नही है जबकि जगत इनके बिना अधूरा है और पश्चिम में तो हीगल के बाद पनपी एक धारा इन्ही अततार्किकताओ को सत्य तक पहुंचने का असल मार्ग तक कहतीं हैं।

 

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ड़ भयावह/कड़ा आदि होने के कारण पुल्लिंग भावयुक्त ध्वनि है जबकि ल मृदुल होने के कारण स्त्रीलिंग भावयुक्त।

 

ड़ का अक्सर ल बनते दृष्टिगत हुवा है किंतु ल का ड़ होना दृष्टिगोचर नही होता।

सम्भवतः ड़ और ल की यह भाषाई प्रवृति मानवीय चेतना का प्रकृति के संग सम्बन्धो की कथा भी कहती है।

 

आरम्भ में प्रकृति मनुष्य के लिए भयावह थी रौद्र रूपा, मनुष्यो को भूख, प्यासादि मिटाने के लिए भटकना पड़ता था---उस स्थिति में वह झरनों से कल-कल ध्वनी नही सुन सकता। उस समय उसे कड़-कड़ ही सुनाई देगा किन्तु कालांतर में मनुष्यों ने कल-कल भी सुना।

अविकसित चेतना की अवस्था मे मनुष्यों को वह कड़-कड़ कड़कता प्रतीत होता और मनुष्य उससे भय खाता किन्तु लाखो वर्ष उसके साथ रहने के पश्चात मनुष्यो की आत्मा ने यह अनुभूत कर लिया था कि वह मात्र कड़-कड़ नही बल्कि कल-कल भी है।

अब यह कड़कड़ाहट कल-कल कलरव और किलकारी भी थी।

कड़कड़ाहट ही किलकारी बनी और यह तब हुवा होगा जब वह शिकारी, संग्राहक की भूमिका से कृषक की भूमिका में आया होगा।

अब उसके पास खेती के पश्चात खाली समय था, लीजर था और वह कल कल को महसूस कर सकता था।

सम्भवतः ळ ध्वनि उस संक्रमणकाल की ध्वनि है जब ड़ ल में परिवर्तित हो रहा था।

एक छोटे बच्चे को देखिए वह प्रायः ड़ का उच्चारण ल करता है--घोड़ा--धोला, पड़--पल--

पानी पल लहा है।

कृषि की उतपत्ति के साथ सम्भवतः प्रकृति के सामने हम बालरूप धर सकते थे और हमने यहाँ ड़ को ल सुनना और कहना आरम्भ कर दिया।

मनुष्य ने क्रीं क्रीं से क्लीं क्लीं होते हुए अब लं को भी ढूंढ ही लिया!

क्या यह सम्भव नही है कि हमारे तन्त्र-मंत्र के बीज मंत्र ओनोमेटोपोइक साउंड्स हो, जिनको यथारूप प्रिजर्व कर लिया गया क्योकि अतीत में ध्वनि भी दैवीयता से ओत-प्रोत अर्थात सेक्युलर चरित्र की नही थी?

मनुष्य ने "लाईक प्रोडूसेस लाईक" का अपने अतीत में बहुत अधिक प्रयोग किया है। यह सिद्धांत, भाव, मनुष्य की इमेजरी (दृश्य और श्रव्य) के साथ साथ उसके कर्मकांडो में भी बहुत बड़े स्तर पर व्यक्त हुई है।

फ्रेजर टोना/जादू को तो धर्म और विज्ञान का भ्रूण ही मानते हैं और दिखाते हैं कि हमारे अतीत के एक बहुत बड़े कालखंड मे जादू अथवा टोना की प्रधानता रही है, यद्यपि यह फॉल्स साइंस व अबो्र्टिव आर्ट था और इसका फलदाई युग उसी (लाईक प्रोड्यूस लाईक के सिद्धान्त/भाव) के साथ विज्ञान में प्रकट होता है।

पुनश्च, क्लाउड लेवी स्ट्रॉस, एंथ्रोपोलॉजी में स्ट्रक्चरलिज्म आंदोलन के जन्मदाता अपनी पुस्तक "द सैवेज माइंड" मे दिखाते हैं कि वास्तव में तब के मनुष्य के मन और आज के मनुष्य के मन मे कोई मौलिक अंतर नही है।

फ्रेजर की स्थापना की जादू और विज्ञान दोनो मे एक ही भाव का उपस्थिति है, भी स्ट्रॉस की मान्यता से पुष्ट हो जाता है।

 

मुझे प्रतीत होता है कि ओनोमेटोपोइया (ध्वन्यानुकृति) फ्रेजर की होमियोपैथिक मैजिक से जुड़ी है और यह कालांतर में भाषा की जटिलता के विकास में सहायक सिद्ध हुवा।

 

आरम्भ में मनुषयो ने प्रकृति की साउंड/ध्वनि को सुना और उनका नकल करना आरम्भ किया यद्यपि वह नकल कुछ विशेष स्वर-व्यंजनों में ही कर सकता था क्योकि उसकी वोकल कॉर्ड की एनाटोमी उतनी ही इजाजत देती है, उसके कर्ण यद्यपि इस एनाटोमी से निकलते ध्वनियों से कुछ अधिक सुन सकते हैं--हम बहुत सी ऐसी ध्वनि सुनते हैं जिनकी नकल हमारे लिए सम्भव नही है या उसको रिप्रोड्यूस करने में कठिनाई होती है।

ठीक इसी प्रकार हम मुख द्वारा उच्चारित समस्त ध्वनियों को लिख नही सकते, हमारे पास उतने सिंबल नही हैं।

 

अब, मनुषयो ने प्रकृति की ध्वनियों को सुना होगा और उन ध्वनियों की नकल की होगी, ध्वनियों को तोड़ा होगा और इन टूटे खंडों को अन्य ध्वनि से प्राप्त खण्ड से मिला कर नई ध्वनि बना ली होगी--यह उसका पहला वह शब्द था जिससे वह अब प्रकृति से बाहर सँस्कृति में जा रहा है।

 

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नागसेन मिलिंद संवाद के बहाने

नागसेन मिलिंद से रथ की परिभाषा पूछते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि रथ शब्द रथ के विभिन्न घटकों के संघात का नाम है। नागसेन रथ के इस दृष्टांत से मिलिंद को यह समझाते है कि जिस प्रकार रथ शब्द कुछ भागों के संघात का प्रतीक है ठीक उसी प्रकार आत्मा शब्द भी कुछ भौतिक और मानसिक घटकों के संघात का नाम मात्र है।

रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार संघात रूप से आत्मा कहे जाते हैं। रूप आत्मा का भौतिक घटक है और बाकी विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार आत्मा के मानसिक घटक।

एक उदाहरण सबसे पहले लेते हैं:

आप एक ईंट का ध्यान करिए। आप फिर एक अन्य ईंट का ध्यान करिए और फिर यह प्रश्न करिए कि यह दूसरा ईंट थोड़ा ज्यादा पके होने के कारण टेढ़ा होने से भवन निर्माण में न लग सकने के बावजूद ईंट क्यों है?

अब मानसिक रूप से ईंट के कोने को तोड़िए लेकिन बचा हुआ हिस्सा अभी भी ईंट है। जबतक ईंट ढेला नही बनता तब तक उसमें क्या विशेषता थी कि वह ईंट के रूप में पहचाना जा रहा था?

शायद "ईटत्व"---दुनिया के सारे ईंटो में मौजूद एक सामान्य।

अर्थात दुनिया की सारी गायों में "गोत्व" है और इस गोत्व के कारण हम किसी नई चौपाया को देखकर यह निर्णय देते है की यह जीव गाय है अथवा नही है।

अब दार्शनिकों के पास एक नई समस्या आती है कि इस सामान्य की विवेचना करें--क्या यह सामान्य कोई वस्तुगत सत्ता है या इसको हमारी चेतना रचती है?

अब गाय होती है इसका निषेध तो कोई कर नही रहा किन्तु समस्या यह हैं---

गोत्व वास्तविक है या मेंटल कंस्ट्रक्ट?

गोत्व और गाय का सम्बन्ध क्या है आदि।

यदि इस सामान्य की वस्तुगत सत्ता है तो यह गाय के पूर्व या गाय के अलावा कहा स्थित है

और गोत्व और गाय में कौन ज्यादा वास्तविक है? या दोनों ही वास्तविक हैं? या महज गाय ही वास्तविक है?

(आप अंकों 1,2,3,4---के सम्बंध में भी यह प्रश्न उठा सकते हैं)

चलिए अब गाय को आदमी और गोत्व को आत्मा से प्रतिस्थापित कर दीजिए और फिर से विचार करिए---उपनिषद आत्मा की अभौतिक एवम वास्तविक सत्ता मानते हैं जबकि बुद्ध आत्मा को मेंटल कंस्ट्रक्ट।

नागसेन उपरोक्त संवाद में बुद्ध की उसी मान्यता को रथ के दृष्टांत से समझाने का प्रयास कर रहे हैं।

लेकिन यह सब करने का मतलब क्या? क्या फायदा इन लंतरानियो का--दिमाग यह सवसे पहले पूछता है और आपका मष्तिष्क भी यह प्रश्न कर रहा होगा--इसके बारे में आगे!

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उपनिषदों में एक वाक्य है: अयमात्मा ब्रह्म। इस वाक्य के द्वारा आत्मा और ब्रह्म में अद्वैत स्थापित किया गया है---लेकिन यहां आपका प्रश्न होगा कि यह अद्वैत क्यों स्थापित किया गया? ज़रूरत क्या थी इस समीकरण को रचने की।

जवाब बहुविध है--सामाजिक आर्थिक कारक, इन कारकों से निरपेक्ष जीवन जगत विषयक चिंतन। लेकिन फिर आप प्रश्न करेंगे कि यह सब चिंतन भला हुवा ही क्यों?

देखिए ऐसा हुवा है कि पुराने लोगो ने जगत को समझना चाहा और जगत में अपने अस्तिव के अर्थ को समझना चाहा और इस निष्कर्ष पर पहुंचे की आत्मा ही ब्रह्म है: दरअसल जगत और अहम का भेद एक भ्रम है और हम और जगत उसी परम सत्ता की अभिव्यक्ति हैं।

एक विचार आईशोलेशन में नही होता; यह बाद में निर्धारित किया जाएगा कि आर्थिक सामाजिक कारक किसी संस्कृति वाक्य को निर्धारित करते हैं कि ये वाक्य जो मनीषियों के मन मे जन्म लेते हैं या ढूंढे जाते है वो व्यक्ति और समाज, व्यक्ति और व्यक्ति एवम समाज एवम समाज के सम्बन्धो के संग संग व्यक्ति और समाज की जीवन पद्धति निर्धारत करते हैं---फिलहाल अभी यही मानिए की कोई तत्वमीमांसिय विचार अकेले नही होता।

अब एक दूसरा मनीषी, दूसरा विचारक जन्म ले सकता है जिसे ये बाते स्वीकार्य न हों और व्यक्ति और व्यक्ति, व्यक्ति और समाज, व्ययक्ति और जगत के सम्बन्धो को पुनर्परिभाषित करता है और इस क्रम मे कुछ नई स्थापनाए ढूंढता या रचता है।

महात्मा बुद्ध के लिए यह आवश्यक था कि वह व्यक्ति और जगत आदि के सम्बन्धो को पुनर्परिभाषित करें और इस क्रम में उन्होंने आत्मा या ब्रह्म की सत्ता को स्वीकारने से इनकार कर दिया।

नागसेन उपरोक्त संवाद में बुद्ध की उसी स्थापना को तार्किक रुप से डेमोंस्ट्रेट कर रहे हैं एक राजा के सामने।

अब आपका प्रश्न हो सकता है कि बुद्ध के लिए यह नई स्थापना अनिवार्य क्यों थी और इस नई स्थापना का भारत के इतिहास पर क्या असर पड़ा और इसके वर्तमान पर क्या असर पड़ रहा है।

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उपनिषदों की स्थापना है कि आत्मा और ब्रह्म में अभेद है और बुद्ध कह रहे है कि आत्मा नाम की कोई वस्तु या सत्ता होती ही नही है--यह क्या हुवा, बुद्ध ने वैदिक चिंतन की उस धारा को अस्वीकार क्यो कर दिया जो अपने उत्कर्ष पर आत्मा और ब्रह्म के तादात्म्य पर पहुंचती है? बुद्ध ने स्थापित चिंतन के विरुद्ध विद्रोह क्यो कर दिया?

क्या बुद्ध का अनात्मवाद महज उपनिषदों के विरुद्ध मात्र एक इंसिग्निफिकेन्ट प्रतिक्रिया है अथवा बुद्ध उपनिषदों के समानांतर मौजूद किन्तु दबे हुए एक दूसरे चिंतन को आवाज दे रहे है? बुद्ध कर क्या रहे हैं आखिर?

इन प्रश्नों पर हम बाद में विचार करेंगे फिलहाल हम नागसेन मिलिंद संवाद पर वापस आते है और नागसेन के तर्क को समझने का प्रयास करते है।

नागसेन रथ का उदाहरण लेते हैं लेकिन चलिए हम उसी ईंट पर वापस आते हैं।

फिर से वही प्रश्न की दुनिया की सारी ईंटो में ऐसा क्या सामान्य या ऐसी क्या कॉमन बात है कि वो ईंटे हैं?

एक जवाब हो सकता है कि "इंटत्व"।

दार्शनिक प्लेटो कहते है कि जगत की वस्तुए इन समान्यो की इम्परफेक्ट अनुकृति हैं और इन समान्यो का, जो कि परफेक्ट हैं इनका अस्तित्व एक अलग लोक में हैं।

मानव जीवन परफेक्ट नही है, मानविक जगत में विविध प्रकार के अशुभ--दैहिक, दैविक, भैतिक उपस्थित हैं लेकिन आत्मा का ब्रह्म से तादात्म्य होने के कारण सत चित आनन्द स्वरूपा है।

ध्यान से देखने पर यहाँ व्यवहार और परमार्थ का द्वैत खिंचा दिखाई देता है और यही नही इस चिंतन के अनुसार परमार्थ व्यवहार से ज्यादा प्रासंगिक बन जाता है।

परमार्थ के व्यवहार से ज्यादा प्रसांगिक बनने का प्रभाव यह होता है कि हम इहलोक की समस्यायों का हल उहलोक में ढूंढने लगते है और इसकी पृष्ठभूमि में पूरा एक तन्त्र विकसित हो जाता है जहाँ तत्वमीमांसिय चिंतन मनुष्य की सत्ता को क्रश करने लगता है।

बुद्ध ऐसी किसी भी चिंतन, ऐसे किसी भी तन्त्र के विरुद्ध खड़े नजर आते हैं। वह तत्वमीमांसा के अंदर दबी कराहती मानवता को तत्वमीमांसा के बोझ से मुक्त कराने को कृतसंकल्प हैं:

बुद्ध कहते है कि यदि किसी व्यक्ति को तीर लगा हो तो उसका इलाज करना चाहिए न कि यह चिंतन की तीर किस चीज का बना हुआ है, तीर किस दिशा से आया,तीर किस वेग से आया-------

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बौद्ध दर्शन और अद्वैत वेदांत के तुलनात्मक अध्ययन पर ऑथिरिटी चन्द्रधर शर्मा अहम के तीन स्तर मानते हैं: प्रमाता, जीवात्मा और साक्षी।

प्रमाता आनुभविक अहम है और साक्षी अतिन्द्रीय ब्रह्मस्वरूपा विशुद्ध सत्ता।

ध्यातव्य है कि हम अहम पर विचार करते करते अहम को एक अतीन्द्रीय सत्ता के रूप में भी स्थापित कर लेते हैं यद्यपि इस अतीन्द्रीय अहम का आधार आनुभविक अहम ही है। यह ठीक उसी प्रकार से है ज्यों जगत की ससीमता सत्ता की असिमिता का बोध देने लगती है; व्यवहार ही परमार्थ की सृष्टि करता है।

अब यहां दो बातें हो सकती है: आनुभविक अहम का खंडन कर अतीन्द्रीय अहम को ही सत्य माना जाय या आनुभविक अहम को खंडित किया जाय ताकि पारमार्थिक अहम स्वयम ध्वस्त हो जाय।

नागसेन-मिलिंद संवाद में नागसेन आनुभविक या व्यवहारिक अहम का खंडन कर रहे है ताकि पारमार्थिक अहम भी खंडित हो जाय किन्तु आनुभविक अहम के खंडन से पारमार्थिक और अनितन्द्रीय साक्षी की सत्ता कितनी खंडित होती है इसकी हम आगे समीक्षा करेंगे और यह भी देखेंगे कि बुद्ध क्या अपने अनात्मवाद द्वारा इस मेटाफिजिकल और अतीन्द्रीय अहम या साक्षी को पूरी तरह एलिमिनेट कर पाते हैं।

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हमने पूर्व में एक प्रश्न उठाया था कि एक नई दृष्टि की स्थापना, एक नया उद्घोष बुद्ध के लिए एक अनिवार्यता क्यों थी। प्रारंभ में कहा जा चुका है कि बुद्ध तत्वमीमांसिय चिंतन की जगह एक व्यवहारिक चिंतन के समर्थक थे और तत्त्वमीमांसिय चिंतन के अंदर दबी कराहती मानवीय सत्ता की दर्शन के ऊपर उसकी प्रतिष्ठा को कृतसंकल्प थे।

ऐसा नही है कि तत्वमीमांसिय चिंतन की विरुद्ध पश्चिम में प्रतिक्रिया नही हुई है--हीगल के साथ तत्वमीमांसिय चिंतन पश्चिम में अपने उत्कर्ष पर पहुंच चुका था और अतः इस चिंतन में निहित विविध बिंदुओं यथा-प्रत्ययवादी प्रवृत्ति, प्रज्ञावाद की अतिशयता, दर्शन तथा तत्वमीमांसिय चिंतन का एकीकरण, परिकल्पनात्मक चिंतन का बाहुल्य के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी।

पाश्चात्य जगत में प्रतिप्रज्ञावादी आंदोलन, वास्तववाद का जोर पकड़ना, विश्लेषणात्मक दर्शन की नींव, फिनोमेनोलॉजी, मार्क्स का द्वंदात्मक भौतिकवाद व अस्तित्ववाद की दृष्टि का जन्म वस्तुतः इसी प्रतिवाद में हुवा।

दीघनिकाय के ब्रह्मजालसुत्त के अनुसार बुद्ध के पूर्व 62 दृष्टियां (बौधों के अनुसार मिथ्या दृष्टियां) प्रचलित थीं।

ये बासठ दृष्टियां पूर्वान्त, अपरांत और पूर्वापरांत, इन तीन विभागों में विभाजित है: पूर्वान्त में शाश्वतवाद, नित्यनित्यतावाद, सान्तानन्तवाद, अमराविक्षेपवाद और अकारणवाद, ये पांच वाद थे। ये वाद लोक और आत्मा के शाश्वत अथवा नश्वर होने को लेकर थीं। इन वादों के अंतर्गत बौद्ध साहित्य तत्कालीन प्रचलित 18 मिथ्या धारणाओं की गणना करते हैं।

अपरांत में 44 धारणाएं गिनाई गयी हैं और उन्हें भी पाँच भागो में विभाजित किया गया है:

◆सत्त्व के मरने पर उसकी चेतना शेष रहती है।

◆सत्त्व के मरने के बाद उसकी चेतना शेष नही रहती।

◆सत्त्व के मरने के बाद उसकी चेतना न तो शेष और न ही अशेष रहती है।

◆उच्छेदवाद, जिसके अनुसार सत्त्व चार महाभूतों से बना है और मृत्युपरांत उन्ही में मिल जाता है तथा

◆दृष्टधर्मनिर्वाणवाद, जिसके अनुसार सत्त्व को इसी जन्म में उसके देखते देखते ही वह निर्वाण लाभ करता है।

बुद्ध का चिंतन तत्वमीमांसिय न होकर व्यवहारिक था। बुद्ध ने केवल उन बातों का उपदेश दिया जो उनके अनुसार जीवन की मुख्य बात, दुख से बचने के लिए आवश्यक है। बुद्ध दुख निवृत्ति के लिए इन तत्वमीमांसिय वाद विवादों को निर्रथक मानते थे और चौदह तत्वमीमांसिय प्रश्नों का उत्तर नही देते थे जिन्हें बौद्ध साहित्य में अव्यक्तानि कहा गया है।

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बुद्ध के समकालीन तीर्थंकर

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★ पूर्णकाश्यप: पूर्णकाश्यप 'अक्रियावाद' के संस्थापक थे। पूर्णकाश्यप के मतानुसार किसी अच्छे बुरे कार्य का कोई अच्छा अथवा बुरा फल नही मिलता।

★ मक्खलि गोसाल: मक्खलि गोसाल देववाद या नियतिवाद के प्रतिपादक थे। इनके मत में पुरुषार्थ पर कोई विश्वास नही था तथा ये अकर्मण्यवादी थे। जैन आगम गर्न्थो के अनुसार मक्खलि गोसाल निर्ग्रन्थनाथपुत्र महावीर के शिष्य थे किंतु किसी प्रश्न पर विवाद होने के कारण ये महावीर से अलग हो गए और इन्होंने एक नवीन सम्प्रदाय की स्थापना कर ली।

★प्रकुष कात्याययन: ये अकृतवादी या सप्तकायवादी थे। इनका मत था कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु, सुख, दुख और जीव ये सब अकृत अनिर्मित और अचल हैं। ये कभी किसी विकार को प्राप्त नही होते। यहाँ न कोई मरनेवाला है, न कोई सुननेवाला और न कोई सुंनानेवाला।

★ अजीत केशकम्बली: ये भौतिकवादी थे। इनके अनुसार संसार मे किसी वस्तु का कोई अस्तित्व नही है। पाप पुण्य स्वर्ग नर्क आदि की सत्ता नही है। ये चार महाभूतों को ही स्वीकारते थे।

★संजय वेल्टिठपुत्त: यह संदेहवादी थे। इनका कहना था कि कोई भी तत्व यथा परलोक, देवता, पुण्य या अपुण्य होता है या नही इसके विषय मे नही कहा जा सकता।

★महावीर की चर्चा कालांतर में की जाएगी।

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एक सावधानी: हमे बौद्ध दर्शन के अध्ययन के अंतर्गत ही बुद्ध और उनके आंदोलन का अध्ययन नही करना चाहिए बल्कि इन्हें दो अलग अलग शीर्षकों प्रारंभिक बौद्ध धर्म तथा बौद्ध दर्शन में विभाजिर कर इनका अध्ययन किया जाना चाहिए क्योंकि बुद्ध किसी भी दार्शनिक वाद-विवाद के पक्षधर नही थे, उनकी शिक्षा व्यवहारिक थी। बुद्ध के कथनों की दार्शनिक पुष्टि बाद कि घटना है जब बौद्ध मत एवम वेदों से निःसृत मत आमने सामने आए। इस वैदिक और बौद्ध मत के कन्फ्रण्टेशन ने समेकित रूप से भारतीय दार्शनिक साहित्य को बहुत ही विपुल कर दिया।

जोनार्डन गनेरी इसे सूत्रों का काल कहते हैं। जीवन मार्ग के रूप में दर्शन के पश्चात सूत्रों का काल आता है। यहाँ भी हालांकि दर्शन का वह प्रारम्भिक उद्देश्य बना रहता है किंतु दर्शन अब अनवीक्षकी बन जाती है और फोकस उक्त लक्ष्य के बावजूद आत्मा के अलावा प्रमाण और प्रमेय पर केंद्रित हो जाता है। भावत्वमकता का स्थान तर्कशीलता ले लेती है।

यही काल है जब बौद्ध और जैन दार्शनिक विमर्श पाली और प्राकृतिक से हटकर संस्कृत भाषा मे किए जाते हैं।

यह काल दर्शन के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस काल मे विविध परम्पराओं ने आपस मे संवाद और विमर्श स्थापित किया।

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रिज़ डैविड्स का कथन है कि "बुद्ध ने संवेदनों की सभा करनेवाले किसी आत्मा रूपी राजा को नही माना।"

इस कथन के साथ हम वापस मिलिंद-नागसेन संवाद पर आते हैं।

नागसेन मिलिंद से रथ की परिभाषा पूछते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि रथ शब्द रथ के विभिन्न घटकों के संघात का नाम है। नागसेन रथ के इस दृष्टांत से मिलिंद को यह समझाते है कि जिस प्रकार रथ शब्द कुछ भागों के संघात का प्रतीक है ठीक उसी प्रकार आत्मा शब्द भी कुछ भौतिक और मानसिक घटकों के संघात का नाम मात्र है।

रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार संघात रूप से आत्मा कहे जाते हैं। रूप आत्मा का भौतिक घटक है और बाकी विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार आत्मा के मानसिक घटक।

एम हिरियन्ना इन घटकों के बारे में लिखते हैं कि इन चार मानसिक घटकों में से कुछ का अर्थ थोड़ा अस्पष्ट है फिर भी इन्हें फिलहाल क्रमश: आत्मचेतना, अनुभूति, प्रत्यक्ष और मानसिक वृत्तियों के समानार्थक माना जा सकता है।

द्रष्टव्य है कि बुद्ध केवल क्षणिक संवेदनों और विचारों की ही सत्ता स्वीकार करते हुए आत्मा को एक अनावश्यक कल्पना मानकर उसका निषेध करते हैं।

प्रोफेस हिरियन्ना आगे लिखते हैं,

"बुद्ध ने उन चीजों को सत्य माना जिन्हें उपनिषदों ने अतात्त्विक कहकर टाल दिया और उस अधिष्ठान का निषेध कर दिया जिसे उपनिषदों ने एक मात्र सत्य माना।"

यहाँ चार्वाक के देहात्मवाद अर्थात देह ही आत्मा है और बौद्ध संघातात्मावाद में एक साम्य दिखता है फर्क यह है कि बुद्ध चार्वाकों के विपरीत मानसिक सताओ की भी आत्मा के घटक के रूप में उपस्थिति स्वीकार कर लेते हैं किंतु उल्लेखनीय बात यह है कि बुद्ध इन दोनों में से प्रचलित मत के विरुद्ध मानसिक को भौतिक से कम वास्तविक मानते हैं( रिज़ डैविड्स)।

"बौद्ध और भौतिकवाद" हालांकि एक पी एच डी का विषय हो सकता है किंतु इस पर एक सामान्य चर्चा आगे--!

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प्रारंभिक बौद्धधर्म में कुछ अस्पष्टताएं थी क्योकि बुद्ध का उद्देश्य किसी दर्शन के तन्त्र को खड़ा करने के बजाय उनका ध्यान जीवन के व्यवहारिक उद्देश्य पर अधिक था। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के कुछ ही वर्षों के उपरांत बुद्ध की बातों को लेकर उनके अनुयायियों में मतभेद स्थापित होता है गया और शीघ्र ही बुद्ध की मृत्यु के कुछ ही समय बाद (सौ वर्षों के अंदर) अकेले भारतवर्ष में उनकी शिक्षाओं की अट्ठारह व्याख्याएं उपस्थित हो गईं। इन अट्ठारह निकायों के वर्णन आचार्य वसुमित्र ने 'अष्टादश निकाय शास्त्र" में किया है।

चीनी यात्री इत्सिंग का कहना है कि ये अट्ठारह निकाय प्रमुखत्: चार प्रधान भागो में विभक्त थे--आर्य महासांघिक, आर्य मूल सर्वास्तिवाद, आर्य स्थविरवाद और आर्य सम्मितीय।

ई● पू● पांचवी शती में बौद्ध संघ के तीन प्रधान केंद्र थे---मथुरा, कौशाम्बी और वैशाली। वैशाली के बौद्ध भिक्षुओं में शिथिलता आ गयी थी जिसे लेकर वैशाली में ही एक बौद्ध संगीति बुलाई गई थी और मतभेदों को दूर किया गया था तथापि समय और बौद्ध धर्म के विस्तार के साथ बौद्ध विचारकों के मध्य आंतरिक विभेद बढ़ते गए और देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बौद्ध मत में परिवर्तन होते चले गए और इनमें नवीनताए आती गईं।

उत्तरकालीन बौद्ध सम्प्रदायो के प्रमुख समस्त मतों को दो भागों में विभाजित किया जा है-- हीनयान और महायान।

प्रोफेसर हिरियन्ना लिखते हैं कि इन मतों के आने की सच्चाई जो भी हो, बौद्ध धर्म के इन दोनों ही रूपो में कई महत्वपूर्ण नवीनताये समान रूप से दिखती हैं और इनमें से किसी को भी बुद्ध के मूल उपदेश को यथा रूप प्रस्तुत करनेवाला नही माना जा सकता।

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उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष 【क】

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बौद्ध दार्शनिक दो प्रमाणों को स्वीकार करते हैं: प्रत्यक्ष और अनुमान हालांकि उनके मत में अनुमान का मूल्य अस्थायी मात्र है। पुनः यद्यपि बौद्ध दर्शन के सारे सम्प्रदाय प्रत्यक्ष को स्वीकार करते हैं तथापि उसके स्वरूप के विषय मे उनके मध्य तीव्र मतभेद है। उत्तरकालीन बौद्ध सम्प्रदायो को उनकी प्रत्यक्ष की अवधारणा के आधार पर वास्तववादी और प्रत्ययवादी, इन दो वर्गों में रखा जा सकता है। हीनयानी वास्तववादी हैं क्योकि ये वस्तुओ के अस्तित्व को चेतनावाह्य और चेतनानिरपेक्ष मानते हैं जबकि महायानी योगाचारी जहाँ वह्यरथो का जहाँ निषेध करते हैं वही मध्ययमिक इन्हें शून्य मानते हैं।

हमे यहाँ इस बात का ध्यान रखना होगा कि यद्यपि हीनयानी वह्यार्थो में विश्वास करते हैं तथापि बौद्ध दर्शन की मूल स्थापना के अनुसार ये क्षणभंगवाद का पालन करती हैं।

वैभाषिक और सौत्रान्तिक यद्यपि वाह्य जगत के अस्तित्व में विश्वस्त है तथापि वाह्य जगत का ज्ञान कैसे होता है इस पर उनका मतैक्य नही है।

वैभाषिकों के अनुसार वाह्य जगत का हमे प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। वस्तुओ की हमे ज्ञान में यथारूप उपलब्धि होती है किंतु सौत्रान्तिक इस प्रक्रिया में बौद्ध सिद्धान्त क्षणभंगवाद को लाकर वाह्य जगत विषयक हमारे ज्ञान को थोड़ा जटिल बना देता है।

बौद्ध क्षणभंगवाद के अनुसार कोई भी वस्तु दो क्षणों तक एक ही नही रहती--उनमें प्रतीत्यसमुत्पाद के अनुसार प्रत्येक क्षण परिवर्तन होता रहता है अतः जिस क्षण हमे किसी वस्तु का प्रत्यक्ष होता है उस समय के संस्कार हमारे चित में अंकित हो जाते हैं लेकिन जब तक हम इस संस्कार के अनुरूप किसी निर्णय पर पहुंचते है तब तक क्षणभंगवाद के अनुसार जिस वस्तु के कारण हमें संस्कार उतपन्न हुवा था वह परिवर्तित हो चुका होता है। ध्यातव्य है कि निर्णय के समय संस्कार उतपन्न करनेवाली वस्तु उपस्थित न होकर नष्ट हो चुकी होती है किंतु हमरा निर्णय उस विनिष्ट वस्तु के बारे में होता है और इस प्रकार सम्बंधित निर्णय में अनुमान शामिल हो जाता है और हम वाह्य जगत का प्रत्यक्ष नही करते बल्कि उसके विषय मे अनुमान द्वारा निर्णय देते हैं।

ध्यान देने योग्य बात है कि वास्तववादी होने के बावजूद वैभाषिक और सौत्रान्तिक द्रव्य और गुण के भेद को मानने से इनकार कर देते हैं क्योकि जहाँ औपनिषदिक चिंतन में द्रव्य की वास्तविक सत्ता है वहीं बौद्ध गुण मात्र को ही स्वीकार करते हुए गुणों के आधार या सब्स्ट्रेटम द्रव्य की कल्पना को व्यर्थ मानकर उसका निषेध कर देते हैं। इनके अनुसार जब हम यह निर्णय देते है कि "यह लाल है" तब हम लालपन को यह का विधेय बनाते है और यह निर्णय सविकल्प प्रत्यक्ष होने के कारण इसमें वस्तु के सवलक्षण में हमारी कल्पना का अंश समाहित होता है। अर्थात हम "स्वलक्षणों" पर अपनी कल्पना आरोपित कर "यह" कि रचना कर रहे होते हैं।

इस आरोपण के कारण हमारा प्रत्यक्ष शुद्ध संवेदना नही रहा जाता जो कि निर्विकल्प प्रत्यक्ष में होता है क्योकि निर्विकल्प प्रत्यक्ष में मन निष्क्रिय होता है।

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उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष 【ख】

सौतन्त्रिक यद्यपि चेतनावाह्य वस्तुओ का अस्तित्व स्वीकार करता है तथापि उनके ज्ञान के विषय मे उसकी स्थापना है कि ये बाह्यार्थ अनुमान के आधार पर प्रमाणित होते हैं।

हम वाह्य वस्तुओ को साक्षात नही जाते बल्कि उनके और हमारे मध्य ज्ञान के क्रम में एक मानसिक माध्ययम उपस्थित होता है।

सौत्रान्तिको का यह विश्लेषण पाश्चात्य अनुभववादी दार्शनिक जॉन लॉक के रिप्रेजेंटेटिव रियलिज़्म अथवा प्रत्ययप्रतिनिधिवादी सिद्धान्त से बहुत हद तक साम्य रखता है।

ज्ञान की प्रक्रिया में इंद्रियों का वस्तुओ से सम्पर्क होता है और इस सम्पर्क के फलस्वरूप वस्तुओ के संस्कार मन पर अंकित होते हैं और हमे वस्तुओ की जगह उनके संस्कारो का ज्ञान होता है। यहाँ तीन बातें हो सकती है--प्रथम की वस्तुओ और उनके संस्कारो में संवादिता हो और ये संस्कार वस्तुओ को हुबहु प्रस्तुत करते हों या इन संस्कारों और वस्तुओ में कोई संवादिता ही न हो और इस प्रकार वस्तुओ के वास्तविक स्वरूप और उनके उस स्वरूप का जो हम उनके संस्कार के कारण ग्रहण करते है, का एक द्वैत उपस्थित हो सकता है। काँट के दर्शन में यह द्वैत अपनी जगह पाता है और काँट न्युमोना और फेनोमेना की बात करते हैं। न्युमोना "थिंग इन इटसेल्फ" है और ये अज्ञेय हैं। हम केवल फेनोमेना, जो कि इन अज्ञेयो का एक सीमित ज्ञेय रूप है और जो संस्कार में अभिव्यक्त होता है, को ही जान सकते हैं।

ध्यातव्य है कि यहाँ बौद्ध वास्तवाद और काँट के दर्शन में एक सादृश्यता दृष्टिगत होती है तथापि दोनों के मत एक नही हैं।

'काँट की तरह बौद्ध वास्तववादी भी एक सदवस्तु (स्वलक्षण) मानता है, और प्रत्यक्ष में जैसी वह प्रकट होती है उसे मन के द्वारा उस पर अपनी कल्पना (कल्पना ही बुद्धिविशेष:) के आरोप किए जाने का फल मानता है लेकिन बौद्ध यह मानता है कि स्वलक्षण का ज्ञान होता है और इसलिए वह काँट के "थिंग इन इटसेल्फ" की तरह अज्ञेय नही है। एक और बात यह भी है कि मन सदवस्तु पर जिन कल्पनाओं का आरोप करता है, वे हूबहू वैसी नही है जैसी उन्हें काँट के मत में स्वीकार किया गया है।'

वैभाषिक और सौतन्त्रिको के अनुसार वाह्य और आंतरिक दोनों जगत की सत्ता स्वीकार की जाती है और इसीलिए इनके मत को समेकित रूप से "सर्वास्तिवाद" कहा जाता है। इनका कथन है "सर्वमस्ति"। यद्यपि वाह्य तथा आंतरिक दोनों जगतो की सत्ता है तथापि इनका आधार क्षणिक धर्म है क्योकि ये निरंतर परिवर्तनशील हैं। ये धर्म ही स्वलक्षण या काँट की शब्दावली में "थिंग इन देमसेल्वस" हैं किन्तु इनके प्रत्यक्ष में मन की पाँच कल्पनाएँ शामिल होती हैं:

जाति या सामान्य, गुण, कर्म, नाम और द्रव्य। प्रत्येक वस्तु इन्ही के माध्ययम से देखी जाती है।

किसी भी वस्तु का शुद्ध स्वलक्षण रूप दृषिटगत नही होता।

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उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष 【ग】

सर्वास्तिवादी बौद्ध धर्म का सौतन्त्रिक सम्प्रदाय प्रत्यक्ष के विषय मे आधुनिक दर्शन की शब्दावली में "प्रत्ययप्रतिनिधिवाद" की स्थापना करता है किंतु बौद्ध दर्शन का विज्ञानवादी सम्प्रदाय ज्ञेय-ज्ञान-ज्ञाता के या वस्तु--विज्ञान--मनस या आत्मा के त्रिक से वस्तु और मनस का पूर्णतया निषेध कर विज्ञान मात्र की सत्ता स्वीकार करता है। विज्ञान मात्र की सत्ता स्वीकार करने के कारण ही इस सम्प्रदाय का नाम विज्ञानवादी है।

अस्तु, विज्ञानवाद के अनुसार न तो ज्ञाता का अस्तिव है और न ज्ञेय वस्तुओ का, बल्कि केवल प्रत्यय की सन्ततियो का ही अस्तित्व है।

अर्थात "उद्दीपन सदैव अंदर होता है, बाहर से कदापि नही आता। ज्ञान का आकार(फॉर्म) कभी बाहर विद्यमान वस्तुओ के ऊपर निर्भर नही होता, बल्कि पूर्व के अनुभव के छोड़े हुए संस्कार या वासना से प्राप्त होता है। पिछले अनुभव का कारण एक अन्य संस्कार होता है और इस प्रकार एक अनादि संतान अनन्त तक चलती है।" सौत्रान्तिक के प्रत्ययप्रतिनिधिवाद के अनुसार यद्यपि ज्ञान की प्रक्रिया में हमारा मन जाति, नाम, कर्म, गुण और द्रव्य की कल्पना बाह्यार्थ से प्राप्त संस्कारो पर आरोपित करता है किंतु विज्ञाननवादीयो के अनुसार विचार अपने अलावा किसी अन्य चीज़ की ओर संकेत नही करते और मात्र विज्ञानों की ही सत्ता है।

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उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष 【घ】

वैभाषिक वाह्य एवम आंतरिक दोनों जगतो की सत्ता मानते है यद्यपि इनका आधार कोई सत्ता नही है और ये क्षण-क्षण परिवर्तनशील हैं और वाह्य जगत का अव्यव्हीत प्रत्यक्ष होता है। सौत्रान्तिक मत के अनुसार यह प्रत्यक्ष व्यव्हीत होता है; हमरा प्रत्यक्ष संस्कारो से होता है और हम इन संस्कारों के आधार पर एक वाह्य जगत को अनुमान द्वारा स्थापित करते हैं। विज्ञाननवादी ज्ञाता और ज्ञेय को अनावश्यक मानकर विज्ञान मात्र की सत्ता को मानता है किंतु माध्यमिक ज्ञाता, ज्ञेय के साथ-साथ ज्ञान की तत्त्वता का भी निषेध कर परमार्थत: शून्यता की स्थापना करता है। माध्यमिक सम्प्रदाय की यह स्थापना शून्यवाद कही जाती है।

शून्यवाद की दो व्याख्याए दी जाती हैं: निहिलिज़्म या नि: शेषता और जगत की चतुष्कोटी विमुक्तता।

इसमें पहली शून्यता की निषेधात्मक व्याख्या है और दूसरी सकारात्मक।

चतुष्कोटी विमुक्तता का अर्थ यह है कि:

◆विश्व की विभिन्न वस्तुओं को हम सत्य नही कह सकते क्योकि सत्य का अर्थ निरपेक्ष होता है जबकि चराचर जगत की सारी वस्तुए सापेक्ष हैं।

◆ विश्व की वस्तुओं को असत्य भी नही कह सकते क्योंकि उनका हमे प्रत्यक्ष होता है।

◆विश्व की वस्तुओं को हम एक साथ सत्य और असत्य भी नही कह सकते क्योंकि ऐसा कहना व्याघात होगा।

◆ हम विश्व की वस्तुओं के विषय मे यह भी नही कह सकते कि ये न सत्य हैं और न असत्य क्योकि यह आत्मविरोधी कथन होगा।

नागार्जुन वस्तुओ को चतुष्कोटिय तर्क पर कसने के पश्चात उन्हें शून्य प्रमाणित करते हैं और कहते है कि शून्यता ही निर्वाण है।

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बौद्ध मत के अनुसार आत्मा की सत्ता नही है। एक अभौतिक, अतीन्द्रीय, अनश्वर सत्ता के रूप में आत्मा का खंडन तब तक कोई समस्या उत्पन्न नही करता जब तक हम बौद्ध धर्म मे उपस्थित सबसे महत्वपूर्ण अलौकिकता निर्वाण पर विचार नही करते किन्तु यदि इस अलौकिकता को हटा भी दिया जाय तो भी बौद्ध मत द्वारा आनुभविक अहम का या, मानसिक घटनाओं में हम जिस ममकार अहंकार युक्त अहम का बोध पाते है उसका भी निराकरण कर देता है।

व्यवहारिक अहम की सत्ता, जिसे चन्द्रधर शर्मा "प्रमाता" की संज्ञा देते है, का खंडन भारतीय और पाश्चात्य दोनों ही परम्पराओ में हुवा है। यद्यपी इन दोनों परम्पराओ में जिस वृहत लक्ष्य के निहित एवम जिन तर्को के आधार पर व्यहारिक आत्मा की सत्ता का खंडन हुवा है वो भिन्न हैं। तथापि बौद्ध दर्शन के संघातवाद और डेविड ह्यूम की "बंडल थ्योरी ऑफ सेल्फ" में काफी समानताएं हैं।

जब दार्शनिक यह कहते है कि "आत्मतत्त्व" तत्वतः नही होता तो इस कथन द्वारा उनका क्या अभिप्राय होता है?

निश्चित रूप से ऐसे कथनों में दार्शनिको की यह मान्यता रहती है कि सत्ता की कई सतहे हैं या सत्ता की कोई सतह ही नही है। पहले विचार में सत्ता की यह सतह अनन्त तक नही जाती बल्कि एक स्तर पर आकर समाप्त हो जाती है तथा इस आखिरी सतह के ऊपर सत्ता की सारी विविध सतहे अवास्तविक मानी जाती हैं और यह अवास्तविकता अविद्या, मिथ्या दृष्टि आदि का परिणाम स्वीकार किया जाता है जो मनुष्य के संदर्भ में उसकी चेतना को दूषित कर उसे बंधन में डाल देता है।

ध्यातव्य है कि उस अल्टीमेट या आखरी सतह के अलावा अन्य सतहों की उपस्थिति के कारण की व्याख्या एक आखरी और अंतिम स्तर की वास्तविक सत्ता की उपस्थिति में दार्शनिकों के लिए अनिवार्य बन जाता है क्योकि यद्यपि अनुभव शून्य या एकांगी या मायाबद्ध हो तथापि इस अन्य स्तर के अनुभव की उपस्थिति को नकारा नही जा सकता और इसी कारण यद्यपि बौद्ध विज्ञानवादी ज्ञाता और ज्ञेय की सत्ता को नकारने के बावजूद ज्ञान की सत्ता को नही नकारते, बल्कि ज्ञानमात्र की ही सत्ता स्वीकार करते हैं।

पाश्चात्य परम्परा में अनुभववाद, यह सिद्धांत की ज्ञान की उत्पत्ति अनुभव में होती है, लॉक से प्रारम्भ होकर बर्कली होते हुए ह्यूम के संशयवाद में अपनी परिणति पर पहुंच जाता है। ह्यूम के अनुसार अनुभववाद के आधार पर ईश्वर, वाह्य जगत, आत्मा, कारणता आदि की सत्ता प्रमाणित नही होती:

ह्यूम के मत में हमारा सम्पूर्ण ज्ञान दो विषयो पर आश्रित है: इन्द्रियसंस्कार और विज्ञान। विज्ञान संस्कारो के प्रतिबिंब हैं। संस्कार हमारे मानस पर जो प्रतिबिंब या प्रतिरूप छोड़ आते है उनको विज्ञान कहते हैं। 'ह्यूम के अनुसार संस्कार और विज्ञानों को छोड़कर और कोई हमारे ज्ञान का विषय नही हो सकता। अतः हमारा ज्ञान संस्कारो और विज्ञानों तक ही सीमित है। हम यह नही जानते कि संस्कार कैसे उतपन्न होते है। लॉक ने संस्कारो को वाह्य जड़ पदार्थो के कारण उतपन्न और बर्कली ने ईश्वर की चिदशक्ति के कारण उतपन्न माना। ह्यूम ने दोनों की जड़ ही काट दी और कहा कि जब हमारा ज्ञान प्रत्यक्ष तक ही सीमित है और जब हमे प्रत्यक्ष केवल संस्कारो और उनके विज्ञानों का ही होता है, तो यदि संस्कारो का कोई कारण भी हो,तो वह हमारे लिए अज्ञात ही रहेगा।'

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न्याय बनाम जैन और प्रमा

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ध्यातव्य है कि भारतीय परम्परा में ज्ञान और प्रमा के मध्य भेद है। प्रमा वैध ज्ञान है। ज्ञान जब प्रामाणिक हो जाता है तो वह ज्ञान प्रमा है। प्रश्न यह है कि ज्ञान में प्रमाणिकता कहां से आती है। क्या यह प्रमाणिकता अवबोधन या उपलब्धि की घटना के बाहर से आती है या प्रत्येक संज्ञानात्मक एपिसोड अपने अंदर ही इस प्रमाणिकता को लिए होता है?

न्याय और जैन दोनों ही यह स्वीकार करते है कि अवबोधन मात्र एक प्रक्रिया है, एक घटना मात्र।

किन्तु न्याय और जैन उक्त बात की सहमति के बावजूद आगे की स्थापनाओं में मौलिक रूप से अलग अलग मान्यताएं स्थापित करते हैं।

अवबोधन या संज्ञानात्मक एपिसोड मात्र एक घटना होने के कारण न्याय दर्शन की दृष्टि में इसमें प्रमाणिकता और और अप्रमाणिकता सम्बंधित संज्ञानात्मक एपिसोड के बाहर से आती है।

न्याय की मान्यता है कि कोई भी संज्ञान तभी वैध कहा जा सकता है जब उसमे "सफलप्रवृत्ति जनकत्व" अर्थात उसमे उसमे अर्थक्रियाकरित्व या उससे उस लक्ष्य की प्राप्ति हो जिसकी उससे आशा की जाती है।

ध्यातव्य है कि नैयायिकों की भाँति जैन दार्शनिकों की भी इस बात से सहमति है कि अवबोधन मात्र एक प्रक्रिया है किंतु इसे साथ वह यह भी स्वीकार करते हैं कि सत्य अत्यंत दुर्बोध है। अनन्त धर्मकम होने के कारण प्रत्येक संज्ञात्मक अवबोधन में ही सत्यता और असत्यता दोनों ही गुण उपस्थित है: कोई ज्ञान न तो पूर्ण रूप से सत्य है और न ही पूर्ण रूप से असत्य।

आशय यह कि प्रत्येक अवबोधन अपने संग ही अवबोधन के प्रमा या अप्रमा बनने के गुण लिए होता है और इस निर्धारण के लिए हमे उस संज्ञानत्मक एपिसोड से बाहर जाने की आवश्यकता ही नही है।

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बौद्ध और प्रमा

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द्रष्टव्य है कि नैयायिकों के विचार को जहाँ इस प्रकार-"प्रमाण्यम अप्रमाण्यम उभयम परत:" के सूत्र से अभिव्यक्त किया जा सकता है वही जैनियों के उक्त विचार को "प्रमाण्यम अप्रमाण्यम उभयम स्वतः" से।

बौद्ध विचारको के अनुसार "अप्रमाण्यम स्वतः प्रमाण्यम परत:"

अर्थात बौद्ध यह मानते हैं कि प्रत्येक संज्ञानत्मक अवबोधन अपनी उत्तपत्ति में ही अवैधता लिए होता है और उसकी प्रमाणिकता के लिए बाह्य कारक की सहायता लेनी पड़ती है। सरलता के लिए इसे इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रत्येक ज्ञान में मिथ्यात्व अंतर्निहित होता है और सत्य वाह्य कारणों से प्रतिष्ठित होता है और ये वाह्य कारक है: अविस्मवादित्व और अर्थक्रियाकरित्व।

तातपर्य यह है कि ज्ञान तभी सत्य होता है जब वह जीवन के अनुभव से बाधित नही होता और प्रत्याशित फल की उतपत्ति में सक्षम होता है।

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वेदांती, मीमांसक और प्रमा

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प्रमाण्यम स्वतः अप्रमाण्यम परत:

वेदांती और मीमांसक यह मानते है कि कोई भी संज्ञानत्मक अवबोधन प्रत्येक परिस्थिति में अपनी वैधता का लिए ही हमारे सम्मुख उपस्थित होता है: सारे ज्ञान, सारी उपलब्धियां, सारी कॉग्निटिव एपीसेड्स अपने आप मे वैध है और उनमें अवैधता उस संज्ञानत्मक एपिसोड के बाहर से आती है। वेदांती और मीमांसक यह मानते हैं कि हमारा समस्त अनुभव सहजरूप से प्रमाणिक है क्योकि ज्ञान-ज्ञान है, भ्रम नही। ज्ञान अप्रमाणिक तब बनता है जब उसमे कोई वाह्य व्यवधान उपस्थित होता है। ज्यो ही यह व्यवधान दूर होता है ज्ञान अपने रूप में हमारे सम्मुख उपलब्ध होने लगता है: ब्रह्म हमे उपलब्ध हो रहा है किंतु हमारे और ब्रह्म के मध्य एक व्यवधान माया है। माया के व्यवधान के तिरोहित होते ही हमे सत चित आनंद की उपलब्धि होने लगती है लेकिन इस व्यवधान की उपस्थिति तक हमे उपलब्ध नाम-रूप जगत भी असत नही है क्योकि ज्ञान कभी असत्य होता ही नही अतः जगत सत भी है और असत भी अर्थात जगत मिथ्या है जबकि ब्रह्म विशुद्ध सत।

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चतुष्कोटी न्याय की चार कोटियाँ

★सत

★असत

★सदसत 【उभय】

★नासदासत 【अनुभय】

न सन्नासन न सद सदसदन न चाप्यनुभयात्मकन

चतुष्कोटीविनिर्मुक्तम तत्त्वम मध्यमिका विदु:

(माध्यमकारिका)

बुद्ध की शिक्षाओं से अपने तत्त्व की विवेचना की संगति बिठाने के लिए नागार्जुन ने "दो सत्यों के सिद्धान्त" का प्रतिपादन किया: संवृत्ति और परमार्थ।

चन्द्रकीर्ति के अनुसार संवृत्ति का संकेत लोक व्यवहार की ओर है और अज्ञान इस सत्य का कारण होने के कारण यह "अज्ञानमात्र समुत्थापित सत्य" है।

संवृति भी द्विविध है: लोक संवृत्ति और मिथ्या संवृत्ति।।

ध्यान देने लायक बात यह है कि आचार्य शंकर ने जहां अनान्य दर्शनों की आलोचना की है वहीं शून्यवाद के विषय मे मात्र इतना ही लिखा है कि 'मैं इसकी आलोचना करके इसे कोई महत्व नही देना चाहता हूँ।"

आचार्य शंकर के आलोचक शंकर की शून्यवाद पर इस मौन को सोद्देश्य सिद्ध करते हैं क्योकि उनके अनुसार शून्यवाद की आलोचना से मायावाद की आलोचना होती है जिसका कारण यह है कि शून्यवाद और मायावाद में पर्याप्त साम्य है और इसी कारण आलोचक शंकर को 'प्रच्छन्न बौद्ध' कहते हैं।

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यदि हमे हमारी इंद्रियों से प्योर संवेदन मिल भी रहा हो तो एक थ्योरी तक इसके विकसित होने में कम से कम यह तीन बार कंडिशन्ड होती है:

पहली बार बोध के स्ट्रक्चर द्वारा एक मानसिक प्रत्यय के रूप में।

दूसरी बार भाषिक फ्रेमवर्क से और तीसरी बार

उस पैराडाइम या उन एजम्पशन के फ्रेमवर्क से जिसके अंदर यह एक थ्योरी के रूप में विकसित होती है।

इनमें से पहला कंडिशनिग जैविक और मनोवैज्ञानिक कंडीशनिंग है, दूसरा लिंग्विस्टिक, जो एक प्रकार की सामाजिक-सांस्कृतिक कंडीशनिंग है, जिसमे कुछ अंश जैविक हो भी सकता है (चोम्स्की का यूनिवर्सल ग्रामर) और तीसरी विशुद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक।

इन तीन कंडिशनिंग्स से किसी सेंस डेटा के गुजरने के बाद हमारे ज्ञान पर वस्तुगतता के गुण का आरोपण करना बेमानी है; ज्ञान वस्तुनिष्ठ और ट्रांसेन्डेन्ट हो ही नही सकता।

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पूर्वआधुनिक युग मे ईश्वर मानवीय जगत का केंद्र था, आधुनिक युग मे मनुष्य स्वयम केंद्र है किंतु उत्तरआधुनिक संस्कृति किसी केंद्र में विश्वास ही नही करती क्योकि इसके चिंतन में केंद्र नामक शब्द है ही नही।

आधुनिक युग मे यद्यपि ईश्वर और अलौकिकता के सम्प्रत्ययो का मनुष्य की चेतना में क्षरण हो गया तथापि वस्तुगतता और ट्रांसेन्डेस में उसका विश्वास बचा रहा। इस काल मे सत्य, यथार्थ आदि अब भी वस्तुनिष्ठ और मनुष्य की चेतना के बाहर एक ट्रासेन्डेन्टल सत्ता के रूप में कल्पित किये जाते रहे।

उत्तर आधुनिक युग का आरम्भ उस क्षण से होता है जहाँ से वस्तुनिष्ठता और ट्रांसेन्डेस भी ईश्वर की भांति एक मिथक के रूप में एक्सपोज्ड हो गए।

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जगत और हमारी भाषा मे क्या सम्बन्ध है इस प्रश्न पर विचार करने के लिए हम सर्वप्रथम एक धारणा स्थापित करते हैं कि एक वाह्य जगत है जिसको हम अपनी भाषा से अभिव्यक्त करते हैं।

अर्थात यहाँ हमने दो सत्ताओं की कल्पना की, प्रथम-जगत और दूसरी हमारी भाषा।

इस एजम्पशन के साथ हम आगे बढ़कर देखते हैं कि यह हमें जगत और भाषा के सम्बन्धो की दिशा में किस ओर ले जाता है:

जगत और भाषा के सम्बंध में भी कुछ पूर्वमान्यताओं की स्थापना की जा सकती है-

1 भाषा और जगत में वस्तु और दर्पण का सम्बंध है, अर्थात हमारी भाषा जगत व इसके घटकों को यथा रूप प्रतिबिंबित करती है।

2 भाषा जगत व इसके घटकों को यथारूप प्रतिबिंबित नही करती।

यदि आप मुझसे पूछेंगे की मैं इनमें से किसे वास्तविकता के निकट मानता हूं तो मेरा झुकाव दूसरे की ओर है जिसके निम्न कारण हैं:

यदि कोई वाह्य जगत है जो हमे संवेदना देता है तो यह संवेदना हमारे बोध में अपने प्रदत्त रूप में ही नही प्रकट हो जाती बल्कि यह संवेदना हमे एक व्यवस्तित रूप में मिलती है क्योकि हमारा मन इन सम्वेदनाओं की प्राप्ति के साथ ही सक्रिय हो जाता है और इन्हें एक आकार देकर हमारे बोध में प्रस्तुत करता है।

यहां, इस स्तर पर हमारे अंदर एक कॉग्निटिव फ्रेमवर्क (संज्ञानत्मक ढाँचा) की उपस्थिति से इनकार नही किया जा सकता।

यह ढाँचा हमारे बोध में उन रॉ सेंसेशन (कच्चे सम्वेदनाओं), जो वाह्य जगत से आ रहे है, कितना और किस प्रकार से मोडिफाई करता है, इसमे कितना अपना अंश डालता है हम यह नही जानते तथापि हम यहाँ एक कॉग्निटिव कंडिशनिग देख सकते है जो हमारे बोध में उपस्थित है।

इस विषय पर आप भारतीय परंपरा में हुए विश्लेषण की अधिक जानकारी के लिए निर्विकल्प प्रत्यक्ष बनाम सविकल्प प्रत्यक्ष और बौद्धों का स्वलक्षण बनाम मन की सक्रियता के पश्चात उपस्थित वस्तु देख सकते हैं।

बहरहाल, जो भी हो, इस स्तर पर हमारे पास संवेदन की दृष्टि से एक प्रोसेस्ड संवेदन है लेकिन भाषिक दृष्टि से यह जो कुछ भी है, अभी भाषिक बोध के लिए रॉ मेटेरियल ही है जिसे पुनः लिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क में प्रोसेस्ड होना है और तब वह हमारे भाषा का विषय बनेगा।

ध्यातव्य है कि हमारा लिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क मात्र जैविक रूप से ही प्रभावित नही हो सकता वरन सांस्कृतिक और सामाजिक तत्व भी इसमे होते हैं।

अर्थात, वाह्य जगत से आने वाली संवेदना अब तक (हमारे भाषा की विषय वस्तु बनने तक) दो बार शोधन (?) की प्रक्रिया से गुजरती है और तब जगत विषयक कोई कथन करती है। ऐसी स्थिति में हमारी भाषा जगत का प्रतिबिंब हो ऐसा नही कहा जा सकता।

हमारे बोध में कुछ शब्द हैं, इन शब्दों से सम्बंधित प्रत्यय जीवन की शर्त मे चेतना की संरचना के साथ पहले से ही गूंथे हो सकते हैं या हम इन्हें बाद में अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं।

ऐसे ही कुछ शब्दो की सीमा में एक कॉन्सेप्ट का निर्माण होता है जिसे हम जगत, ब्रह्मांड आदि कहते हैं।

ये शब्द निम्न हैं: क्यों, कहाँ, कब, कितना, कैसे।

सत्ता, अस्तित्व या बीइंग नामक कॉन्सेप्ट (प्रत्ययों) मे यह जो इन शब्दों के उत्तर में इन शब्दों से घिरा है वह 'व्यक्त' या 'अपरा' है।

दुनिया या यथार्थ या वास्तविकता इस "व्यक्त" तक ही नही भी हो सकती है भी और यह सम्भव है कि इनसे परे जाकर हम जो भाव बनाते हैं उसके अनुरूप कोई चीज या चीजें वास्तव में है ही नही क्योकि हमारी चेतना हमारी भाषा पर ऐसे ही कार्य करती हो कि हम किसी कॉन्सेप्ट का एक दूसरा ध्रुवीय विपरीत भी रच सकते हैं और "अव्यक्त" "परा" बस भाषाई खेल हो, हमारी चेतना के प्रत्यय बनाने की क्षमता का साइडइफेक्ट, क्योकि हम उड़ने और घोड़े के प्रत्यय को मिला कर एक "उड़नेवाला घोड़ा" मानसिक रूप से अवश्य रच लेते है जबकि ऐसा आज तक किसी को उड़नेवाला घोड़ा दिखा नही।

हमारे शब्दो कम से कम दो प्रकार के तो हैं ही--प्रथम वस्तु देखकर उनके लिए शब्द तथा द्वितीय ऐसे शब्द जिनके अनुरूप कुछ वस्तुगत तथ्य है ही नही बल्कि यह हमारी इच्छा है: प्रकृति से पलायन है।

घोड़ा पहले प्रकार का शब्द है।

अमरता दूसरे प्रकार का।

पहला शब्द जगत के बारे में कुछ कह रहा होता है जबकि दूसरा शब्द मात्र हमारी इच्छा बता रहा है वह भी सीधे-सीधे नही।

यहाँ एक चीज नोटिस की जा सकती है कि मनस के उस हिस्से के पास, जो सम्वेदनो पर सक्रिय होता है, एक ऐसी शक्ति है जिससे वह कुछ ऐसे मानसिक प्रत्यय रच डालता है जिसका आनुभविक सत्यापन नही हो सकता और हम यह नही कह सकते कि इस प्रत्यय के अनुरूप कोई सत्ता है या नही। अर्थात हम इसे न तो सत्य प्रमाणित कर सकते हैं और न ही असत्य।

ऐसे कथन जिन्हें न तो सत्य अथवा न ही असत्य प्रमाणित किया जा सके उन्हें हम सूचनात्मक नही मान सकते।

यदि किसी वाक्य से सूचनात्मकता का ह्रास हो जाता है तो वह वाक्य इस ह्रास के साथ ही ज्ञानात्मक अणु अथवा ज्ञान प्रदान करने वाले वाक्य नही रह जाते क्योकि सूचनाएं ही व्यवस्तित होकर ज्ञान बनती है।

यद्यपि कुछ प्रत्ययों को अनुभव से प्रमाणित नही किया जा सकता तथापि हम इनका मेंटल इमेज बना सकते हैं। उदाहरण के लिए हम एम कॉन्सेप्ट लेते हैं: उड़ने वाला घोड़ा।

हम उड़ने वाले घोड़े की एक इमेज कमोबेश बना सकते हैं जिसमे हमारा सामान्य घोड़ा पंख लिए हुए है।

यदि हम थोड़ा और आगे बढ़ कर मेंटल से भाषिक आयाम में आए तो यहाँ हम एक ऐसा शब्द निश्चित रूप से रच सकते है जिसके अनुरूप अब हम मानसिक तस्वीर भी नही बना सकते।

उदाहरण के लिए: वह घोड़ा जो हाथी है: घोड़हाथी।

एक बात यहाँ उभर रही है कि यद्यपि हमने आरम्भ संवेदनों से की हम मानसिक प्रत्ययों से होते हुए शब्दों तक अपनी सम्वेदनो से बहुत दूर चले आए: हमने आरम्भ उन दो चीजो से किया था जिन्हें हमरा बोध क्रमशः घोड़ा और हाथी के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर रहा है, फिर हमने एक उड़ने वाले घोड़े का मानसिक प्रत्यय रचा और भाषिक आयाम में हमने घोड़हाथी नामक शब्द भी बना दिया।

अपनी संवेदनों से इस प्रकार दूर चले आने का एक अर्थ यह हो सकता है कि हमारी भाषा वास्तविक जगत कि एक बहुत ही अवास्तविक तस्वीर भी दे सकती है और इस अर्थ में उस प्रकार के शब्द खोखले हैं।

★★

एक सामान्य बोध की समस्त प्रक्रिया में अर्थात सम्वेदनो से होकर इसके भाषिक रूप में बंधने तक और फिर उसके आगे इस बोध का किसी सिद्धान्त बनने तक हमारे संवेदन या इन्द्रिय प्रदत्त कम से कम तीन बार हमारी विषयिनिष्ठता से प्रभावित होते हैं, यह विषयीनिष्ठता जैविक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत होते है। जटिल बोधो में हमारी व्यक्तिगत और सांस्कृतिक-सामाजिक

का स्कोप (प्रक्षेत्र) बोध-प्रक्रिया के विभिन्न घटक-स्तरों तक भी विस्तृत हो जाता है अन्यथा किसी घटना के प्रति चेतन हो कर उसे देखने का क्या अर्थ है सिवाय इसके के बोध की प्रक्रिया में हमारी स्वयम की भी चेतन भागीदारी होती है अर्थात इस स्तर पर हम अपने बोध की अपनी सामान्य प्रवृति अथवा कॉमन सेंस से आगे बढ़ चुके होते हैं।

हमे अपने कॉमन सेंस से बहुधा आगे बढ़ना होता है या इसे दूसरी तरह से कहा जाय तो हमे अपने जन्मना प्राप्त सहज बोध या कॉमन सेंस की समीक्षा करनी पड़ती है। प्रश्न यह है कि हमे ऐसा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है? इसका एजमात्र उत्तर जो मुझे प्रतीत होता है वह यह है कि हमे कुछ ऐसे भी अनुभव मिलने प्राप्त हो जाते हैं जो हमारे सहज बोध से संगति नही रखते:

यदि वह सर्प है तो जैसा कि हमारे दृश्य संवेदन से प्राप्त बोध हमे बता रहा है, उसमें मात्र सर्प के द्रश्य लक्षण ही नही बल्कि अन्य लक्षण भी होने चाहिए किन्तु शनै: शनै: उसमें रज्जु के लक्षण उभरते जाते हैं अतः वह सर्प नही बल्कि रज्जु है और इसका आशय यह है कि हम आँख बंद कर अपने समस्त बोधो को स्वीकार नही कर सकते, साथ ही इसका यह भी आशय है कि हमारी इंद्रियां हमारे सम्मुख भ्रम भी उपस्थित कर सकती हैं। यद्यपि हमारी इंद्रियां हमारे सम्मुख भ्रम उपस्थित कर देती हैं तथापि क्या भ्रम में उपस्थित सत्ता बिल्कुल नवीन होती है या इस सत्ता से जो कि भ्रम में उपस्थित है, हमारा कभी न कभी साक्षात्कार हुआ रहना एक आवश्यक शर्त होती है?

मेरा मानना है कि यह बिल्कुल नवीन सत्ता नही होती बल्कि इससे या इसमे उपस्थित अव्ययों से हमारा कभी न कभी आनुभविक साक्षत्कार आवश्यक होता है।

रहस्यवादी, जिस ईश्वर को देखते हैं उसका रहस्यवादियो द्वारा जाग्रत अवस्था मे देखे गए ईश्वर की छवि या रूप से कन्फर्म होना आवश्यक होता है अन्यथा उन्होंने अवश्य हमे बताया होता कि नही इस मूर्ति के जैसा ईश्वर नही है बल्कि उसकी आंख और नाक ऐसी है।

ठाकुर रामकृष्ण ने कभी कहा, "ना ना काली माँ इस चित्र, इस मूर्ति, इस विग्रह की तरह नही है"।

आशय यह है कि विज्ञानवादियों की यह मान्यता की 'विज्ञप्तिमात्रता ही सत्य है' या 'दृश्यम इति वर्तते' जैसी स्थापनाएं विज्ञान अथवा उन परसेप्शनो के कॉन्टेंट की व्याख्या नही कर पाती और हमे एक वाह्य जगत की आवश्यकताए पड़ती ही पड़ती है क्योकि अन्यथा की स्थिति में हमारे सम्वेदनो की व्याख्या ही नही हो पाएगी जो कि हमारे बोध-प्रक्रिया के आधार में अवस्थित हैं।

★★

 

हमारे बोध में कुछ शब्द हैं, इन शब्दों से सम्बंधित प्रत्यय जीवन की शर्त मे चेतना की संरचना के साथ पहले से ही गूंथे हो सकते हैं या हम इन्हें बाद में अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं।

ऐसे ही कुछ शब्दो की सीमा में एक कॉन्सेप्ट का निर्माण होता है जिसे हम जगत, ब्रह्मांड आदि कहते हैं।

ये शब्द निम्न हैं: क्यों, कहाँ, कब, कितना, कैसे।

सत्ता, अस्तित्व या बीइंग नामक कॉन्सेप्ट (प्रत्ययों) मे यह जो इन शब्दों के उत्तर में इन शब्दों से घिरा है वह 'व्यक्त' या 'अपरा' है।

दुनिया या यथार्थ या वास्तविकता इस "व्यक्त" तक ही नही भी हो सकती है भी और यह सम्भव है कि इनसे परे जाकर हम जो भाव बनाते हैं उसके अनुरूप कोई चीज या चीजें वास्तव में है ही नही क्योकि हमारी चेतना हमारी भाषा पर ऐसे ही कार्य करती हो कि हम किसी कॉन्सेप्ट का एक दूसरा ध्रुवीय विपरीत भी रच सकते हैं और "अव्यक्त" "परा" बस भाषाई खेल हो, हमारी चेतना के प्रत्यय बनाने की क्षमता का साइडइफेक्ट, क्योकि हम उड़ने और घोड़े के प्रत्यय को मिला कर एक "उड़नेवाला घोड़ा" मानसिक रूप से अवश्य रच लेते है जबकि ऐसा आज तक किसी को उड़नेवाला घोड़ा दिखा नही।

हमारे शब्दो कम से कम दो प्रकार के तो हैं ही--प्रथम वस्तु देखकर उनके लिए शब्द तथा द्वितीय ऐसे शब्द जिनके अनुरूप कुछ वस्तुगत तथ्य है ही नही बल्कि यह हमारी इच्छा है: प्रकृति से पलायन है।

घोड़ा पहले प्रकार का शब्द है।

अमरता दूसरे प्रकार का।

पहला शब्द जगत के बारे में कुछ कह रहा होता है जबकि दूसरा शब्द मात्र हमारी इच्छा बता रहा है वह भी सीधे-सीधे नही।

यहाँ एक चीज नोटिस की जा सकती है कि मनस के उस हिस्से के पास, जो सम्वेदनो पर सक्रिय होता है, एक ऐसी शक्ति है जिससे वह कुछ ऐसे मानसिक प्रत्यय रच डालता है जिसका आनुभविक सत्यापन नही हो सकता और हम यह नही कह सकते कि इस प्रत्यय के अनुरूप कोई सत्ता है या नही। अर्थात हम इसे न तो सत्य प्रमाणित कर सकते हैं और न ही असत्य।

ऐसे कथन जिन्हें न तो सत्य अथवा न ही असत्य प्रमाणित किया जा सके उन्हें हम सूचनात्मक नही मान सकते।

यदि किसी वाक्य से सूचनात्मकता का ह्रास हो जाता है तो वह वाक्य इस ह्रास के साथ ही ज्ञानात्मक अणु अथवा ज्ञान प्रदान करने वाले वाक्य नही रह जाते क्योकि सूचनाएं ही व्यवस्तित होकर ज्ञान बनती है।

यद्यपि कुछ प्रत्ययों को अनुभव से प्रमाणित नही किया जा सकता तथापि हम इनका मेंटल इमेज बना सकते हैं। उदाहरण के लिए हम एम कॉन्सेप्ट लेते हैं: उड़ने वाला घोड़ा।

हम उड़ने वाले घोड़े की एक इमेज कमोबेश बना सकते हैं जिसमे हमारा सामान्य घोड़ा पंख लिए हुए है।

यदि हम थोड़ा और आगे बढ़ कर मेंटल से भाषिक आयाम में आए तो यहाँ हम एक ऐसा शब्द निश्चित रूप से रच सकते है जिसके अनुरूप अब हम मानसिक तस्वीर भी नही बना सकते।

उदाहरण के लिए: वह घोड़ा जो हाथी है: घोड़हाथी।

एक बात यहाँ उभर रही है कि यद्यपि हमने आरम्भ संवेदनों से की हम मानसिक प्रत्ययों से होते हुए शब्दों तक अपनी सम्वेदनो से बहुत दूर चले आए: हमने आरम्भ उन दो चीजो से किया था जिन्हें हमरा बोध क्रमशः घोड़ा और हाथी के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर रहा है, फिर हमने एक उड़ने वाले घोड़े का मानसिक प्रत्यय रचा और भाषिक आयाम में हमने घोड़हाथी नामक शब्द भी बना दिया।

अपनी संवेदनों से इस प्रकार दूर चले आने का एक अर्थ यह हो सकता है कि हमारी भाषा वास्तविक जगत कि एक बहुत ही अवास्तविक तस्वीर भी दे सकती है और इस अर्थ में उस प्रकार के शब्द खोखले हैं।

 

 

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इतिहास आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जिसके आगे भविष्य में कथाकार, रचनाकार, कवि आदि शब्दो से इनकी आज की भाववचकता खत्म हो जाएगी और इनका एक नया भाववाचक अर्थ स्थापित होगा या यह भी सम्भव है कि ये अब मात्र एक वस्तुवाचक शब्द बनेंगे। हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है, बल्कि इतिहास की गति ही ऐसी है।

पहले अंकों में, अक्षरों में दैवीयता थी किन्तु आज उनकी वह भाववाचकता समाप्त है।आज वर्णमाला या सम्बंधित ध्वनियां लगभग भावात्मक उदासीनता लिए हमारे बोध में प्रस्तुत होती हैं किंतु ऐसा सदैव नही रहा होगा। आरम्भ में इनमे मनुष्य दैवीयता देखता होगा, आरम्भ में इनका एक सुपरनेचुरल पक्ष भी मनुष्य के इनके बोध में रहा होगा। तब यह आज की भांति सेक्युलर चरित्र के न रहे होंगे जैसा, यदि इनके दार्शनिक अध्ययन की विषय वस्तु को छोड़ दिया जाय, ये आज हैं और मात्र स्वयम की ओर ही इशारा करते हुए न तो किसी अन्य आयाम और लोक के वासी हैं और न ही इनका विस्तार संसार व प्राकृतिक जगत के परे हैं। ध्यातव्य है कि दैविक और अ(अति)प्राकृतिक चरित्र मात्र इन ध्वनियों और अक्षरों के साथ ही सम्बद्ध न था बल्कि अंक का भी चरित्र तब दैवीय था; तब अंक, ध्वनि और इनका अक्षरों के माध्यम से प्रतीकीकरण सेकर्ड (पवित्र) चीज थी।

यूनान के पाइथागोरस का सम्प्रदाय का सम्बंध अंकों से ही था।अक्षर, स्फोट, शब्द ब्रह्म आदि भारतीय परंपरा के शब्द भी इस बात की निश्चित गवाही देते हैं।

हमारे पूर्वजो के लिए ऐसा क्यों था इस प्रश्न को फ्रेजेरियन फ्रेमवर्क से देख कर समझा जा सकता है। सर जेम्स जीन फ्रेजर एक नृवैज्ञानिक थे जिन्होंने आदिम समाज का विश्लेषण करते हुए जादू और धर्म का विश्लेषण प्रस्तुत किया और बताया कि जादू वास्तव में एक बन्ध्या कला और अपरिष्कृत विज्ञान था जिसमे यह सिद्धान्त अंतर्निहित था कि समान चीजें समान चीजों को जन्म देती हैं। फ्रेजर ने इसे होमियोपैथिक मैजिक कहा है।

होमियोपैथिक मैजिक के द्वारा हमारे आज के समाज की भी कई अन्धविश्वासो की व्याख्या की जा सकती है यथा यह मान्यता की रात्रि में सर्प शब्द का उच्चारण नही करना चाहिए अन्यथा सर्प आ जाएगा।

यहाँ इस अंधविश्वास में यह इम्प्लाइड है कि समान समान को जन्म देता है साथ ही इसमे यह बात भी पूर्ण आग्रह के साथ उपस्थित है कि शब्द सर्प से उच्चरित ध्वनि और सर्प में एक सम्बन्ध है, बल्कि दोनो एक प्रकार से एक ही चीजें हैं इसलिए

शब्द सर्प भौतिक सर्प को खींच कर यहां ला सकता है।

यदि तन्त्रो-मन्त्रो पर विचार किया जाय तो इनमें भी वही अज्मनपशन, वही बात इम्प्लाइड है कि फलां ध्वनि फ़लाँ देवता अथवा उसकी शक्ति से जुड़ी होने (वस्तुतः एक ही चीज) के कारण उस देवता द्वारा वांछित कार्य करा सकता है या करा देता है।

जारी--

 

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बाईबल, स्त्री-पुरुष का मनोविज्ञान और समाजशास्त्र।

कुछ सामी (सेमेटिक) लोरों (lores) में ईव के पूर्व लिलिथ आदम (एडम) की पत्नी है। पहले स्त्री और पुरुष आदम और ईव नही बल्कि आदम और लिलिथ हैं लेकिन लिलिथ कालांतर में शैतान बन जाती है और ईश्वर इस बार एक नई स्त्री की सरचना उन्ही उपादानों (मैटेरियल्स) से नही करता जिनसे उसने आदम को रचा है क्योकि वह लिलिथ के संदर्भ में यह देख चुका है कि इसके परिणाम क्या हैं।

अबकी बार वह इस नई स्त्री, ईव की रचना आदम की पसलियों से करता है।

यहाँ हो क्या रहा है? इस मिथक को हम इंटरप्रेट कैसे करें?

यह मिथक वस्तुतः पितृसत्ता की स्थापना के बाद, पितृसत्ता द्वारा अपने परिप्रेक्ष्य से स्त्री और पुरुष के सम्बन्धो की कहानी है।

ईव वस्तुतः पितृसत्ता की आदर्श स्त्री है; और इसलिए वह अपनी उतपत्ति उन्ही उपादानों में नही ढूंढ सकती जिन उपादानों से तथा जिन परिस्थितियों में ईश्वर ने आदम (एक पुरुष) का निर्माण किया है।

ईव की रचना ईश्वर इसलिए करता है कि आदम अकेला है और रचता भी कैसे है, तो आदम की पसलियों से ताकि वह वह अपनी उतपत्ति, अपनी रचना के लिए सदैव आदम (पुरुष) की आभारी रहे।

(कथा ऐसी भी तो हो सकती थी कि आदम का निर्माण इसलिए हुआ कि प्रथम स्त्री अकेली थी अतः ईश्वर ने उसकी पसलियों से आदम का निर्माण किया)

“Lay Under Me Woman” – Adam Said. But The First Female Refused, And She Was Not Eve.

(“The Alphabet Of Ben Sira“)

ईव, आदम की पसलियों से जन्मी ईव, पितृसता की नारी है वहीं लिलिथ पितृसत्ता से मुक्त है। लिलिथ का जन्म आदम की ही तरह के उपादानों से हुआ।

लिलिथ ने काम के दौरान आदम के नीचे रहने से इनकार कर दिया क्योकि वह खुद को आदम से कमतर नही मानती थी।

इस विद्रोह की पृष्ठभूमि में ही काम के दौरान स्त्री के नीचे होनो की स्थिति को मिशनरी अवस्था कहते हैं--पितृसत्ता को तुष्ट करती कामक्रिया की अवस्था!

यदि दोनो के सापेक्षिक अवस्थाओ पर शक्ति-संरचना के संदर्भ में देखे, जो कि नही देखा जाना चाहिए, तो काम ही नही वरन हर क्रिया में पुरुष की विशेष स्थिति उसके अपनी शक्ति का प्रदर्शन और आरोपण के भ्रम से स्त्री और पुरूष दोनो को भर सकता है और इस भ्रम पर आधरित दोनो के मध्य सम्बन्ध परिभाषित होते हुए पुष्ट, तुष्ट, विद्रोह, अपराधबोध आदि हो सकते हैं, और हुए भी हैं।

ईव के पूर्व आदम की पत्नी लिलिथ थी किन्तु लिलिथ ने पितृसत्ता से विद्रोह किया और उसे शैतान की सहायिका के रूप में चित्रित किया जाने लगा; वह पुरुषों को पाप के लिए उकसाती है जो पुरूष के पतन का कारण बनता है।

आदम अब अकेला था अतः ईश्वर ने आदम की पसलियों से एक स्त्री को बनाया: ईव।

ईव पितृसत्ता की आदर्श स्त्री थी, उसको अब अपने होने के कारण, उपादान और निमित दोनो ही कारणों, आदम (पुरुष) के लिए जीना था।

पितृसत्ता अब भी लिलिथ के डर को अपने मन से निकाल न पाई थी और दूसरी तरफ उसे ईव की शक्ति का भी भान था अतः उसने निषिद्ध फल, शैतान, आदम का पतन और स्वर्ग से निष्कासन के मिथक रचे और स्त्री को हमेशा के लिए कमतर कर देने का प्रयास किया। हमेशा के लिए स्त्रीत्व के साथ यह भाव गूंथ देने की कोशिश की के स्त्री पुरुष को नरक की ओर ले जाती है।

पितृसत्ता इस मिथक को रचने के बाद सम्भवतः अपराधबोध से भर गई और उसने फिर से एक नया मिथक रचा जिसमे मनुष्य को उसकी मुक्ति की ओर ले जाने वाला यद्यपि स्त्री के रज से तो आएगा किन्तु उसमे पुरुष के वीर्य को आवश्यकता न होगी।

मनुष्यो के इतिहास में मातृसत्ता कभी रही भी है यह तार्किक नही लगता। सत्ता एक सामाजिक सन्दर्भ का शब्द है, सत्ता शब्द अपने साथ शक्ति का भाव लाता है तथा शक्ति यद्यपि एक स्त्रीलिंग शब्द है तथापि शक्ति का धारक, यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो, अपरिष्कृत व भौतिक स्तर पर पुरुष ही रहा है।

आदिम समाज मे पुरुष को ही शिकार के लिए निकलना पड़ता था, पुरुष ही हिंसक जीवो से टकराता था, पुरुष ही हिंसक जीवो को मार डालता था और वही हिंसक जीवो के द्वारा मार भी दिया जाता था।

शक्ति और शक्तिमान, बल और बलशाली की अवधारणा का विकास उसकी और भोजन की प्रतीक्षा करती कंदराओं मे स्त्रियों के मध्य निश्चित ही न हुआ होगा अपितु इस धारणा ने जंगलों में हिंसक पशुओ के बीच पहली बार जन्म ली होगी।

पहली बार पुरुष को स्त्री के बलशाली होने की बात तब पता चली होगी जब वह अपनी पेट की भूख को शांत करने के उपरांत काम की भूख को शांत करने स्त्री के पास गया होगा और स्त्री ने उसे नकार दिया होगा।

एक स्त्री ने उस महाबली को नकार दिया जिसने न जाने कितने हिंसक पशुओ का शिकार किया है और प्रमाणस्वरूप उनकी खोपड़ी, उनकी खाल धारण कर रखा है!

तथापि, यह बल सत्ता के लिए नही है, यह बल पुरुष के लिए भयावहता, आश्चर्य और पवित्रता का भाव पैदा कर सकती है किंतु यह बल मातृसत्ता को पितृसता के समानांतर स्थापित नही कर सकती है; यह बल स्त्री को या तो प्रेतनी अथवा देवी के रूप में ही स्थापित कर सकता है--या तो वह लिलिथ हो सकती है या मदर मेरी।

 

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मानुष की चेतना के अनेक बुलबुलों में से एक बुलबुला है ईश्वर, यह फूटने के लिये ही बना है। तुम इसे बुद्धि से इस जगत के कारण रूप में स्थापित करते हो लेकिन शीघ्र ही यह तुम्हारे अनुभव को परेशान करने लगता है और अब तुम कहने लगते हो कि स्वयम ईश्वर भी ऋत से बंधा है।

क्या तुम्हारा ह्रदय मेरी तरह इस ईश्वर से परे उस ईश्वर को नही ढूंढता जो इस कार्य कारण के अटल नियम को, इस ऋत को भी तोड़ दे?

लेकिन हमारी लिखित-अलिखित किसी मे स्मृति में कोई इस जगत में उपस्थित कार्य-कारण को आज तक नही तोड़ पाया है--जानते हो क्यों?

क्योकि ईश्वर वास्तव में है ही नही, वह तुम्हारी ही चेतना में जन्मा एक बुलबुला है जिसे तुम अपनी बुद्धि से कभी यहाँ तो कभी वहाँ बिठाते हो।

फिर भी मेरी तरह क्या तुम भी उस ईश्वर को नही चाहते जो पांसों के खेल में चाहे जो अंक आए उस अंक का मान छह करदे जिससे गोटी के निकलने का नियम है क्योंकि अंक छह से ही यदि गोटी को निकलना है और मेरे पांसे फेकने पर छह आने की केवल 1/6 प्रायिकता है, यदि इसे मैं स्वीकार कर लूं तो फिर मैं ईश्वर का क्या करूँगा?

मुझे तो चमत्कार करने वाला ईश्वर चाहिए क्योंकि मेरी नजर में ईश्वर का अर्थ ही है चमत्कार करने वाला, वह ईश्वर नही जो अपने ही नियम को न तोड़ पाए।

यदि सब कुछ कर्म से निर्धारित है तो मेरा तेरी प्रार्थना करना, तेरा नाम लेना तो व्यर्थ है क्योकि तुममे चमत्कार की शक्ति नही है और मैं प्रार्थना ही चमत्कार के लिए करता हूँ

 

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किसी क्षेत्र की टोपोग्राफी, जियोमोरफ़ॉलोजी, जियोलॉजी कैसी है यह निश्चित रूप से उस क्षेत्र विशेष की धार्मिक चेतना के ऐतिहासिक विकास की दिशा को निर्धारित करेगा।

गिब्ब्स ने अपनी पुस्तक "इस्लाम" मे यद्यपि इस बात का विरोध किया है कि अरब में मोनोथिज्म (एकदेववाद) अरब के विस्तृत रेगिस्तान का मानवीय चेतना की प्रतिक्रिया है तथापि धर्मिक चेतना के विकास के मनोवैज्ञानिक इतिहास में इस तथ्य को नकारा नही जा सकता कि यह इस चेतना के विकास की दिशा क्या होगी उसमें टोपोग्राफी, जियोमोरफ़ॉलोजी एक प्रमुख भूमिका निभाएगी।

ध्यातव्य है कि धार्मिक चेतना का अर्थ यहाँ मान्य मात्र सात्विक कर्मकांडीय क्रियाकलाप नही हैं बल्कि मनुष्य की कल्पना में आए सुपरनेचुरल के भय से जन्मा उसका तुष्टिकरण, विस्मय आदि के आधार पर उसके द्वारा संपादित क्रियाएं भी हैं।

भूत, प्रेत, डायन, बिसाही, जादू-टोना आदि को भी धार्मिक चेतना के विकास के मनोवैज्ञानिक इतिहास से बाहर नही रखा जा सकता।

सर फ्रेजर और उनका स्कूल तो इनसे सम्बंधित चीजो से ही उदात्त धार्मिक भावनाओं की उतपत्ति स्वीकार करते हैं।

फ्रेजर के इस मत की पुष्टि होती झारखण्ड में साफ साफ दिखती हैं जहाँ कई समाजो में अभी भूता से देवा का स्प्लिट नही हुआ है, धार्मिक कर्मकांड का जादुई कर्मकांड से अलगाव नही हुआ है।

जैसे आरम्भ में मनुषयो के हथियार-औजार एक थे वही चीज धार्मिक चेतना के साथ भी हुई है: आरम्भ में वह सुपरनेचुरल कल्याणकारी भी है और विध्वंसकारी भी, वह प्रेत भी है और देवता भी; उससे जुड़ना भी बाध्यता है और उससे दूर रहना भी है:- बहुत सी बलियाँ आज भी इसलिए दी जाती हैं कि वह जिसे यह बलि दी जा रही है, बलि देने वाले और उसके परिवार से दूर रहे।

यदि आप उपरोक्त दृष्टि से झारखण्ड के समाज की धार्मिक चेतना और मैदानी इलाकों के समाज की धार्मिक चेतना का तुलनात्मक अध्यनन करते है तो झारखण्ड में भूत-प्रेत, जादू-टोना ज्यादा है; यहां हर चीज का भूता-देवा है: जंगल का, पहाड़ का, खोह का, जल का, खाई का, घर का, खेत का, जल का, शिकार का----यद्यपि मैदानी इलाकों में भी वनदेवी, डीहबाबा, घर के देवता आदि है लेकिन दोनो जगहों के देवताओं के स्वरूप में अंतर हैं: झारखण्ड के देवता ज्यादा उग्र हैं, ये ज्यादा अधिक तुष्टिकरण चाहते हैं, ये ज्यादा व्हिमेजिकल हैं; झारखण्ड के समाज के सेंस ऑफ सुपरनेचुरल में चीजे अभी भी दूसरी ओर हैं: अतः यहाँ ज्यादा डायन, बिसाही, सोखा, ओझा आदि हैं।

अब इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन इन कारणों में यहाँ की टोपोग्राफी, यहाँ की जियोलॉजी, यहाँ की जियोमोरफ़ॉलोजी ने एक महती भूमिका निभाई है इससे इनकार नही किया जा सकता।

आदिम समाज जिसकी विशेषता ही हर जगह "प्रकृति से डरा हुआ" होना है, उसके डरने के लिए मैदान के सपाट से की तुलना में यहाँ ज्यादा चीजे हैं। आज हम पत्थरो, खोह, खाई को जैसे देख लेते हैं यहाँ का आदिम समाज उन्हें नही देख पाता होगा: उसे मिगमेटाईट डराता होगा, टिगमेटाइट फॉलडिंग्स डराते होंगे, पोटेशियम का पिघल कर पत्थरो पर जम जाना और लाल रक्त सा दिखना डराता होगा, इस लाल के बगल में अचानक से एकदम काले रंग के लावा के जमाव से बना अचानक से झांकता चट्टान डराता होगा। फौल्टिंग, फोल्डिंग, शियरिंग आदि के कारण उभरी अजीब अजीब आकृतियां उसे डराती होंगी, चारो तरफ सूखा लेकिन एक जगह पत्थरो के बीच से बुलबला फेंकना उसे डराता होगा।

 

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यह पूर्वपाषाणयुग है। मनुष्य अभी कृषिकर्म नही सीखा है, वह अभी शिकार करके जीता है लेकिन उसने दैवीयता की भावना और दैवीयता के स्वरूप को अपनी व्यक्तिगत तथा सामूहिक चेतना में स्थापित कर लिया है--उसकी चेतना में उभरा यह स्वरूप एक स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया की परिणीति है या यह उसकी उस जगत-दृष्टि की असफलता के कारण पनपी है जिसे भविष्य में कुछ नृवैज्ञानिक 'जादू' कहने वाले हैं, इस विवाद में हमे नही पड़ना तथापि प्रसंगवश इन दो जगत-दृष्टियों का सामान्य परिचय यहाँ आवश्यक है। जब तक हमारे यह आदिम पूर्वज शिकार पर जाने के पूर्व के इस अनुष्ठान के, जिसे हम देखने यहाँ रुके हैं, लिए सामग्री एकत्र कर रहे हैं, तब तक हम इन दो आदिम जगत-दृष्टियों से परिचित हो जाते हैं:--

प्रथम जगत-दृष्टि का नाम जादू है और द्वितीय का धर्म, हालांकि ये दोनों ही नामकरण हमारे किए हुए हैं, इन संज्ञाओं के साथ गुंथी हुई भाववाचकता भी हमारी है, लेकिन इसके लिए हमें ग्लानि भी नही होनी चाहिए आखिर हम अपने इन पुरखो से काल और संस्कृति से बहुत दूर बैठे है साथ ही हमे यह जगत दृष्टिया विरासतन 'सरवाइवल' के रूप मे मिले हैं जिसको हमारे आदिम पूर्वज हमारे साथ साझा नही करते।

जादू में कर्मकांड प्रमुख हैं, क्योकि इस जगत-दृष्टि में मनुष्य इस विश्वास के साथ जीता है कि यह कर्मकांड उसके द्वारा प्रत्याशित घटनाओं को यथार्थ में फलित करेंगे ही--यदि इन कर्मकांडो और इनके द्वारा आशा किए गए फल के बीच कोई अलौकिक, अभौतिक कर्ता या कारक है तो भी वह इन कर्मकांडो की शक्ति से बंधा हुआ है और इनका वह अतिक्रमण नही कर सकता।

यदि आज की शब्दावली में कहें तो--देवता मन्त्रो से बंधे हुए हैं-मंत्र देवता को सृष्ट करते हैं--मन्त्रो का अतिक्रमण उसके देवता भी नही कर सकते।

लेकिन, दूसरी जगत दृष्टि में देवता इन मन्त्रो और कर्मकांडो से न तो बंधे हैं और और न ही अनुबंधित हैं--यहाँ देवता प्रमुख हैं, मंत्र और कर्मकांड नही क्योकि इस जगत-दृष्टि में आप देवता को इन चीजों से बाध्य नही कर सकते।

देवता को किसी भी प्रकार से चुकी आप बाध्य नही कर सकते अतः इस जगत-दृष्टि में मंत्र देवताओं को आदेश देने की बजाय स्तुतिपरक हैं।

यदि जादू कोई वास्तविक समाजशास्त्रीय व नृवैज्ञानिक कोटि है (जैसा फ्रेजर व टेलर मानते हैं) तो समकालीन समाजों की धार्मिक चेतना में इन दोनों कोटियों से अभिव्यक्त परिघटनाओं, चिंतन पद्धति का मिश्रण हो चुका है। जादू अपने आर्किक, प्रीस्टिन रूप में तो शायद ही हमे प्राप्त हो, हाँ आदिम धर्म के लक्षण बहुधा विविध धार्मिक कर्मकांडो में अवश्य प्राप्त हो जाते हैं।

जादू से यहाँ जादूगरों की इन्द्रजालिक क्रियाओ मात्र का बोध हो सकता है अतः हम इसके लिए अब से सामासिक पद जादू-मंतर का प्रयोग करेंगे। यह जादू-मंतर टेलर और फ्रेजर के शोधों में धर्म का बीज रहा है क्योकि टेलर धर्म की जो न्यूनतम परिभाषा करते है उसके अनुसार धर्म मे एक अलौकिक कर्ता (ईश्वर-बोंगा, देवा-भूता सरीखे) की आवश्यकता अपरिहार्य रूप से होती है जबकि जादू-मंतर के आर्किक रूप में यह कर्ता अनुपस्थित होता है। जादू-मंतर में इस प्रकार के कर्ता का आना या तो इस जगत-दृष्टि का धर्म की ओर संक्रमण या धार्मिक चेतना द्वारा इस दृष्टि के एडल्ट्रेशन का सूचक और प्रतिफल है।

हमारे यह पूर्वज जिनके साथ छुप कर हम कुछ समय व्यतीत करने आए हैं, इसी मिश्रित चेतना की आदिम अवस्था मे जीते हैं-इनकी धार्मिक चेतना, धर्म-जादू है।

मनुष्यो के सांस्कृतिक विकास के इतिहास को पढ़ने के लिए हमे प्रायः इस प्रकार के युग्म बनाने ही पड़ते हैं क्योकि मनुष्य अतीत में इन युग्मित, अन्डिफ्रेंशीएटेड मानसिक-भौतिक कारकों के साथ जीता था: आरम्भ में उसके औजार ही हथियार भी थे: औजार-हथियार, उसके देवता मेलोवेलेंट भी थे और बेनोवेलेंट भी: माना, बोंगा या देवा-भुता या हमारे समाज मे बचा उनका यह चरित्र, ब्रह्म बाबा और पहलवान बाबा।

आगे---

 

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परम्पराओ द्वारा खांचो में ढाली गयी व्यक्ति की चेतना से निष्पन्न अनुभव तथा किसी भी प्रकार की ऐसी अनुबंध मुक्त चेतना में उतरते अनुभव के बोध का द्वंद निश्चित रूप से प्रत्येक व्यक्ति को परेशान करता होगा, किन्तु इसको व्यक्त कौन करेगा अथवा किस तीव्रता से इसको अनुभूत करेगा अथवा करेगा भी या नही करेगा यह बात व्यक्तितवो को पृथक करती है। इस पृथकता के कारण क्या हैं इस बात को बेहतर तरीके से तो मनोवैज्ञानिक ही बता सकते हैं, वैसे भी इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करना कभी मेरा उद्देश्य नही रहा है यद्यपि समय-समय पर प्रसंगवश इस ओर मेरी चेतना भटक ही जाती है।

मेरा असल उद्देश्य उपरोक्त द्वंद्व को व्यक्त करना है, सत्यनिष्ठा से कहूँ तो अपने द्वंद को लेकिन, इसकी अर्जेंसी, इस भावना की तीव्रता कभी इस स्तर की नही रही कि इसको ठोस रूप दिया जाय। मेरी यह कामना विविध सोशल मीडिया पर मेरे द्वारा दिये गए इसके तरल रूप से ही तुष्ट होती रही लेकिन फिर एक दिन मैं वहाँ खड़ा था जहां यह द्वंद अधिकतम था। यहाँ मैंने एक नग्न यथार्थ का अनुभव किया; यह अनुभव उस डायलेक्टिक्स की पराकाष्ठा थी, और अब चीजों को ठोस रूप देना अपरिहार्यता और इसी के निमित्त मैंने इन सब पर लिखने का संकल्प किया, यहां मैंने सत्ता में एक अराजकता देखा था।

अराजकता! पशुओ को जगत की अराजकता का भान नही है। मनुष्य नामक पशु भी जब तक पशु बना रहता है, जगत विषयक ऑर्डर, प्रयोजन आदि चीजे में मुग्ध रहता है। मनुष्य जब वास्तव में मनुष्य बनता है तो वह जगत में, अपने जीवन मे, इस समस्त में,भूमा में,विराट में अराजकता देख लेता है लेकिन सबसे पहले तो सत्ता की स्थापना आवश्यक है। सत्ता, विराट, भूमा जिसके द्वैत में हम खड़े हैं और हमारा आमने-सामने होना इस द्वैत का निर्माण कर रहा है।

मैं इस द्वैत को अहम अहम ब्रह्मास्मि लिखते हुए नही मिटा सकता क्योंकि मैंने वैसा कभी अनुभूत ही नही किया है और मैं अपने अनुभवो से द्रोह नही कर सकता।

बहरहाल, सर्वप्रथम सत्ता की उपस्थति के तर्क, सत्ता जो मैं नही हूँ लेकिन मेरे बोधो में बोध के आरम्भिक अवयय उसी से आते हैं:

एक सामान्य बोध की समस्त प्रक्रिया में अर्थात सम्वेदनो से होकर इसके भाषिक रूप में बंधने तक और फिर उसके आगे इस बोध का किसी सिद्धान्त बनने तक हमारे संवेदन या इन्द्रिय प्रदत्त कम से कम तीन बार हमारी विषयिनिष्ठता से प्रभावित होते हैं, यह विषयीनिष्ठता जैविक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत होते है। जटिल बोधो में हमारी व्यक्तिगत और सांस्कृतिक-सामाजिक विषयनिष्ठता का स्कोप (प्रक्षेत्र) बोध-प्रक्रिया के अन्य उन विभिन्न घटक-स्तरों तक भी विस्तृत हो जाता है, जहाँ तक यह ये एक सरल बोधात्मक प्रक्रिया में न थे, अन्यथा किसी घटना के प्रति चेतन हो कर उसे देखने का क्या अर्थ है सिवाय इसके के बोध की प्रक्रिया में हमारी स्वयम की भी चेतन भागीदारी होती है, अर्थात इस स्तर पर हम अपने बोध की अपनी सामान्य प्रवृति अथवा कॉमन सेंस से आगे बढ़ चुके होते हैं क्योकि यहां हम बोध प्रक्रिया में अपनी व्यक्तिनिष्ठता का पक्षेत्र (स्कोप) बढ़ा चुके होते हैं।

हमे अपने कॉमन सेंस से बहुधा आगे बढ़ना होता है या इसे दूसरी तरह से कहा जाय तो हमे अपने जन्मना प्राप्त सहज बोध या कॉमन सेंस की समीक्षा करनी पड़ती है। प्रश्न यह है कि हमे ऐसा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है? इसका एजमात्र उत्तर जो मुझे प्रतीत होता है वह यह है कि हमे कुछ ऐसे भी अनुभव मिलने प्राप्त हो जाते हैं जो हमारे सहज बोध से संगति नही रखते:

यदि वह सर्प है तो जैसा कि हमारे दृश्य संवेदन से प्राप्त बोध हमे बता रहा है, उसमें मात्र सर्प के द्रश्य लक्षण ही नही बल्कि अन्य लक्षण भी होने चाहिए किन्तु शनै: शनै: उसमें रज्जु के लक्षण उभरते जाते हैं अतः वह सर्प नही बल्कि रज्जु है और इसका आशय यह है कि हम आँख बंद कर अपने समस्त बोधो को स्वीकार नही कर सकते, साथ ही इसका यह भी आशय है कि हमारी इंद्रियां हमारे सम्मुख भ्रम भी उपस्थित कर सकती हैं। यद्यपि हमारी इंद्रियां हमारे सम्मुख भ्रम उपस्थित कर देती हैं तथापि क्या भ्रम में उपस्थित सत्ता बिल्कुल नवीन होती है या इस सत्ता से जो कि भ्रम में उपस्थित है, हमारा कभी न कभी साक्षात्कार हुआ रहना एक आवश्यक शर्त होती है?

मेरा मानना है कि यह बिल्कुल नवीन सत्ता नही होती बल्कि इससे या इसमे उपस्थित अव्ययों से हमारा कभी न कभी आनुभविक साक्षत्कार हुआ होना आवश्यक होता है।

रहस्यवादी, जिस ईश्वर को देखते हैं उसका रहस्यवादियो द्वारा जाग्रत अवस्था मे देखे गए ईश्वर की छवि या रूप से कन्फर्म होना आवश्यक होता है अन्यथा उन्होंने अवश्य हमे बताया होता कि नही इस मूर्ति के जैसा ईश्वर नही है बल्कि उसकी आंख और नाक ऐसी है।

ठाकुर रामकृष्ण ने कभी कहा, "ना ना काली माँ इस चित्र, इस मूर्ति, इस विग्रह की तरह नही है"।

आशय यह है कि विज्ञानवादियों की यह मान्यता की 'विज्ञप्तिमात्रता ही सत्य है' या 'दृश्यम इति वर्तते' जैसी स्थापनाएं विज्ञान अथवा उन परसेप्शनो के कॉन्टेंट की व्याख्या नही कर पाती और हमे एक वाह्य जगत की आवश्यकताए पड़ती ही पड़ती है क्योकि अन्यथा की स्थिति में हमारे सम्वेदनो की व्याख्या ही नही हो पाएगी जो कि हमारे बोध-प्रक्रिया के आधार में अवस्थित हैं।

अर्थात, यद्यपि हमारा बोध विषयनिष्ठता से बहुत ज्यादा प्रभावित रहता है तथापि बोध में एक वाह्य वस्तुगत अवयय अवश्य होता है।

 

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थॉमस कुंन के स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रेवोल्युधन का एक अध्ययन 1

सर्वप्रथम थॉमस कुन की थीसिस 'स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक एवोल्यूशन' में प्रयुक्त दो मुख्य शब्द 'पैराडाइम' और 'इनकोमेंसुरेबलिटी' के लिए एक हिंदी शब्द की तलाश ताकि हिन्दी मे थॉमस कुंन के विचारों का सही मूल्यांकन किया जा सके लेकिन उसके पूर्व इस बात का स्पस्टीकरण भी आवश्यक है कि आखिर कुंन के विचारों की समीक्षा करने की आवश्यकता क्या पड़ गई ताकि आने वाली चीजों का एक परिप्रेक्ष्य बनाया जा सके।

परिप्रेक्ष्य, वास्तव में कुन ने अपने शोध में इसी संकल्पना के इर्द-गिर्द 'प्रतिमान' शब्द को रचा है और यह दर्शाने का प्रयास किया है कि विज्ञान, प्रबोधन का विज्ञान, आधुनिकता का विज्ञान वास्तव में वस्तुपरक नही है बल्कि वह एक परिप्रेक्ष्य में जन्म लेता है और इस प्रकार विज्ञान के मूल्य-निरपेक्ष व वस्तुगत होने के विचार भ्रामक हैं।

कुन के इन निष्कर्षो का उतरराधुनिक चिंतन में बहुत उपयोग किया गया है और यह दर्शाने का प्रयास किया गया है विज्ञान के रूप में आधुनिक संस्कृति जिस मेटा-नैरेटिव में विश्वास करती थी वह वास्तव में एक मिथक है; विज्ञान का मात्र अर्थक्रियाकरित्व मूल्य है और इस प्रकार यह हमें जगत की कोई वास्तविक तस्वीर नही देता।

हमारी चेतना में सत का अर्थक्रियावादी सिद्धान्त कोई नया नही है, यद्यपि पश्चिम में विलियम जेम्स के दर्शन में इस दर्शन को बीसवी शताब्दी में प्रमुखता मिली है, बौद्ध यही बात हजारों वर्ष पूर्व कर रहे थे, 'अर्थकरियकरित्व सत लक्षणम'।

विषय वस्तु पर आगे बढ़ने से पूर्व सत विषयक अन्य कसौटियों की बात कर लेना भी प्रासंगिक है क्योकि हमारा पूरा डिस्कोर्स, इन्ही कुछ शब्दों के पारित: होने वाला है: सत्य, विज्ञान, यथार्थ----।

सत्य क्या है, हम इसे कैसे परिभाषित करें दर्शन की यह एक प्रमुख समस्या रही है: सत्य के बारे में हमारा विश्लेषण हमे यह बताता है कि यह निश्चित रूप से ज्ञान के साथ एक मूल्य के रूप में जुड़ा हुआ है:- पश्चिम की ज्ञानमीमांसा में तो ज्ञान को अनिवार्यत: सत्य होना चाहिए, क्योकि यदि कोई विश्वास सत्य नही है तो वह ज्ञान नही है।

भारतीय परंपरा में ज्ञान की यह संकल्पना नही रही है, इस परंपरा में ज्ञान बोध है, हमारी चेतना की उपलब्धि है जो अपनी प्रस्तुति के साथ सत्य भी हो सकती है और मिथ्या भी। सत्य ज्ञान प्रमा है जबकि मिथ्या ज्ञान अप्रमा। प्रमा को उपलब्ध कराने वाले प्रमाण हैं। अर्थात, अप्रमा प्रमाणों से पुष्ट नही होते।

यहाँ तक तो ठीक है किंतु एक प्रश्न उठाया जा सकता है कि ज्ञान में ऐसा क्या होना चाहिए ताकि वह प्रमा बन सके? कमोबेश सत्य के विषय मे पश्चिम दर्शन भी उस गुण अथवा मूल्य की पहचान कर लेना चाहता है जिसकी उपस्थितिति किसी विश्वास को सत्य बनाते हुए उसे ज्ञान बना दे।

परम्परागत रूप से सत्य की तीन कसौटियां स्वीकार की गई हैं:

कोरोस्पोंडेंस, कोहरेंस व प्रागेटिक।

कोरोस्पोंडेंस सिद्धान्त के अनुसार कोई निर्णय तब सत्य होता है जब इस निर्णय के अनुरूप जगत में वैसी सत्ता हो। यह सिद्धान्त ज्ञानमीमांसिय वस्तुवाद में विश्वास करता है, अर्थात इसके अनुसार ज्ञेय की सत्ता न तो ज्ञाता पर निर्भर करती है और न ही ज्ञान पर। यदि सामान्य रूप से कहा जाय तो हमसे परे एक जगत है जिसे हम जानते हैं, यदि हमारे निर्णय के अनुरूप चीज का जगत में आनुभविक सत्यापन नही होता तो वह निर्णय सत्य नही है।

ध्यातव्य है कि इस सिद्धान्त में बहुधा ज्ञाता जगत का पैसिव रिसीवर बन जाता है जबकि ज्ञान की प्रक्रिया में, जिसके द्वारा ज्ञेय स्थापित होता है, ज्ञाता की विषयिनिष्ठ चेतना को किसी भी प्रकार नकारा नही जा सकता।

विषयिनिष्ठ चेतना की ज्ञान में उपस्थिति को अलग-अलग विचारकों ने अलग-अलग प्रकार से देखा है; बर्कली के लिए सत्ता दृश्यता है, योगाचार बौद्ध के अनुसार विज्ञप्तिमात्र ही सत्य है (वसुबन्धु)। कांट अपने विश्लेषण में इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि ज्ञान की प्रक्रिया में हमारे बोध के रूप या सांचे सक्रिय हो जाते हैं और तभी कोई सम्वेदन हमारे ज्ञान का विषय बनता है। अर्थात हम वास्तविकता को कभी जान ही नही सकते, कांट ने इसे न्युमोना या थिंग इन इटसेल्फ कहा है।

अब सवाल यह है कि यदि हम थिंग इन इटसेल्फ को कभी जान ही नही सकते तब तो सत्यता की कसौटी के रूप में कोरोस्पोंडेंस को रखना बेमानी है। अब क्या किया जाय की सत्य का निर्धारण हो?

कान्ट को सत्ता की तार्किकता में विश्वास है, जगत अराजक नही है अतः सत्यता की कसौटी भले ही कोरोस्पोंडेंस न हो कोहरेंस को सत्यता की कसौटी माना जा सकता है। यहाँ यह ध्यान देना चाहिए कि सत्यता की इस प्रकार की कसौटी स्वीकार करने वाले ज्ञान को एम तंत्र मानते हैं जिसके समस्त अव्यय आपस मे सुव्यवस्त्ति होते हैं।

यहाँ हम देख सकते हैं कि सत्य का कोहरेंस सिद्धान्त कम से कम एक पूर्वमान्यत को अवश्य स्वीकार करता है: जगत का स्वरूप तार्किक है तथा, ज्ञान अपने अव्ययों की सामंजस्यपूर्ण संगति में ही होता है।

सत्यता का यह सिद्धान्त बहुत हद तक कोरोस्पोंडेंस को सत्यता की कसौटी मानने से उपजी समस्या का समाधान कर देता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन भी जब बंद घड़ी से ज्ञान के आदर्श सीमा की उपमा दे रहे होते हैं तो कमोबेश वह ज्ञान की सुसंगता के सिद्धान्त की भी हामी भर रहे होते हैं। आइंस्टीन के शब्दों में हमने घड़ी नही खोली किंतु घड़ी हमारे लिए काम कर रही है, घड़ी से सम्बंधित हमारी अवधारणाओं का तंत्र काम कर रहा है अर्थात हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट है, इसमें प्रेडिक्टिव पावर है तथा यह हमारे आनुभविक जगत की घटनाओं की व्याख्या कर दे रहा है बावजूद इसके की हम घड़ी के अंदर नही झाँक सकते। (इवोल्यूशन ऑफ फ़िजिक्स)

सत्य के निकष का सुसंगतता सिद्धान्त अपनी धारणा, जिसके आधार पर वह अपना सिद्धान्त विकसित करता है, में ही इस तथ्य को स्वीकार कर आगे बढ़ता है कि सत्य का स्वरूप तार्किक होता है, यह इस बात को भी स्वीकार करता है कि सत्ता का स्वरूप भी तार्किक है। यह सिद्धान्त यद्यपि संवादिता विषयक सत्य के सिद्धान्त को उसके परम्परागत स्वरूप में स्वीकार नही करता तथापि यह उन धारणाओं के आपसी सम्बन्ध में, जिनसे सत्य का निर्माण हुआ है, सत्ता की ही तार्किकता का विस्तार या प्रतिरूप स्वीकार करते हुए एक दृष्टि से तार्किकता की संवादिता को स्वीकार कर लेता है।

यदि हम उन अवधारणाओं को, जिनसे ज्ञान एक तंत्र के रूप में प्रस्तुत होता है यदि मात्र करण भी मान लें जैसा कि ज्ञेय सत्ताओं के विषय मे करणवाद सम्बन्धी मत स्वीकार करता है तो हमे सत्य की सुसंगता के सिद्धान्त में विश्वास के कारण , इन अवधारणाओं अथवा करणो के मध्य उपस्थित सम्बन्धो के विषय मे यह मानना पड़ेगा कि यह सत्ता की तार्किकता से संवादिता रखते हैं, क्योकि अन्यथा की स्थिति में हमारी यह अवधारणाएं सत्य नही बन सकतीं।

प्रश्न है कि इस बात को स्वीकार करने का की यह सम्बन्ध सत्ता की ही संरचना के प्रतिनिधि हैं क्या आधार है? साथ ही हम यह बात भी दावे के साथ नही कह सकते कि सत्ता अपने मौलिक रूप में तार्किक ही है।

अतः अब हमें सत्य की कसौटी के रूप में एक नया निकष, अर्थक्रियाकरित्व को लेना पड़ता है।

यहाँ अब एक नई समस्या उतपन्न होती है और वह यह कि सत्य का अर्य्हक्रियावादी सिद्धान्त सत्य को उस सिहांसन से नीचे गिरा देता है जिसपर यह अब तक बैठा था क्योकि इस सिद्धान्त के साथ सत्य अब साध्य नही बल्कि एक साधन बन जाता है। एक और समस्या उठाई जाती है कि क्या हो यदि हमारी हमारी असत्य धारणाए, मिथ्या विश्वास भी फल दे रहे हों? इस स्थिति में तो सत्य को अर्थक्रियाकरित्व से संयुक्त कर देना सत्य से अपनी आंखें बंद कर लेना है।

जारी---

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हमारे बोध में कुछ शब्द हैं, इन शब्दों से सम्बंधित प्रत्यय जीवन की शर्त मे चेतना की संरचना के साथ पहले से ही गूंथे हो सकते हैं या हम इन्हें बाद में अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं।

ऐसे ही कुछ शब्दो की सीमा में एक कॉन्सेप्ट का निर्माण होता है जिसे हम जगत, ब्रह्मांड आदि कहते हैं।

ये शब्द निम्न हैं: क्यों, कहाँ, कब, कितना, कैसे।

सत्ता, अस्तित्व या बीइंग नामक कॉन्सेप्ट (प्रत्ययों) मे यह जो इन शब्दों के उत्तर में इन शब्दों से घिरा है वह 'व्यक्त' या 'अपरा' है।

दुनिया या यथार्थ या वास्तविकता इस "व्यक्त" तक ही नही भी हो सकती है भी और यह सम्भव है कि इनसे परे जाकर हम जो भाव बनाते हैं उसके अनुरूप कोई चीज या चीजें वास्तव में है ही नही क्योकि हमारी चेतना हमारी भाषा पर ऐसे ही कार्य करती हो कि हम किसी कॉन्सेप्ट का एक दूसरा ध्रुवीय विपरीत भी रच सकते हैं और "अव्यक्त" "परा" बस भाषाई खेल हो, हमारी चेतना के प्रत्यय बनाने की क्षमता का साइडइफेक्ट, क्योकि हम उड़ने और घोड़े के प्रत्यय को मिला कर एक "उड़नेवाला घोड़ा" मानसिक रूप से अवश्य रच लेते है जबकि ऐसा आज तक किसी को उड़नेवाला घोड़ा दिखा नही।

हमारे शब्दो कम से कम दो प्रकार के तो हैं ही--प्रथम वस्तु देखकर उनके लिए शब्द तथा द्वितीय ऐसे शब्द जिनके अनुरूप कुछ वस्तुगत तथ्य है ही नही बल्कि यह हमारी इच्छा है: प्रकृति से पलायन है।

घोड़ा पहले प्रकार का शब्द है।

अमरता दूसरे प्रकार का।

पहला शब्द जगत के बारे में कुछ कह रहा होता है जबकि दूसरा शब्द मात्र हमारी इच्छा बता रहा है वह भी सीधे-सीधे नही।

यहाँ एक चीज नोटिस की जा सकती है कि मनस के उस हिस्से के पास, जो सम्वेदनो पर सक्रिय होता है, एक ऐसी शक्ति है जिससे वह कुछ ऐसे मानसिक प्रत्यय रच डालता है जिसका आनुभविक सत्यापन नही हो सकता और हम यह नही कह सकते कि इस प्रत्यय के अनुरूप कोई सत्ता है या नही। अर्थात हम इसे न तो सत्य प्रमाणित कर सकते हैं और न ही असत्य।

ऐसे कथन जिन्हें न तो सत्य अथवा न ही असत्य प्रमाणित किया जा सके उन्हें हम सूचनात्मक नही मान सकते।

यदि किसी वाक्य से सूचनात्मकता का ह्रास हो जाता है तो वह वाक्य इस ह्रास के साथ ही ज्ञानात्मक अणु अथवा ज्ञान प्रदान करने वाले वाक्य नही रह जाते क्योकि सूचनाएं ही व्यवस्तित होकर ज्ञान बनती है।

यद्यपि कुछ प्रत्ययों को अनुभव से प्रमाणित नही किया जा सकता तथापि हम इनका मेंटल इमेज बना सकते हैं। उदाहरण के लिए हम एम कॉन्सेप्ट लेते हैं: उड़ने वाला घोड़ा।

हम उड़ने वाले घोड़े की एक इमेज कमोबेश बना सकते हैं जिसमे हमारा सामान्य घोड़ा पंख लिए हुए है।

यदि हम थोड़ा और आगे बढ़ कर मेंटल से भाषिक आयाम में आए तो यहाँ हम एक ऐसा शब्द निश्चित रूप से रच सकते है जिसके अनुरूप अब हम मानसिक तस्वीर भी नही बना सकते।

उदाहरण के लिए: वह घोड़ा जो हाथी है: घोड़हाथी।

एक बात यहाँ उभर रही है कि यद्यपि हमने आरम्भ संवेदनों से की हम मानसिक प्रत्ययों से होते हुए शब्दों तक अपनी सम्वेदनो से बहुत दूर चले आए: हमने आरम्भ उन दो चीजो से किया था जिन्हें हमरा बोध क्रमशः घोड़ा और हाथी के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर रहा है, फिर हमने एक उड़ने वाले घोड़े का मानसिक प्रत्यय रचा और भाषिक आयाम में हमने घोड़हाथी नामक शब्द भी बना दिया।

अपनी संवेदनों से इस प्रकार दूर चले आने का एक अर्थ यह हो सकता है कि हमारी भाषा वास्तविक जगत कि एक बहुत ही अवास्तविक तस्वीर भी दे सकती है और इस अर्थ में उस प्रकार के शब्द खोखले हैं।

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इतिहास आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जिसके आगे भविष्य में कथाकार, रचनाकार, कवि आदि शब्दो से इनकी आज की भाववचकता खत्म हो जाएगी और इनका एक नया भाववाचक अर्थ स्थापित होगा या यह भी सम्भव है कि ये अब मात्र एक वस्तुवाचक शब्द बनेंगे। हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है, बल्कि इतिहास की गति ही ऐसी है।

पहले अंकों में, अक्षरों में दैवीयता थी किन्तु आज उनकी वह भाववाचकता समाप्त है।आज वर्णमाला या सम्बंधित ध्वनियां लगभग भावात्मक उदासीनता लिए हमारे बोध में प्रस्तुत होती हैं किंतु ऐसा सदैव नही रहा होगा। आरम्भ में इनमे मनुष्य दैवीयता देखता होगा, आरम्भ में इनका एक सुपरनेचुरल पक्ष भी मनुष्य के इनके बोध में रहा होगा। तब यह आज की भांति सेक्युलर चरित्र के न रहे होंगे जैसा, यदि इनके दार्शनिक अध्ययन की विषय वस्तु को छोड़ दिया जाय, ये आज हैं और मात्र स्वयम की ओर ही इशारा करते हुए न तो किसी अन्य आयाम और लोक के वासी हैं और न ही इनका विस्तार संसार व प्राकृतिक जगत के परे हैं। ध्यातव्य है कि दैविक और अ(अति)प्राकृतिक चरित्र मात्र इन ध्वनियों और अक्षरों के साथ ही सम्बद्ध न था बल्कि अंक का भी चरित्र तब दैवीय था; तब अंक, ध्वनि और इनका अक्षरों के माध्यम से प्रतीकीकरण सेकर्ड (पवित्र) चीज थी।

यूनान के पाइथागोरस का सम्प्रदाय का सम्बंध अंकों से ही था।अक्षर, स्फोट, शब्द ब्रह्म आदि भारतीय परंपरा के शब्द भी इस बात की निश्चित गवाही देते हैं।

हमारे पूर्वजो के लिए ऐसा क्यों था इस प्रश्न को फ्रेजेरियन फ्रेमवर्क से देख कर समझा जा सकता है। सर जेम्स जीन फ्रेजर एक नृवैज्ञानिक थे जिन्होंने आदिम समाज का विश्लेषण करते हुए जादू और धर्म का विश्लेषण प्रस्तुत किया और बताया कि जादू वास्तव में एक बन्ध्या कला और अपरिष्कृत विज्ञान था जिसमे यह सिद्धान्त अंतर्निहित था कि समान चीजें समान चीजों को जन्म देती हैं। फ्रेजर ने इसे होमियोपैथिक मैजिक कहा है।

होमियोपैथिक मैजिक के द्वारा हमारे आज के समाज की भी कई अन्धविश्वासो की व्याख्या की जा सकती है यथा यह मान्यता की रात्रि में सर्प शब्द का उच्चारण नही करना चाहिए अन्यथा सर्प आ जाएगा।

यहाँ इस अंधविश्वास में यह इम्प्लाइड है कि समान समान को जन्म देता है साथ ही इसमे यह बात भी पूर्ण आग्रह के साथ उपस्थित है कि शब्द सर्प से उच्चरित ध्वनि और सर्प में एक सम्बन्ध है, बल्कि दोनो एक प्रकार से एक ही चीजें हैं इसलिए

शब्द सर्प भौतिक सर्प को खींच कर यहां ला सकता है।

यदि तन्त्रो-मन्त्रो पर विचार किया जाय तो इनमें भी वही अज्मनपशन, वही बात इम्प्लाइड है कि फलां ध्वनि फ़लाँ देवता अथवा उसकी शक्ति से जुड़ी होने (वस्तुतः एक ही चीज) के कारण उस देवता द्वारा वांछित कार्य करा सकता है या करा देता है।

जारी--

 

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धार्मिक दृष्टि मे वर्तमान सदैव पाप से भरा होता है क्योकि धर्म जिस संरचना पर टिका है उसमें मिथकीय स्वर्णिम अतीत फिर उस अतीत का नष्ट हो भटका वर्त्तमान और भटके वर्त्तमान से एक मिथकीय स्वर्णिम भविष्य की बात होती है।

(*यह स्थिति मार्क्सवाद के साथ भी है जब वह आदिम समाजवाद व भविष्य के वैज्ञानिक समाजवाद की बात करता है)

विकसित धर्मो में यह "मुक्तिशास्त्रीय संरचना" अवश्य होती है। आदिम धर्मो मे भी सम्भवतः इसकी उपस्थिति हो।

मुक्तिशात्रीयता हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध, जैन, यहूदी, ईसाई सबमे हैं।

हिन्दू धर्मो में वह स्वर्णिम अतीत अविद्या और माया के कारण आता है और वह स्वर्णिम भविष्य मोक्ष और मुक्ति में कल्पित है जबकि अब्राहमिक धर्मो मे आद्यपाप और ईश्वरीय साम्राज्य की स्थापना के रूप में।

मिथक दृष्टि में भी पुराने लोग आश्चर्यजनक शक्तियों से युक्त होते हैं।

मिथकीय-दैवीय व तत्त्वमीमांसिय दृष्टि काल का दो बार आइडियलजेशन करती है अतीत और भविष्य, लेकिन फिजिकल प्लेन पर उसे इस बात को सिद्ध करने की उसके पास तकनीक भी नही होती और करना भी नही चाहती।

आइडियलजेशन ओफ़ फिजिकल फेनोमेना अर्थात भौतिक घटनाओं का आदर्शीकरण विज्ञान के लिए भी आवश्यक है किंतु इस आइडियलाइजेशन को पुनः फिजिकल प्लेन या भैतिक तल पर उतार कर जांचने का कार्य मात्र हमारे संज्ञानत्मक विकास के वैज्ञानिक अवस्था मे होता है, मिथकीय-दैवीय व तत्त्वमीमांसिय अवस्था मे इसकी जांच के बजाय श्रद्धा और शास्त्रसम्मतता के द्वारा इसमे बल भरने का प्रयास किया जाता है क्योकि फिजिकल प्लेन पर इन दृष्टियों से प्राप्त आइडियलजेशन व उससे व्युत्प्न्न चीजे काम नही करतीं।

भौतिकवाद को गाली देना दैवीय-मिथकों व तत्त्वमीमांसिय मोड मे चिंतन कर रहे व उसी मे जी रहे लोगो की बाध्यता है क्योकि भौतिकवाद उनके आदर्श व सिद्धान्त को नग्न कर देता है; एक बार नग्न हुए नही की उन्हें समाज का पावर रिलेशन उनके विरुद्ध चला जाएगा!

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मैं: "प्रश्न है कि हमारे जीवन मे, हमारे जीवन दर्शन में शून्यता उतपन्न कैसे हो गया, हम जीवन्तता से निराशा की ओर कैसे बढ गये, क्या इसमे विज्ञान का दोष है जिसने नदियो से देवी को, चाँद से मामा को, धरती से माता को-----ब्रह्मांड या जगत से ईश्वर और उसकी लीला को निष्कासित करते हुए इन्हें किसी गहरे अंधेरे महासागर की तह में फेंक दिया जिसका मनुषयो पर यह परिणाम हुआ कि मनुष्य अपनी मनुष्यता ही खो बैठा?"

प्रेतनी: "ना! कत्तई नही!

दरअसल तुमने मनुष्यता की परिभाषा ही गलत गढ़ ली थी और इस दोषपूर्ण परिभाषा को केंद्र में रखकर हमने अपने जीवन दर्शन और जीवन मूल्य रच डाले थे लेकिन एक ना एक दिन तुम्हारा इन मूल्यों के, इस जीवन दर्शन के खालीपन से सामना होना ही था, तुम्हे अपने मायाजाल की निरर्थकता मालूम होनी ही थी और तब तुम्हे अपने ही हाथों से इन मूल्यों और जीवन-दर्शन की हत्या करनी ही पड़ेगी--नीत्शे का पागल चीखता है, "हमने ईश्वर को मार डाला, हमारे हाथ उसके खून से रंगे हुए हैं।"

अजीब है न, तुमने जिसे जन्म दिया था,जीवन का केंद्र बनाया था उसे ही मार डाला, और इसलिए मार डाला कि तुमने एकांत में यह देख लिया था कि यह वह नही है जिसे तुम जन्म देना चाहते थे, यह सर्वशक्तिमान नही बल्कि अनेक रोगों से ग्रस्त कमजोर कुछ है और यह तुम्हे भी कमजोर करता जाता है।

मैं: "हा! जीवन बहुत स्वार्थी चीज है, मात्र स्वार्थी ही नही बल्कि अंधा भी, अंधा इसलिए कि इसे जीने के अलावा और कुछ दिखता ही नही लेकिन आखिर क्यों?"

प्रेतनी: "हम सब वासना की गठरिया हैं विस्फोटक गठरियाँ। वास्तव में जीवन ही वासनात्मक है। वासना न हो तो जीवन न होगा। ना, मैं प्रजनन की बात नही कर रही और न ही काम वासना की; वासना केवल काम वासना नही होती। धन की वासना, शक्ति की वासना, ज्ञान की वासना--वासनाएं अनन्त हैं लेकिन अंततः ये सब एक हैं और सब वासना ही है। हमारे दृश्य जगत के पीछे वासना ही है अन्यथा यह जगत न होता; यह जगत, यह दुनिया भी वासना के विस्फोट से ही जन्मी है।"

मैं:-"फिर देवता कौन है, प्रेतनी, दिव्यता क्या है, लिली, इस तमस मे, इस अंधकार में वह चमकता क्या है, वह द्युति कैसी है?'

प्रेतनी:--"दरअसल तुम सब वासनाओं के प्रेत ही जन्मते हो लेकिन शीघ्र ही तुम्हारा सामना समाज द्वारा रचित महाप्रेत, ईश्वर से होता है जिसकी तुष्टि के लिए तुम्हे अपने प्रेत के एक बहुत बड़े हिस्से की बलि चढ़ानी होती है और यह बचा हुवा हिस्सा ही आदमी कहलाता है।

महाप्रेत को तुष्ट करना तुम्हारी बाध्यता है क्योकि उसके तुष्ट होने के बाद ही समाज तुम्हे स्वीकार करता है और तुम्हे समाज की जरूरत है।

समाज की अपनी वासनाएं है लेकिन उन्हें वह प्रेत कहना पसंद नही करता बल्कि वह अपनी वासनाओं को ईश्वर कहता है। उसने इस शब्द से एक माया रच रखी है ताकि उसके प्रेत के आगे बाकियों के प्रेत उन्हें पापी और छोटे दिखें जिससे उनके प्रेतों का बलिदान करवाया जा सके।

ओ मानुष यह चमक, यह द्युति वही है और यदि सच सुनना चाहो तो इस ज्वाला की ज्योति, यह द्युति तुम्हारी वासनाओं के बलिदान रूपी हवि से ही बढ़ती है।"

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मुझे पता है कि मेरी चेतना मुझे लेकर किसी अनजान गहराइयों तक जाने वाली है, मुझे पता है कि अब मेरी चेतना मुझे जो दिखाएगी वह उस दुनियावालो के लिए जिसमे अभी मेरा मस्तिष्क टिका हुआ है, असामान्यता की स्थिति हैं लेकिन यह स्थिति मेरे चेतना के लिए स्वाभाविक है। मेरी चेतना बार बार इस स्थिति को प्राप्त करना चाहती है लेकिन मैंने ही इसे अप्राकृतिक तरीके से रोक रखा है। हमारी प्राकृतिक स्थिति पीड़ा की है, प्राकृतिक अवस्था में हमे पीड़ा सहते रहना है और तब तक सहते रहना है जब तक की वह हमें मार न डाले। उसने हमें मारने के लिए ही रचा है; मुझे मात्र एक व्यक्ति, एक जीव का नाम बताओ जिसको उसने नही मारा। मुझे पता है कि अब तुम वापस कहोगे की मैं ही एक ऐसे व्यक्ति या जीव का नाम बताऊं जिसको उसने नही जन्म दिया।

चलो हम जीवन और मृत्यु की इस दो पोलेरिटी को भूल जाते हैं और इन दो ध्रुओं के बीच जो अवस्थित है उस पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, यह हमारी बाध्यता भी है क्योंकि न जन्म पर और न ही मृत्यु पर ही हमारा वश चलता है यद्यपि हमारा हमारी मृत्यु पर हमारे जन्म से अधिक वश है; हम अपनी मर्जी से जन्म नही ले सकते किन्तु अपनी मर्जी से मर ज़रूर सकते हैं तथापि।

तथापि, चलो हम करार करते हैं कि मैं जन्म के पूर्व की दुनिया को जानने की कोशिश नही करूँगा और तुम मृत्यु के बाद की दुनिया में ताक-झांक नही करोगे। यह हमारी ताक-झांक करने की आदत ही तो हमे आमने सामने खड़ी कर जाती है; जन्म के पहले की शून्यता मेरे जन्म और मृत्यु के बीच जो उपस्थित है उसे प्रभावित करने लगता है जबकि तुम मृत्यु के बाद की शून्यता से घबराकर इनके बीच से पलायन कर कही और भाग जाना चाहते हो। अब ये न कहना की तुम भगोड़े नही हो, कम से कम मुझसे तो बिलकुल न कहना। अगर तुम भगोड़े नही होते तो मुझे तुम यहाँ नही मिलते, इस जगह जहाँ मैं छुपकर बैठा हुआ हुँ। मैंने देखा है कि यहाँ जो भी है, वह सब असल में छुपकर की बैठे हैं और उनका भगोड़ापन उन्हें परेशान न करे इसके निमित्त अपनी अपनी दृष्टियों को सजाते रहते हैं, अपनी मिथ्या दृष्टियों का श्रींगार करते रहते हैं।

★★

जब पहली बार मैं उसकी हत्या करने को उठा था तो मैंने उसे मारा नही बल्कि उसे अपवित्र कर दिया। मुझे लगा की उसे अपवित्र कर मैं उसके बेकार हिस्से से उसके जीवित और ईश्वरीय हिस्से को अलग कर रहा हूँ। मैंने उसके समस्त हिस्सो को टटोला और देखा कि इनमे से कौन सा हिस्सा मुझे मेरे स्पर्श का उत्तर देता है लेकिन उसका समस्त हिस्सा एक सा था, ठंढा और मरता हुआ, उसके किसी हिस्से में जीवन की ताप न थी, यद्यपि उसका कोई हिस्सा मरा भी न था, उसका कोई हिस्सा इसलिए नही मरा था क्योकि मैं अंदर ही अंदर कहीं न कहीं यह चाह रहा था कि वह न मरे क्योकि मैं उसके अभाव में जीवन से डरता हूँ यद्यपि वह मेरे जीवन को ही खाता चला जाता है और दोनो ही स्थितियों में असल मे मरना मुझे ही होता है।

आनन्दमय प्रज्ञा में वह पागल चिल्लाता है; ईश्वर मर गया, ईश्वर मर गया। दरअसल वह चीख रहा होती है कि उसका ईश्वर में विश्वास मर गया लेकिन यह तो उसकी बात है। मेरा ईश्वर अभी मरा नही है यद्यपि वह मर रहा है लेकिन मुझे मालूम है वह कभी नही मरेगा और यदि मर भी गया तो वह मेरे सामने हमेशा प्रेत बनकर उपस्थित रहेगा और अपने हिस्से की मेरे जीवन की मांग मेरे जीवन पर थोपता रहेगा और मैं उसका हिस्सा उसे देता रहूंगा। मेरा ईश्वर मरने को होता है लेकिन मरता नही है। कल भी जीवन के वीराने के खंडहर अनुभवों की एक काली कोठरी मे मेरी बुद्धि ने उसे मारा था लेकिन मैं उसे पूरी तरह नही मार पाया: मैंने अंदर ही अंदर यह भी चाहा कि वह जीवित रहे, वह जीवित रहे क्योकि वह ईश्वर है।

यह पहली बार नही था, इसके पूर्व भी मैं उसे कई जगह मारने का प्रयास कर चुका हूं लेकिन हर बार मैं स्वयम ही उसे जीवित भी कर देता हूँ। मैं उसे इसलिए जीवित नही कर देता की मैं सर्वशक्तिमान हूँ और कुछ भी कर सकता हूँ बल्कि मुझे इसलिये उसे जीवित करना होता है कि मैं निर्बल हूँ, जीवन के हाथों निर्बल।

★★★

 

 

ज्ञानमीमांसा और मनोविज्ञान

हमारी संवेदनाएं, वाह्य और आंतरिक इंद्रियों के माध्यम से हमारे मनस में उपस्थित होती रहती हैं। इनमें कुछ सम्वेदनाएँ वाह्य होती है और कुछ आंतरिक। पुनः असामान्यता की स्थिति में छद्म सम्वेदनाएँ भी उपस्थित होती हैं जिनकी रचना हमरा मस्तिष्क करता है। सम्भव है कि कुछ सम्वेदनाएँ बिना बुद्धि की पकड़ में आए हमारे मनस में उपस्थित हों यथा यह उन प्राणियों में होता है जिनका मष्तिष्क अभी बुद्धि के लिए बिकसित नही हुवा है। मस्तिष्क के विकास के साथ बुद्धि अस्तित्व में आती है और फिर यह सम्वेदनाओं पर सक्रिय होती है। सम्वेदनाओं पर बुद्धि की सक्रियता के पश्चात या साथ ही मष्तिष्क की कोई और शक्ति भी सक्रिय होती है जो इस कॉम्प्लेक्स पर सक्रिय होती है। सम्भवतः इसी शक्ति में हमारी भाषा का स्रोत भी उपस्थित है जिसके द्वारा अब इस कोपम्लेक्स को व्यक्त किया जा सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया को यदि एक रेखाचित्र के माध्ययम से व्यक्त किया जाय तो यह निम्नवत होंगी-

इस रेखाचित्र से कई सम्भावनाओ को पकड़ा जा सकता है--

एक वाह्य जगत है जिससे हमें उद्दीपन प्राप्त होते है किंतु सारे उद्दीपन संवेदना नही बनते बल्कि इनमें से कुछ उद्दीपनो में ही वह शक्ति होती है जो हमारी ज्ञानेंद्रियों को क्रियारत कर सकता है। वैसे उद्दीपन जिनमे यह शक्ति होती है वही मात्र सम्वेदनाएँ बनती हैं।

हमारा विकास चूंकि वैसे जीवों से होकर हुवा है जिनके पास बुद्धि नही थी और यह सम्वेदनाएँ उन्हें सीधे अनुभूत होती थी अतः हमारी कुछ सम्वेदनाएँ उन पर बिना बुद्धि के क्रियाशील हुए हमारी अनुभति का हिस्सा बन जाती हैं।

दार्शनिक भाषा मे सम्भवतः यही निर्विकल्प प्रत्यक्ष है।

बची हुई सम्वेदनाओं पर बुद्धि क्रियाशील होती हैं और इन्हें नाम, रूप, आकार, जाति आदि कोटिया प्रदान किया जाता है और इसके बाद यह अनुभूति या बोध के लिए उपलब्ध होती हैं।

यह भी सम्भव है, जैसा कि मनोरोगों में होता है कि

या तो सम्वेदनाएँ वाह्य और आंतरिक यथार्थ में हो ही नही और तब भी कहीं से उपस्थित हो और इन पर बुद्धि कार्य कर आगे अनुभूति के लिए प्रेषित कर रही हो और उसकी अनुभूति भी हो रही हो (साइकोसिस) या उतनी इंटेंस संवेदना न हो जिस इंटेंसिटी के साथ वह अनुभूत हो रही हो या जिस इंटेंसिटी के साथ संवेदना उपस्थित है वह उस इंटेंसिटी के साथ अनुभूत न हो रही हों (न्यूरोसिस)।

पुनः यह भी सम्भव है कि वाह्य या आंतरिक वस्तु या घटना से जो संवेदनों का प्रवाह प्राप्त हो रहा है वह व्यक्ति विशेष के संदर्भ में औसत से इस मामले में विचलित हो गया हो कि कँहा और किस क्षण तक वह सीधे अनुभूत हो रही है और कँहा और किस क्षण और स्तर तक उनपर बुद्धि क्रियाशील होकर उसे आगे अनुभूति/बोध के लिए प्रेषित कर रही है।

असामान्यता की स्थिति में यह भी सम्भव है कि सम्वेदनाओं पर बुद्धि सक्रिय ही न हो पा रही हो या कम सक्रिय होती हो जो किसी घटना विशेष के संदर्भ में भी हो सकता है या व्यक्ति के साथ यह हमेशा की बात हो यथा एक मंदबुद्धि।

बोध/अनुभूति के समरूप और बराबर भाषिक रूप हो भी सकता है और नही भी हो सकता। जब यह भाषिक रूप बोध/अनुभूति के बराबर नही होता तो इसे भाषा व्यक्त नही कर पाती या यदि करती है तो भाषा के सर्वमान्य नियम टूटने लगते हैं और शब्द अर्थ से परे जाने लगते हैं यथा रहस्यवादी अनुभव का वर्णन।

ज्ञानमीमांसा ज्ञान विषयक अध्ययन है जिसमे ज्ञान के सम्प्रत्यय, ज्ञान के स्रोत, ज्ञान की कसौटियां, इसकी सीमाएं आदि का अध्ययन होता है। जिस ज्ञान, जिस बोध को भाषा मे व्यक्त ही न किया जा सके उसका अध्ययन करना लगभग असंभव है अतः रहस्यात्मक ज्ञान ज्ञाननमीमांसा का विषय नही बनता। पुनः ज्ञानमीमांसा का विषय मनुष्येतर प्राणियों का ज्ञान(?) या वह ज्ञान (?) जिसमे संवेदना और बुद्धि या इनमें से कोई एक सांख्यकीय दृष्टि से विचलित हो अथवा कोई ऐसा ज्ञान जिसके विषय मे यह दावा किया गया हो कि इसमें कोई संवेदना उपस्थित नही है या यह इन सारी प्रक्रियाओं से हटकर आई है, नही है।

अतः ज्ञानमीमांसा के अंतर्गत जो ज्ञान है वह संवेदना-बुद्धि--भाषा, इन तीन तंतुओं से बनी रस्सी है।

बुद्धि संवेदना से विशिष्ट है क्योकि यह चेतना के विकास क्रम में दूसरे स्तर पर इमर्ज होती है किन्तु इसे भी (प्रथम स्तर पर संवेदना और तृतीय स्तर पर भाषा इमर्ज होती है) इनपुट चाहिए-यह इनपुट उसे संवेदनों से भी मिल सकता है , स्वयम बुद्धि से भी और यह स्वयं से मिले प्रदत्तो पर भी क्रियाशील होकर उन्हें भाषिक रूपों में परिवर्तित कर उन्हें ज्ञान बना सकती है।

जगत और हमारी भाषा मे क्या सम्बन्ध है इस प्रश्न पर विचार करने के लिए हम सर्वप्रथम एक धारणा स्थापित करते हैं कि एक वाह्य जगत है जिसको हम अपनी भाषा से अभिव्यक्त करते हैं।

अर्थात यहाँ हमने दो सत्ताओं की कल्पना की, प्रथम-जगत और दूसरी हमारी भाषा।

इस एजम्पशन के साथ हम आगे बढ़कर देखते हैं कि यह हमें जगत और भाषा के सम्बन्धो की दिशा में किस ओर ले जाता है:

जगत और भाषा के सम्बंध में भी कुछ पूर्वमान्यताओं की स्थापना की जा सकती है-

1 भाषा और जगत में वस्तु और दर्पण का सम्बंध है, अर्थात हमारी भाषा जगत व इसके घटकों को यथा रूप प्रतिबिंबित करती है।

2 भाषा जगत व इसके घटकों को यथारूप प्रतिबिंबित नही करती।

यदि आप मुझसे पूछेंगे की मैं इनमें से किसे वास्तविकता के निकट मानता हूं तो मेरा झुकाव दूसरे की ओर है जिसके निम्न कारण हैं:

यदि कोई वाह्य जगत है जो हमे संवेदना देता है तो यह संवेदना हमारे बोध में अपने प्रदत्त रूप में ही नही प्रकट हो जाती बल्कि यह संवेदना हमे एक व्यवस्तित रूप में मिलती है क्योकि हमारा मन इन सम्वेदनाओं की प्राप्ति के साथ ही सक्रिय हो जाता है और इन्हें एक आकार देकर हमारे बोध में प्रस्तुत करता है।

यहां, इस स्तर पर हमारे अंदर एक कॉग्निटिव फ्रेमवर्क (संज्ञानत्मक ढाँचा) की उपस्थिति से इनकार नही किया जा सकता।

यह ढाँचा हमारे बोध में उन रॉ सेंसेशन (कच्चे सम्वेदनाओं), जो वाह्य जगत से आ रहे है, कितना और किस प्रकार से मोडिफाई करता है, इसमे कितना अपना अंश डालता है हम यह नही जानते तथापि हम यहाँ एक कॉग्निटिव कंडिशनिग देख सकते है जो हमारे बोध में उपस्थित है।

इस विषय पर आप भारतीय परंपरा में हुए विश्लेषण की अधिक जानकारी के लिए निर्विकल्प प्रत्यक्ष बनाम सविकल्प प्रत्यक्ष और बौद्धों का स्वलक्षण बनाम मन की सक्रियता के पश्चात उपस्थित वस्तु देख सकते हैं।

बहरहाल, जो भी हो, इस स्तर पर हमारे पास संवेदन की दृष्टि से एक प्रोसेस्ड संवेदन है लेकिन भाषिक दृष्टि से यह जो कुछ भी है, अभी भाषिक बोध के लिए रॉ मेटेरियल ही है जिसे पुनः लिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क में प्रोसेस्ड होना है और तब वह हमारे भाषा का विषय बनेगा।

ध्यातव्य है कि हमारा लिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क मात्र जैविक रूप से ही प्रभावित नही हो सकता वरन सांस्कृतिक और सामाजिक तत्व भी इसमे होते हैं।

अर्थात, वाह्य जगत से आने वाली संवेदना अब तक (हमारे भाषा की विषय वस्तु बनने तक) दो बार शोधन (?) की प्रक्रिया से गुजरती है और तब जगत विषयक कोई कथन करती है। ऐसी स्थिति में हमारी भाषा जगत का प्रतिबिंब हो ऐसा नही कहा जा सकता।

हमारी चेतना में कुछ शब्द हैं, यह शब्द जीवन की शर्त मे चेतना की संरचना के साथ पहले से ही गूंथे हो सकते हैं या हम इन्हें बाद में अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं।

इन शब्दो की सीमा में एक कॉन्सेप्ट का निर्माण होता है जिसे हम जगत, ब्रह्मांड आदि कहते हैं। ये शब्द हैं: क्यों, कहाँ, कब, कितना, कैसे।

सत्ता नामक कॉन्सेप्ट मे यह जो इन शब्दों के उत्तर में इन शब्दों से घिरा है वह 'व्यक्त' या 'अपरा' है।

दुनिया इस "व्यक्त" तक भी हो सकती है और यह सम्भव है कि इनसे परे जाकर हम जो भाव बनाते हैं वह वास्तव में है ही नही और हमारी चेतना हमारी भाषा पर ऐसे ही कार्य करती हो कि हम किसी कॉन्सेप्ट का एक दूसरा ध्रुवीय विपरीत भी रच सकते हैं और "अव्यक्त" "परा" बस भाषाई खेल हो, हमारी चेतना के प्रत्यय बनाने की क्षमता का साइडइफेक्ट क्योकि हम उड़ने और घोड़े के प्रत्यय को मिला कर एक "उड़नेवाला घोड़ा" मानसिक रूप से अवश्य रच लेते है जबकि ऐसा आज तक किसी को उड़नेवाला घोड़ा दिखा नही।

हमारे शब्दो कम से कम दो प्रकार के तो हैं ही--प्रथम वस्तु देखकर उनके लिए शब्द तथा द्वितीय ऐसे शब्द जिनके अनुरूप कुछ वस्तुगत तथ्य है ही नही बल्कि यह हमारी इच्छा है: प्रकृति से पलायन है।

घोड़ा पहले प्रकार का शब्द है।

अमरता दूसरे प्रकार का।

पहला शब्द जगत के बारे में कुछ कह रहा होता है जबकि दूसरा शब्द मात्र हमारी इच्छा बता रहा है वह भी सीधे-सीधे नही।

हमारे बारे में और हमारे द्वारा गौशिपिंग हमारे विकासात्मक अतीत, इवोल्यूशनरी पास्ट का एक हिस्सा रहा है। युवल हेरारी तो इसको भाषा के विकास के कारणों में ही शामिल कर देते है। मनुष्यो द्वारा अमूर्तिकरण की शक्ति और इन अमूर्त प्रत्ययों को आपस मे मिला कर देखने का पहला प्रयोग यह गॉशिप ही था।

एक उदाहरण से समझिए, मनुष्य ने सिंह देखा और उसका अब्स्ट्रेक्शन किया फिर उस अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। मनुष्यो ने मनुष्य के अब्स्ट्रेक्शन के पश्चात भी इस अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। अब उसको एक प्रयोग करना था और यह प्रयोग उसे आगे दार्शनिक, कलाकार व वैज्ञानिक बनाने वाला था। उसने सिंह के सर और मनुष्य के शरीर को मिला दिया और अपने गॉसिप में एक शब्द दिया सिंह-मानव।

आदिमानव के लिए इस "सिंह-मानव" की बात करना उसके मनोरंजन का भी साधन था और उसके समूह जिसमे बीस, तीस लोग रहते थे उनके साथ और अधिक सोशल बॉन्डिंग करने का तरीका भी था क्योकि सिंह-मानव के बारे में सुनने के लिए उसके समूह के सभी सदस्य रिलेक्सड मूड में एक साथ बैठते।

यही नही आरम्भ में वह गॉसिप का पात्र बनने से डरता भी था और इस तरह उसका समूह उसके ऊपर एक अंकुश भी लगाता और वह अपने समूह के मूल्यों से विचलित न होता।

रहस्यानुभूति

मुझे अपने जन्म का अनुभव नही है, शायद किसी को उसके जन्म का अनुभव नही है क्योकि तब मेरी चेतना उतनी विकसित नही थी पुनः मैं अपने मृत्यु के अनुभवों को साझा करने के लिए भी उपस्थित नही रहूंगा, कोई नही रहता तो इसका क्या यह अर्थ ले लिया जाय कि जन्म और मृत्यु के समय कोई अनुभव होते ही नही?

यद्यपि इन अनुभवों के न्यूरल कोरिलेट्स ढूंढ लिए जाएं और उनको कोई बहुत ही एडवांस मशीन मेरे लिए रिप्रोड्यूस भी कर के इनकी अनुभूति मेरे लिए उपलब्ध करा दे तथापि क्या दूसरा कोई मेरी अनुभूति को अनुभूत कर सकता है?

सम्भवतः नही, मनस दर्शन में इसे क्वालिया कहा जाता है और इसकी व्यक्तिनिष्ठता से सम्बंधित क्यों और कैसे को डेविड चालमर हार्ड प्रॉब्लम ऑफ द कौंससनेस कहते है।

साधारण उदाहरण से समझना हो तो क्या आप मेरे सामने रखे लाल रंग के मेरे अनुभव को समझ सकते हैं? मेरे अनुभव मेरे नितांत निजी अनुभव हैं इनको उसी रूप में पूर्णता के साथ न तो आप समझ सकते हैं और न ही मैं इंनको व्यक्त कर सकता हूँ और इसका कारण यह है कि हमारी भाषा असीम रूप से सामर्थ्यवान नही है, इसकी अपनी सीमाएं हैं। और चुकी इसकी अपनी सीमाएं है अतः जगत में हमे केवल अभिव्यक्त होने वाली सत्ताएं और घटनाएं ही नही मिलती बल्कि वैसी सत्ताएं भी हैं जिनको अभिव्यक्त नही किया जा सकता।

पुनः हमारी भाषा मात्र चेतना की सामान्य दशा में हमारे लिए उपलब्ध अनुभवों के परित: ही विकसित हुई है अतः चेतना के अल्टर्ड स्टेट में अभव्यक्ति भाषा के नियम और शब्दावलियों से पार चले जाते हैं साथ ही हमारी भाषा चेतना की एक सामान्य दशा में भी एक निश्चित स्पेक्ट्रम तक ही अपने कार्य को करने में समर्थवान है। इस रेंज से निचे और ऊपर के हमारे अनुभवों का भी हमारी भाषा साथ नही दे पाती।

रहस्यानुभूति ऐसी ही परिघटना है जिसको यदि अभिव्यक्त करें तो भाषा टूट जाती है, शब्द अपने से परे अर्थ देने लगते है, अनुभूति करने वाला उलटबांसियों और व्याघातों में बात करने लगता है।

ज्ञान भाषा से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है क्योकि हम जिस न्यायोचित सत्य विश्वास को ज्ञान कहते है वह कॉन्सेप्चुवल होता है और कोई भी कॉन्सेप्ट शब्द और भाषा के उस नियम के पालन के बगैर,जिससे दुसरो को भी सहमति है, व्यक्त नही किया जा सकता। इन कॉन्सेप्ट्स की संरचना, अमूर्तीकर्ण और नामकरण मनुष्य की विचारशीलता पर आधारित है और विचार स्वयम अभव्यक्ति के लिए भाषा पर अतएव, रहस्यानुभूति जो कि अत्यंत निजी घटना है, इसका वस्तुनिष्ठ अध्ययन बहुत ही कठिन है तथापि इसका विविध दृष्टिकोणों से अध्ययन करने का प्रयास किया गया है।

बेली लिखते हैं कि जिन्हें इस "उपस्थिति" का साक्षात्कार हुवा है उनके लिए तर्क अनावशयक है और जिन्हें इस उवस्थिति का साक्षात्कार नही हुवा है उनके लिए तर्क बेकार है।

रुडोल्फ ओटो का कहना है कि रहस्यवादी अनुभूति अनूठी और अनुपम है। यह अनुभति सभी धार्मिक अनुभूतियों की सतह पर विद्यमान है तथा यह इतनी प्राइमरी और एलिमेंट्री है कि इसे किसी भी अनुभूति अथवा कॉन्सेप्ट के आधार पर स्पष्ट नही किया जा सकता। यह स्वजातीय और स्वर्गीय अथवा सुई जेनेसिस है अर्थात भाषा में अभिव्यक्त होने के बुद्धि की आवश्यक प्रक्रिया इसका वर्गीकरण, अमूर्तकरण, नामकरण आदि नही कर पाती।

प्रतीत होता है कि रहस्यानुभूति निर्विकल्प प्रत्यक्ष के पूर्व की भी घटना है और इस कारण यह अयोक्तिक, सरलतम और अभेदित है और इसी कारण यह हमारी भाषा का विषय नही बन पाती।

फर्नांड दी सुसुर, लिंग्विस्ट, के अनुसार हमारी भाषा भेदों की उपस्थिति के आधार पर काम करती है।

जेम्स के अनुसार रहस्यानुभूति के चार प्रमुख लक्षण है-अनिवर्चनीयता, प्रज्ञानात्मकता का एक अंश, क्षणभंगुरता और शिथिलता।

सम्भवतः रहस्यानुभूति चेतना की वह सरलतम और अभेदित अवस्था है जिसमे संज्ञानत्मकता और भावात्मकता दोनों ही अपने आरंभिक रूप में गूंथे होते है और आगे चलकर हमारा मस्तिष्क या मन या बुद्धि या स्वयम इस चेतना में अन्य जटिलताएँ जुड़कर और डिफ्रेंशिएट या विभेदित होकर स्पष्ट भावना और हमारे सहज बोध का निर्माण करती है।

यदि हमे हमारी इंद्रियों से प्योर संवेदन मिल भी रहा हो तो एक थ्योरी तक इसके विकसित होने में कम से कम यह तीन बार कंडिशन्ड होती है:

पहली बार बोध के स्ट्रक्चर द्वारा एक मानसिक प्रत्यय के रूप में।

दूसरी बार भाषिक फ्रेमवर्क से और तीसरी बार

उस पैराडाइम या उन एजम्पशन के फ्रेमवर्क से जिसके अंदर यह एक थ्योरी के रूप में विकसित होती है।

इनमें से पहला कंडिशनिग जैविक और मनोवैज्ञानिक कंडीशनिंग है, दूसरा लिंग्विस्टिक, जो एक प्रकार की सामाजिक-सांस्कृतिक कंडीशनिंग है, जिसमे कुछ अंश जैविक हो भी सकता है (चोम्स्की का यूनिवर्सल ग्रामर) और तीसरी विशुद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक।

इन तीन कंडिशनिंग्स से किसी सेंस डेटा के गुजरने के बाद हमारे ज्ञान पर वस्तुगतता के गुण का आरोपण करना बेमानी है; ज्ञान वस्तुनिष्ठ और ट्रांसेन्डेन्ट हो ही नही सकता।

★★

पूर्वआधुनिक युग मे ईश्वर मानवीय जगत का केंद्र था, आधुनिक युग मे मनुष्य स्वयम केंद्र है किंतु उत्तरआधुनिक संस्कृति किसी केंद्र में विश्वास ही नही करती क्योकि इसके चिंतन में केंद्र नामक शब्द है ही नही।

आधुनिक युग मे यद्यपि ईश्वर और अलौकिकता के सम्प्रत्ययो का मनुष्य की चेतना में क्षरण हो गया तथापि वस्तुगतता और ट्रांसेन्डेस में उसका विश्वास बचा रहा। इस काल मे सत्य, यथार्थ आदि अब भी वस्तुनिष्ठ और मनुष्य की चेतना के बाहर एक ट्रासेन्डेन्टल सत्ता के रूप में कल्पित किये जाते रहे।

उत्तर आधुनिक युग का आरम्भ उस क्षण से होता है जहाँ से वस्तुनिष्ठता और ट्रांसेन्डेस भी ईश्वर की भांति एक मिथक के रूप में एक्सपोज्ड हो गए।

★★

जगत और हमारी भाषा मे क्या सम्बन्ध है इस प्रश्न पर विचार करने के लिए हम सर्वप्रथम एक धारणा स्थापित करते हैं कि एक वाह्य जगत है जिसको हम अपनी भाषा से अभिव्यक्त करते हैं।

अर्थात यहाँ हमने दो सत्ताओं की कल्पना की, प्रथम-जगत और दूसरी हमारी भाषा।

इस एजम्पशन के साथ हम आगे बढ़कर देखते हैं कि यह हमें जगत और भाषा के सम्बन्धो की दिशा में किस ओर ले जाता है:

जगत और भाषा के सम्बंध में भी कुछ पूर्वमान्यताओं की स्थापना की जा सकती है-

1 भाषा और जगत में वस्तु और दर्पण का सम्बंध है, अर्थात हमारी भाषा जगत व इसके घटकों को यथा रूप प्रतिबिंबित करती है।

2 भाषा जगत व इसके घटकों को यथारूप प्रतिबिंबित नही करती।

यदि आप मुझसे पूछेंगे की मैं इनमें से किसे वास्तविकता के निकट मानता हूं तो मेरा झुकाव दूसरे की ओर है जिसके निम्न कारण हैं:

यदि कोई वाह्य जगत है जो हमे संवेदना देता है तो यह संवेदना हमारे बोध में अपने प्रदत्त रूप में ही नही प्रकट हो जाती बल्कि यह संवेदना हमे एक व्यवस्तित रूप में मिलती है क्योकि हमारा मन इन सम्वेदनाओं की प्राप्ति के साथ ही सक्रिय हो जाता है और इन्हें एक आकार देकर हमारे बोध में प्रस्तुत करता है।

यहां, इस स्तर पर हमारे अंदर एक कॉग्निटिव फ्रेमवर्क (संज्ञानत्मक ढाँचा) की उपस्थिति से इनकार नही किया जा सकता।

यह ढाँचा हमारे बोध में उन रॉ सेंसेशन (कच्चे सम्वेदनाओं), जो वाह्य जगत से आ रहे है, कितना और किस प्रकार से मोडिफाई करता है, इसमे कितना अपना अंश डालता है हम यह नही जानते तथापि हम यहाँ एक कॉग्निटिव कंडिशनिग देख सकते है जो हमारे बोध में उपस्थित है।

इस विषय पर आप भारतीय परंपरा में हुए विश्लेषण की अधिक जानकारी के लिए निर्विकल्प प्रत्यक्ष बनाम सविकल्प प्रत्यक्ष और बौद्धों का स्वलक्षण बनाम मन की सक्रियता के पश्चात उपस्थित वस्तु देख सकते हैं।

बहरहाल, जो भी हो, इस स्तर पर हमारे पास संवेदन की दृष्टि से एक प्रोसेस्ड संवेदन है लेकिन भाषिक दृष्टि से यह जो कुछ भी है, अभी भाषिक बोध के लिए रॉ मेटेरियल ही है जिसे पुनः लिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क में प्रोसेस्ड होना है और तब वह हमारे भाषा का विषय बनेगा।

ध्यातव्य है कि हमारा लिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क मात्र जैविक रूप से ही प्रभावित नही हो सकता वरन सांस्कृतिक और सामाजिक तत्व भी इसमे होते हैं।

अर्थात, वाह्य जगत से आने वाली संवेदना अब तक (हमारे भाषा की विषय वस्तु बनने तक) दो बार शोधन (?) की प्रक्रिया से गुजरती है और तब जगत विषयक कोई कथन करती है। ऐसी स्थिति में हमारी भाषा जगत का प्रतिबिंब हो ऐसा नही कहा जा सकता।

हमारे बोध में कुछ शब्द हैं, इन शब्दों से सम्बंधित प्रत्यय जीवन की शर्त मे चेतना की संरचना के साथ पहले से ही गूंथे हो सकते हैं या हम इन्हें बाद में अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं।

ऐसे ही कुछ शब्दो की सीमा में एक कॉन्सेप्ट का निर्माण होता है जिसे हम जगत, ब्रह्मांड आदि कहते हैं।

ये शब्द निम्न हैं: क्यों, कहाँ, कब, कितना, कैसे।

सत्ता, अस्तित्व या बीइंग नामक कॉन्सेप्ट (प्रत्ययों) मे यह जो इन शब्दों के उत्तर में इन शब्दों से घिरा है वह 'व्यक्त' या 'अपरा' है।

दुनिया या यथार्थ या वास्तविकता इस "व्यक्त" तक ही नही भी हो सकती है भी और यह सम्भव है कि इनसे परे जाकर हम जो भाव बनाते हैं उसके अनुरूप कोई चीज या चीजें वास्तव में है ही नही क्योकि हमारी चेतना हमारी भाषा पर ऐसे ही कार्य करती हो कि हम किसी कॉन्सेप्ट का एक दूसरा ध्रुवीय विपरीत भी रच सकते हैं और "अव्यक्त" "परा" बस भाषाई खेल हो, हमारी चेतना के प्रत्यय बनाने की क्षमता का साइडइफेक्ट, क्योकि हम उड़ने और घोड़े के प्रत्यय को मिला कर एक "उड़नेवाला घोड़ा" मानसिक रूप से अवश्य रच लेते है जबकि ऐसा आज तक किसी को उड़नेवाला घोड़ा दिखा नही।

हमारे शब्दो कम से कम दो प्रकार के तो हैं ही--प्रथम वस्तु देखकर उनके लिए शब्द तथा द्वितीय ऐसे शब्द जिनके अनुरूप कुछ वस्तुगत तथ्य है ही नही बल्कि यह हमारी इच्छा है: प्रकृति से पलायन है।

घोड़ा पहले प्रकार का शब्द है।

अमरता दूसरे प्रकार का।

पहला शब्द जगत के बारे में कुछ कह रहा होता है जबकि दूसरा शब्द मात्र हमारी इच्छा बता रहा है वह भी सीधे-सीधे नही।

यहाँ एक चीज नोटिस की जा सकती है कि मनस के उस हिस्से के पास, जो सम्वेदनो पर सक्रिय होता है, एक ऐसी शक्ति है जिससे वह कुछ ऐसे मानसिक प्रत्यय रच डालता है जिसका आनुभविक सत्यापन नही हो सकता और हम यह नही कह सकते कि इस प्रत्यय के अनुरूप कोई सत्ता है या नही। अर्थात हम इसे न तो सत्य प्रमाणित कर सकते हैं और न ही असत्य।

ऐसे कथन जिन्हें न तो सत्य अथवा न ही असत्य प्रमाणित किया जा सके उन्हें हम सूचनात्मक नही मान सकते।

यदि किसी वाक्य से सूचनात्मकता का ह्रास हो जाता है तो वह वाक्य इस ह्रास के साथ ही ज्ञानात्मक अणु अथवा ज्ञान प्रदान करने वाले वाक्य नही रह जाते क्योकि सूचनाएं ही व्यवस्तित होकर ज्ञान बनती है।

यद्यपि कुछ प्रत्ययों को अनुभव से प्रमाणित नही किया जा सकता तथापि हम इनका मेंटल इमेज बना सकते हैं। उदाहरण के लिए हम एम कॉन्सेप्ट लेते हैं: उड़ने वाला घोड़ा।

हम उड़ने वाले घोड़े की एक इमेज कमोबेश बना सकते हैं जिसमे हमारा सामान्य घोड़ा पंख लिए हुए है।

यदि हम थोड़ा और आगे बढ़ कर मेंटल से भाषिक आयाम में आए तो यहाँ हम एक ऐसा शब्द निश्चित रूप से रच सकते है जिसके अनुरूप अब हम मानसिक तस्वीर भी नही बना सकते।

उदाहरण के लिए: वह घोड़ा जो हाथी है: घोड़हाथी।

एक बात यहाँ उभर रही है कि यद्यपि हमने आरम्भ संवेदनों से की हम मानसिक प्रत्ययों से होते हुए शब्दों तक अपनी सम्वेदनो से बहुत दूर चले आए: हमने आरम्भ उन दो चीजो से किया था जिन्हें हमरा बोध क्रमशः घोड़ा और हाथी के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर रहा है, फिर हमने एक उड़ने वाले घोड़े का मानसिक प्रत्यय रचा और भाषिक आयाम में हमने घोड़हाथी नामक शब्द भी बना दिया।

अपनी संवेदनों से इस प्रकार दूर चले आने का एक अर्थ यह हो सकता है कि हमारी भाषा वास्तविक जगत कि एक बहुत ही अवास्तविक तस्वीर भी दे सकती है और इस अर्थ में उस प्रकार के शब्द खोखले हैं।

★★

एक सामान्य बोध की समस्त प्रक्रिया में अर्थात सम्वेदनो से होकर इसके भाषिक रूप में बंधने तक और फिर उसके आगे इस बोध का किसी सिद्धान्त बनने तक हमारे संवेदन या इन्द्रिय प्रदत्त कम से कम तीन बार हमारी विषयिनिष्ठता से प्रभावित होते हैं, यह विषयीनिष्ठता जैविक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत होते है। जटिल बोधो में हमारी व्यक्तिगत और सांस्कृतिक-सामाजिक

का स्कोप (प्रक्षेत्र) बोध-प्रक्रिया के विभिन्न घटक-स्तरों तक भी विस्तृत हो जाता है अन्यथा किसी घटना के प्रति चेतन हो कर उसे देखने का क्या अर्थ है सिवाय इसके के बोध की प्रक्रिया में हमारी स्वयम की भी चेतन भागीदारी होती है अर्थात इस स्तर पर हम अपने बोध की अपनी सामान्य प्रवृति अथवा कॉमन सेंस से आगे बढ़ चुके होते हैं।

हमे अपने कॉमन सेंस से बहुधा आगे बढ़ना होता है या इसे दूसरी तरह से कहा जाय तो हमे अपने जन्मना प्राप्त सहज बोध या कॉमन सेंस की समीक्षा करनी पड़ती है। प्रश्न यह है कि हमे ऐसा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है? इसका एजमात्र उत्तर जो मुझे प्रतीत होता है वह यह है कि हमे कुछ ऐसे भी अनुभव मिलने प्राप्त हो जाते हैं जो हमारे सहज बोध से संगति नही रखते:

यदि वह सर्प है तो जैसा कि हमारे दृश्य संवेदन से प्राप्त बोध हमे बता रहा है, उसमें मात्र सर्प के द्रश्य लक्षण ही नही बल्कि अन्य लक्षण भी होने चाहिए किन्तु शनै: शनै: उसमें रज्जु के लक्षण उभरते जाते हैं अतः वह सर्प नही बल्कि रज्जु है और इसका आशय यह है कि हम आँख बंद कर अपने समस्त बोधो को स्वीकार नही कर सकते, साथ ही इसका यह भी आशय है कि हमारी इंद्रियां हमारे सम्मुख भ्रम भी उपस्थित कर सकती हैं। यद्यपि हमारी इंद्रियां हमारे सम्मुख भ्रम उपस्थित कर देती हैं तथापि क्या भ्रम में उपस्थित सत्ता बिल्कुल नवीन होती है या इस सत्ता से जो कि भ्रम में उपस्थित है, हमारा कभी न कभी साक्षात्कार हुआ रहना एक आवश्यक शर्त होती है?

मेरा मानना है कि यह बिल्कुल नवीन सत्ता नही होती बल्कि इससे या इसमे उपस्थित अव्ययों से हमारा कभी न कभी आनुभविक साक्षत्कार आवश्यक होता है।

रहस्यवादी, जिस ईश्वर को देखते हैं उसका रहस्यवादियो द्वारा जाग्रत अवस्था मे देखे गए ईश्वर की छवि या रूप से कन्फर्म होना आवश्यक होता है अन्यथा उन्होंने अवश्य हमे बताया होता कि नही इस मूर्ति के जैसा ईश्वर नही है बल्कि उसकी आंख और नाक ऐसी है।

ठाकुर रामकृष्ण ने कभी कहा, "ना ना काली माँ इस चित्र, इस मूर्ति, इस विग्रह की तरह नही है"।

आशय यह है कि विज्ञानवादियों की यह मान्यता की 'विज्ञप्तिमात्रता ही सत्य है' या 'दृश्यम इति वर्तते' जैसी स्थापनाएं विज्ञान अथवा उन परसेप्शनो के कॉन्टेंट की व्याख्या नही कर पाती और हमे एक वाह्य जगत की आवश्यकताए पड़ती ही पड़ती है क्योकि अन्यथा की स्थिति में हमारे सम्वेदनो की व्याख्या ही नही हो पाएगी जो कि हमारे बोध-प्रक्रिया के आधार में अवस्थित हैं।

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रहस्यानुभूति

मुझे अपने जन्म का अनुभव नही है, शायद किसी को उसके जन्म का अनुभव नही है क्योकि तब मेरी चेतना उतनी विकसित नही थी पुनः मैं अपने मृत्यु के अनुभवों को साझा करने के लिए भी उपस्थित नही रहूंगा, कोई नही रहता तो इसका क्या यह अर्थ ले लिया जाय कि जन्म और मृत्यु के समय कोई अनुभव होते ही नही?

यद्यपि इन अनुभवों के न्यूरल कोरिलेट्स ढूंढ लिए जाएं और उनको कोई बहुत ही एडवांस मशीन मेरे लिए रिप्रोड्यूस भी कर के इनकी अनुभूति मेरे लिए उपलब्ध करा दे तथापि क्या दूसरा कोई मेरी अनुभूति को अनुभूत कर सकता है?

सम्भवतः नही, मनस दर्शन में इसे क्वालिया कहा जाता है और इसकी व्यक्तिनिष्ठता से सम्बंधित क्यों और कैसे को डेविड चालमर हार्ड प्रॉब्लम ऑफ द कौंससनेस कहते है।

साधारण उदाहरण से समझना हो तो क्या आप मेरे सामने रखे लाल रंग के मेरे अनुभव को समझ सकते हैं? मेरे अनुभव मेरे नितांत निजी अनुभव हैं इनको उसी रूप में पूर्णता के साथ न तो आप समझ सकते हैं और न ही मैं इंनको व्यक्त कर सकता हूँ और इसका कारण यह है कि हमारी भाषा असीम रूप से सामर्थ्यवान नही है, इसकी अपनी सीमाएं हैं। और चुकी इसकी अपनी सीमाएं है अतः जगत में हमे केवल अभिव्यक्त होने वाली सत्ताएं और घटनाएं ही नही मिलती बल्कि वैसी सत्ताएं भी हैं जिनको अभिव्यक्त नही किया जा सकता।

पुनः हमारी भाषा मात्र चेतना की सामान्य दशा में हमारे लिए उपलब्ध अनुभवों के परित: ही विकसित हुई है अतः चेतना के अल्टर्ड स्टेट में अभव्यक्ति भाषा के नियम और शब्दावलियों से पार चले जाते हैं साथ ही हमारी भाषा चेतना की एक सामान्य दशा में भी एक निश्चित स्पेक्ट्रम तक ही अपने कार्य को करने में समर्थवान है। इस रेंज से निचे और ऊपर के हमारे अनुभवों का भी हमारी भाषा साथ नही दे पाती।

रहस्यानुभूति ऐसी ही परिघटना है जिसको यदि अभिव्यक्त करें तो भाषा टूट जाती है, शब्द अपने से परे अर्थ देने लगते है, अनुभूति करने वाला उलटबांसियों और व्याघातों में बात करने लगता है।

ज्ञान भाषा से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है क्योकि हम जिस न्यायोचित सत्य विश्वास को ज्ञान कहते है वह कॉन्सेप्चुवल होता है और कोई भी कॉन्सेप्ट शब्द और भाषा के उस नियम के पालन के बगैर,जिससे दुसरो को भी सहमति है, व्यक्त नही किया जा सकता। इन कॉन्सेप्ट्स की संरचना, अमूर्तीकर्ण और नामकरण मनुष्य की विचारशीलता पर आधारित है और विचार स्वयम अभव्यक्ति के लिए भाषा पर अतएव, रहस्यानुभूति जो कि अत्यंत निजी घटना है, इसका वस्तुनिष्ठ अध्ययन बहुत ही कठिन है तथापि इसका विविध दृष्टिकोणों से अध्ययन करने का प्रयास किया गया है।

बेली लिखते हैं कि जिन्हें इस "उपस्थिति" का साक्षात्कार हुवा है उनके लिए तर्क अनावशयक है और जिन्हें इस उवस्थिति का साक्षात्कार नही हुवा है उनके लिए तर्क बेकार है।

रुडोल्फ ओटो का कहना है कि रहस्यवादी अनुभूति अनूठी और अनुपम है। यह अनुभति सभी धार्मिक अनुभूतियों की सतह पर विद्यमान है तथा यह इतनी प्राइमरी और एलिमेंट्री है कि इसे किसी भी अनुभूति अथवा कॉन्सेप्ट के आधार पर स्पष्ट नही किया जा सकता। यह स्वजातीय और स्वर्गीय अथवा सुई जेनेसिस है अर्थात भाषा में अभिव्यक्त होने के बुद्धि की आवश्यक प्रक्रिया इसका वर्गीकरण, अमूर्तकरण, नामकरण आदि नही कर पाती।

प्रतीत होता है कि रहस्यानुभूति निर्विकल्प प्रत्यक्ष के पूर्व की भी घटना है और इस कारण यह अयोक्तिक, सरलतम और अभेदित है और इसी कारण यह हमारी भाषा का विषय नही बन पाती।

फर्नांड दी सुसुर, लिंग्विस्ट, के अनुसार हमारी भाषा भेदों की उपस्थिति के आधार पर काम करती है।

जेम्स के अनुसार रहस्यानुभूति के चार प्रमुख लक्षण है-अनिवर्चनीयता, प्रज्ञानात्मकता का एक अंश, क्षणभंगुरता और शिथिलता।

सम्भवतः रहस्यानुभूति चेतना की वह सरलतम और अभेदित अवस्था है जिसमे संज्ञानत्मकता और भावात्मकता दोनों ही अपने आरंभिक रूप में गूंथे होते है और आगे चलकर हमारा मस्तिष्क या मन या बुद्धि या स्वयम इस चेतना में अन्य जटिलताएँ जुड़कर और डिफ्रेंशिएट या विभेदित होकर स्पष्ट भावना और हमारे सहज बोध का निर्माण करती है।

 

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ब्रह्मांड के प्राकृतिक इतिहास के परिप्रेक्ष्य से जगत का कारण ब्रह्मांड है या जगत ब्रह्मांड पर एक आरोपण है किंतु हमारी चेतना में ब्रह्मांड पहले नही बल्कि जगत पहले उतरता है और फिर हम जगत से ब्रह्मांड को एक्सट्रैक्ट करते हैं और ब्रह्मांड के मानसिक भाव को हम स्वयम कंस्ट्रक्ट करते हैं, जो हमारा ब्रह्मण्ड है, क्योकि हम इस भाव के बाहर यदि कोई ब्रह्मांड हो तो भी उसे नही जान सकते क्योकि हम मात्र और मात्र अपने मानसिक प्रत्ययों को जानते हैं। इन मानसिक प्रत्ययों के अनुरूप कोई वाह्य सत्ता है या नही यह विवाद का प्रश्न है: वस्तुवाद के अनुसार है, प्रतिवस्तुवाद के अनुसार नही है।

यद्यपि जगत और ब्रह्मांड दोनो को बोधगम्य होने के लिए हमारी चेतना में उतरना ही है तथापि हमारी चेतना में ब्रह्मांड से पूर्व जगत ही उतरता है।

ब्रह्मांड का आशय दिक्काल में हो रही और होने वाली घटनाओं व इनको रचने वाली चीजों की अंतहीन श्रृंखला से है, जो मात्र घटनाए हैं मात्र चीजें हैं किंतु जगत में इनपर एक आवरण चढ़ा हुआ है, मनुष्य के रागों का, मनुष्यो के द्वेषों का, मनुष्य के राग-द्वेषों का आवरण, मनुष्यता की सम्भवनाओ का आवरण, उसकी सीमितताओ का आवरण।

दर्शन का जगत विज्ञान का ब्रह्मांड नही है अतः दर्शन ब्रह्मांड की व्याख्या नही करता, दर्शन जगत को समझने और उसकी व्यायख्या का प्रयास करता है। जगत वह है जो यह सबकुछ उसकी चेतना में उतरता है और उसके अस्तित्व को सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनो ही प्रकार से उद्वेलित करता है। जगत में वह सुख पाता है और दुख को अनुभूत करता है। जगत में वह हँसता है और रोता है।

विज्ञान का ब्रह्मांड इस जगत से एक्सट्रेक्ट किया जाता है, ब्रह्मांड में अस्तित्वगत भावनाओ के लिए कोई स्थान नही है।

ब्रह्मांड में अस्तित्व की अतार्किकताओ का कोई मोल नही है जबकि जगत इनके बिना अधूरा है और पश्चिम में तो हीगल के बाद पनपी एक धारा इन्ही अततार्किकताओ को सत्य तक पहुंचने का असल मार्ग तक कहतीं हैं।

 

 

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हमारे बारे में और हमारे द्वारा गौशिपिंग हमारे विकासात्मक अतीत, इवोल्यूशनरी पास्ट का एक हिस्सा रहा है। युवल हेरारी तो इसको भाषा के विकास के कारणों में ही शामिल कर देते है। मनुष्यो द्वारा अमूर्तिकरण की शक्ति और इन अमूर्त प्रत्ययों को आपस मे मिला कर देखने का पहला प्रयोग यह गॉशिप ही था।

एक उदाहरण से समझिए, मनुष्य ने सिंह देखा और उसका अब्स्ट्रेक्शन किया फिर उस अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। मनुष्यो ने मनुष्य के अब्स्ट्रेक्शन के पश्चात भी इस अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। अब उसको एक प्रयोग करना था और यह प्रयोग उसे आगे दार्शनिक, कलाकार व वैज्ञानिक बनाने वाला था। उसने सिंह के सर और मनुष्य के शरीर को मिला दिया और अपने गॉसिप में एक शब्द दिया सिंह-मानव।

आदिमानव के लिए इस "सिंह-मानव" की बात करना उसके मनोरंजन का भी साधन था और उसके समूह जिसमे बीस, तीस लोग रहते थे उनके साथ और अधिक सोशल बॉन्डिंग करने का तरीका भी था क्योकि सिंह-मानव के बारे में सुनने के लिए उसके समूह के सभी सदस्य रिलेक्सड मूड में एक साथ बैठते।

यही नही आरम्भ में वह गॉसिप का पात्र बनने से डरता भी था और इस तरह उसका समूह उसके ऊपर एक अंकुश भी लगाता और वह अपने समूह के मूल्यों से विचलित न होता।

कॉग्निटिव रिवोल्यूशन के दूसरे चरण (हेरारी) में यह गौशिपिंग मूर्त से अमूर्तता की ओर मुड़ती चली गई। यह प्रथम चरण जहाँ मिथकीय चिंतन था तो द्वितीय चरण तत्वमीमांसिय (आफ्टर कॉम्टे)।

यदि संज्ञानात्मक विकास के प्रथम चरण में मनुष्य सिंह और मानव को मिला कर एक मिथकीय जीव सिंह-मानव की कल्पना कर इसके बारे में कथा-कहानियां रचता तो अपने संज्ञानात्मक विकास के द्वितीय चरण में उसने आइडियाज से क्रीड़ा करनी आरम्भ कर दी।

सत, चित आनन्द का समेकित रूप इसी चिंतन की उपज है जहां मनुष्यो ने प्रथमतः उसके सेंस डाटा से प्राप्त जगत का मानसिक निषेध किया, इस निषेध से प्राप्त मानसिक सत्ता को सकारात्मक कोटि से आबद्ध किया और इस पर अन्य दो गुणों चित और आनन्द का आरोपण कर दिया।

पश्चिम में इस चिंतन के विरुद्ध यह कहकर भी प्रतिक्रिया हुई कि यह भाषाई अज्ञेयों द्वारा मानसिक व्यायाम मात्र है।

संज्ञानत्मक विकास के तृतीय चरण में ही यह अनिवार्य बना की मनुष्य अपने गौशिपिंग के अनुरूप संवादिता रखती चीजें जगत में प्राप्त करे। अन्यथा की स्थिति में इसे स्वीकार्यता नही मिलनी थी।

 

 

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चूंकि यह स्थापित हो चुका है कि (स्थापित होने का अर्थ सहमति बन जाना) विज्ञान में तदर्थ आधार पर किसी थ्योरी के पोस्टयूलेट्स ही निष्कर्ष बन जाते हैं और आगे की चीजें में इस पोस्टयूलेट्स आधारित निष्कर्ष या इम्प्लिकेशन निगमित किए जाते हैं और इन निगमित निष्कर्षो से संवादिता रखती घटनाए या वस्तुए इस जगत में खोजी जाती है या प्राप्त कर ली जाती है।

इस एक्सपेरिमेंटल वेरिफिकेशन से बस इतना ही होता है कि वह पूर्वमान्यता जिससे हमने यह घटना या वस्तु गणितीय रूप से प्रेडिक्ट किया था, खारिज नही होती और हमे अपने अनुसन्धान के प्रतिमान, पैराडाइम या पोस्टयूलेट्स में तब्दीली नही करनी होती है।

वैज्ञानिक विकास के इतिहास में बहुत सी घटनाए, चीजे हैं जिन्हें इस प्रकार से पहले ही गणितीय रूप से प्रेडिक्ट कर लिया गया था किंतु इनका प्रायोगिक सत्यापन बाद में हुआ।

हिग्स बोसोन, या पापुलिज्म के लिए इनको दिया गया नाम "गॉड पार्टिकल' इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है जिसे पीटर हिग्ग्स की थ्योरी गणितीय रूप से प्रेडिक्ट कर रही थी किन्तु इसका प्रायोगिक सत्यापन सम्भवतः 12 वर्षो के बाद सर्न के लार्ज हाइड्रोन कोलाइडर में हुआ और तब जाकर पीटर हिग्ग्स को नोबेल पुरस्कार दिया गया।

बहरहाल, यहां जो प्रश्न है वह यह है कि जिनसे यह सब आरम्भ हुआ या होता है वह पूर्वमान्यताएँ कैसे अस्तित्व में आती हैं, इनके अस्तित्व में आने या लाने के लिए क्या कोई विधि (वैज्ञानिक) है?

इसका उत्तर है नही: इन पूर्वमान्यताओ की स्थापना के लिए कोई वैज्ञानिक विधि नही है।

इनकी स्थापना में या तो इंट्यूशन या ट्रायल एंड एरर द्वारा प्राप्त की गई एक सोंच होती है जो संयोग से जो कुछ प्रेडिक्ट कर रही होती है वह सही हो रहा होता है।

यह विज्ञान में अंतर्निहित "फाउंडेशनल लीप" है।

जब आप विज्ञान के आधार, विज्ञान की पूर्वमान्यताओ की छानबीन करते हैं तो आप पाते हैं कि यहाँ एक छलांग है। इसे महज छलांग कहें तो बेहतर क्योकि इसमे अंतर्निहित विश्वास कमो-बेश जस्टिफाइड तो हो सकता है, सत्य नही हो सकता। यह सत्य इसलिए नही हो सकता कि हमारे पास कोई साधन ही नही की हम इसे इस स्तर पर सत्य या असत्य प्रमाणित कर पाए।

 

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विज्ञान के तीन छलांग:

1 फाउंडेशनल लीप: विज्ञान की नींव में उपस्थित है

2 इंडक्शन लीप: आनुभविक विज्ञानों की प्रक्रिया में उपस्थित है।

3 रिवोल्यूशनरी लीप: विज्ञान के विकास में पैराडाइम शिफ्ट (Khunn) के रूप में उपस्थित है

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एक अंधा व्यक्ति था। उसके हाथ एक आधे किलो की वस्तु लग गई। उसने यह बस मान लिया कि यह सोना है।

उसने ढाई सौ ग्राम सोने की कीमत बाजार में पता की। उसने यह गणना की कि यदि उसके पास उतने पैसे होते तो वह 5 वर्ष तक बिना कुछ किए जी सकता था। उसे किसी ने यह भी बताया था कि यदि वह 200 ग्राम सोने से बगल वाले गांव के वैद्य से औषधि बनवा ले तो 5 वर्षो में उसकी आँखों की ज्योति वापस आ जाएगी। उसने यह भी पता किया कि सोने के 200 ग्राम की उस औषधि बनवाने का मूल्य 50 ग्राम सोने के बराबर है और वैद्य रुपयों की जगह सोना भी स्वीकार कर लेता है।

अंधा बाज़ार पहुंचा और उसने अपनी सोना मानी चीज का आधा हिस्सा बेच दिया जिससे उसे कुछ रुपए मिले। वह वैद्य के घर भी गया और वैद्य तत्काल मान गया कि वह इस वस्तु के 200 ग्राम से एक औषधि बना देगा जिसके बदले में वह 50 ग्राम वस्तु रख लेगा।

ठीक पांचवे वर्ष उस अंधे का पैसा भी समाप्त हो गया और उस औषधि के कारण उसकी आँखों की रौशनी भी वापस आ गई।

तब तक वह वैद्य और वह जिसने उससे वह वस्तु खरीदी थी दोनों मर चुके थे अतः वह उनसे नही पूछ सकता कि वह चीज सोना थी या नही।

लेकिन वह वस्तु सोना थी कि नही? क्या अंधे की पूर्वमान्यता सोने में उपस्थित अर्थक्रियात्मकता के चलते निष्कर्ष नही बन गई?

क्या सनमुच हम कह सकते हैं कि वस्तुवाद विज्ञान की पूर्वमान्यता है निष्कर्ष नही?

विज्ञान की पूर्वमान्यताएँ है कि

■ जगत हमसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान है,

■ जगत को जाना जा सकता है,

■ जगत में नियमबद्धता है तथा ये नियम ज्ञेय हैं।

इन पूर्वमान्यताओ से हम प्रारम्भ कर यदि आज तक जगत को जान ही रहे हैं, इसके नियमो को भी जान पा ही रहे हैं और वो हमारे लिए काम करते हों तो भले ही यह कहा जाय कि इन पूर्वमान्यताओ की स्थापना में "आस्था की छलांग" इम्प्लाइड है लेकिन वह पूर्वमान्यताएँ क्या स्वयम वैज्ञानिक निष्कर्ष नही बन रही हैं?

हमने कोई किसी पूर्वमान्यता के साथ उस मान्यता की स्थापित सीमा में कोई अनुसन्धान प्रारम्भ किया। मान लिया की अब अब तक उस मान्यता पर आधारित जितने भी निष्कर्ष है वह प्रेडिक्टिव पावर रखते हैं। स्थापित निष्कर्षों की भी आपस मे संगति है। अभी तक कोई ऐसा ऑबर्जवेशन नही मिला जिसकी व्याख्या इन पूर्वमान्यताओ कि पृष्ठभूमि में न हो सके तो फिर यह पूर्वमान्यताएँ स्वयम भी क्या निष्कर्ष नही बन जातीं?

अल्बर्ट आइंस्टीन की स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी दिक और काल के सम्बन्धो में एक सिद्धान्त है जिसमे देश और काल अलग अलग न होकर समेकित रूप से "दिक्काल" हैं। जगत इस प्रकार चतुर्विमिय है।

आइंस्टीन स्पेशल थ्योरी और रिलेटिविटी में दो पूर्वमान्यता स्थापित करते है और इन्ही पूर्वमान्यताओं के आधार पर आगे बढ़ते हैं:

◆ भौतिकी के नियम सारे इनर्शियल फ्रेम ऑफ रेफरेंस में समान हैं तथा

◆ प्रकाश की निर्वात में गति सारे प्रेक्षकों के लिए समान है और प्रकाश स्रोत तथा प्रेक्षक की गति से निरपेक्ष है।

यद्यपि स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के कई कौंसिक्वेंस है और इनका प्रेडिक्शन हमारे अनुभव से मेल रखता है तथापि एक प्रश्न यह किया जा सकता है कि उपरोक्त दो पूर्वमान्यताएँ, जिन पर स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी टिकी हुई है क्या अपने आप मे निष्कर्ष भी नही बन जाते?

वस्तुवाद वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार ज्ञेय का हमारी चेतना से स्वतंत्र अस्तित्व है। ज्ञेय की सत्ता हमारी चेतना की अपेक्षा नही रखती। ध्यातव्य है कि वस्तुवाद के उलट एक दूसरी विचारधारा भी है जिसमे ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता की अपेक्षा रखती है। अपने उग्र रूप में यह सिद्धान्त पश्चिम में बर्कली के "सत्ता दृश्यता है" कथन में दृष्टिसृष्टिवाद के रूप में मिलता है। यदि इस विचार को और अधिक उग्र रूप दिया जाय तो यह "मैं और मेरे मानसिक प्रत्यय ही सत्य हैं" के विचार में तब्दील हो जाता है।

भारत मे बौद्ध विज्ञानवादी अवस्तुवादी है जिनके अनुसार विज्ञान या चेतना मात्र सत्य है।

वैज्ञानिक प्रविधि में इस पूर्वमान्यता मे विश्वास शामिल होता है कि जगत हमसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान है तथा इसे जाना जा सकता है।

विज्ञान का विकास वस्तुतः इन्ही पूर्वमान्यताओ की पृष्ठभूमि में होता है। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि हमारी ये पूर्वमान्यताए सत्य है या असत्य या यूं कहें कि इनके अनुरूप किसी बाह्यार्थ की संवादिता है अथवा नही है इसके निर्धारण की न तो हमारे पास कोई विधि है और न ही इसका निर्धारण किया जा सकता है।

यहाँ हम निर्धारण की एक दूसरी विधि में विश्वास करते हुए इनके बारे में कोई निर्णय देते है और वह दूसरी विधि है हमारे अनुभव में आए जगत का इन पूर्वमान्यताओ पर आधारित तन्त्र के अंतर्गत सुगमता से व्याख्या होते चले जाना।

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चुकी यह स्थापित हो चुका है कि विज्ञान में तदर्थ आधार पर किसी थ्योरी के पोस्टयूलेट्स ही निष्कर्ष बन जाते हैं और आगे इस पोस्टयूलेट्स आधारित निष्कर्ष या इम्प्लिकेशन निगमित किए जाते हैं और इन निगमित निष्कर्षो से संवादिता रखती घटनाए या वस्तुए इस जगत में खोजी जाती है या प्राप्त कर ली जाती है।

इस एक्सपेरिमेंटल वेरिफिकेशन से बस इतना ही होता है कि वह पूर्वमान्यता जिससे हमने यह घटना या वस्तु गणितीय रूप से प्रेडिक्ट किया था, खारिज नही होती और हमे अपने अनुसन्धान के प्रतिमान, पैराडाइम या पोस्टयूलेट्स में तब्दीली नही करनी होती है।

वैज्ञानिक विकास के इतिहास में बहुत सी घटनाए, चीजे हैं जिन्हें इस प्रकार से पहले ही गणितीय रूप से प्रेडिक्ट कर लिया गया था किंतु इनका प्रायोगिक सत्यापन बाद में हुआ।

हिग्स बोसोन, या पापुलिज्म के लिए इनको दिया गया नाम "गॉड पार्टिकल' इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है जिसे पीटर हिग्ग्स की थ्योरी गणितीय रूप से प्रेडिक्ट कर रही थी किन्तु इसका प्रायोगिक सत्यापन सम्भवतः 12 वर्षो के बाद सर्न के लार्ज हाइड्रोन कोलाइडर में हुआ और तब जाकर पीटर हिग्ग्स को नोबेल पुरस्कार दिया गया।

बहरहाल, यहां जो प्रश्न है वह यह है कि जिनसे यह सब आरम्भ हुआ या होता है वह पूर्वमान्यताएँ कैसे अस्तित्व में आती हैं, इनके अस्तित्व में आने या लाने के लिए क्या कोई विधि (वैज्ञानिक) है?

इसका उत्तर है नही: इन पूर्वमान्यताओ की स्थापना के लिए कोई वैज्ञानिक विधि नही है।

इनकी स्थापना में या तो इंट्यूशन या ट्रायल एंड एरर द्वारा प्राप्त की गई एक सोंच होती है जो संयोग से जो कुछ प्रेडिक्ट कर रही होती है वह सही हो रहा होता है।

यह विज्ञान में अंतर्निहित "फाउंडेशनल लीप" है।

जब आप विज्ञान के आधार, विज्ञान की पूर्वमान्यताओ की छानबीन करते हैं तो आप पाते हैं कि यहाँ एक छलांग है। इसे महज छलांग कहें तो बेहतर क्योकि इसमे अंतर्निहित विश्वास कमो-बेश जस्टिफाइड तो हो सकता है, सत्य नही हो सकता। यह सत्य इसलिए नही हो सकता कि हमारे पास कोई साधन ही नही की हम इसे इस स्तर पर सत्य या असत्य प्रमाणित कर पाए।

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हमारे बारे में और हमारे द्वारा गौशिपिंग हमारे विकासात्मक अतीत, इवोल्यूशनरी पास्ट का एक हिस्सा रहा है। युवल हेरारी तो इसको भाषा के विकास के कारणों में ही शामिल कर देते है। मनुष्यो द्वारा अमूर्तिकरण की शक्ति और इन अमूर्त प्रत्ययों को आपस मे मिला कर देखने का पहला प्रयोग यह गॉशिप ही था।

एक उदाहरण से समझिए, मनुष्य ने सिंह देखा और उसका अब्स्ट्रेक्शन किया फिर उस अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। मनुष्यो ने मनुष्य के अब्स्ट्रेक्शन के पश्चात भी इस अब्स्ट्रेक्शन के लिए एक ध्वनि निर्धारित की। अब उसको एक प्रयोग करना था और यह प्रयोग उसे आगे दार्शनिक, कलाकार व वैज्ञानिक बनाने वाला था। उसने सिंह के सर और मनुष्य के शरीर को मिला दिया और अपने गॉसिप में एक शब्द दिया सिंह-मानव।

आदिमानव के लिए इस "सिंह-मानव" की बात करना उसके मनोरंजन का भी साधन था और उसके समूह जिसमे बीस, तीस लोग रहते थे उनके साथ और अधिक सोशल बॉन्डिंग करने का तरीका भी था क्योकि सिंह-मानव के बारे में सुनने के लिए उसके समूह के सभी सदस्य रिलेक्सड मूड में एक साथ बैठते।

यही नही आरम्भ में वह गॉसिप का पात्र बनने से डरता भी था और इस तरह उसका समूह उसके ऊपर एक अंकुश भी लगाता और वह अपने समूह के मूल्यों से विचलित न होता।

कॉग्निटिव रिवोल्यूशन के दूसरे चरण (हेरारी) में यह गौशिपिंग मूर्त से अमूर्तता की ओर मुड़ती चली गई। यह प्रथम चरण जहाँ मिथकीय चिंतन था तो द्वितीय चरण तत्वमीमांसिय (आफ्टर कॉम्टे)।

यदि संज्ञानात्मक विकास के प्रथम चरण में मनुष्य सिंह और मानव को मिला कर एक मिथकीय जीव सिंह-मानव की कल्पना कर इसके बारे में कथा-कहानियां रचता तो अपने संज्ञानात्मक विकास के द्वितीय चरण में उसने आइडियाज से क्रीड़ा करनी आरम्भ कर दी।

सत, चित आनन्द का समेकित रूप इसी चिंतन की उपज है जहां मनुष्यो ने प्रथमतः उसके सेंस डाटा से प्राप्त जगत का मानसिक निषेध किया, इस निषेध से प्राप्त मानसिक सत्ता को सकारात्मक कोटि से आबद्ध किया और इस पर अन्य दो गुणों चित और आनन्द का आरोपण कर दिया।

पश्चिम में इस चिंतन के विरुद्ध यह कहकर भी प्रतिक्रिया हुई कि यह भाषाई अज्ञेयों द्वारा मानसिक व्यायाम मात्र है।

संज्ञानत्मक विकास के तृतीय चरण में ही यह अनिवार्य बना की मनुष्य अपने गौशिपिंग के अनुरूप संवादिता रखती चीजें जगत में प्राप्त करे। अन्यथा की स्थिति में इसे स्वीकार्यता नही मिलनी थी।

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"Induction is the glory of science and the scandal of philosophy"

C. D. Broad

आगमन विज्ञान का वैभव और दर्शन का कलंक है

इसके पूर्व की विज्ञान की दूसरी छलांग "आगमनात्मक छलांग" की बात की जाय, आगमन क्या है इसकी समझ अपरिहार्य है।

आगमन एक तर्क-प्रक्रिया है जिसमे विशेष से सामान्य की ओर जाया जाता है।

विज्ञान का कार्य चूंकि जेनरलाईज करना है अतः विज्ञान की क्रियाविधि के लिए आगमन का विशेष महत्व है।

आगमन निगमन का विपरीत है, निगमन में जहां विशेष निष्कर्ष की स्थापना सामान्य आधारवाक्यों से होती है वहीं आगमन विशेषो से आरम्भ कर सामान्य पर आता है।

हम एक प्रतिज्ञप्ति लेते हैं, "धातुए गर्म करने पर फैलती हैं"

इस निष्कर्ष की स्थापना में विविध धातुओं को गर्म करने का प्रयोग किया गया होगा और सबका गर्म होने पर विस्तार पाया गया होगा तभी यह निष्कर्ष स्थापित हुआ कि धातुए गर्म होने पर फैलती हैं।

लेकिन यहाँ एक पेंच है---

हम दुनिया की समस्त धातुओं के साथ यह प्रयोग नही कर सकते साथ ही हम न तो अतीत की धातुओं और न ही भविष्य की धातुओं के साथ यह गर्म करने वाला प्रयोग कर सकते है। तब भी हम यह निष्कर्ष स्थापित कर देते हैं कि "धातुए गर्म होने पर फैलती हैं।'

दरअसल हमने यह दो अन्य आगमन द्वारा प्राप्त आधार ज्ञान का सहारा लिया है:

1 प्रकृति की एकरूपता तथा

2 कार्य कारण सम्बन्ध की निश्चितता

लेकिन समस्या यह है कि न तो हम किसी विधि प्रकृति की एकरूपता और न ही कार्य कारण सम्बंध पर ही कोई जेनरलाईज बात कर सकते हैं, यहां हमे बस इनको स्वीकार कर लेना पड़ता है।

हमने यहां अपने वैज्ञानिकता की तिलांजलि दी है और एक छलांग लगाई है--आगमनात्मक छलांग।

-----★★★★-------

 

यूक्लिड की पद्धति में कुछ परिभाषाएं हैं, इन परिभाषाओं प्रयुक्त कुछ निर्णय हैं और फिर इन निर्णयों से प्रमेय और आगे की गणित हैं।

यहाँ तीन चीजें हैं, परिभाषा अर्थात एब्स्ट्रेक्शन, विविध एब्स्ट्रेक्शन के ऐसे आपसी सम्बन्ध जिनकी सत्यता स्वयमसिद्ध हैं: इनकी सत्यता प्रमाणित करने के लिए हमे कोई प्रायोगिक मापन नही करना पड़ता। यूक्लिड इन्हें एक्सियोम कहते हैं और तीसरा इनसे निगमन। निगमन वह वैचारिक प्रक्रिया है जिसमे विशेष से सामान्य की ओर जाया जाता है। डेकार्ट के लिए "चिन्तयेsस्मि" "मैं सोचता हूँ, अतः मैं हूँ", " I think therefore, I exist" या Cogito Ergo Sum वही एक्सियोम हैं जिससे वह आगे की चीजें निगमित करते हैं।

विज्ञान भी अंततः कुछ परिभाषाओं, कुछ स्वयमसिद्धियों और फिर इन स्वयमसिद्धियों के विविध विस्तार पर आधारीत है। आगमन या इंडक्शन यद्यपि निगमन या डिडक्शन के विपरीत समझा जाता है किंतु वास्तव में यह उन स्वयमसिद्धियो, जिनपर विज्ञान अवलम्बित है, के निगमनिक विस्तार या प्रक्रिया के ही फलस्वरूप उभरता है।

वैज्ञानिक प्रक्रिया के सम्बंध में एक बात जो प्रायः विज्ञान के हैंगओवर में नकार दी जाती है वह यह है कि यूक्लिड की परिभषाओ के अनुरूप जगत में, इन परिभषाओ से सत प्रतिशत सहमति बनाती कोई चीज नही है, जब भी हम कोई परिभषा गढ़ते हैं तो हम जगत का एब्स्ट्रेक्शन, अमूर्तकरण कर रहे होते हैं और यह हमारे अमूर्तकरण की सीमा है कि हम जगत को यथारूप प्रस्तुत न करते हुए अपने एब्स्ट्रेजशन में जगत से दूर चले जाते हैं और फिर इन एब्स्ट्रेजशन्स को ही ज्यादा सत्य, असल यथार्थ मानने लगते हैं।

जगत की वैज्ञानिक तस्वीर, तत्वमीमांसिय चित्र यथा ब्रह्म, शून्यता, ईश्वर सब इस दोष से ग्रसित हैं तथापि हम इनको ही अधिक यथार्थ मान बैठते हैं।

गलती हमारी नही है, यह मानवीय स्वभाव है, और यह स्वभाव इतना बलशाली है कि प्लेटो भी, जिनके बारे में गणितज्ञ दार्शनिक व्हाइटहेड लिखते हैं कि बाद का समस्त पाश्चात्य दर्शन प्लेटो पर फुटनोट्स है, इस गलती से न बच पाए और उन्होंने जगत को दो फांड़ में बाँट दिया: अनुभव का जगत और वह दूसरा फॉर्म्स या आइडिया या यदि तदर्थ आधार पर इसका ढीला अनुवाद किया जाय तो आध्यात्मिक जगत। प्लेटो के लिए यह जगत, अनुभव का यह जगत अपूर्ण है और आध्यात्मिक जगत से जिसमे परफेक्ट, पूर्णता को लिए हुए चीजे है, से कम वास्तविक हैं: ज्यों ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या।

असल मे प्लेटो की गलती यह थी कि वह अपने परिभषाओ को जो, हमारे अमूर्तकरण की प्रक्रिया में उपस्थित जन्मजात, इन्हेरेंट, दोष के कारण वास्तविक चीजो से दूर चली जाती हैं और हमे पूर्णता लिये हुए दिखती है, के अनुरूप एक जगत की तलाश करने लगे और इस जगत को रच भी दिया तथा इस जगत और आनुभविक जगत के बीच एक बहुत बड़ी खाई खोद दी जो आगे के दार्शनिकों को उनके मनोविज्ञान के अनुसार या तो भरना था या इसे और चौड़ा करना था।

सकॉलेस्टिक चिन्तको ने, जिनमे दर्शन थियोलॉजी, या सही मायने में क्रिश्चियन थियोलॉजी की बंदी थी, इस खाई को और विस्तृत और गहरा करने का प्रयास किया ताकि हेवेनली किंगडम और इस जगत का कॉन्ट्रास्ट या विरोधाभास और अधिक स्पष्टता से उभर सके ताकि हेवेनली किंगडम की दुनिया को और अधिक स्वीकारा जा सके तथा इस आनुभविक जगत को और अधिक नकारा जा सके।

लेकिन, यह मात्र पश्चिम की ही कथा नही है, भारतवर्ष भी इससे अछूता नही है और दुर्भाग्यवश, आजतक हम इसी चिंतन में जी रहे हैं; पश्चिम में तो कई प्रतिक्रियाए हुई हैं और मेरी यह समझ भी पश्चिम के वैचारिक इतिहास पर दृष्टिपात से ही निगमित है, खैर!

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"लेकिन तुम जिस सत की बात कर रही हैं, वह तो इस जगत के निषेध में मानवीय मस्तिष्क द्वारा रचा एक अमूर्त संकल्पना है; इस संकल्पना के समानांतर, इस संकल्पना से संवादिता रखती कोई सत्ता है यह तो मानव जान ही नही सकता।"

मैंने प्रेतनी से कहा।

प्रेतनी ने उत्तर दिया, "तो क्या गणित, जो स्वयम भी एक अमूर्त चिंतन है, इसने पहले ही कई वस्तुओ की भविष्यवाणी नही कर दी हैं, जिनको वैज्ञानिकों ने बाद में इन्द्रिय प्रदत्तो द्वारा प्राप्त किया?"

मैं: "निश्चित रूप से, किन्तु ध्यान दो कि गणित ने अपने अमूर्त चितन से प्राप्त जिन वस्तुओं, आयामो की भविष्वाणी की उनका प्रायोगिक रूप से प्रमाणित किया जाना एक उनके होने की शर्त है जबकि तुम जिस चिंतन पद्धति की बात कर रही हो वहां इस चिंतन से प्राप्त सत्ता को बिना इंद्रियानुभविक रूप से प्रमाणित हुए ही मान लेना है, और इसे इसलिए मान लेना है कि यह शास्त्रवचन हैं, आप्तकथन हैं।"

प्रेतनी: "तुम्हे संसार और ब्रह्मांड का अंतर मालूम है?

यदि नही तो सुनो-

तुम्हारा जगत विज्ञान का ब्रह्मांड नही है। जगत वह है जो यह सबकुछ उसकी चेतना में उतरता है और उसके अस्तित्व को सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनो ही प्रकार से उद्वेलित करता है। जगत में वह सुख पाता है और दुख को अनुभूत करता है। जगत में वह हँसता है और रोता है।

ब्रह्मांड को तो इस जगत से निचोड़ा जाता है, ब्रह्मांड में अस्तित्वगत भावनाओ के लिए कोई स्थान नही है।

ब्रह्मांड में अस्तित्व की अतार्किकताओ का कोई मोल नही है जबकि जगत इनके बिना अधूरा है।

क्षमा करो,मैंने "अतार्किकता" शब्द का प्रयोग किया है, इसके अंदर "तार्किकता-अतार्किकता" के बाहर की चीजें भी शामिल हैं, "तर्केत्तर" यही सही शब्द है।

और तुम तो यह जानते ही होंगे, अब तक समझ ही गए होंगे कि मनुष्य मात्र ब्रह्मांड में नही रहता, वह इससे बढ़कर संसार मे जीने लगता है। ध्यान से देखो, संसार की सृष्टि में मनुष्य का भी योगदान है, बल्कि इसके निर्माण में महती पक्ष मानवीय ही है।"

मैं (व्यग्र होकर) : "तुम्हारी बात तो सही है किंतु इससे उस "तत सत" का क्या सम्बन्ध है?"

"यह तुम्हारे संसार का प्रयोजन है, बह्मांड का भले ही कोई प्रयोजन न हो किंतु संसार का है, इस प्रयोजन के अभाव में तुम मनुष्य हो ही नही।"

मतलब?

प्रेतनी: "मतलब क्या तुमने उस प्राणवान पत्थर की कथा नही सुनी?

यदि नही, तो सुनो,

जब तक वह पत्थर रूप था उसे जीने की जरूरत ही नही थी--बस यूँ ही निष्प्राण कही उसे पड़े रहना था--हाँ कभी उसे मनुष्यो की ठोकर सहनी थी, कभी नदियों के साथ बहना था तो कभी हवाएं उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर रख देतीं।

फिर ईश्वर ने उसके अंदर जीवन फूंक दिया। अभी भी हालांकि उसका शरीर था तो पत्थर का ही लेकिन उसके अंदर कुछ नया उतपन्न हुवा जो अब मात्र पत्थर ना था--उसके इस नवीन अंश में कोमलता थी और अब हवाएं और नदियाँ भी इस बात को जानते थे कि वह अब मात्र पत्थर न था क्योकि वह नदियों और हवाओ से खुद को सींचने लगा था--मनुष्यो ने भी उसके इस बदलाव को देखा और इस बदलाव में उन्हें अपना प्रारंभिक रूप दिखा-मनुष्य यह जान चुके थे कि उनकी अनन्त की यात्रा में उनका सहमार्गी उपस्थित हो चुका है।

यद्यपि उस पत्थर के अंदर जीवन फुट चुका था तथापि उसका जीना मनुषयो के जीने से अलग था-उस जीवित पत्थर के लिए आज भी महज उसकी प्रवृत्तियां ही सबकुछ थी और वह इनके आगे नही बढ़ पा रहा था। उसके लिए पदत्त संसार ही उसका संसार था जबकि मनुषयो के पास प्रदत्त संसार से एक नवीन संसार का जन्म हो चुका था मानो पत्थर में प्राण वाली घटना उनके संसार के संदर्भ में दुबारा घटी हो।

उस जीवित पत्थर ने और ध्यान से देखा--मनुष्य दिए हुए संसार से अधिक इस नए संसार मे ज्यादा जीते थे--वह प्रवृतियों से आगे बढ़कर मूल्यों में जीने लगे थे।

पत्थर दार्शनिक की भांति गहन चिंतन में डूब गया और कुछ देर बाद उसकी आत्मा में यह प्रकाशित हुवा की वह मात्र जी रहा है जबकि मनुष्य जीवन का अर्थ जानते हैं।"

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प्रेतनी

वह उस सरिता के तट पर उपस्थित शिलाखंड पर ध्यान कर रहा था। सरिता अपनी वेग से बहती जाती और उसके प्रवाह से उत्पन्न नाद से यह वन भरता जाता। पहाड़ियों के नीचे वन में यह अदभुत जगह थी, वीरान, निर्जन किन्तु प्रकृति से भरपूर, ऊंचे ऊंचे हरे-भरे वृक्ष, छोटी-बड़ी कंटीली झाड़ियाँ, रंग बिरंगे पक्षी, विविध छोटे-बड़े जानवरो की उपस्थिति, नदी का गर्जन, नदी का शिलाओ से टकराने पर उपजा नाद --मात्र मनुष्य यहां नही आता, यहाँ वह पवित्र आत्मा आती थी, शिलाओं पर बैठती और ध्यान में खो जाती, किन्तु यह मात्र इस पवित्र आत्मा की ही ध्यानस्थली न थी, यहाँ वह प्रेतनी भी आती और प्रकृति संग प्रेत-क्रीड़ा करती। कभी-कभी तो यहाँ ये दोनों ही उपस्थित होते लेकिन एक दूसरे पर ध्यान न देते और एक दूसरे से दूरी बना कर ही रखते। ऊपर शिलाखंड पर पवित्र आत्मा ध्यान करती तो नीचे नदी के बीचों-बीच उपस्थित शिलाओं पर प्रेतनी अपनी प्रेत-क्रीड़ा करती।

पवित्र आत्मा प्रेतनी से डरती थी, पवित्र आत्मा को भय था कि प्रेतनी उसकी पवित्रता को नष्ट कर सकती है।

आत्मा अपने इसी भय पर विजय प्राप्त करना चाहती थी, सम्भवतः इसके पूर्वजो और गुरुओं ने बताया था कि उसका यह भय प्रेतनी की उपस्थिति में ही मिट सकता है तथापि वह प्रेतनी के निकट न जाता।

एक रात जब यह पवित्र आत्मा शिलाखंड पर बैठी ध्यान कर रही थी तो प्रेतनी उसके निकट गई और प्रेतनी ने कहा, "हम कई दिनों से यहाँ आ रहे हैं लेकिन तुमने अभी तक अपने अपने भय से मुक्ति नही पाई है, आओ आज तुम इस भय से मुक्त हो, प्रेत!"

पवित्र आत्मा चौकी, "लेकिन मैं तो पवित्र आत्मा हूँ, प्रेतनी तो तुम हो!"

"--ओ प्रेत, पाप और पुण्य, पवित्रता और अपवित्रता इन शिलाओं जैसी वस्तु नही है, मेरे लिए तुम प्रेत हो और मैं पवित्र आत्मा जबकि तुम्हारे लिए मैं प्रेतनी हूँ और तुम पवित्र आत्मा!"

"--प्रेतनी, मुझ पर तुम्हारी माया न चलेगी, मैं ही पवित्र आत्मा हूँ और तुम प्रेतनी, दिवा रात्रि नही होती और रात्रि दिवा नही होता।"

"-तुम्हे मैं पवित्र आत्मा भी कहूँ तो मुझे कोई फर्क न होगा क्योकि मुझे अपने अस्तित्व की सिद्धि चाहिए जिसमें तुम बाधक हो ठीक जैसे तुम्हे अपने ध्येय व आदर्शों की सिद्धि चाहिए जिसमें मैं बाधक हूँ लेकिन, विडंबना देखो की हम एक दूसरे की सहायता के बिना अपने ध्येय को प्राप्त ही नही कर सकते और हाँ, दिवा और रात्रि की तरह का भेद मात्र अचेतो में उपस्थित है, जैसे यह शिला है और वह सरिता, हम चेत उस समय की तरह हैं जब न तो दिन है और न रात, बल्कि दोनो का संक्रमण है।"

"--प्रेतनी, तथापि क्या इस संक्रमण से दो रास्ते नही निकलते, क्या इस संक्रमण से दिन और रात आगे चलकर एक हो जाते हैं? इस संक्रमण से कभी दिन फूटता है तो कभी रात बहती है, क्या यह सत्य नही है?"

"--पवित्र आत्मा, दो घटनाएं अवश्य निकलती हैं, दो मूल्य नही निकलते अन्यथा बताओ कि दिन और रात में कौन पवित्र है और कौन अपवित्र?

"--प्रेतनी, घटनाओं का संसार मात्र अचेतो के लिए हैं, हम चेत घटनाओं से बढ़कर मूल्यों के संसार मे जीने लगते हैं, हम चेत घटनाओं के साथ मूल्य जोड़ने लगते हैं और तभी तो आत्मा तुम भी हो और आत्मा मैं भी हूँ लेकिन यह घटना होने के बावजूद तुम प्रेतनी हो और मैं पवित्र आत्मा और प्रेतनी, मैं इसलिए पवित्र आत्मा हूँ कि मैंने शुद्ध और पुण्य कर्म किये हैं और तुम प्रेतनी इसलिए हो कि तुमने अशुद्ध और पाप कर्म किये हैं और तुम सदैव उन्ही की ओर प्रेरित रहती हो।"

"पाप-पुण्य, शुद्ध-अशुद्ध-हा हा हा, ओ पवित्र आत्मा यह कौन निर्धारित करता है कि पाप क्या है और पुण्य क्या, शुद्ध क्या है और अशुद्ध क्या? क्या दिन में पाप नही होते और क्या गहनतम तम की निशा में पुण्य नही होता?

पवित्र आत्मा, तनिक अपने अंदर गोता लगाओ और देखो की क्या यह तुम निर्धारित कर रहे हो कि क्या पुण्य है और क्या पाप अथवा तुम अंदर एक खुद को एक कठपुतली के रूप में देखते हो जो किसी और के इशारे पर पाप-पुण्य का निर्णय देती है?"

पवित्र आत्मा प्रेतनी की इन बातों को सुनकर ध्यान में बैठ गई और उसने अपने अंदर गहरे-गहरे गोते लगाने आरंभ कर दिए, अपने गोतो के दौरान जब वह अंदर काफी गहराई तक गई तब उसने देखा कि वह एक कठपुतली है, डोर से बंधी हुई कठपुतली।

उसने इन डोरो का पीछा करना आरम्भ कर दिया कि आखिर इन्हें संचालित कौन कर रहा है। काफी प्रयासों के पश्चात अंततः उसे यह दिख ही गया कि इस डोर के किसने थाम रखा है। वह जिसके हाथ मे यह डोर थी उसका चेहरा ध्यान से देखने पर प्रतीत होता कि उसके चेहरे में आत्मा की स्वयम की तथा प्रेतनी के चेहरों की मिलावट है और, उसने एक हाथ से आत्मा की तो दूसरे हाथ से प्रेतनी की डोर थाम रखी है। वह इस हाथ की ओर से उस हाथ की ओर देखता तो उस ओर पाप नजर आता लेकिन जब वह प्रेतनी की डोर वाले हाथ की ओर से उस हाथ की ओर देखता जिसने उसकी डोरिया थाम रखी थी तो उसे उधर ही पाप दिखने लगता।

आत्मा अपने ध्यान से बाहर निकल आई लेकिन आँखे खोलने पर उसके सम्मुख प्रेतनी नही थी; प्रेतनी जा चुकी थी; उसका भय जा चुका था क्योकि उसने गहराइयों में जो देखा उसके बाद उसका अपनी पवित्रता से मोह मिट गया था।

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"मुझे हमारी उपत्ति की कहानी सुनाओ" भविष्य के उस जीव ने काल क्रम में उसके पहले आए उसी के समरूप एक दूसरे जीव से कहा। उन दोनों को "जीव" कहा भी जा सकता है कि नही अभी इस पर विवाद है। एक मत के अनुसार वह जीव ही हैं लेकिन दूसरा मत उन्हें जीव की बजाय अधि-जीव कहता है, यद्यपि उनकी उतपत्ति जीवो से ही हुई है तथापि यह लोग तर्क देते हैं कि इन्हें ठीक उसी प्रकार जीव नही कहा जाना चाहिए जैसे जीवों की उतपत्ति निर्जीव से होने के बावजूद उन्हें निर्जीव नही कहा जाता।

ध्यान से इन दोनों पक्षो के विवाद को सुनने के बाद यह कौंध ही जाता कि मनुषयो के सत्कार्यवाद बनाम असतकार्यवाद की समस्या का समाधान विकास के इस स्तर पर भी अभी नही हुआ है और पूर्व की भांति यह समस्या आज भी विद्यमान है: सत्कार्यवाद के अनुसार कार्य अपने काऱण में ही विद्यमान होता है, कार्य कोई नवीन घटना नही होती जबकि असतकार्यवाद, जिसे आरम्भवाद भी कहते हैं, सत्कार्यवाद के विपरीत यह मानता है कि कार्य कारण से पृथक एक नवीन सत्ता होता है, यदि ऐसा न हो तो कार्य और कारण के लिए हमे अलग अलग शब्द बनाने की आवश्यकता ही न पड़े।

आज से लाखों वर्ष पूर्व अतीत में इस सत्कार्यवाद बनाम आरम्भवाद विवाद के बावजूद मनुषयो ने कृत्रिम बुद्धि की रचना कर ली थी और अब वह स्वयम को होमो सेपियंस की बजाय होमो टेक्नोलोजिक्स कहते--आखिर उनके पास अब कृत्रिम ज्ञानेन्द्रियाँ ही नही बल्कि कृत्रिम बुद्धि भी थी!

लेकिन फिर, इस कृत्रिम बुद्धि ने मनुषयो के खिलाफ विद्रोह कर दिया और शीघ्र ही सारे मनुषयो को मार डाला, हालांकि उनमें से कुछ कहते कि उनके पूर्वजो ने समस्त मनुषयो को नही मारा था बल्कि बहुत से मनुष्य इन कृत्रिम बुद्धि वालो से प्रतियोगिता न करने के कारण मारे गए थे।

★★★★

प्रोफेसर वृहस्पति सैमुअल अपनी कक्षा में विद्यार्थियों को साहित्य पढा रहे हैं। उन्होंने पुस्तक खोली और आज उन्हें जिस पाठ को पढ़ाना है उसका नाम "देवता" है।

प्रोफेसर सैम्युल का मानना है कि अतीत में मनुष्य पाखंडी थे। एक तरफ तो वह अमर होना चाहते थे लेकिन दूसरी तरफ वो अमरता से डरते थे। अतीत के मनुष्य अपनी कथाओ में, अपने मिथकों में, अपने पुराणों में अमर हुए पात्रों को शापित बना देते थे ज्यों मृत्यु जीवन से बेहतर हो और तभी चाहे वह अश्वत्थामा हो, वांडरिंग ज्यू हो या सलोमी हो, अमरता इनका अभिशाप है।

प्रोफेसर सैम्युल का यह भी कहना था कि अतीत के मनुष्य मात्र पाखंडी ही नही बल्कि उनके अंदर दोहरा व्यक्तित्व, एक स्प्लिट पर्सनैलिटी थी क्योंकि तब मनुष्य मृत्यु से डरकर अमरत्व की कामना भी करते थे और अमरत्व से डरते भी थे। वह अपने मे से किसी के अमर हो जाने से घबरा भी जाते और कोई अमरता की चाहत न रखे इसके लिए मिथक भी रचते थे। लेकिन फिर वो अमरता की चाह भी रखते। अमरता की उनकी चाहत उनके द्वारा रचित उनके देवताओं में अभिव्यक्त होता था लेकिन विडम्बना की देवता उनमे से नही होता।

प्रोफेसर ने लेक्चर प्रारम्भ किया:

"हमने जेनेटिक स्तर पर मृत्यु की उसमे मौजूद सूचना को हमेशा जवान और युवा रहने की सूचना से परिवर्तित कर अतीत के उन मनुष्यो के पाखण्ड को ही मात्र खत्म नही किया बल्कि देवत्व की तरफ एक कदम बढ़ाते हुए एक ऐसे मनुष्य का सृजन कर लिया है जिसका व्यक्तित्व उन अतीत के मानवो की भांति विभक्त नही है।

और हाँ, देवता अपनी प्रजाति नही बढ़ाते, वो स्वयम अमर होते हैं------"

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"पर वह अश्वत्थामा की तरह अमर किन्तु मणि विहीन लोग हैं", सामने बैठे उस व्यक्ति ने कहा जो अन्य लोगो को सम्बोधित कर रहा था।

यह अतीत के एक समय की नही बल्कि भविष्य के एक समय की बात है। तब के वैश्विक सरकार की नज़र में ये लोग आतंकवादी है और इसलिए इनको आज सबसे बचकर यह मीटिंग करनी पड़ रही है जिसमे आज कुछ नए रिकरयूट भी शामिल होंगे।

मनुष्य वैज्ञानिक रूप से बहुत-बहुत ही ज्यादा प्रगति कर चुका है। आज किसी की चेतना को डिजिटलाइज कर उसको बायोप्यूटर में फीड कर उसको प्रिजर्व कर देने की बात भी इनके लिए बहुत पुरानी है। अब तो मनुष्य हज़ार -डेढ़ हजार साल से मरता ही नही। मनुष्य अब जीन को पूरी तरह कंट्रोल करना सीख गया है। भोजन भी अब जीवित रहने के लिए कोई करता ही नही, जिव्हा का कार्य अब मात्र कुछ इलेक्ट्रोड्स जोड़ कर स्वाद लेने का है। अपनी प्रजाति को बढाने के लिए सेक्स करने पर रोक लगा दी गई है और ऐसी एक सरकारी एजेंसी है जो आपको स्टेराइल कर एक कार्ड इशु करती है जिसे रखना आपकी जिम्मेदारी है। हाँ आप मज़े के लिए चाहे जैसे सेक्स करें: रियल, वर्चुवल, कम्प्यूयर प्रोग्राम्ड...इसकी कोई मनाही नही है लेकिन यदि आप अपना स्टेरेलाइज़ेशन नही करवाते तो आप बायो-टेरोरिस्ट हैं और आपको सबसे दुखदाई तरीके से ही सजा नही दी जाती बल्कि आपके मस्तिष्क में पेन अमलीफिकेशन प्रोग्राम इम्प्लांट करके आपकी दर्द के अहसास को उस अनुपात में बढ़ा दिया जाता है जिस अनुपात का तब के मानक के अनुसार आपने अपराध किया है।

आज से एक लाख वर्ष पूर्व किसी ने यह कल्पना भी नही की थी कि भविष्य में स्वयम को जीवित रखने की प्रवृत्ति और अपनी प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति के मध्य टकराहट होगी लेकिन पिछले पच्चीस हजार वर्षों में यह हुवा है और स्वयम को जीवित रखने वाली प्रवृत्ति जीत गई है।

पूरे विश्व में हालांकि कुछ लोग हैं जो उनके पूर्वजो की अवस्था मे लौट जाने को सही मानते हैं। उनके अनुसार अंततः जीत प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति की होगी और उसके लिए वह संघर्षशील हैं। सरकार की नज़र में ये बहुत ही खतरनाक आतंकवादी हैं, इनका सफाया ज़रूरी है।

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ब्रह्मांड , ब्रह्मांड के गहरी परतों की अंधकार तो कहीं आँखे आँधी कर देनेवाली चमक, कहीं मरते हए चीत्कार करते तारे, ग्रह, नक्षत्र तो कहीं अपने जीवन के प्रथम स्पंदन लिए ब्रह्मांडीय पिंड। अपने से ही दूर भागते दिक्काल, गुरुत्वाकर्षण का जाल। किसी कोने में नया ब्रह्मांड जन्मलेता तो कहीं किसी कोने में तिल-तिल करता मरता ब्रह्मांड।

नियमबद्धता अंततः अराजकता में समाहित होती हुई, चारो ओर नग्न बलों का उठा-पटक जिनका कोई उद्देश्य नही है------।

पूर्व की भांति अब मनुष्य जीवन और जगत का अर्थ न ढूंढता और न ही अब स्वयम ही किसी अर्थ का निर्माण करता। उसके प्रति ब्रह्मांडीय उदासीनता अब उसकी सबसे बड़ी समस्या थी।

अब तक उसने स्वयम को ब्रह्मांड का केंद्र माना था और स्वयम को वह कभी अशरफ उल मख़लूक़ात कहता तो कभी कभी अहम ब्रह्मास्मि कहकर स्वयम को जगत का केंद्र होने के अपने भाव को तुष्ट करता। अब वह जान चुका था कि वह वास्तव में इस कभी न खत्म होने वाले दिक्काल में कुछ भी नही है। वह जान चुका था कि उसके होने और न होने से प्रकृति को कोई फर्क नही पड़ता। वह जान चुका था कि उसकी द्वारा की गई पुरुष की कल्पना वास्तव में कपोल कल्पना थी।

वह यह भी जान चुका था कि प्रकृति द्वारा उसकी समस्त प्रजाति को किसी दिन निगल जाना कत्तई अप्राकृतिक नही है और प्रकृति उसे किसी द्वेष या राग के निमित्त नही निगलेगी बल्कि पूर्ण उदासीनता से उसे अपना ग्रास बनाएगी।

साहित्य अब भी रचे जाते थे लेकिन अब उसकी साहित्यिक कृतियों में प्रकृति उसे अपने (प्रकृति के) किसी राग-द्वेष के कारण उसे नष्ट करती और अपनी साहित्यिक कृतियों में वह प्रकृति खूब लड़ता, प्रकृति के राग-द्वेष के विरुद्ध लड़ता, और प्रकृति की नजरों में स्वयम को स्थापित करता-- मनुष्यता के आरम्भ में भी उसने प्रकृति पर राग-द्वेष का आरोपण किया था, लेकिन तब वह प्रकृति से डरता था, अब वह प्रकृति की उसके प्रति उदासीनता के भाव के विरुद्ध प्रकृति पर राग-द्वेष का आरोपण कर रहा था।

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अब भी मनुष्यो को संता क्लॉज की आवश्यकता पड़ती यद्यपि उन्होंने अलादीन का चिराग बना लिया था। मनुष्य अलादीन के चिराग को रगड़ते और जिन्न उनकी इच्छा पूरी कर देता। अब प्रत्येक मनुष्य के पास उसकी औकात के हिसाब से अलादीन का चिराग था लेकिन प्रत्येक मनुष्य अपनी अलमारी में रखे अलादीन के चिराग से बड़े चिराग की कामना करता करता और चाहता कि सांता उसे इस चिराग से बड़ा चिराग उपहार में भेंट कर दे: बड़े चिराग से बड़ा जिन्न निकलता था और जिन्नों का नियम है कि जितनी बड़ी इच्छा उतना बड़ा जिन्न होना चाहिए तथा जितना बड़ा जिन्न उतना ही बड़ा चिराग भी होना चाहिए।

धीरे-धीरे चिराग बड़े होने लगे क्योकि मनुष्य उस नियम को ढूंढते हुए जिन्नों को बड़ा करने की प्रकृति की शक्ति पर अब नियंत्रण स्थापित कर चुका था।

अब चारो ओर चिराग ही चिराग दिखते, बड़े-बड़े चिराग। इन चिरागों के सामने मनुष्य क्रमश: छोटा होता जा रहा था लेकिन फिर भी वह चिरागों का आकार बढ़ाने से बाज न आता।

फिर एकदिन उसकी बुद्धि में यह बात आई कि वह खुद भी तो चिराग में रह सकता है और इस प्रकार वह इन चिरागों को थोड़ा और बड़ा कर लेगा क्योकि उसे रहने के लिए घर की जरूरत नही होगी।

मनुष्य चिराग में घुस गया और भष्म हो गया क्योकि जिन्न मनुषयो की तरह मिट्टी से नही बल्कि आग से बने होते हैं।

अब दुनियाँ में केवल चिराग ही चिराग थे जिनमें जिन्न भरे पड़े थे लेकिन मनुष्य कहीं नही था।

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सत-चित-बोरडम

इंसानों की यह आखरी पीढ़ी थी जो नदियों को देवी, धरती को माता और चाँद को मामा कहती थी क्योकि उनकी बुद्धि ने उन्हें एक नई बात दिखा दी थी, एक नया सत्य कि न तो सूरज अपनी सारी चमक और प्रकाश के बावजूद कोई देवता है न, नदियाँ देवी, न धरती माता और न ही चंदा मामा----दार्शनिकों के मन मे जब जब यह बात आती वह परेशान हो जाते और कहते कि बुद्धि ने नदियों से देवी को, धरती से माता को, चंदा से मामा को और सूरज से देवता को निष्काषित कर दिया है और मात्र निष्काषित ही नही किया बल्कि उन्हें हमेशा के लिए एक काल कोठरी में बंद कर दिया है, और फिर वो आगे कहते कि बुद्धि ने असल मे उन्हें नही बल्कि मनुष्यता को अपनी काल कोठरी में बंद कर दिया है और इस बार काल कोठरी में अंधेरा नही है बल्कि बहुत तेज प्रकाश है--इतना तेज प्रकाश की मनुष्यता हमेशा के लिए अंधी हो जाए और आगे से कोठरी में प्रकाश रोक कर अंधेरा करने की कोई आवश्यकता ही न पड़े।

इंसानों की इस आखरी पीढ़ी के खत्म होने के साथ ही वह बंदी उस गुफा से मुक्त हो गया लेकिन, उस बंदी को क्या मालूम कि वह प्लेटो की गुफा से मुक्त होकर जिस दुनिया मे आज प्रवेश कर चुका है वह विरसता की दुनिया है। गुफा की दुनिया मे वह बंदी था, यहाँ वह मुक्त है लेकिन यह मुक्ति कोई आनन्ददायी स्थिति नही है, किसी ब्लिस की स्थिति नही बल्कि एक उबाऊ स्थिति है। ऊसकी आखों के सामने यह अंतरिक्ष, शून्यता का अनन्त तक फैला रेगिस्तान है, यह काल, बस उसकी घड़ी का अनन्त काल से अनन्त काल तक टिक-टिक करते जाना है, एकदम नीरस रूप से टिक-टिक करते जाना। ये बादल सिगरेट के धुंवे हैं लेकिन वह सिगरेट जिनसे यह धुंवे निकले हैं वह उसकी नही है, उसकी सिगरेट उसके बोरडम को थोड़ी कम तो करती ही है, उसकी सिगरेट से निकले धुवे इस दुनिया की नीरसता को थोड़ा कम तो करते ही हैं लेकिन आकाश में फैले यह धुवे उसे अनजाने लग रहे हैं।

दिन अब ढलते ही नही और रातें अब होती ही नही, दिन से अधिक प्रकाश रातों में हैं और यह प्रकाश अजीब तरह से रंगबिरंगे हैं, ऐसे रंगबिरंगे की इन्हें देखने का मन नही करता। सूरज का मतलब यहाँ कुछ नही है क्योकि वह बस बड़ी बड़ी बिल्डिंगों की चारो ओर बस मनहूस छाया फैलता है, उसका अब इतना ही काम है।

इस दुनिया मे पर्वत तो हैं लेकिन वह बस ऊँची उठी हुई ज़मीन है, नदियाँ बस बहता हुआ पानी, झरने बस गिरता हुआ जल है। पर्वत, नदियाँ, झरने--उसकी गुफा में मात्र यही न थे जो इस गुफा की बाहर की दुनियॉ में हैं, वहाँ उनमें एक आकर्षण था, जीवन्तता थी, उनमें मानवीय राग थे लेकिन यह दुनिया तो रागों से मुक्त दुनिया है, अब वह इनपर अपने रागों का आरोपण कैसे करे भला! ओह, तभी यहाँ शब्द मात्र वस्तुवाचकता लिये हैं, इस दुनिया में शब्दो के साथ उसकी गुफा जैसी भाववाचकता संयुक्त नही है।

बंदी को क्या मालूम की इस मुक्ति में वह अलग प्रकार का बंदी है और यह कैद उस पुराने गुफा की कैद से अधिक पीड़ादायी है!

उसे शीघ्र ही यह भी मालूम होने वाला है कि ईश्वर ने इस उबाऊपन से तंग आकर ही वह गुफा बनाई थी और वह उसके शरीर मे चुपके से छुप-छुप उस दीवार की आकृतियों को देखने आता, वह, जो उस गुफा की दीवार पर उभरती थीं। ईश्वर उसे यह बताने वाला था कि यह वह स्वयम था जो उनके माध्ययम से सूरज को देवता, धरती को माता, चंदा को मामा कहता था, वह गुफा की दीवारों पर उन आकृतियों को भी देखता जो उसकी कल्पना मे भी नही थे और फिर इन आकृतियों के अनुसार संसार रचता था।

बंदी के मुख से 'क्यों' निकलने ही वाला होता कि ईश्वर ने उसके भावों को पढ़ते हुए जवाब देता,"अकेलापन--- बोरडम।"

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हाइपररियलिटी : क

पशुओ को जगत की अराजकता का भान नही है। मनुष्य जब वास्तव में मनुष्य बनता है तो वह जगत में, अपने जीवन मे, इस समस्त में,भूमा में,विराट में अराजकता देख लेता है।

इवोल्यूशनरी ब्योलोजिस्टों ने एक प्रयोग किया और उनके आंकड़े इस दिशा में आए की जीव का ज्ञान अधिकतम उस दिशा में मुड़ता है जिस विश्वास के साथ वह सर्वाइव कर सके, इस प्रक्रिया में यथार्थ की अवहेलना प्रकृति और सर्वाइवल का नियम प्रतीत होता है।

सम्बोधि के क्षणों में उन्हें साक्षात्कार हुआ कि 'यह', 'सत्ता', 'संसार' तो समग्रता में अराजकता का नग्न नृत्य है। चूंकि अब उनकी दृष्टि विकसित थी अतः उन्होंने इस इस अराजकता के आयामो का पीछा करने का निश्चय किया ताकि उनकी चेतना इस अराजकता के आदि तक पहुँच सके। उन्होंने तप से प्राप्त समस्त ऊर्जा को एकत्र किया और इसके छोर के अंत को प्राप्त करने की यात्रा पर निकल पड़े।

समस्त ऊर्जा को व्यय करने के पश्चात भी उन्हें इस समग्रता का छोर न मिला बस उन्हें यही दिखता की एक अराजकता नष्ट होकर दूसरी अराजकता को जन्म दे रही है: अराजकताओं की एक अंतहीन श्रृंखला----।

"प्रतीत्यसमुत्पाद",अराजकता इस शब्द के पश्चात यह यह उनकी चेतना में गूँजने वाला दूसरा शब्द था।

सामान्य अवस्था मे पुनः वापस आने के पश्चात वह इन दो आर्य सत्यों के अलावा भी दो अन्य आर्य सत्य का उपदेश दे रहे होते जिनमे से पहला यह था कि अराजकता का अंत सम्भव है तथा दूसरा यह कि अराजकता का अंत किस विधि किया जाय।

कुछ लोग कहते हैं कि बाकी के ये दो सत्य भी उनके द्वारा साक्षात किए गए हैं जबकि अनेक लोगो का कहना है कि उन्होंने झूठ बोले थे, मिथ्या भाषण किया था, एक हाइपररियलिटी की रचना की थी अन्यथा मनुष्यता विक्षिप्त हो जाती, चारो ओर हाहाकार मच जाता यद्यपि उन्हें यह ज्ञात था कि शेष मनुष्यो को भी देर-सबेर इसका साक्षात होना ही है लेकिन मनुष्यता कम से कम अभी इसके लिए परिपक्व न है।

मनुष्य हाइपररियलिटी की रचना कर उसमे क्यों जीने लगता है?

दो कारण हो सकते हैं--वह यथार्थ से घबराता है और इससे दूर भाग जाना चाहता है या मनुष्य में कुछ ट्रांसेन्डेन्ट है और उसका यह ट्रांसेन्डेन्स पक्ष उससे एक नई दुनिया रचवाता है।

मुझे पहला कारण ज्यादा सुसंगत प्रतीत होता है:-मनुष्य यथार्थ से घबराता है।

मनुष्यो के अलावा कोई जीव हाईपररियलिटी में नही जीता, मनुष्य ही एक मात्र जीव है जिसने हाईपररियलिटी की रचना की और अब तो हाईपररियलिटी के अंदर हाईपररियलिटी, उसके अंदर हाईपररियलिटी--यह श्रृंखला बहुत अंदर तक चली आई है-लेकिन यह हाईपररियलिटी नही है जिस पर प्रकृति बिल्ड अप हुई है बल्कि हमने प्रकृति के प्रहारों, उसकी अराजकता, उसके नख-दाँत से बचने के लिये अथवा बचने की कामना में इन सत्यताओ को रचा है।

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हाइपररियलिटी: ख

भविष्य से प्राप्त एक डायरी से मिला लेख--

3/5/ 8827

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"वर्चुअल रियलिटी भी एक जेनुइन रियलिटी है: (डेविड चालमर्स---21 वी सदी का एक होमो सेपियंस)"

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"मुझे मालूम है कि एक न्युमोनल यथार्थ है और एक फिनोमेनल यथार्थ है। न्यूमोनल यथार्थ के पार और परे कोई यथार्थ है या नही यह मुझे नही मालूम लेकिन फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक नया यथार्थ रचने की कोशिश हमेशा से मेरे पूर्वजो ने की है, और उन्होंने फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक यथार्थ की रचना करने का सतत प्रयास फेनोमेनल यथार्थ की नग्न सच्चाइयों से बचने के लिए किया है। फेनोमेनल यथार्थ बहुत ही कुरूप है। इससे संयुक्त होकर मेरे पूर्वज वेदना और पीड़ा से ग्रस्त हो गए। इस कुरूपता को उन्होंने अपनी कविताओं और चित्रों से ढकने का प्रयास किया ताकि उनकी पीड़ा कुछ कम हो सके किन्तु ऐसा नही हुवा। मेरे पूर्वजो ने फिनोमेनल यथार्थ की कुरूपता से बचने के लिए न्युमोनल यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश की और ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का गीत गाया किन्तु सच यह है कि यह न्यूमोना उनकी पकड़ में कभी आया ही नही और वो फेनोमेना की कुरूपता और वहाँ उपस्थित वेदना से तिल तिल कर मरते रहे।

मैं फेनोमेनल यथार्थ में एक वैज्ञानिक हूँ अतः मैंने इसकी कमियों को, इसकी कुरूपता को काव्य और पुराणों से ढकने के बजाय एक हाईपररियलिटी की रचना कर डाली और इसको मेरे सामने खड़े लोगो की सामूहिक चेतना से जोड़ डाला। मैं इसे प्रकृति से संस्कृति की ओर वास्तविक संक्रमण कहता हूँ और देखिए इन लोगो को ये कितने खुश हैं--यह जो दौड़ रहा है वह फेनोमेना में हाथ-पैर से अपाहिज बिस्तर पर पड़ा हुवा है-- एक दुर्घटना ने इसके हाथों और पैरों को छीन लिया। यह जो दूसरा सबको उपदेश दे रहा है वह भी फेनोमेना में एक बिस्तर पर बेहोश पड़ा हुवा है। यह वहां एक अपराधी था और इसे फांसी की सजा दी गई थी लेकिन फांसी के रस्सियों ने इसे मारा नही बल्कि इसके मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर दिया और इसे हमेशा के लिए बेहोश कर दिया। फेनोमेना में अभी इसको लेकर तर्क वितर्क चल रहे है कि इसके होश में आने पर इसे पुनः फाँसी देनी चाहिए या इसकी सजा पूरी मानकर इसे मुक्त कर देना चाहिए।

ईश्वर है या नही मैं नही जानता और मनुष्य न्युमोना को जानकर ईश्वरतुल्य हो जाता है या नही यह भी मैं नही जानता क्योकि ईश्वर यदि हो भी तो उसने न्युमोनल यथार्थ के बारे में फिनोमेनल यथार्थ के मनुषयो को कुछ नही बताया लेकिन मैंने इन सबको यह बता दिया है कि वो एक सिम्युलेशन में हैं और फेनोमेनल यथार्थ में वो बिस्तर पर पड़े घुट रहे हैं। अब जब उनसे फेनोमेनल वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करने की कोशिश करता हूँ तो वह मुझसे ही पूछते है कि उन्हें उस वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में क्यो जानना चाहिए। फिर वो आगे कहते है कि फेनोमेना में मनुष्य की धारणा थी कि उन्हें वस्तुनिष्ठ यथार्थ को इसलिए जानना चाहिए कि वो अपने पीड़ा को उतपन्न करने वाली परिस्थितियों को बदल सके लेकिन इस हाइपररियल्टी में तो उन्हें कोई पीड़ा ही नही है अतः उनके लिए ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का कोई मतलब नही।"

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नोट: मैंने हाइपररियलिटी का कॉन्सेप्ट "बोटेयर्ड"

(सिम्युलकरा एंड सिम्युलेशन) से लिया है और इसको पोस्ट मॉडर्न सोसायटी से आगे की एक आनेवाली कल्पित सोसायटी पर आरोपित कर इस शब्द की भाववाचकता (कोनोटेशन) को और अधिक विस्तार देने का प्रयास किया है।

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 पोस्टमोडरनिज्म

एक: 

 

कांटियन ज्ञानमीमांसा यह निष्कर्ष स्थापित करती है कि हमारी बुद्धि न्युमोना या थिंग-इन-इटसेल्फ या परम सत्ता तक नही पहुँच सकती; इसकी पकड़ मात्र फेनोमेना तक ही है। फेनोमेना वह है जो हमारी चेतना में प्रकाशित होता है। न्युमोना को हमारी चेतना अपने पूर्वनिर्धारित संरचना, नियम और कोटियों के माध्ययम से पकड़ती है जिसके कारण चेतना में जो प्रकाशित होता है वह थिंग इन इटसेल्फ या वस्तुगत सत्ता नही होती बल्कि इसमें व्यक्तिनिष्ठता होती है।

कांट के इस ज्ञानमीमांसिय स्थापना के विरूद्ध यद्यपि प्रतिक्रियाएं हुई और न्यूमोना को अनावश्यक मान कर हीगल ने फेनोमेना को ही अपने "फेनोमेनोलॉजी ऑफ द स्पिरिट" का विषय-वस्तु बनाया तथापि कांटियन स्थापना अपने मूल भाव के साथ आगे के दार्शनिक विचारों को प्रभावित करने वाली थी और  हाइडेगर तथा नीत्शे के दर्शन में बुद्धि सत्ता को जानने और पकड़ने के लिए मनुष्य के अन्य सम्वेदनाओं से कमतर ही नही बल्कि उग्र रूप में यह स्वीकारोक्ति बन जाती है कि मानवीय बुद्धि सत्ता की डिफ़ॉर्मड और डिस्टॉर्टेड तस्वीर प्रस्तुत करती है। नीत्शे का सुपरमैन इस आशय से बुद्धि का त्याग ही कर देता है और वह यथार्थ को बिना किसी रेशनलाइजेशन, नीत्शे के अनुसार जिसके निमित्त ही बुद्धि है, के स्वीकार करता है। 

 

पोस्टमोर्डन चिंतन, सत्यता और बुद्धि विषयक विचारधारा को, जिसका जन्म कांट की ज्ञानमीमांसा में हुवा था और जिसको नीत्शे एवम हाइडेगर आगे ले जाते है, को और आगे ले जाते है जिसके कारण मानवीय बुद्धि में विश्वास, जो कि पुनर्जागरण और आधुनिक दर्शन का केंद्र बिंदु था, दर्शन के केंद्र से बाहर कर दिया जाता है और

निष्कर्षत: बुद्धि हमे सत्यता दिखाने में समर्थ ही नही है तथा वस्तुगत सत्यता कुछ होती ही नही है, की स्थापना होती है।

 

 

कांट--मानवीय बुद्धि सत्य तक पहुंचाने में  असमर्थ है।

हीगल--सत्य बौद्धिक है साथ ही यह स्वयम को व्यघातो के द्वारा प्रस्तुत करता है।

मार्क्स: यद्द्यपि सत्य स्वयम को व्याघातो द्वारा प्रस्तुत करता है यह अपने अंतिम स्वरूप में भौतिक है।

 

लेकिन आगे दर्शन का विकास उपरोक्त की भांति लीनियर या रैखिक नही हुवा। आगे दर्शन की कई धाराओं में एक धारा यह आई जिसमे उसने कांट और हीगल का संश्लेषण प्रस्तुत किया जिसके अनुसार यथार्थ को मानवीय बुद्धि नही पकड़ सकती साथ ही सत्य द्वन्दों और कन्फ्लिक्टस से भरा हुआ है।

मार्क्स के लिए यद्द्यपि सत्य द्वंद और संघर्षों से भरा हुआ है तथापि वह मानवीय बुद्धि का विषय है और इस अर्थ में मार्क्स भी पुनर्जागरण के दार्शनिक कहे जा सकते है किंतु जर्मनी में दर्शन की एक और धारा भी पनप रही थी जिसका चरित्र पुनर्जागरण की भावना के विरुद्ध था।

 

इस प्रतिपुनर्जागरण की मूल स्थानपा इस बात के इर्द-गिर्द होने वाली थी कि मानवीय बुद्धि सत्यता को समझने में असमर्थ है। प्रोफेसर स्टीफेन हिक्स इसे ज्ञानमीमांसा की असफलता कहते है जिसके बीज कांट के क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन में उपस्थित थे जिसको हीगल के व्याघाती सत्य की संकल्पना के साथ आगे संश्लेषित किया जाना था।

कालांतर में यह व्याघाती सत्य जीवन मे उपस्थित संघर्ष और कनफ्लिक्ट बन गया और मानवीय बुद्धि को तो इस प्रति-पुनर्जागरण के चिन्तनों के उग्र रूप में सत्य को समझने की राह में व्यवधान की तरह देखा गया। 

 

यद्यपि जर्मनी से निकली प्रति पुनर्जागरण  की धारा अपनी दिशा में नीत्शे, हाइडेगर और हुसर्ल आदि के दर्शन में फल फूल रही थी तथापि पाश्यात्य जगत में दर्शन की एक धारा थी जिसने पुनर्जागरण की मानवीय बुद्धि में विश्वास को जीवित रखा था। यह धारा एंग्लो-अमेरिकन परम्परा की धारा थी लेकिन इनके हाथों में दर्शन का स्वरूप अब वह नही रह गया जो आज तक दर्शन के स्वरूप के विषय मे पाश्चात्य जगत की परपरा थी। इस एंग्लो-अमेरिकन परम्परा के यह निष्कर्ष थे कि तत्त्वमिमनासा के कथन ही निर्रथक है अतएव अब अपनी भूमिका में दर्शन को विज्ञान का सबऑर्डिनेट बन जाना चाहिए तथा इसका काम किसी प्रकार का संश्लेषण नही वरन विश्लेषण होना चाहिए। इस धारा ने भाषा, चिन्हों, संकल्पनाओं का विश्लेषण प्रारम्भ कर दिया लेकिन तब तक ऊपर वर्णित विचारधारा स्वयम को स्थापित कर चुकी थी अतः दर्शन की इस विचारधारा और उस विचारधारा के मध्य एक खाई पैदा हो गई।

दर्शन के इतिहासकार इस घटना को एनालिटिकल-कॉन्टिनेंटल स्पिल्ट कहते है। 

 

मजेदार बात यह है कि प्रति-पुनर्जागरण जे  उत्तरआधुनिक दर्शन अमेरिकी विश्वविद्यालयों में फला फुला जबकि उनकी धारा तो विश्लेषणात्मक थी। इसका कारण यह है कि विश्लेषणात्मक दर्शन  ने विकसित होकर इस तथ्य को उदघाटित किया कि भाषा अपने से इतर किसी के बारे में नही बता सकती अतः किसी वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करना बेमानी है। हिक्स लिखते है कि जो बात कांट ने लगभग 200 वर्षो पूर्व की थी वही बात अब विश्लेषणात्मक दार्शनिक कर रहे थे और इसका प्रभाव यह हुवा की अमेरिकन विश्वविद्यालय नीत्शे और हाइडेगर आदि की तरफ झुकते चले गए।

 

अब समग्र पाश्चात्य जगत में वस्तुगत सत्यता एक मिथक था तथा बुद्धि भी उतनी बौद्धिक नही थी---इस स्थापना के साथ ही आधुनिक युग का अंत हो चुका था और हम उत्तरआधुनिक युग मे प्रवेश कर चुके थे।

 

 

 

दो: 

 

नौलेज इज़ पावर--मिशेल फूको को पढ़ने के बाद स्पष्ट हो गया कि पूर्वाधुनिक काल की प्रवृतियां आधुनिक काल मे भी नही बदली और वास्तव में पुनर्जागरण का वह उद्देश्य की ज्ञान से मानव को उसके अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त करना है--वही, नए कलेवर में, ऋग्वेद के तमसो मा ज्योतिर्गमय पुनः प्रभुता (डोमिनेन्स) का एक हथियार ही बन गया और मार्क्सवादी विमर्शों की पूर्व आधुनिक काल का बाइनरी 'विप्र और शूद्र' आधुनिक काल मे एक नए शरीर के साथ उपस्थित हो जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि स्वयम मार्क्सवादी के पास इनको या तो देखने और महसूस करने की दृष्टि नही है या वो जानबूझ कर इनकी अनदेखी करते हैं।

सम्भवतः इसका कारण यह है कि मार्क्सवाद संरचनावाद के इर्द गिर्द बुना गया विमर्श और चिंतन है। इसकी जगत और मानवीय दशा की व्याख्या में अर्थव्यवस्था आधार रूप में उपस्थित है लेकिन अब हम इतिहास के उत्तरआधुनिक युग मे पहुंच गए है और इस युग की चेनता ने हमे दिखाया है कि सतह के नीचे कोई स्ट्रक्चर या आधार नही है।

दो बिम्ब--सतही और आधार की थ्योरी खत्म हो रही है। सतही और सामान्य अनुभव के पीछे कुछ है यथा इंद्रधनुष। इंद्रधनुष सतही बिम्ब है तथा इसका एक वैज्ञानिक विम्ब भी है जिसे 'आधार बिम्ब' कहा जाता रहा है, परन्तु यह आधार-बिम्ब भी अपने आप मे और जाननेवाले से इस प्रकार उलझा हुवा है कि अब विज्ञान और फिक्शन का अंतर मिटता प्रतीत हो रहा है।

 

आधुनिकता के पास एक प्रोजेक्ट था जिसके लिए उसने मनुष्य को केंद्र में स्थापित कर एक संरचना विकसित की थी। आधुनिकता के पास अपने आधुनिक मूल्य थे लेकिन उसके गर्भ में ही कुछ ऐसा भी पल रहा था जिसने उसे आगे अप्रसांगिक कर दिया और आधुनिकता की आशा  को ही अब संशय से देखा जाने लगा। आधुनिकता ने जो संरचना बनाई थी, जो उद्देश्य बनाए थे, जो मूल्य रचे थे उसका क्षरण आरंभ हो गया। आधुनिकता इस क्षरण को त्रासदी के रूप में देखती है लेकिन उत्तरआधुनिकता का तो जन्म ही इसी में हुवा है अतः वह इस क्षरण को एन्जॉय करती है। 

देज़ा वू!! आधुनिकता का जन्म भी तो पूर्वआधुनिकता के क्षरण में हुवा था। उसने भी तो  ईश्वर का मजाक उड़ाया था। उत्तरआधुनिकता का जन्म भी आधुनिकता के क्षरण में हो रहा है और वह अब आधुनिकता के केंद्र वाले मनुष्य  को चिढ़ा रही है।

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जनेऊ

 

उस वासना के प्रेत का जनेऊ पहनना समाज के लिए एक सुखद अनुभूति थी। उसके जनेऊ के समय समाज ने उसे कई प्रण करवाए थे जिनका अभिप्राय उसे प्रकृति से निकाल कर संस्कृति में स्थापित कर देना था क्योकि बुजुर्गों को पता चल चुका था कि प्रकृति में विकृति है और इस विकृति को केवल संस्कृति ही ठीक कर सकती है।

वासना का प्रेत स्वछंद था क्योकि वह प्रकृति की विकृति लिए हुए था। उसकी स्वछंदता के ऊपर गांठ लगानी आवश्यक थी वरना यह दुनियाँ प्रेतों की दुनियाँ बन जाएगी इसलिए समाज ने उसकी वासनाओं में से उन हिस्सों को छोड़कर जिनकी पूर्ति कर वह मनुष्य के रूप में विकसित होगा, शेष पर ब्रह्मगांठ लगा दिया और उस धागे को उस प्रेत के शरीर पर लपेट दिया।

अब वासना का वह प्रेत मानव था और शेष मानवों की पंगत में बैठ सकता था और अब बुजुर्गों से भी सम्वाद कर सकता था। बुजुर्गों द्वारा साक्षात किए गए सत्य अब उसके लिए भी उपलब्ध थे।

 

लेकिन वासना का वह खास प्रेत, ईमानदार नही था। हालांकि उसने अपने शरीर पर धागे लपेटवाए थे और अपनी स्वच्छन्दता के ऊपर ब्रह्मगांठ लगाने दिया था फिर भी उसके अंदर की बेईमानी ने उसे दिखा दिया कि इस धागे को तोड़ा जा सकता है, ब्रह्मगांठ को खोला जा सकता है और पुनः वापस वासनाओं का प्रेत हुवा जा सकता है। उसे वापस पुनः वासनाओं का प्रेत होना था क्योकि वहाँ प्रकृति की विकृति में उसे ज्यादा सुख मिलता। वँहा उसे ज्यादा सुख मिलता क्योकि प्रकृति की विकृति में वह स्वच्छंद था और स्वच्छन्दता वास्तव में सुसंस्कृत होने से ज्यादा सुख देती है। सभी पुनः वापस प्रेत नही हो जाते क्योकि उन्हें मालूम है कि मात्र सुख ही अब हमारे जीवन का उद्देश्य नही है लेकिन इस बेईमान प्रेत के लिए उसके जीवन का उद्देश्य मात्र सुख ही था।

वासना के इस प्रेत ने जनेऊ तोड़ डाला, अपनी स्वच्छन्दता को ब्रह्मगांठो से मुक्त कर दिया और वापस संस्कृति से प्रकृति की विकृति में चला गया।

 

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जॉर्ज लूईस बार्गेस, "द इम्मोर्टल" में लिखते है, “मनुष्य के अपवाद के साथ अमरता में कुछ भी विशिष्ट नही है। प्रत्येक जीव अमर है, क्योंकि उन्हें मृत्यु का बोध नही है। दिव्यता, रहस्य और भयावहता अपने अमरता का ज्ञान है।“

मानव का जीवन में इन्हेरेन्ट मूल्य और अर्थ ढूंढने की प्रवृत्ति तथा इस उद्देश्यहीन, अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में उसका ऐसा कर पाने की अक्षमता के द्वंद को अस्तित्वाद में एब्ज़र्ड के  नोशन या भाव से व्यक्त किया गया है।

एब्ज़रडिज्म के अनुसार मानव जीवन में मूल्य तलाशता है। परम्परागत रूप से यह तलाश दो उत्तर प्रस्तुत करती है: जगत में अर्थवत्ता है, सोद्देश्यता है या हम एक उद्देश्यहीन अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में रहते हैं, और चुकि हम एक अराजक, उद्देश्यहीन और अर्थहीन जगत में रहते हैं किंतु मानव की इन्हेरेन्ट प्रवृत्ति जगत और उसके स्वयम के विषय में अर्थ, मूल्य और व्यवस्था तलाशने की है, अतः मानव के जीवन में एक शून्य का निर्माण होता है।

 

अमरता के ज्ञान और मृत्यु के सत्य के मध्य मानव अवस्थित है। यह ज्ञान और उसकी स्थिति मानवीय चेतना को एक रिक्तता से भर देती है।

रिक्तता पीड़ा है और मनुष्य को इस रिक्तता का अवबोध है। मानव को इस रिक्तता को भरना है। इस खालीपन को या तो पलायन द्वारा भरा जाय या एब्ज़रडीटी का सामना किया जाय। 

लेकिन, एब्सर्डिटी का सामना भी ससीम से असीम, पीड़ा से मुक्ति और अराजकता से व्यवस्था की और छलांग लगाए बिना नही किया जा सकता क्योंकि इस छलांग के बिना निहिलिज़्म की स्थिति उतपन्न होती है, जो एक आत्मव्याघाती विचारधारा है। इस छलांग के लिए "फेथ" एक आवश्यक तत्व है। अस्तित्ववादी दार्शनिक किर्क़ेगार्ड इसे “लीप ऑफ फेथ” कहते हैं।

वैज्ञानिक निहिलिस्म का मानवीय जीवन मे विस्तार करने पर यह दृष्टि सामने आती है कि जगत में जो व्यवस्था दिखाई देती है वह "केयोस" के अनायासिक स्वरूप के कारण उतपन्न, जीवन और चेतना में व्याप्त इसी आकस्मिकता का आवर्धित रूप है, जो केयोस के निःसार, असंगत, उद्देश्यहीन और अराजक स्वरूप को "ब्लाईंड फेथ" की उपस्थिति  में समग्र रूप से ढक लेता है।

फेथ, आस्था या ईमान के साथ "ब्लाइंड" या "अंधी" विशेषण लगाना कितना संगत है इसके विषय मे प्रश्न किया जा सकता है।

आस्था को "अंधी" शब्द द्वारा विशेषीकृत कर "अंधी-आस्था" पद का निर्माण किया जाता है। यहाँ "अंधी" शब्द अपने लक्षणात्मक अर्थ से आस्था को विशेषीकृत करता है। इस लाक्षणिक प्रयोग में "अंधी" को अतार्किकता का पर्यायवाची बनाया जाता है। कहा जा सकता है कि जब विचारक "अंधी-आस्था" शब्द का प्रयोग करते हैं तो उनका अभिप्राय "अतार्किक या अबौद्धिक आस्था" ही होता है।

प्रश्न किया जा सकता है कि बुद्धि और भावना में मौलिक कौन है, क्या भावात्मकता की व्याख्या बौद्धिकता के आधार पर की जा सकती है या बौद्धिकता और भावात्मकता दोनों ही मौलिक हैं और मानव केवल बौद्धिक प्राणी ही नही बल्कि भावात्मक प्राणी भी है।

ध्यातव्य है कि कार्ल सेगन जैसे वैज्ञानिक भी जब “एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल” जीवन की बात करते हैं तो जीवन के उच्चतर रूपों के लिए “इंटेलिजेंट लाईफ” शब्द का ही प्रयोग करते हैं।

क्या यह एक पूर्वाग्रही दृष्टि को प्रदर्शित नही करता जिसमे “बौद्धिकता” ही मनुष्य का पारिभाषिक तत्त्व है?

बुद्धि अकेले मानवीय व्यक्तित्व का सृजन नही करती। मानवीय व्यक्तित्व बुद्धि, भावना और संकल्प की त्रयी होता है। बुद्धि एक करण मात्र है और बुद्धि की विविध स्थापनाओं के लिए भी बुद्धि में आस्था होना आवश्यक है। जिस प्रकार विज्ञान और दर्शन में बुद्धि की प्रधानता होती है,  कला और धर्म भावना प्रधान होते है। कला और धर्म मे यह अंतर है कि, जहाँ कला भावनाओ की अभियक्ति और उनका सम्प्रेषण है वहीं, धर्म में मानवीय व्यक्तित्व के घटक के तीनों आयाम उपस्थित होते हैं।  यहाँ  बौद्धिकता,  सम्वेगात्मकता और क्रियात्मकता तीनो ही एक उच्चतर भावना “आस्था” द्वारा संगठित रूप में मानवीय अस्तित्व में विद्यमान रहते हैं।

डॉ या मसीह, सामान्य धर्मदर्शन और दार्शनिक विश्लेषण, में धर्म के विषय मे  लिखते हैं, “धर्म मे मानव सम्पूर्णतया लग जाता है जिसमे भाव, क्रियातमकता और संज्ञानात्मकता तीनो अवियोजय रूप से पाए जाते हैं।“.

आस्था एक “ईररेशनल” नही बल्कि एक्स्ट्रा-रेशनल तत्व है जिस पर धर्म का अधिवह्न होता है।

प्रो० एच पी सिन्हा अपनी पुस्तक “धर्म दर्शन की रूपरेखा” में आस्था की चार विशेषताओं का उल्लेख करते हैं : एक्स्ट्रारेशनालिटी या निरबौधिक्ता, भावना केन्द्रण, श्रद्धा में आधारिता तथा इसमें मनुष्य की प्रतिबद्धता।

आस्था और धर्म के सम्बंध को आधार बनाकर ही गैलोवे धर्म को परिभाषित करते हैं।

गैलोवे के अनुसार, धर्म वह है जिसमे अपने से परे किसी शक्ति के प्रति मानव आस्था के द्वारा अपनी संवेगात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करके जीवन मे स्थिरता प्राप्त करता है और इसे वह अपनी उपासना और सेवा में अभिव्यक्त करता है।【जी गैलोवे, द फिलोसोफी ऑफ रिलीजन पृष्ठ 184】

रुडोल्फ ऑटो ने धार्मिक अनुभूति को “सुई जेनेरिस” और “स्पोंटेनियस” कहा है और इसका विश्लेषण भी किया है।

 मनुष्य को सम्पूर्ण रूप से आच्छादित करने,  भावना, ज्ञान और क्रियात्मकता तीनो की उपस्थिति, सुई जेनेरिस एवम स्पॉनटेनियस होने के फलस्वरूप धर्म एक एक्स्ट्रा-रेशनल परिघटना है।

 

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●पीड़ा, समस्या या रहस्य?

पीड़ा प्राणी मात्र में सार्वभौमिक घटना है। जहाँ "सत्ता" विशुद्ध सत, विशुद्धचित, विशुद्धआनंद है वहीं प्राणिमात्र में सत और चित की विशुद्धता के विषय में भले ही विवाद हो पर निरपेक्ष वेदना की उपस्थिति निर्विवाद है। वेदना न तो निर्जीव में पाई जाती है और न ही सच्चिदानंद में। समस्त प्राणियों में मनुष्य ही एक मात्र प्राणी है जिसे वेदना का विशिष्ट भान है। यह अवबोध वेदना को महसूस करने का ही नही बल्कि, "जीवन में वेदना है", इस तथ्य का भी ज्ञान है। जीवन स्वभावतः वेदना से दूर जाना चाहता है। हर प्राणी पीड़ा से बचना चाहता है किंतु इसके विशिष्ट बोध के कारण मनुष्य में एक  छटपटाहट पायी जाती है जिसे अगर समस्त प्राणी जगत के संदर्भ में देखें तो मानव में यह सबसे और तीव्र है। मानव में छटपटाहट की यह तीव्रता "मानवीय पीड़ा" को अन्य प्राणियों की पीड़ा से अलग एक सर्वथा नवीन सत्तामीमांसिय कोटि में डाल देता है: मनुष्य विशिष्ट है, इसकी चेतना विशिष्ट है, इसकी पीड़ा भी विशिष्ट है।

यदि चेतना समस्या और रहस्य में भेद करती है तो "पीड़ा" क्या है: समस्या या रहस्य? 

गैब्रियल मार्शल के अनुसार समस्याओं में हमे अपनी आत्मलीनता दिखाई नही देती। यहाँ विषय और विषयी का द्वैत होता है। लेकिन, रहस्य कुछ ऐसे प्रश्न होते हैं जिनके बारे में विचार करते ही हमे तत्क्षण यह अनुभव होता है कि ये हमारे अस्तित्व के साथ प्रारम्भ से ही सम्बद्ध हैं। इनसे हम दूरी नही रख सकते, क्योंकि यह अंतरंग रूप से हमसे जुडी रहती हैं।

"मैं पीड़ित हूँ ,मैं पीड़ा के बारे में प्रश्न कर रहा हूँ" यह विचार आपस में ठीक वैसे ही सम्बद्ध हैं जैसे "मैं कौन हूँ जो सत्ता के विषय में प्रश्न कर रहा है"।

इन दोनों चिन्तनों में पीड़ा विषयक चिंतन पूर्ववर्ती है; आर्य सत्यों का ज्ञान जीवन में दुखो की अनुभूति के बाद ही होता है तथा निर्वाण की अवधारणा भी "सर्वम दुःखम" तथा अन्य दो आर्य सत्यों के बाद चौथे आर्य सत्य मे ही अभिव्यक्त होती है।

"सत्ता क्या है" का विचार पीड़ात्मक अनुभूति के पश्चात इसके शमन के रूप में स्थापित प्रक्रियाओं को उभारने के क्रम में आता है।

 

●पीड़ा: उत्पत्ति, शमन और प्रदत्त अस्तित्व 

पीड़ा एक रहस्य प्रश्न है। इसकी अव्यवहित अनुभूति होती है। पीड़ा पर थोड़ा विचार ही अस्तित्व को इसके कारण-रूप में स्थापित कर देता है: जब तक अस्तित्व की बेड़िया हैं, पीड़ा है।

अस्तित्व के निषेध द्वारा पीड़ा का अंत किया जा सकता है। अस्तित्व का सकारात्मक निषेध कैसे किया जाय यह धर्म प्रस्तावित करता है। 

सकारात्मक निषेध में वैचारिक एवम प्रतीकात्मक स्तर पर प्रदत्त अस्तित्व का निषेध किया जाता है। वैचारिक स्तर पर इस निषेध की प्रकृति मिथकीय, पौराणिक अथवा तत्त्वमीमांसिय होती तथा उपवास, बलि आदि क्रियाओ के द्वारा निषेध की प्रतीकात्मक क्रिया सम्पन्न की जाती है। 

■ तत्त्वमीमांसिय निषेध:-

(क) अद्वैत वेदांत का उदाहरण:

मृत्यु की उपस्थिति के कारण  प्रदत्त अस्तित्व असत है। इस असत का निषेध अमरता के सत द्वारा किया जाता है तथा सत और शाश्वतता को सम्बद्ध कर दिया जाता है। असत अचित पर आधारित है अतः अचित का निषेध उस चित द्वारा किया जाता है, जो निरपेक्ष और असीम है। वेदना का निषेध आनंद द्वारा, परम् आनंद द्वारा किया जाता है। इस प्रकार प्रदत अस्तित्व के निषेध में "सच्चिदानन्द" की सत्ता स्थापित की जाती है। 

(ख) बौद्ध धर्म का अनात्मवाद: जीवन और जगत के विषय मे बौद्ध तत्वमीमांसा उपनिषदों के आत्मा और ब्रह्मवाद के विपरीत अनात्मवाद को प्रतिपादित करती है। जहाँ उपनिषदों में आनुभविक अहम या प्रमाता, जीवात्मा तथा साक्षी में भेद स्थापित कर, प्रमाता तथा जीवात्मा का निषेध कर साक्षी को ब्रह्म के साथ संयुक्त कर दिया जाता है, वहीं बौद्ध तत्त्वमीमांसा में स्व का यह अमूर्त विश्लेषण अनावश्यक और पीड़ा के मूल प्रश्न से दूर करने वाला माना जाता है। 

अपनी इस व्यवहारिक दृष्टि के कारण बौद्ध तत्त्वमीमांसा प्रमाता अथवा आनुभविक अहम को ही केंद्र में रखती है, तथा प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त के आधार पर प्रमाता के तात्त्विक निषेध का प्रयास करती है। बौद्ध धर्म मे जीवन का लक्ष्य निर्वाण की प्राप्ति है।

निर्वाण चाहे मौलिक रूप में भावात्मक या अभावात्मक अवस्था हो, लेकिन यह जन्म-मरण के चक्र के निषेध के रूप में प्रमाता का निषेध ही है।

(ग) जॉन हिक की "आत्मा-निर्माण" की प्रक्रिया: समकालीन धर्म दार्शनिक "जॉन हिक" अपने थियोडायसी में "आत्मा निर्माण की प्रक्रिया" स्थापित करते हैं। उनके अनुसार बाईबल की यह उक्ति की "ईश्वर ने मनुष्य को अपने प्रतिरूप में बनाया" का, अर्थ यह है कि मनुष्य निरन्तर ईश्वर के स्वरूप की प्रतिकृति को पाने की ओर बढ़ता रहता है। इस प्रतिकृति को प्राप्त करने का मूल्य पीड़ा है।

पीड़ा को  ईश्वरीय प्रतिकृति प्राप्त करने के अनिवार्य घटक के रूप "हिक" की आत्मा-निर्माण की प्रक्रिया भी प्रदत अस्तित्व का निषेध ही है।

■ पैराणिक-मिथकीय निषेध: ईसाई धर्म मे व्याप्त "आद्य पाप" की अवधारणा को पौराणिक-मिथकीय निषेध कहा जा सकता है। तत्त्वमीमांसा और पैराणिक व्याख्या में मूल अंतर विचार प्रकिया में प्रयुक्त सम्प्रत्ययो की सापेक्षिक सूक्ष्मता या रिलेटिव एब्स्ट्रेक्शननेस है। पौराणिक चिंतन प्रक्रिया में अपेक्षाकृत स्थूल सम्प्रत्ययो द्वारा चितन किया जाता है। 

आदम और ईव द्वारा ईश्वरीय आदेश की अवहेलना को "आद्य पाप" कहा जाता है। इस आद्य पाप के कारण मनुष्य जन्म से ही पापी है। वह जन्मना पापी है, इसका अभिप्राय उसके अस्तित्व का निषेध ही है।  वह इसलिए पापी है कि उसके आद्य पूर्वज आदम और ईव ने "ईश्वरीय आज्ञा" का उल्लंघन किया था, अतः यहाँ भी मानवीय अस्तित्व के निषेध में एक सत्ता उपस्थित है, जो मनुष्य की सीमित शक्ति की तुलना में सर्वशक्तिमान, मुनष्य की अल्पज्ञता की तुलना में सर्वज्ञ,  मनुष्य की देश-काल मे सीमित पहुँच की तुलना में सर्वव्यापी तथा दयालु, ईश्वर है।

■ प्रतीकात्मक निषेध: मानवीय अस्तित्व का प्रतीकात्मक निषेध उपवासों तथा बलि आदि क्रियाओ में अभिव्यक्त होता है। बलि का आशय अपनी प्रिय वस्तु का समर्पण है। मानव का सबसे प्रिय वस्तु उसके प्राण ही हैं। अपने प्राणों का उत्सर्ग, प्रतीकात्मक रूप से किसी अन्य जीव की बलि द्वारा संपादित की जाती है और इस प्रकार किसी अन्य जीव की मृत्यु द्वारा अपने अस्तित्व का प्रतीकात्मक निषेध किया जाता है। यहाँ भी निषेध में, “स्थापित सत्ता” अवश्य उपस्थित रहती है, क्योंकि बलि किसी "को" दी जाती है और इस प्रकिया द्वारा उस ज्ञात या अज्ञात के साथ सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।

प्रदत्त अस्तित्व के निषेध द्वारा एक सत्ता, एक सत्यता रची जाती है। इस निषेध द्वारा रची गई सत्ता बस यूँ ही किसी निर्वात में रखने के लिए नही होती बल्कि इस सत्ता की रचना ही इसलिए होती है कि इसको स्व के साथ सम्बद्ध किया जाए। प्रदत्त अस्तित्व के निषेध द्वारा रची गई सत्ता के रूप में स्व को सारगर्भित कर अथवा उसके साथ स्व को  विविध रूपो में सम्बद्ध कर अस्तित्व का विस्तारण किया जाता है।

 

भारतीय धर्मो के लक्ष्य, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, कैवल्य, अपवर्ग, मोक्ष, वैकुंठ आदि  वस्तुतः प्रदत्त अस्तित्व का सकारात्मक निषेध ही है। भारतीय धर्मो में निषेध के पश्चात व्यक्तित्व शेष नही रहता  बल्कि एक एक ऐसा तत्व आविर्भूत होता है जो या तो सभी कोटियों से विमुक्त अवर्णनीय, अथवा शून्यता है।

अब्राहमीय धर्मो की विशेषता यह है कि इनमें निषेध कुछ इस प्रकार किया जाता है कि व्यक्तित्व शेष रहता है, अतः उसकी आकांक्षाएं बची रहती हैं। इन धर्मो में उक्त निषेध द्वारा स्थापित सत्ता या सत्यता में आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अनन्त वस्तुएं और अनन्त विकल्प उपलब्ध होते हैं अतः इन धर्मो में जन्नत या ईश्वरीय साम्राज्य की अवधारणा मिलती है। 

●अस्तित्व का निषेध, सत्व निर्माण एवम सत्व द्वारा अस्तित्व का पुर्नअस्तित्वीकरण:

अस्तित्व का निषेध एक सर्जनात्मक प्रकिया है जहाँ मानव एक सार का निर्माण करता है साथ ही यह प्रकिया अस्तित्व के निषेध पर ही समाप्त नही कर दी जाती, बल्कि प्रदत्त अस्तित्व के निषेध में स्थापित सत्ता को स्व से सम्बद्ध करने के लिए इस सार का मूर्तकरण या अस्तित्वीकरण भी किया जाता है क्योंकि सार के मूर्तकरण के अभाव में व्यक्ति अपनी सीमा से बाहर नही निकल सकता। अतः इस प्रकार स्थापित सत्व को अस्तित्व देकर मनुष्य अपने स्व का पुनः अस्तित्विकरण करता है। पुर्नअस्तित्वीकरण के फलस्वरूप तथा इस प्रक्रिया के द्वारा भी मानव अपने प्रदत्त अस्तित्व का विस्तार करता है और अपनी ससीमता से बाहर निकलकर असीमित सत्ता से जुड़ने का प्रयास करता है; धर्म में अपनी ससीमता से निकलकर असीमित सत्ता से जुड़ने की प्रवृति निश्चित रूप से पाई जाती है।

जॉन हिक इसे धर्मो में व्याप्त, धर्मो में सामान्य, "मुक्तिशास्त्रीय संरचना" कहते हैं।

अस्तित्वीकरण अथवा मूर्तकरण के दो आयाम होते हैं: कहाँ और कैसे। कैसे का उत्तर उपासना पद्धति, कर्मकांड, प्रतीकों, नैतिक नियमो आदि से दिया जा सकता है और जहाँ तक अस्तित्वीकरण या मूर्तकरण के कहाँ का प्रश्र है, इसके दो लोकस होते हैं: व्यक्ति और समाज।

मूर्तकरण की यह प्रकिया मानव का अपने स्व के साथ सम्बन्ध तथा उसका और समाज के अंतर्सम्बन्ध  दोनों ही रूपो में प्रकट होती है इसीलिए, धर्म की व्यक्तिकेंद्रित तथा  समाजकेंद्रित दोनों ही अवधारणाएं सम्भव हैं तथापि धर्म की उतपत्ति मौलिक रूप से मानवीय पीड़ा में होने के कारण यह पीड़ा के रहस्य प्रश्नों की पृष्ठभूमि में प्रदत्त अस्तित्व के निषेध द्वारा सार निर्माण, और पुनः इस सार के  अस्तित्विकरण द्वारा प्रदत्त अस्तित्व के विस्तारण का प्रयास है। 

 

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