ग्रीक मिथकों मे सिसिफ़ज़ एक चरित्र है जिसे देवताओं के राजा जीयूस द्वारा एक श्राप मिला है। सिसिफ़ज़ पर जीयूस इस लिए कुपित हो गए कि इसने दो बार मृत्यु को धोखा दे दिया।
सिसिफ़ज़ को जीयूस ने एक शाप दिया कि उसे एक पहाड़ की तली से बड़ा सा पत्थर ऊपर पहाड़ के शीर्ष तक ले जाना है और ज्यो ही सिसिफ़ज़ पत्थर के साथ पहाड़ के शीर्ष के निकट होगा वह पत्थर लुढ़ककर फिर से पहाड़ की तली में चला जाएगा। सिसिफ़ज़ को फिर से पत्थर को लेकर ऊपर चढ़ना है और फिर ज्यों ही पहाड़ का शीर्ष नजदीक होगा---सिसिफ़ज़ को यह अनन्त काल के लिए करते रहना है।
जॉर्ज लूईस बार्गेस, "द इम्मोर्टल" में लिखते है, “मनुष्य के अपवाद के साथ अमरता में कुछ भी विशिष्ट नही है। प्रत्येक जीव अमर है, क्योंकि उन्हें मृत्यु का बोध नही है। दिव्यता, रहस्य और भयावहता अपने अमरता का ज्ञान है।“
मानव का जीवन में इन्हेरेन्ट मूल्य और अर्थ ढूंढने की प्रवृत्ति तथा इस उद्देश्यहीन, अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में उसका ऐसा कर पाने की अक्षमता के द्वंद को अस्तित्वाद में एब्ज़र्ड के नोशन या भाव से व्यक्त किया गया है।
एब्ज़रडिज्म के अनुसार मानव जीवन में मूल्य तलाशता है और जब सब कुछ अर्थहीन है लेकिन मानव अर्थ खोजने को विवश है तो मानव के जीवन में एक शून्य का निर्माण होता है।
रिक्तता पीड़ा है और मनुष्य को इस रिक्तता का अवबोध है। मानव को इस रिक्तता को भरना है। इस खालीपन को या तो पलायन द्वारा भरा जाय या एब्ज़रडीटी का सामना किया जाय।
बुद्ध भी एबज़रडीटी का सामना नही करते
बुद्ध निर्वाण की बात करते है अतः उनके दर्शन और दृष्टि को रिक्तता का दर्शन नही कहा जा सकता। बुद्ध के चार आर्य सत्यों में आखरी दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा उन्हें रिक्तता और शून्यता के विचारक होने से अलग कर देता है। बुद्ध के विचारों में भी जीवन का अर्थ और अभिप्राय उपस्थित है--दुखो से मुक्ति, निर्वाण लेकिन क्या हो जब दुखो से मुक्ति और निर्वाण जैसी कोई चीज ही नही हो--बुद्धि ने तो दिखा दिया है कि कोई केंद्र होता ही नही है--न ईश्वर, न मोक्ष, न आत्मा, न ब्रह्म, न निर्वाण, न ईश्वरीय साम्राज्य--और इस बात को स्वीकार करने के बाद जो रिक्तता उभरती है उस रिक्तता की यहाँ बात है--इस रिक्तता को हालांकि बुद्ध की तरह एक अतीन्द्रिय सत्ता 'निर्वाण' में आस्थावान हुए भरा जा सकता है लेकिन यह तो कामू के शब्दों में दार्शनिक आत्महत्या है-- और यही बात देवी--माया आदि शब्दो मे चिंतन करने पर भी लागू है।
कामु के पहले के बुद्धों ने संसार की व्याख्या गुणात्मक रूप से दो आर्य सत्यों से की जिसमे पहला आर्य सत्य दुख है और दूसरा इससे मुक्ति लेकिन कामु ने जब संसार पर दृष्टिपात किया तो पीड़ा से मुक्ति कही थी ही नही अतः उन्होंने मानवीय इतिहास में पहली बार बिना विचलित हुए, बिना किसी करुणा के वश में आए एकमात्र आर्य सत्य के यथार्थ का उपदेश कर दिया।
कामु ने देखा कि जगत का कोई अर्थ नही है और मनुष्य के अंदर जगत में अर्थ खोजने की प्रवृति बहुत ही प्रबलता के साथ विद्यमान है। सिसिफ़ज़ बार बार नए तरीके से पत्थर ऊपर शीर्ष पर ले जाने की कोशिश करता है लेकिन नतीजा तो पूर्वनिर्धारित है।
कामु के इस दर्शन को एब्ज़रडिज्म कहा जाता है। आपको सम्मानित करने के लिए नोबेल दिया गया।
जब भी कामु के मिथ ऑफ सिसिफ़ज़ को याद करता हूँ तो मन कहता है कि सिसिफ़ज़ अबकी बार पत्थर देख कर कह दे--भाग भो%ड़ी अब नही, पत्थर चढ़े हमरे &ड़े पर, लेकिन इसके लिये उसे मरना पड़ेगा और मौत से हर प्राणी डरता है, सिसिफस भी।
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