Friday, November 8, 2024

ट्रांसेन्डेन्ट

'एक ट्रांसेन्डेन्ट है'

अपनी इस स्थापना के लिए मेरे कुछ तर्क:

 

इस लेख का जस्टिफिकेशन: समकालीन दर्शन (उत्तर आधुनिक दर्शन) ज्ञानमीमांसा को मृत घोषित करती है (रोर्टी), इसके अनुसार जब कोई वाह्य वस्तुनिष्ठ, सब्जेक्टिव-इंडिपेंडेंट होता ही नही तो ज्ञानमीमांसा (और साथ ही तत्त्वमीमांसा) ही फलौड थी जो ज्ञान के लिए एक ऐसी वस्तुनिष्ठ  क्रिटेरिया या कॉनसेप्ट या प्रतिज्ञप्ति ढूंढ रही थी जिससे ज्ञान की मीमांसा हो सके ताकि तत्त्व को पकड़ा जा सके।

उत्तरआधुनिक चिंतन में हमारी भाषा अंततः अपने बारे में ही बता सकती है, वह अपने से परे किसी चीज के बारे में बता ही नही सकती।

ऐसी स्थिति में अब तत्त्वमीमांसा कहाँ बचेगा जबकि भारतीय परंपरा में दर्शन का अर्थ ही तत्त्व दर्शन है (परे निष्णात)

 

★★

 

एक:

जगत की प्रकृति के संदर्भ में तर्क और अनुभव, कम से कम एक अनुभव के बीच विरोधाभास है। तर्क अंततः यही प्रतिष्ठित करता है कि जगत, यह जगत आभासी है क्योकि यह हमारी चेतना द्वारा रचित है, यह कांट के शब्दों में फिनोमिना है, शंकर के शब्दों में माया है।

इस माया से परे, फिनोमिना से अतीत क्या है और कैसा है, इस पर विभिन्न परम्पराओं, विभिन्न चिन्तनों की विभिन्न  आपस मे विरोधी निष्पत्तियां हैं किन्तु, इस महान तत्वमीमांसाओं की आपस मे यह सहमति अवश्य है कि यह जगत आभासी है।

आधुनिक न्यूरोसाइंस के निष्कर्ष भी इसी ओर जा रहे हैं (हाऊ डस आवर ब्रेन क्रिएट मीनिंग फ्रॉम मैटर), क्वांटम भौतिकी भी ऑब्जर्वर की भूमिका की महत्ता को स्वीकार रहा है।

 

इन सबके बीच कम से कम एक अनुभव ऐसा है जो जगत को आभासी, जगत को सब्जेक्टिव कन्स्ट्रट सिद्ध होने से रोकता है, और वह अनुभव है पीड़ा।

जगत आभासी हो सकता है, जगत मिथ्या हो सकता है किंतु पीड़ा सत्य है, पीड़ा सन्देह से परे है।

जीवन स्वभावतः, अपनी प्रवृति में पीड़ा से दूर भागता है, अर्थात जीवन के समानांतर एक सत्ता पीड़ा की तो माननी ही पड़ेगी, पुनश्च पीड़ा सब्जेक्टिव कंस्ट्रक्ट नही हो सकती, जीवन भला इसकी रचना क्यों करेगा?

इसका अर्थ तो यही हुआ कि पीड़ा का स्रोत वाह्य जगत है और एक आभासी जगत वास्तविक सत्ता (पीड़ा तथा उसे अनुभूत करने वाले) को जन्म नही दे सकता!

 

पीड़ा, मनुष्य को व्यवहार से बाँधे भी रखती है और मनुष्य से परमार्थ के रूप में पलायन की अधिभौतिकी भी रचवाती है।

सत चित आनंद का नही पता, सत और चित का भी नही मालूम लेकिन वेदना है, यह निर्विवाद है।

परमार्थ के बोध में पीड़ा का निवारण नही होता बल्कि पीड़ा से पलायन के प्रयास में परमार्थ रचा जाता है।

★★★

 

दो:

 

यदि हमे हमारी इंद्रियों से प्योर संवेदन मिल भी रहा हो तो एक थ्योरी तक इसके विकसित होने में कम से कम यह तीन बार कंडिशन्ड होती है:

पहली बार बोध के स्ट्रक्चर द्वारा एक मानसिक प्रत्यय के रूप में।

दूसरी बार भाषिक फ्रेमवर्क से और तीसरी बार

उस पैराडाइम या उन एजम्पशन के फ्रेमवर्क से जिसके अंदर यह एक थ्योरी के रूप में विकसित होती है।

 

इनमें से पहला कंडिशनिग जैविक और मनोवैज्ञानिक कंडीशनिंग है, दूसरा लिंग्विस्टिक, जो एक प्रकार की सामाजिक-सांस्कृतिक कंडीशनिंग है, जिसमे कुछ अंश जैविक हो भी सकता है (चोम्स्की का यूनिवर्सल ग्रामर) और तीसरी विशुद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक।

इन तीन कंडिशनिंग्स से किसी सेंस डेटा के गुजरने के बाद हमारे ज्ञान पर वस्तुगतता के गुण का आरोपण करना बेमानी है; ज्ञान वस्तुनिष्ठ और ट्रांसेन्डेन्ट हो ही नही सकता।

 

★★

 

पूर्वआधुनिक युग मे ईश्वर मानवीय जगत का केंद्र था, आधुनिक युग मे मनुष्य स्वयम केंद्र है किंतु उत्तरआधुनिक संस्कृति किसी केंद्र में विश्वास ही नही करती क्योकि इसके चिंतन में केंद्र नामक शब्द है ही नही।

आधुनिक युग मे यद्यपि ईश्वर और अलौकिकता के सम्प्रत्ययो का मनुष्य की चेतना में क्षरण हो गया तथापि वस्तुगतता और ट्रांसेन्डेस में उसका विश्वास बचा रहा। इस काल मे सत्य, यथार्थ आदि अब भी वस्तुनिष्ठ और मनुष्य की चेतना के बाहर एक ट्रासेन्डेन्टल सत्ता के रूप में कल्पित किये जाते रहे।

उत्तर आधुनिक युग का आरम्भ उस क्षण से होता है जहाँ से वस्तुनिष्ठता और ट्रांसेन्डेस भी ईश्वर की भांति एक मिथक के रूप में एक्सपोज्ड हो गए।

 

★★

 

जगत और हमारी भाषा मे क्या सम्बन्ध है इस प्रश्न पर विचार करने के लिए हम सर्वप्रथम एक धारणा स्थापित करते हैं कि एक वाह्य जगत है जिसको हम अपनी भाषा से अभिव्यक्त करते हैं।

अर्थात यहाँ हमने दो सत्ताओं की कल्पना की, प्रथम-जगत और दूसरी हमारी भाषा।

 

इस एजम्पशन के साथ हम आगे बढ़कर देखते हैं कि यह हमें जगत और भाषा के सम्बन्धो की दिशा में किस ओर ले जाता है:

 

जगत और भाषा के सम्बंध में भी कुछ पूर्वमान्यताओं की स्थापना की जा सकती है-

1 भाषा और जगत में वस्तु और दर्पण का सम्बंध है, अर्थात हमारी भाषा जगत व इसके घटकों को यथा रूप प्रतिबिंबित करती है।

2 भाषा जगत व इसके घटकों को यथारूप प्रतिबिंबित नही करती।

 

यदि आप मुझसे पूछेंगे की मैं इनमें से किसे वास्तविकता के निकट मानता हूं तो मेरा झुकाव दूसरे की ओर है जिसके निम्न कारण हैं:

 

यदि कोई वाह्य जगत है जो हमे संवेदना देता है तो यह संवेदना हमारे बोध में अपने प्रदत्त रूप में ही नही प्रकट हो जाती बल्कि यह संवेदना हमे एक व्यवस्तित रूप में मिलती है क्योकि हमारा मन इन  सम्वेदनाओं की प्राप्ति के साथ ही सक्रिय हो जाता है और इन्हें एक आकार देकर हमारे बोध में प्रस्तुत करता है।

यहां, इस स्तर पर  हमारे अंदर एक कॉग्निटिव फ्रेमवर्क (संज्ञानत्मक ढाँचा) की उपस्थिति से इनकार नही किया जा सकता।

यह ढाँचा हमारे बोध में  उन रॉ सेंसेशन (कच्चे सम्वेदनाओं), जो वाह्य जगत से आ रहे है, कितना  और किस प्रकार से मोडिफाई करता है, इसमे कितना अपना अंश डालता है हम यह नही जानते तथापि हम यहाँ एक कॉग्निटिव कंडिशनिग देख सकते है जो हमारे बोध में उपस्थित है।

इस विषय पर आप भारतीय परंपरा में हुए विश्लेषण की अधिक जानकारी के लिए निर्विकल्प प्रत्यक्ष बनाम सविकल्प प्रत्यक्ष और बौद्धों का स्वलक्षण बनाम मन की सक्रियता के पश्चात उपस्थित वस्तु देख सकते हैं।

बहरहाल, जो भी हो, इस स्तर पर हमारे पास संवेदन की दृष्टि से एक प्रोसेस्ड संवेदन है लेकिन भाषिक दृष्टि से यह जो कुछ भी है, अभी भाषिक बोध के लिए रॉ मेटेरियल ही है जिसे पुनः लिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क में प्रोसेस्ड होना है और तब वह हमारे भाषा का विषय बनेगा।

ध्यातव्य है कि हमारा लिंग्विस्टिक फ्रेमवर्क मात्र जैविक रूप से ही प्रभावित नही हो सकता वरन सांस्कृतिक और सामाजिक तत्व भी इसमे होते हैं।

 

अर्थात, वाह्य जगत से आने वाली संवेदना अब तक (हमारे भाषा की विषय वस्तु बनने तक) दो बार शोधन (?) की प्रक्रिया से गुजरती है और तब जगत विषयक कोई कथन करती है। ऐसी स्थिति में हमारी भाषा जगत का प्रतिबिंब हो ऐसा नही कहा जा सकता।

 

हमारे बोध में कुछ शब्द हैं, इन शब्दों से सम्बंधित प्रत्यय जीवन की शर्त मे चेतना की संरचना के साथ पहले से ही गूंथे हो सकते हैं या हम इन्हें बाद में अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं।

ऐसे ही कुछ शब्दो की सीमा में एक कॉन्सेप्ट का निर्माण होता है जिसे हम जगत, ब्रह्मांड आदि कहते हैं।

ये शब्द निम्न हैं: क्यों, कहाँ, कब, कितना, कैसे।

सत्ता, अस्तित्व या बीइंग नामक कॉन्सेप्ट (प्रत्ययों) मे यह जो इन शब्दों के उत्तर में इन शब्दों से घिरा है वह 'व्यक्त' या 'अपरा' है।

दुनिया या यथार्थ या वास्तविकता इस "व्यक्त" तक ही नही भी हो सकती है भी और यह सम्भव है कि इनसे परे जाकर हम जो भाव बनाते हैं उसके अनुरूप कोई चीज या चीजें वास्तव में है ही नही क्योकि हमारी चेतना हमारी भाषा पर ऐसे ही कार्य करती हो कि हम किसी कॉन्सेप्ट का एक दूसरा ध्रुवीय विपरीत भी रच सकते हैं और "अव्यक्त" "परा" बस भाषाई खेल हो, हमारी चेतना के प्रत्यय बनाने की क्षमता का साइडइफेक्ट, क्योकि हम उड़ने और घोड़े के प्रत्यय को मिला कर एक "उड़नेवाला घोड़ा" मानसिक रूप से अवश्य रच लेते है जबकि ऐसा आज तक किसी को उड़नेवाला घोड़ा दिखा नही।

 

हमारे शब्दो कम से कम दो प्रकार के तो हैं ही--प्रथम वस्तु देखकर उनके लिए शब्द तथा द्वितीय ऐसे शब्द जिनके अनुरूप कुछ वस्तुगत तथ्य है ही नही बल्कि यह हमारी इच्छा है: प्रकृति से पलायन है।

घोड़ा पहले प्रकार का शब्द है।

अमरता दूसरे प्रकार का।

पहला शब्द जगत के बारे में कुछ कह रहा होता है जबकि दूसरा शब्द मात्र हमारी इच्छा बता रहा है वह भी सीधे-सीधे नही।

 

यहाँ एक चीज नोटिस की जा सकती है कि मनस के उस हिस्से के पास, जो सम्वेदनो पर सक्रिय होता है, एक ऐसी शक्ति है जिससे वह कुछ ऐसे मानसिक प्रत्यय रच डालता है जिसका आनुभविक सत्यापन नही हो सकता और हम यह  नही कह सकते कि इस प्रत्यय के अनुरूप कोई सत्ता है या नही। अर्थात हम इसे न तो सत्य प्रमाणित कर सकते हैं और न ही असत्य।

ऐसे कथन जिन्हें न तो सत्य अथवा न ही असत्य प्रमाणित किया जा सके उन्हें हम सूचनात्मक नही मान सकते।

यदि किसी वाक्य से सूचनात्मकता का ह्रास हो जाता है तो वह वाक्य इस ह्रास के साथ ही ज्ञानात्मक अणु अथवा ज्ञान प्रदान करने वाले वाक्य नही रह जाते क्योकि सूचनाएं ही व्यवस्तित होकर ज्ञान बनती है।

 

यद्यपि कुछ प्रत्ययों को अनुभव से प्रमाणित नही किया जा सकता तथापि हम इनका मेंटल इमेज बना सकते हैं। उदाहरण के लिए हम एम कॉन्सेप्ट लेते हैं: उड़ने वाला घोड़ा।

हम उड़ने वाले घोड़े की एक इमेज कमोबेश बना सकते हैं जिसमे हमारा सामान्य घोड़ा पंख लिए हुए है।

यदि हम थोड़ा और आगे बढ़ कर मेंटल से भाषिक आयाम में आए तो यहाँ हम एक ऐसा शब्द निश्चित रूप से रच सकते है जिसके अनुरूप अब हम मानसिक तस्वीर भी नही बना सकते।

उदाहरण के लिए: वह घोड़ा जो हाथी है: घोड़हाथी।

एक बात यहाँ उभर रही है कि यद्यपि हमने आरम्भ संवेदनों से की हम मानसिक प्रत्ययों से होते हुए शब्दों तक अपनी सम्वेदनो से बहुत दूर चले आए: हमने आरम्भ उन दो चीजो से किया था  जिन्हें हमरा बोध क्रमशः घोड़ा और हाथी के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर रहा है, फिर हमने एक उड़ने वाले घोड़े का मानसिक प्रत्यय रचा और भाषिक आयाम में हमने घोड़हाथी नामक शब्द भी बना दिया।

अपनी संवेदनों से इस प्रकार दूर चले आने का एक अर्थ यह हो सकता है कि हमारी भाषा वास्तविक जगत कि एक बहुत ही अवास्तविक तस्वीर भी दे सकती है और इस अर्थ में उस प्रकार के शब्द खोखले हैं।

 

★★

 

एक सामान्य बोध की समस्त प्रक्रिया में अर्थात सम्वेदनो से होकर इसके भाषिक रूप में बंधने तक और फिर उसके आगे इस बोध का किसी सिद्धान्त बनने तक हमारे संवेदन या इन्द्रिय प्रदत्त कम से कम तीन बार हमारी विषयिनिष्ठता से प्रभावित होते हैं, यह विषयीनिष्ठता जैविक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत होते है। जटिल बोधो में हमारी व्यक्तिगत और सांस्कृतिक-सामाजिक

का स्कोप (प्रक्षेत्र) बोध-प्रक्रिया के विभिन्न घटक-स्तरों तक भी विस्तृत हो जाता है अन्यथा किसी घटना के प्रति चेतन हो कर उसे देखने का क्या अर्थ है सिवाय इसके के बोध की प्रक्रिया में हमारी स्वयम की भी चेतन भागीदारी होती है अर्थात इस स्तर पर हम अपने बोध की अपनी सामान्य प्रवृति अथवा कॉमन सेंस से आगे बढ़ चुके होते हैं।

हमे अपने कॉमन सेंस से बहुधा आगे बढ़ना होता है या इसे दूसरी तरह से कहा जाय तो हमे अपने जन्मना प्राप्त सहज बोध या कॉमन सेंस की समीक्षा करनी पड़ती है। प्रश्न यह है कि हमे ऐसा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है? इसका एजमात्र उत्तर जो मुझे प्रतीत होता है वह यह है कि हमे कुछ ऐसे भी अनुभव मिलने प्राप्त हो जाते हैं जो हमारे सहज बोध से संगति नही रखते:

यदि वह सर्प है तो जैसा कि हमारे दृश्य संवेदन से प्राप्त बोध हमे बता रहा है, उसमें मात्र सर्प के द्रश्य लक्षण ही नही बल्कि अन्य लक्षण भी होने चाहिए किन्तु शनै: शनै: उसमें रज्जु के लक्षण उभरते जाते हैं अतः वह सर्प नही बल्कि रज्जु है और इसका आशय यह है कि हम आँख बंद कर अपने समस्त बोधो को स्वीकार नही कर सकते, साथ ही इसका यह भी आशय है कि हमारी इंद्रियां हमारे सम्मुख भ्रम भी उपस्थित कर सकती हैं। यद्यपि हमारी इंद्रियां हमारे सम्मुख भ्रम उपस्थित कर देती हैं तथापि क्या भ्रम में उपस्थित सत्ता बिल्कुल नवीन होती है या इस सत्ता से जो कि भ्रम में उपस्थित है, हमारा कभी न कभी साक्षात्कार हुआ रहना एक आवश्यक शर्त होती है?

मेरा मानना है कि यह बिल्कुल नवीन सत्ता नही होती बल्कि इससे या इसमे उपस्थित अव्ययों से हमारा कभी न कभी आनुभविक साक्षत्कार आवश्यक होता है।

रहस्यवादी, जिस ईश्वर को देखते हैं उसका रहस्यवादियो द्वारा जाग्रत अवस्था मे देखे गए ईश्वर की छवि या रूप से कन्फर्म होना आवश्यक होता है अन्यथा उन्होंने अवश्य हमे बताया होता कि नही इस मूर्ति के जैसा ईश्वर नही है बल्कि उसकी आंख और नाक ऐसी है।

ठाकुर रामकृष्ण ने कभी कहा, "ना ना काली माँ इस चित्र, इस मूर्ति, इस विग्रह की तरह नही है"।

 

आशय यह है कि विज्ञानवादियों की यह मान्यता की 'विज्ञप्तिमात्रता ही सत्य है' या 'दृश्यम इति वर्तते' जैसी स्थापनाएं विज्ञान अथवा उन परसेप्शनो के कॉन्टेंट की व्याख्या नही कर पाती और हमे एक वाह्य जगत की आवश्यकताए पड़ती ही पड़ती है क्योकि अन्यथा की स्थिति में हमारे सम्वेदनो की व्याख्या ही नही हो पाएगी जो कि हमारे बोध-प्रक्रिया के आधार में अवस्थित हैं।

 

यह वाह्य जगत वही ट्रांसेन्डेन्ट है, यह कैसा है हम भले ही यह न कह पाए किन्तु यह है ही नही यह हम नही कह सकते।

सकारात्मक शब्दो मे कहूँ तो, हम हम यही कह सकते हैं कि यह अनिवर्चनीय है, यह है ही नही हम यह नही कह सकते।

 

★★

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...