सत-चित-बोरडम
उस बंदी को क्या मालूम कि वह प्लेटो की गुफा से मुक्त होकर जिस दुनिया मे आज प्रवेश कर चुका है वह बोरडम की दुनिया है। गुफा की दुनिया मे वह बंदी था, यहॉँ वह मुक्त है लेकिन यह मुक्ति कोई आनन्ददायी स्थिति नही है, किसी ब्लिस की स्थिति नही बल्कि एक उबाऊ स्थिति है। ऊसकी आखों के सामने यह अंतरिक्ष, शून्यता का अनन्त तक फैला रेगिस्तान है, यह काल, बस उसकी घड़ी का अनन्त काल से अनन्त काल तक टिक-टिक करते जाना है, एकदम नीरस रूप से टिक-टिक करते जाना। ये बादल सिगरेट के धुंवे हैं लेकिन वह सिगरेट जिनसे यह धुंवे निकले हैं वह उसकी नही है, उसकी सिगरेट उसके बोरडम को थोड़ी कम तो करती ही है, उसकी सिगरेट से निकले धुवे इस दुनिया की नीरसता को थोड़ा कम तो करते ही हैं लेकिन आकाश में फैले यह धुवे उसे अनजाने लग रहे हैं।
दिन अब ढलते ही नही और रातें अब होती ही नही, दिन से अधिक प्रकाश रातों में हैं और यह प्रकाश अजीब तरह से रंगबिरंगे हैं, ऐसे रंगबिरंगे की इन्हें देखने का मन नही करता। सूरज का मतलब यहाँ कुछ नही है क्योकि वह बस बड़ी बड़ी बिल्डिंगों की चारो ओर बस मनहूस छाया फैलता है, उसका बस अब इतना ही काम है।
इस दुनिया मे पर्वत तो हैं लेकिन वह बस ऊँची उठी हुई ज़मीन है, नदिया बस बहता हुआ पानी, झरने बस गिरता हुआ पानी है, पर्वत, नदियाँ, झरने--उसकी गुफा में मात्र यही न थे जो इस गुफा की बाहर की दुनियॉ में हैं, वहाँ उनमें एक आकर्षण था, जीवन्तता थी, उनमें मानवीय राग थे लेकिन यह दुनिया तो रागों से मुक्त दुनिया है, अब वह इनपर अपने रागों का आरोपण कैसे करे भला! ओह, तभी यहाँ शब्द मात्र वस्तुवाचकता लिये हैं, इस दुनिया में शब्दो के साथ उसकी गुफा जैसी भाववाचकता संयुक्त नही है।
बंदी को क्या मालूम की इस मुक्ति में वह अलग प्रकार का बंदी है और यह कैद उस पुराने गुफा की कैद से अधिक पीड़ादायी है!
------★★★★--------
एक पुष्प है; यह पुष्प है इस बात को जानता हूँ; यह पुष्प ही है क्योकि इसमें दलपत्र हैं; पुमंग है; जायांग हैं; पुंकेसर हैं; जब इसे स्पर्श करता हूँ तो मेरी उंगलियों से पुंकेसर चिपक जा रहे हैं; मुझे पता है कि यह ऐसा इसलिए हो रहा है कि कही कोई दूसरा पुष्प निषेचित होना चाह रहा है; मैं और पुष्प विकसित ही इस तरह हुए हैं कि हममें आपस मे एक करार है; पुष्प मेरे सौंदर्यबोध को तृप्ति देगा और मैं पुष्प को निषेचित होने का कारक बनूंगा; मुझे यह भी पता है कि यह करार पुष्प ने केवल मेरे साथ ही नही किया है बल्कि वायु से, कीटो से, पक्षियों आदि से भी पुष्प का यह करार है।
पुष्प में चटकीले वर्ण हैं; सुगंध है; पराग है; रस है; बचपन मे, बालक्रीड़ा में, सहजता से इसके रस का पान भी किया है।
लेकिन,अब यह पता है कि वास्तव में पुष्प और अ-पुष्प समान तत्त्वों से ही बने हैं; इसके चटकीले वर्ण वास्तव में प्रकाश की उस उस वर्ण को , परावर्तित कर रहे हैं; इसके दलपत्रो में मूलतः कार्बन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन है, लेकिन यही तत्त्व तो इसके अगल बगल मौजूद शूलों में भी हैं!
तो क्या मुझे अब पुष्प से आह्लादित होना छोड़ देना चाहिए?
यह प्रश्न ही बेतुका है क्योकि पुष्प से आह्लादित होना उस करार के कारण जो मेरे और पुष्प, बल्कि हमारी प्रजाति और पुष्प, के मध्य ऐसा है कि उस करार में मौजूद शर्ते हमारे और पुष्प के अस्तित्व के साथ गुंथी हुई हैं; हम और पुष्प अपने अस्तित्व को नष्ट किए बिना उस करार को भंग कर ही नही सकते।
--------☆★★★☆-------
---★★★★---
काल की नदी
मृत्यु के रेत
जीवन के घरौंदे
खेलता आदमी अंजान
लिये एक मुस्कान
हा विधाता, हा विधाता!!
वह जब उसको स्वयम से अलग करती तो वह बहुत रोती लेकिन शेष हँसते थे और जब वह उसे वापस लेकर खुश होती तो शेष रोते। लोगो ने उसके वापस उसमे समाहित हो जाने को एक भयावह नाम मृत्यु दिया था जबकि उसके लिये जो भयावह था उसे इन लोगो ने जन्म का नाम दिया था।
इन दोनों की भावनाओ के बीच झूलता वह उनकी खुशी के लिए भी पीड़ा सहता और उसे तब भी पीड़ा सहनी पड़ती जब वह उसे वापस बुलाती---हम सब यह पीड़ा सहते हैं, सहना ही है, इसका कोई विकल्प नही है और उनके बीच झूलने के अलावा भी कोई विकल्प नही है, किसी के पास नही। वह जो अमरता, आनंद और आत्मादि की माया रचते है वह भी बस झुल ही रहे होते हैं, यद्यपि उन्हें भी यह ज्ञात होता है कि उनके द्वारा रचे माया के अनुरूप कुछ नही है फिर भी--किसी भी कीमत पर वह शाश्वत आनन्द नही है, वह आनंद है ही नही।
आनन्द बस उतना ही है, वही है जितना आप उस झूले में ले लें।
ॐ शांति!
रेस्ट इन पिस!!
इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैही राजिऊन!!!
हातिमताई
ब्रह्मांड , ब्रह्मांड के गहरी परतों की अंधकार तो कहीं आँखे आँधी कर देनेवाली चमक, कहीं मरते हए चीत्कार करते तारे, ग्रह, नक्षत्र तो कहीं अपने जीवन के प्रथम स्पंदन लिए ब्रह्मांडीय पिंड। अपने से ही दूर भागते दिक्काल, गुरुत्वाकर्षण का जाल। किसी कोने में नया ब्रह्मांड जन्मलेता तो कहीं किसी कोने में तिल-तिल करता मरता ब्रह्मांड।
नियमबद्धता अंततः अराजकता में समाहित होती हुई, चारो ओर नग्न बलों का उठा-पटक जिनका कोई उद्देश्य नही है।
पूर्व की भांति अब मनुष्य जीवन और जगत का अर्थ न ढूंढता और न ही अब स्वयम ही किसी अर्थ का निर्माण करता। उसके प्रति ब्रह्मांडीय उदासीनता अब उसकी सबसे बड़ी समस्या थी।
अब तक उसने स्वयम को ब्रह्मांड का केंद्र माना था और स्वयम को वह कभी अशरफ उल मख़लूक़ात कहता तो कभी कभी अहम ब्रह्मास्मि कहकर स्वयम को जगत का केंद्र होने के अपने भाव को तुष्ट करता। अब वह जान चुका था कि वह वास्तव में इस कभी न खत्म होने वाले दिक्काल में कुछ भी नही है। वह जान चुका था कि उसके होने और न होने से प्रकृति को कोई फर्क नही पड़ता। वह जान चुका था कि उसकी द्वारा की गई पुरुष की कल्पना वास्तव में कपोल कल्पना थी।
वह यह भी जान चुका था कि प्रकृति द्वारा उसकी समस्त प्रजाति को किसी दिन निगल जाना कत्तई अप्राकृतिक नही है और प्रकृति उसे किसी द्वेष या राग के निमित्त नही निगलेगी बल्कि पूर्ण उदासीनता से उसे अपना ग्रास बनाएगी।
उसकी साहित्यिक कृतियों में प्रकृति उसे किसी राग-द्वेष के कारण उसे नष्ट करती और अपनी साहित्यिक कृतियों में वह प्रकृति खूब लड़ता और प्रकृति की नजरों में स्वयम को स्थापित करता--वह इससे अधिक स्वतंत्र नही है।
----------★★★★----------
जिन्न
अब भी मनुष्यो को संता क्लॉज की आवश्यकता पड़ती यद्यपि उन्होंने अलादीन का चिराग बना लिया था। मनुष्य अलादीन के चिराग को रगड़ते और जिन्न उनकी इच्छा पूरी कर देता। अब प्रत्येक मनुष्य के पास उसकी क्षमता के हिसाब से अलादीन का चिराग था लेकिन प्रत्येक मनुष्य अपनी अलमारी में रखे अलादीन के चिराग से बड़े चिराग की कामना करता करता और चाहता कि सांता उसे इस चिराग से बड़ा चिराग उपहार में भेंट कर दे: बड़े चिराग से बड़ा जिन्न निकलता था और जिन्नों का नियम है कि जितनी बड़ी इच्छा उतना बड़ा जिन्न होना चाहिए तथा जितना बड़ा जिन्न उतना ही बड़ा चिराग भी होना चाहिए।
धीरे-धीरे चिराग बड़े होने लगे क्योकि मनुष्य उस नियम को ढूंढते हुए जिन्नों को बड़ा करने की प्रकृति की शक्ति पर अब नियंत्रण स्थापित कर चुका था।
अब चारो ओर चिराग ही चिराग दिखते, बड़े-बड़े चिराग। इन चिरागों के सामने मनुष्य क्रमश: छोटा होता जा रहा था लेकिन फिर भी वह चिरागों का आकार बढ़ाने से बाज न आता।
फिर एकदिन उसकी बुद्धि में यह बात आई कि वह खुद भी तो चिराग में रह सकता है और इस प्रकार वह इन चिरागों को थोड़ा और बड़ा कर लेगा।
मनुष्य चिराग में घुस गया और भष्म हो गया क्योकि जिन्न मनुषयो की तरह मिट्टी से नही बल्कि आग से बने होते हैं।
अब दुनियाँ में केवल चिराग ही चिराग थे जिनमें जिन्न भरे पड़े थे लेकिन मनुष्य कहीं नही था।
काश मनुष्य धर्म, समाज, देश, राष्ट्र आदि के जिन्नों से जलकर सिख गया होता तो आज वह विज्ञान के अलादिनी चिराग में भष्म होने से बच जाता, लेकिन उसकी आँख न खुल पाई की जिन्न बड़े होकर उसको भष्म करने लगते है।
----------★★★★---------
उस दिन कीड़ो मे से बुद्धिमान आपस मे बात करते सुने गए कि आखिर वीतराग भी तो अपनी आवश्यकताओं और कामनाओं को ही तो मारते थे, हम भी वीतरागी हो गए हैं।
यह नई व्यवस्था कुछ मनुष्यो के हाथों में केंद्रित थी। इन मनुष्यो का आपस मे एक संगठन था जो यद्यपि आपस मे देश, राष्ट्र, परिवार आदि पुराने सामाजिक करारों को न मानते लेकिन अपने से शेष लोगो को, जो पहले प्राकृतिक रुप से मनुष्य थे, उनके लिए देश, राष्ट्र और परिवार आदि की नई-नई व्याख्याए लेकर आते और उनके मस्तिष्क में ठूंस देते क्योकि उनकी बौद्धिक वेश्याओं, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, दर्शनिकों ने यह गणना करके बता दिया था कि इस नई व्यवस्था में यही चीजे मनुष्यो को कीड़े बना सकती हैं। इसका कारण यह है कि नई व्यवस्था में सदियों पुराने आदिम सामाजिक करार कार्य नही करते, नई व्यवस्था में आदिम मूल्य बल्कि गले की फाँस बनकर आत्मा का गला घोंटते जाते हैं।
नई व्यवस्था के इन मालिको को यह अपना अपमान लगता कि वह जो शेष पहले प्राकृतिक रूप से मनुष्य थे, आज भी मनुष्य की तरह ही दिखते हैं, हालांकि उन्हें इस बात का सन्तोष भी था कि यह लोग अंदर से कीड़े बन चुके है। यह नई विश्व व्यवस्था उनके हाथों में बनी रहे इसके लिए इन शेष लोगो का हमेशा के लिए कायिक रूप से भी कीड़े बन जाना आवश्यक था।
नई विश्व व्यवस्था में अब श्रम बेचना ही काफी न था। मात्र श्रम बेचकर अब जीवन न चलता बल्कि ठहरकर धीरे-धीरे सड़ने लगता। अब अपने जीवन को रेंगते देखना भी बड़ी बात थी। इस नई व्यवस्था में जीवन रेंगने से थोड़ा अधिक तेज चले इसके लिए अब श्रम के साथ आत्मा, ज़मीर और शरीर भी बेचना पड़ता और इन्हें बेचने के बाद मनुष्य कीड़ा बन ही जाता है।
यह शेष मनुष्य जो कीड़े बनते उन्हें उन्हें इस कायांतरण से फर्क न पड़ता क्योकि कीड़े-मकोड़े बनकर भी उनके पास वही नही होता जो उनके कीड़े बनने से पहले नही था। हाँ, उनके कीड़े बनने से उनकी वह कामनाएँ अवश्य मर जातीं जो पहले उनके मनुष्य के रूप में थीं।
--------★★★★----------
प्रकृति ने हमे सम्बोधित करते हुए कहा कि वह हमें बुद्धि प्रदान करने को तैयार है लेकिन इसके लिए उसे हमारा मस्तिष्क जटिल और बड़ा करना होगा किंतु, सावधान इसके खतरे भी हैं, क्या तुम यह खतरे मोल लेने को तैयार हो?
"खतरा? किस प्रकार का खतरा?"
"अनगिनत खतरे, तुम सबके व्यक्तिगत स्तर और, तुम्हारी प्रजाति के स्तर पर!
सबसे पहले तो मैं तुमसे तुम्हारी मजबूत पेशियां छीन लुंगी और तुम्हे पशुओ के सामने शारीरिक रूप से बौना बना दूंगी क्योकि पेशियां कम न हुई तो वह तुम्हारे उदर से समस्त भोजन को हड़प लेंगी और भोजन के अभाव में तुम्हारा मस्तिष्क वैसे ही मर जाएगा लेकिन मैं तुम्हारी भूख को तुम्हारे साथ ही रहने दूंगी क्योकि मैं तुम्हारी भूख को कम नही कर सकती, वह बीज जो आरम्भ में ही पड़ चुका है, उस बीज से निकले वृक्ष को पुनः बीज नही बनाया जा सकता किन्तु मैं तुम्हारे मस्तिष्क को वृहत करते हुए तुम्हारी क्षुधा को तुम्हारे मस्तिष्क और उदर के बीच बराबर बाँट दूंगी।
लेकिन मुझे पता है कि तुम इस साम्यवस्था को रहने न दोगे। तुममें से बहुतों के उदर की भूख उनके मष्तिष्क की भूख को खा जाएगी और कुछ ऐसे भी होंगे जिनके मष्तिष्क की भूख उनके उदर की भूख को निगल लेगी। वह जिनके उदर की भूख उनके मस्तिष्क की भूख को खा जाएगी वह यद्यपि दिखने में तो मनुष्य होंगे किन्तु उनके अंदर एक पशु अपना पालन-पोषण करेगा और वह जिनके मष्तिष्क की भूख उनके उदर की भूख को निगल लेगी, उनके अंदर भी मानव से इतर कोई जीव स्थापित होगा। दोनो ही स्थितियों में तुम्हारी प्रजाति मानव की न रहेगी।
---------------------
सब ठीक है साहब, इतिहास खोदिए, वीररस-करुणरस में कविता पाठ करिए, संघर्ष का या सामंजस्य का समाजशास्त्र गढ़िए, राजनीतिशास्त्र के नए आयाम ढूंढिए लेकिन सबसे ज़रूरी है, सबसे ज़रूरी, विज्ञान को बचाए रखिए क्योंकि अंततः क्रांति और परिवर्तन यही लाता है।
किसी काल कोई भक्खा भंगी था, मैला साफ करता, सर पर मैला ढोता।
इतिहासकारों ने उसे बताया कि उसके पुरखे ब्राह्मण थे।
हलाकि एक दूसरा इतिहासकार कह रहा था कि भक्खा के पूर्वज अनार्य थे जिनको आर्यो ने गुलाम बना लिया।
अब इससे उसे इससे क्या फर्क पड़ गया कि उसके पुरखे क्या थे।
कुछ साहित्यकारों ने भक्खा के मैला ढोने को वीर रस में ढाल कर तो किसी ने करुण रस में कविता लिख डाली।
क्या हो गया इससे?
जब भक्खा ने वीर रस वाली कविता पढ़ी तो उसने उस दिन रोज के मुकाबले तिगुना मैला ढोया और जिस दिन उसने करुण रस वाली कविता पढ़ी उस दिन लुहार के यहाँ से तलवार खरीद लाया ।
राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र भी उसने पढ़े और उसके अनुरूप तदनुरूप बस प्रतिक्रियाएं ही हुईं जो वास्तव में क्रांति न थीं।
माना भक्खा ने इतिहास, साहित्य, राजनीति शास्त्र और समाज शास्त्रपढ़ के अपना काम छोड़ दिया लेकिन सक्खा का क्या?
महात्मा आँधी करुणा के वशीभूत स्वयं सर पर मैला ढोने लगे।
ठीक, लेकिन कुछ बदला क्या?
मानवीय गरिमा स्थापित हो पाई क्या??
चलिए माना कि भंगियों का अधिनायकत्व ही स्थापित हो गया और अब इस व्यवस्था में ब्राह्मण सर पर मैला ढोएंगे।
क्या इस बार भी संचमुच क्रांति हुई??
कोई वास्तविक परिवर्तन हुवा??
मानव की गरिमा स्थापित हुई???
ना!!
इन सबसे हटकर किसी ने दाब के नियम को समझ कर ऐसी मशीन बना दी जो एकत्रित मल को फेंक देगा, उस व्यक्ति ने एक टॉयलेट बना दिया।
अब न तो इतिहास खोदने की ज़रूरत थी, न काव्य पाठ की, न खुनी क्रांति की , न करुणा युक्त ह्र्दयपरिवर्त की।
एक मशीन ने सब कर दिया और मानवीय गरिमा भी स्थापित हो गई।
------☆★★★☆-----
ईश्वर और संसार
समय के उस पार जब हममें से कोई नही था और हमारी दुनिया भी नही थी तब केवल वह था। वह न तो ईश्वर था न शैतान, न जड़ न चेतन हालांकि वह वेदना और आनन्द का सम्मिलित रूप था, उसमें चित भी था और अचित्त भी, वह सत भी था और असत भी।
अपने आरंभ से ही वह महानिद्रा में सोया हुवा था फिर एक दिन उसकी नींद खुल गई-अब वह जाग गया था लेकिन जाग्रत अवस्था मे वह क्या करे?
उसने दूर-दूर तक देखा लेकिन हर जगह वह खुद को ही पाता था-उसकी दृष्टि बहिर्मुखी होने के बावजूद अंतर्मुखी थी। उसने देखा वह चित्त भी है और अचित्त भी, आनन्द भी और वेदना भी, जन्म भी और मृत्यु भी, अच्छा भी और बुरा भी। अपने अंदर असत, अचित्त और वेदना देखकर वह बेचैन हो उठा अतः उसने अपने भीतर के असत, अचित्त और वेदना को इकट्ठा करना प्रारम्भ किया। जब उसके अंदर के समस्त असत, अचित्त और वेदना इकट्ठे हो गए तो उसने इनको अपने से निकाल कर एक गठरी बनाई और उस गठरी को समय के उस पार फेंक दिया।
अब समय के एक तरफ ईश्वर था और दूसरी ओर संसार।
------●●●●-------
राजा
उस राज्य की सबसे सुंदर स्त्री के सौंदर्य के चर्चे होते थे। दूर देश के कवि उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे ताकि उनकी कविता श्रृंगार और विरह के अब तक अनछुए पक्षो को शब्दों में बांध सके। कुछ दीवानों ने तो उस स्त्री के लिए सम्राट के महल में, जहाँ वह रहती थी और उसका मनोरंजन करती थी, छुपकर प्रवेश करने की कोशिश भी की थी और फिर सम्राट के सजग सैनिकों द्वारा पकड़े गए थे और सम्राट के क्रूर जल्लादों द्वारा चौराहे पर काट डाले गए थे।
उस राज्य के सबसे ज्ञानी व्यक्ति के भी देश विदेश हर जगह चर्चे थे और सम्राट ने उसे सरस्वती-पुत्र की उपाधि भी दे रखी थी। वह समस्त शास्त्रों और समस्त विद्याओं का ज्ञाता था तब भी उसकी ज्ञान पाने की भूख मिटती ही नही थी।
सम्राट अपने सिंहासन के बाएं उस सौंदर्यवान स्त्री को अपने बाएं तथा ज्ञानी को दाएं बिठाकर शासन चलाता।
एक दिन ज्ञानी और सौन्दर्यवती एक दूसरे पर आसक्त हो गए किंतु वह सम्राट से मन ही मन डरते भी थे अतः उनके मन मे इस विचार ने जन्म लिया कि सौंदर्य और ज्ञान मिलकर शासन क्यो न करे, आख़िर हमे इस सम्राट की आवश्यकता क्या है! और यह विचार विद्रोह में बदल गया।
ज्ञानी ने अपने ज्ञान से सबसे घातक विष तैयार किया जिसे उस सौन्दर्यवती स्त्री ने धोखे से सम्राट को उस रात शराब की प्याली में शराब ढालने वक्त मिला दिया।
अगली सुबह सम्राट के सिंहासन के अगल-बगल की जगह खाली थी, पता चला कि कल रात ज्ञानी ने एक विष बनाया था जिसका उसने स्वयम पर प्रयोग किया और उस विष की बेचैनी में उसने उस सौन्दर्यवती को मार दिया तथा स्वयम भी उस विष के प्रभाव से मर गया।
सिंहासन पर बैठे सम्राट की आँखों मे कोई पश्चाताप नही था बल्कि उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखने पर संतोष का भाव दिखता था जो इस बात की गवाही थी कि वह बलवान है।
■■■■■
पतित
अपने अंतरंग वार्तालाप के क्षणों में नदी ने सागर से इठलाते हुए उस चट्टान के बारे में बताया: एक अभागा पत्थर था जो बाकी पत्थरो से टूट कर मुझमे गिर गया लेकिन मुझे तो सागर में मिलना था इसलिए मैंने उस पत्थर पर थोड़ी अठखेलिया कर लीं। और दोष मेरा भी नही है क्योंकि यदि मैं उस पर अठखेलिया ना करती तो वो मेरा बहाव रोक देता लेकिन मुझे तो सागर में मिलना है।
सागर अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता से बोला: पत्थरो की यही नियति है। मैं कई युगों से उनकी यह नियति देख रहा हूँ।
वही बगल में सागर और उस नदी की आंखों से अदृश्य उनकी बातें एक पतित देवदूत ने सुन लिया।
उसे अपनी और उस चट्टान की नियति एक दिखी--दोनों ही तो पतित थे; दोनों ही ने विद्रोह किया था; आह, दोनों ही ने तो सपने देखे थे!
तभी उस पतित देवदूत को स्मरण हुवा कि उसके पास तो स्वप्न विधाता ने भेजे थे और हाथ जोड़ते हुए यह मिन्नत की थी कि इस स्वप्न को देखो ताकि तुम पतित बनो--तुम पतित बनो क्योकि मेरी बनाई दुनिया अभी अपूर्ण है; मैं इसमें पुण्य डालना चाहता हूँ; मैं इसमें मुक्ति डालना चाहता हूँ; मैं इसमें धवल श्वेत रंग भरना चाहता हूँ लेकिन तब पुण्य के लिए पाप होना ज़रूरी है, धवल श्वेत रंग के लिए गहन तम का कालापन होना ज़रूरी है; मुक्ति के लिए मूल पाप का होना ज़रूरी है।
तो क्या इस पत्थर से भी विधाता ने प्रार्थना किया था, पतित देवदूत ने स्वयम से प्रश्न किया।
उधर सबसे ऊपर के आकाश में रहनेवाले जगत के सृष्टिकर्ता ने प्रयोगवश अपनी शब्दावली से पतित शब्द को मिटा दिया क्योकि वह देखना चाहता था कि इस शब्द के बगैर मानवता बनी रह सकती है कि नही।
पतित शब्द के मिटते ही विधाता का अस्तित्व भी वाष्पीकृत हो गया!
---------------●●●●●---------------
अखलाक/ नैतिकता
--------------------------
मजलिस जमी थी, यह रंको की मशहूर चौपाल थी जहाँ उनके बच्चे रंको की तहजीब सीखते। इस मजलिस के सामने जो ऊँची जगह थी वहाँ रखी तख्ती तब से मौजूद है जब से दुनिया मे बादशाहत कायम हुई। दुनिया मे बादशाहत कायम होने के अगले ही दिन वहाँ पहली मजलिस जमी थी। उस तख्त पर उसी दिन एक पहला नासेह बैठा था जिसने रँको को नैतिकता / अखलाकियत की पहली सबक सिखाई थी।
तब से आज तक यह रवायत कायम थी। रंको की दुनिया का सबसे उम्दा नासेह उस तख्ती पर बैठता, सामने बच्चे बैठते और अखलाकियत कि सबक चलती।
नासेह ने एक दास्तान के ज़रिए सबक पढ़ना शुरू किया:
"एक क्रूर राजा था
था एक ज़ालिम बादशाह!"
कहते हैं कि करामन और कातिबीन हर जगह मौजूद होते हैं। इंसान के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का काम ईश्वर ने दो फ़रिश्तों को दे रखा है। ये फ़रिश्ते इंसान के हर अच्छे-बुरे कर्म को लिखते हैं। इन फ़रिश्तों को करामन-कातिबीन कहा जाता है। ये फ़रिश्ते जिस रजिस्टर में कर्मों को लिखते हैं उसे नामा-ए-आमाल कहा जाता है।
इस दिन किसी तरह नामा-ए-आमाल करामन कातिबीन के हाथ से फिसलकर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा और किसी ने उसमे लिखी बाते पढ़ लीं। उसमे लिखा था:
"यह रंको कि कौम के नासेह जो कहते हैं कि एक क्रूर राजा था, एक था ज़ालिम बादशाह, हक़ ये है कि वो बादशाह ज़ालिम हो न हो ये कौम बदअख़लाक़ी ज़रूर है, बिल्कुल बेईमान और भगोड़ी।"
आगे एक शेर दर्ज था जिस के नीचे करामन और कातिबीन दोनों के दस्तखत थे---
"तुम भी चाहते तो थे के तेरी ही होती दुनिया
उसकी दुनिया जो हुई, कहते हो ज़ालिम था वो!"
------------●●●●●------------
बी ए प्रोफेट ऑनटू दाईसेल्फ
इस समाचार को सुनने के पश्चात की सम्बुद्ध, वह जिन्हें सारे रहस्य ज्ञात हैं, कल इस पगडंडी से गुजरेंगे, सड़क के किनारे अपनी दुकान लगाने वाला चर्मकार खुशी से झूम उठा--
"मेरी अज्ञानता ने मेरी राह रोक रखी है अतः कल महाज्ञानी से रहस्य को जानूँगा", चर्मकार ने इस प्रकार मन मे विचार और निश्चय किया।
अगली सुबह जब सम्बुद्ध जब उस चर्मकार की अस्थाई दुकान के सामने से गुजर रहे थे तब वह अपनी चटाई से लगभग छलांग लगाते हुए सम्बुद्ध के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया।
हे परमज्ञानी, मैं आपसे एक सत्य, एक रहस्य जानना चाहता हूँ, चर्मकार ने सम्बुद्ध से कांपते हुए कहा।
-मित्र, सत्य ही केवल उत्तर है, कुछ नही बल्कि मात्र सत्य, प्रश्न करो!
-प्रभु, जूतों की कैसे सिलाई करूँ की वह जूते न कभी घिसे, न फटे?
-एक सम्बुद्ध से इस प्रकार के ओछे प्रश्न करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!! सम्बुद्ध के अनुयायियों ने उनका अपमान समझते हुए क्रोधित होकर कहा।
-लेकिन प्रभु, मेरे लिए इसी प्रश्न का उत्तर सारे रहस्यों की कुंजी है क्योकि आपके पिता, जो इस राज्य के महाराजधिराज थे, ने मेरे पिता को इसी गलती के लिए सजा दी थी कि मेरे पिता ने उनके लिए जो जूते बनाए वह शाश्वत नही थे, कुछ दिनों के पश्चात उनकी सिलाई खुल गई और मैं भी उस दण्ड को मैं भोग रहा हूँ तथा मेरी आने वाली पीढियां भी भोगेंगी।
सम्बुद्ध हमेशा की भांति मौन होक र आगे बढ़ गए-अव्यक्तानि;अप्रश्नानि!!
चर्मकार के मन मे एक निश्चय आया: अप्पदीपो भव!!
--------●●●●-----------
मुक्ति
अपराधी को फाँसी के तख्ते पर ले जाया गया। वहाँ उसके शरीर ने उन स्तम्भो को स्पर्श कर लिया जिनसे वह रस्सी बंधी थी जो थोड़ी ही देर में उसके गले मे पड़ने वाली थी--स्पर्श अत्यंत ठंढा था, बिल्कुल बर्फ सा--मानो समाज ही आज स्वयं सर्द, भावहीन होकर खड़ा हो--आखिर उसे अपने मे से ही किसी को मारना है।
लेकिन, इस स्पर्श ने अपराधी के अंदर मृत्यु के भय को हिकारत की भावना में तब्दील कर दिया--यह स्पर्श उसके लिए कोई नया नही था--ठंढा और सर्द।
इसमें सर्द और ठंडे स्पर्श में उसने बल्कि समाज के उसके प्रति ठंडे और सर्द भावना को ही महसूस किया और वह तेजी से उस रस्सी के नीचे जाने के लिए छटपटा उठा मानो मृत्यु की गरमाहट का ही उसे वर्षो से इंतज़ार हो और यह गरमाहट ही उसकी मुक्ति हो।
सामने उसकी लाश पड़ी थी, उन्होंने अपने मे से किसी को अपना प्रतिनिधि बनाकर उसके लाश के पास भेजा। प्रतिनिधि ने उसके शरीर को स्पर्श किया--एकदम सर्द और ठंढा, उसके नब्जों को महसूस किया जो शांत पड़े थे।
प्रतिनिधि ने नोट किया-यह अब हमारे जैसा हो चुका है--शांत, सर्द और ठंढा।
फिर उसने इन तीनो शब्दो को मिलाकर एक शब्द अपनी रिपोर्ट में लिखा--अपराधमुक्त, और नीचे अपने दस्तखत कर दिए।
----------●●●●●------------
प्रेत
दरअसल हम सब वासनाओं के प्रेत ही जन्मते है लेकिन शीघ्र ही हमारा सामना समाज द्वारा रचित महाप्रेत, ईश्वर से होता है जिसकी तुष्टि के लिए हमे अपने प्रेत के एक बहुत बड़े हिस्से की बलि चढ़ानी होती है और यह बचा हुवा हिस्सा ही आदमी कहलाता है।
महाप्रेत को तुष्ट करना हमारी बाध्यता है क्योकि उसके तुष्ट होने के बाद ही समाज हमे स्वीकार करता है और हमे समाज की जरूरत है।
समाज की अपनी वासनाएं है लेकिन उन्हें वह प्रेत कहना पसंद नही करता बल्कि वह अपनी वासनाओं को ईश्वर कहता है। उसने इस शब्द से एक माया रच रखी है ताकि उसके प्रेत के आगे बाकियों के प्रेत उन्हें पापी और छोटे दिखें जिससे उनके प्रेतों का बलिदान करवाया जा सके।
-------●●●--------
मनुष्य और जीवन
जब तक वह पत्थर रूप था उसे जीने की जरूरत ही नही थी--बस यूँ ही निष्प्राण कही उसे पड़े रहना था--हाँ कभी उसे मनुष्यो की ठोकर सहनी थी, कभी नदियों के साथ बहना था तो कभी हवाएं उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर रख देतीं।
फिर ईश्वर ने उसके अंदर जीवन फूंक दिया। अभी भी हालांकि उसका शरीर था तो पत्थर का ही लेकिन उसके अंदर कुछ नया उतपन्न हुवा जो अब मात्र पत्थर ना था--उसके इस नवीन अंश में कोमलता थी और अब हवाएं और नदियाँ भी इस बात को जानते थे कि वह अब मात्र पत्थर न था क्योकि वह नदियों और हवाओ से खुद को सींचने लगा था--मनुष्यो ने भी उसके इस बदलाव को देखा और इस बदलाव में उन्हें अपना प्रारंभिक रूप दिखा-मनुष्य यह जान चुके थे कि उनकी अनन्त की यात्रा में उनका सहमार्गी उपस्थित हो चुका है।
यद्यपि उस पत्थर के अंदर जीवन फुट चुका था तथापि उसका जीना मनुषयो के जीने से अलग था-उस जीवित पत्थर के लिए आज भी महज उसकी प्रवृत्तियां ही सबकुछ थी और वह इनके आगे नही बढ़ पा रहा था। उसके लिए पदत्त संसार ही उसका संसार था जबकि मनुषयो के पास प्रदत्त संसार से एक नवीन संसार का जन्म हो चुका था मानो पत्थर में प्राण वाली घटना उनके संसार के संदर्भ में दुबारा घटी हो।
उस जीवित पत्थर ने और ध्यान से देखा--मनुष्य दिए हुए संसार से अधिक इस नए संसार मे ज्यादा जीते थे--वह प्रवृतियों से आगे बढ़कर मूल्यों में जीने लगे थे।
पत्थर दार्शनिक की भांति गहन चिंतन में डूब गया और कुछ देर बाद उसकी आत्मा में यह प्रकाशित हुवा की वह मात्र जी रहा है जबकि मनुष्य जीवन का अर्थ जानते हैं।
--------●●●●-----------
देवता
---------
प्रोफेसर वृहस्पति सैमुअल अपनी कक्षा में विद्यार्थियों को साहित्य पढा रहे हैं। उन्होंने पुस्तक खोली और आज उन्हें जिस पाठ को पढ़ाना है उसका नाम "देवता" है।
प्रोफेसर सैम्युल का मानना है कि अतीत में मनुष्य पाखंडी थे। एक तरफ तो वह अमर होना चाहते थे लेकिन दूसरी तरफ वो अमरता से डरते थे। अतीत के मनुष्य अपनी कथाओ में, अपने मिथकों में, अपने पुराणों में अमर हुए पात्रों को शापित बना देते थे ज्यों मृत्यु जीवन से बेहतर हो और तभी चाहे वह अश्वत्थामा हो, वांडरिंग ज्यू हो या सलोमी हो, अमरता इनका अभिशाप है।
प्रोफेसर सैम्युल का यह भी कहना था कि अतीत के मनुष्य मात्र पाखंडी ही नही बल्कि उनके अंदर दोहरा व्यक्तित्व, एक स्प्लिट पर्सनैलिटी थी क्योंकि तब मनुष्य मृत्यु से डरकर अमरत्व की कामना भी करते थे और अमरत्व से डरते भी थे। वह अपने मे से किसी के अमर हो जाने से घबरा भी जाते और कोई अमरता की चाहत न रखे इसके लिए मिथक भी रचते थे। लेकिन फिर वो अमरता की चाह भी रखते। अमरता की उनकी चाहत उनके द्वारा रचित उनके देवताओं में अभिव्यक्त होता था लेकिन विडम्बना की देवता उनमे से नही होता।
प्रोफेसर ने लेक्चर प्रारम्भ किया:
"हमने जेनेटिक स्तर पर मृत्यु की उसमे मौजूद सूचना को हमेशा जवान और युवा रहने की सूचना से परिवर्तित कर अतीत के उन मनुष्यो के पाखण्ड को ही मात्र खत्म नही किया बल्कि देवत्व की तरफ एक कदम बढ़ाते हुए एक ऐसे मनुष्य का सृजन कर लिया है जिसका व्यक्तित्व उन अतीत के मानवो की भांति विभक्त नही है।
और हाँ, देवता अपनी प्रजाति नही बढ़ाते, वो स्वयम अमर होते हैं------"
●●●●●●●●
दानव
--------
"पर वह अश्वत्थामा की तरह अमर किन्तु मणि विहीन लोग हैं", सामने बैठे उस व्यक्ति ने कहा जो अन्य लोगो को सम्बोधित कर रहा था।
यह अतीत के एक समय की नही बल्कि भविष्य के एक समय की बात है। तब के वैश्विक सरकार की नज़र में ये लोग आतंकवादी है और इसलिए इनको आज सबसे बचकर यह मीटिंग करनी पड़ रही है जिसमे आज कुछ नए रिकरयूट भी शामिल होंगे।
मनुष्य वैज्ञानिक रूप से बहुत-बहुत ही ज्यादा प्रगति कर चुका है। आज किसी की चेतना को डिजिटलाइज कर उसको बायोप्यूटर में फीड कर उसको प्रिजर्व कर देने की बात भी इनके लिए बहुत पुरानी है। अब तो मनुष्य हज़ार -डेढ़ हजार साल से मरता ही नही। मनुष्य अब जीन को पूरी तरह कंट्रोल करना सीख गया है। भोजन भी अब जीवित रहने के लिए कोई करता ही नही, जिव्हा का कार्य अब मात्र कुछ इलेक्ट्रोड्स जोड़ कर स्वाद लेने का है। अपनी प्रजाति को बढाने के लिए सेक्स करने पर रोक लगा दी गई है और ऐसी एक सरकारी एजेंसी है जो आपको स्टेराइल कर एक कार्ड इशु करती है जिसे रखना आपकी जिम्मेदारी है। हाँ आप मज़े के लिए चाहे जैसे सेक्स करें: रियल, वर्चुवल, कम्प्यूयर प्रोग्राम्ड...इसकी कोई मनाही नही है लेकिन यदि आप अपना स्टेरेलाइज़ेशन नही करवाते तो आप बायो-टेरोरिस्ट हैं और आपको सबसे दुखदाई तरीके से ही नही बल्कि आपके मस्तिष्क में पेन अमलीफिकेशन प्रोग्राम इम्प्लांट करके आपकी दर्द के अहसास को उस अनुपात में बढ़ा दिया जाता है जिस अनुपात का तब के मानक के अनुसार आपने अपराध किया है।
आज से एक लाख वर्ष पूर्व किसी ने यह कल्पना भी नही की थी कि भविष्य में स्वयम को जीवित रखने की प्रवृत्ति और अपनी प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति के मध्य टकराहट होगी लेकिन पिछले पच्चीस हजार वर्षों में यह हुवा है और स्वयम को जीवित रखने वाली प्रवृत्ति जीत गई है।
पूरे विश्व में हालांकि कुछ लोग हैं जो उनके पूर्वजो की अवस्था मे लौट जाने को सही मानते हैं। उनके अनुसार अंततः जीत प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति की होगी और उसके लिए वह संघर्षशील हैं।
सरकार की नज़र में ये बहुत ही खतरनाक
आतंकवादी हैं, बिल्कुल "दानव", इनका सफाया ज़रूरी है।
--------●●●●●---------
मनुष्य
कुछ ज्ञानी उसे अभी भी पत्थर समझते हैं जबकि कुछ ज्ञानी उसे मात्र चेतना जबकि वास्तव में वह चेतन प्राणमय पत्थर है। दूसरे प्रकार के ज्ञानी उसे मात्र चेतन मान कर उसका स्रोत पत्थर और प्राण प्रकिया के बाहर किसी अन्य लोक में ढूंढते है जबकि वह अन्य लोक मैंने रचा ही नही है। जब मैं चेतन कहता हूं तो उसके अंदर प्राणमय पत्थर पूर्व से ही शामिल होता है जिसको यह ज्ञानी देख नही पाते -----अपनी डायरी का यह अंश पढ़कर ईश्वर ने विचार किया कि क्या एक ऐसा शब्द नही हो सकता जिसके अंदर चेतना, प्राण और पत्थर के साथ वह स्वयं भी शामिल हो?
लेकिन समस्या यह थी चेतन--प्राणमय--पत्थर की
श्रृंखला में खुद को आखिर रखे कहाँ--वह किसका विशेषण बने और विशेषित किससे हो क्योकि वह तो हर जगह विशेषण भी है विशेष्य भी। असल मे उसे ईश्वरमय ईश्वर-ईश्वरमय चेतना-ईश्वरमय प्राण-ईश्वरमय पत्थर--ईश्वरमय ईश्वर जैसा कुछ लिखना पड़ा लेकिन तब भी वह अपने इस लिखे से संतुष्ट नही था। उसकी असंतुष्टि ने तभी आकार ग्रहण किया और उसके सामने उपस्थित हो गई। ईश्वर ने उसे ध्यान से देखा तो यह मनुष्य था--इसके अंदर वह जो लिखना चाहता था वह सब कुछ तो था ही उसकी असंतुष्टि भी थी।
---------●●●●●--------
ॐ अपूर्णमद: अपूर्णमिदम
महासागर ने देखा उसमेंमें जल की विशाल राशि है। वह स्वयम भी जल की विशाल राशि ही है क्योकि वास्तव में तो उसमें "में" और है का भेद खत्म है। जलधि, जलनिधि, समुद्र या सागर एक दृष्टि में जल की एक बहुत बड़ी बून्द ही तो है-- बिल्कुल उस छोटी बून्द की तरह जो सामने रेत पर बैठे उस आदमी की उंगलियों पर मौजूद है। महासागर ने स्वयं से प्रश्न किया इस छोटी बून्द और मुझमें में पूर्ण कौन है?
उत्तर पाने के लिए महासागर ने पुनः अपनी ओर नजरें दौड़ाईं--वह विराट था, समग्र। उसे गर्व हुवा की उसने असंख्य वैसी छोटी बूंदों को अपने अंदर समेट रखा है लेकिन तत्क्षण वह परेशान हो उठा क्योकि उसे भान हुवा की वह तो छोटी छोटी उन बूंदों से ही मिलकर निर्मित है।
रेत पर बैठा वह आदमी जो अपनी उंगलियों पर बूंदों के साथ खेल रहा था कोई साधारण मानव न था। वह किसी के भी मन की बात पढ़ लेता था। वह सागर के पास गया और उसने सागर को वह बूंदे जो उसकी उंगलियों पर थी सागर को लौटाते हुए कहा--
तुम दोनों ही अपने आप मे पूर्ण हो: यह छोटी बून्द भी और तुम महासागर भी। तुम जलनिधि जल की छोटी छोटी बूंदों से निर्मित होने के बावजूद, और ये छोटी बूंदे एक विशाल बून्द के टुकड़ों में बट जाने के बाद भी अपने आप मे पूर्ण हैं।
फिर उसने मन मे सोंचा--
महासागर की उस बड़ी बून्द को छोटी छोटी बूंदे बनना पड़ता है यह उसकी मुक्ति है और फिर इन छोटी बूंदों का महासागर बनना इन छोटी बूंदों की मुक्ति।
मात्र यह बून्द ही बद्ध नही है, महासागर भी मुक्त नही है क्योकि ये दोनों एक दूसरे के सामने अपूर्ण है।
-------●●●●----------
ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति।
मुझे मालूम है कि एक न्युमोनल यथार्थ है और एक फिनोमेनल यथार्थ है। न्यूमोनल यथार्थ के पार और परे कोई यथार्थ है या नही यह मुझे नही मालूम लेकिन फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक नया यथार्थ रचने की कोशिश हमेशा से मेरे पूर्वजो ने की है, और उन्होंने फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक यथार्थ की रचना करने का सतत प्रयास फेनोमेनल यथार्थ की नग्न सच्चाइयों से बचने के लिए किया है। फेनोमेनल यथार्थ बहुत ही कुरूप है। इससे संयुक्त होकर मेरे पूर्वज वेदना और पीड़ा से ग्रस्त हो गए। इस कुरूपता को उन्होंने अपनी कविताओं और चित्रों से ढकने का प्रयास किया ताकि उनकी पीड़ा कुछ कम हो सके किन्तु ऐसा नही हुवा। मेरे पूर्वजो ने फिनोमेनल यथार्थ की कुरूपता से बचने के लिए न्युमोनल यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश की और ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का गीत गाया किन्तु सच यह है कि यह न्यूमोना उनकी पकड़ में कभी आया ही नही और वो फेनोमेना की कुरूपता और वहाँ उपस्थित वेदना से तिल तिल कर मरते रहे।
मैं फेनोमेनल यथार्थ में एक वैज्ञानिक हूँ अतः मैंने इसकी कमियों को, इसकी कुरूपता को काव्य और पुराणों से ढकने के बजाय एक हाईपररियलिटी की रचना कर डाली और इसको मेरे सामने खड़े लोगो की सामूहिक चेतना से जोड़ डाला। मैं इसे प्रकृति से संस्कृति की ओर वास्तविक संक्रमण कहता हूँ और देखिए इन लोगो को ये कितने खुश हैं--यह जो दौड़ रहा है वह फेनोमेना में हाथ-पैर से अपाहिज बिस्तर पर पड़ा हुवा है-- एक दुर्घटना ने इसके हाथों और पैरों को छीन लिया। यह जो दूसरा सबको उपदेश दे रहा है वह भी फेनोमेना में एक बिस्तर पर बेहोश पड़ा हुवा है। यह वहां एक अपराधी था और इसे फांसी की सजा दी गई थी लेकिन फांसी के रस्सियों ने इसे मारा नही बल्कि इसके मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर दिया और इसे हमेशा के लिए बेहोश कर दिया। फेनोमेना में अभी इसको लेकर तर्क वितर्क चल रहे है कि इसके होश में आने पर इसे पुनः फाँसी देनी चाहिए या इसकी सजा पूरी मानकर इसे मुक्त कर देना चाहिए।
ईश्वर है या नही मैं नही जानता और मनुष्य न्युमोना को जानकर ईश्वरतुल्य हो जाता है या नही यह भी मैं नही जानता क्योकि ईश्वर यदि हो भी तो उसने न्युमोनल यथार्थ के बारे में फिनोमेनल यथार्थ के मनुषयो को कुछ नही बताया लेकिन मैंने इन सबको यह बता दिया है कि वो एक सिम्युलेशन में हैं और फेनोमेनल यथार्थ में वो बिस्तर पर पड़े घुट रहे हैं। अब जब उनसे फेनोमेनल वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करने की कोशिश करता हूँ तो वह मुझसे ही पूछते है कि उन्हें उस वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में क्यो जानना चाहिए। फिर वो आगे कहते है कि फेनोमेना में मनुष्य की धारणा थी कि उन्हें वस्तुनिष्ठ यथार्थ को इसलिए जानना चाहिए कि वो अपने पीड़ा को उतपन्न करने वाली परिस्थितियों को बदल सके लेकिन इस हाइपररियल्टी में तो उन्हें कोई पीड़ा ही नही है अतः उनके लिए ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का कोई मतलब नही।
---------●●●●----------
जनेऊ
उस वासना के प्रेत का जनेऊ पहनना समाज के लिए एक सुखद अनुभूति थी। उसके जनेऊ के समय समाज ने उसे कई प्रण करवाए थे जिनका अभिप्राय उसे प्रकृति से निकाल कर संस्कृति में स्थापित कर देना था क्योकि बुजुर्गों को पता चल चुका था कि प्रकृति में विकृति है और इस विकृति को केवल संस्कृति ही ठीक कर सकती है।
वासना का प्रेत स्वछंद था क्योकि वह प्रकृति की विकृति लिए हुए था। उसकी स्वछंदता के ऊपर गांठ लगानी आवश्यक थी वरना यह दुनियाँ प्रेतों की दुनियाँ बन जाएगी इसलिए समाज ने उसकी वासनाओं में से उन हिस्सों को छोड़कर जिनकी पूर्ति कर वह मनुष्य के रूप में विकसित होगा, शेष पर ब्रह्मगांठ लगा दिया और उस धागे को उस प्रेत के शरीर पर लपेट दिया।
अब वासना का वह प्रेत मानव था और शेष मानवों की पंगत में बैठ सकता था और अब बुजुर्गों से भी सम्वाद कर सकता था। बुजुर्गों द्वारा साक्षात किए गए सत्य अब उसके लिए भी उपलब्ध थे।
लेकिन वासना का वह खास प्रेत, ईमानदार नही था। हालांकि उसने अपने शरीर पर धागे लपेटवाए थे और अपनी स्वच्छन्दता के ऊपर ब्रह्मगांठ लगाने दिया था फिर भी उसके अंदर की बेईमानी ने उसे दिखा दिया कि इस धागे को तोड़ा जा सकता है, ब्रह्मगांठ को खोला जा सकता है और पुनः वापस वासनाओं का प्रेत हुवा जा सकता है। उसे वापस पुनः वासनाओं का प्रेत होना था क्योकि वहाँ प्रकृति की विकृति में उसे ज्यादा सुख मिलता। वँहा उसे ज्यादा सुख मिलता क्योकि प्रकृति की विकृति में वह स्वच्छंद था और स्वच्छन्दता वास्तव में सुसंस्कृत होने से ज्यादा सुख देती है। सभी पुनः वापस प्रेत नही हो जाते क्योकि उन्हें मालूम है कि मात्र सुख ही अब हमारे जीवन का उद्देश्य नही है लेकिन इस बेईमान प्रेत के लिए उसके जीवन का उद्देश्य मात्र सुख ही था।
वासना के इस प्रेत ने जनेऊ तोड़ डाला, अपनी स्वच्छन्दता को ब्रह्मगांठो से मुक्त कर दिया और वापस संस्कृति से प्रकृति की विकृति में चला गया।
-----------★★★★-----------
वह आदिम युगों से पत्थर को सींचता था, कभी पत्थरो पर जलाभिषेक करता, कभी प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ पुष्प और फल अर्पित करता तो कभी अपनी भावनाएं चढ़ा आता।
ऐसा कर वह स्वयम मिटता जाता, लेकिन यह भी नही है कि उसे इसका भान न था कि वह पत्थरो को सींच कर स्वयम को मिटाता जाता है। उसे यह भान था और वह सचेतन यह करता क्योकि उसके गर्न्थो में लिखा था कि वह ग्रन्थी है और ग्रन्थियों के खुलने के पश्चात वह मुक्त है, निर्ग्रन्थ, तथा निर्ग्रन्थ होना ही उसके जीवन की सार्थकता है; अच्युत, अभय पद की प्राप्ति; त्रिविध तापों का भूत, वर्तमान, भविष्यत अर्थात आत्यंतिक विनाश।
सदियां बीतती गईं किन्तु उसकी पीड़ा कम न होती बल्कि बढ़ती जाती थी, उसकी घुटन भी और उग्र होती जाती।
फिर एक दिन उसने अपनी पीड़ा और अपने घुटन से परेशान होकर आकाश की ओर देखा और चीख पड़ा। उसके बुजुर्गों ने बताया था कि इस प्रकार से चीखने से विराट से विराट में प्रवेश का रास्ता खुलता है।
वह कई वर्षों तक आकाश की ओर देख चीखता रहा लेकिन उसे कुछ भी दृष्टिगोचर न हुआ, या सम्भवतः हुआ क्योकि अब वह यह देख सकता था कि मात्र वही है और उसकी चीख है, इसके अलावा कुछ भी नही है।
वह उस पत्थर के पास गया और वहाँ उसने देखा कि वह पत्थर से कुछ विशिष्ठ है क्योकि वह चेतन है और वह पत्थर अचेतन, जड़।
फिर उसने पत्थर को थामे उस मिट्टी की ओर देखा। मिट्टी--यह अगर न होती तो यह पत्थर कब का लुढ़ककर कहीं और चला गया होता!
उसने और ध्यान से देखा तो मिट्टी में मात्र वह पत्थर ही नही था बल्कि वनस्पतियां भी थीं जिनपर पुष्प और फल लगते जिनसे वह अपनी क्षुधा भी शांत करता: फलो से पेट की और पुष्पों से मन की।
फिर उसे याद आया कि उसने मिट्टी को इस पत्थर की तुलना में तो बहुत कम सींचा है। वह अपराधबोध से भर गया और फिर से घुटन से भर इस बार धरती की ओर देखकर चीखा।
उस दिन विराट ने उसको जवाब दिया था की विराट में प्रवेश का रास्ता क्या है।
इस बार उसने सचेतन पुष्प और फल उगाए और उनमें से दस बीस पुष्प और फल उस पत्थर पर अर्पित कर आया क्योकि उसने और गहराई में जाकर देख लिया था कि वह पत्थर ही मिट कर मिट्टी बनता था और उसका पत्थर को सींचना व्यर्थ न था और न ही उसका खुद का मिटना ही व्यर्थ था।
कथा लिखने के पश्चात ईश्वर के उस मसखरे भेदिया ने यह कथा ईश्वर को दिखाई जिसे देखकर वह बहुत खुश हुआ कि इसमे न तो अनीश्वर का कोई जिक्र था और न ही मनुष्यो की पीड़ा का। इस कथा में ईश्वर के समस्त पाप, उसकी समस्त खामियां छुप गई थीं हालांकि वह अंदर ही अंदर जान रहा था कि पत्थर को पीड़ा नही होती किन्तु उस मनुष्य को पीड़ा सहनी होगी , और उसे यह पीड़ा इसलिए नही सहनी है कि मनुष्य आद्य पाप से ग्रस्त है अथवा वह अपना दैवीय स्वरूप भूल कर अविद्या ग्रस्त हो चुका है बल्कि, मात्र इसलिए कि ईश्वर कभी सर्वशक्तिमान था ही नही। उसे तो लगा था कि वह अपनी कमजोरियों, अपने अंदर उपस्थित अनीश्वर को समेट कर दूर उन्हें दूर फेंक कर सर्वशक्तिमान और सही मायनों में ईश्वर बन जाएगा लेकिन वह गठरी संसार बन गई और लाख कोशिशों के बावजूद ईश्वर इस गठरी की एक गांठ से खुद को मुक्त न कर सका। उसने हर सम्भव प्रयास भी किए, कभी अदृश्य होता, तो कभी बहुत बड़ा रूप बना लेता। यही नही उसने तो कई बार संसार मे स्वयम जाकर भी यह गांठ खोलनी चाही लेकिन अवतारी बनने पर भी वह उस गांठ को आज तक नही खोल पाया है।
-----★★★★--------
एक्सक्यूज माई वल्गरिटी बट, मदर नेचर इज़ ए डर्टी बिच: स्लावोय ज़िज़ेक।
पहले वह चार पैरों पर चलता था, फिर प्रकृति ने उसे दो पैरों पर चलने को मजबूर कर दिया ताकि वह मारा जाय लेकिन वह मरा नही हालांकि मजबूर अवश्य हुआ था। इस मजबूरी ने उसके साथ सकरात्मक यह किया कि अब उसके पास हाथ थे जिनसे वह अब कुछ ऐसा कर सकता था जो आज तक अन्य किसी जीव ने नही किया था। धीरे-धीरे उसकी भुजाएं विकसित होती जाती थी और अब वह प्रकृति से भी दो हाथ कर सकता था। कई बार तो उसने प्रकृति को पटकनी भी दी। उसकी भुजाएं और विकसित हुईं और अब तो प्रकृति उसकी अट्टालिकाओं में धाय का कार्य करती। कल तक जो प्रकृति उससे अपने स्तुति गान करवाती थी, आज उसकी पालतू बनी उसके इशारे की प्रतीक्षा करती। उसने प्रकृति से अपने इस नये सम्बन्ध को एक नया नाम दिया, संस्कृति।
संस्कृति के साथ मनुष्यों ने अब एक नये जगत का निर्माण कर लिया है जो उस जगत में अधिक परिपूर्ण है जिसमे वह खुद को किसी अविवाहित किशोरी के नवजात सदृश प्रकृति द्वारा फेंका पाया गया था।
उसे यह स्मरण है कि प्रकृति द्वारा उसे फेंके जाने पर वह चीखा था। उसकी चीखों में और कुछ नही बल्कि एक ही शब्द की पुनरावृत्ति थी--प्रकृति माता, माता प्रकृति----
प्रकृति दूसरी तरफ निर्भाव खड़ी थी। प्रकृति को न तो किसी भी बंधन में बंधना स्वीकार नही है। वह उन्मुक्त रहना चाहती है और निरुद्देश्य विचरण करना चाहती है। प्रकृति को यह भी स्वीकार नही की मनुष्य उसके समानांतर किसी सत्ता की प्रतिष्ठा करे और इसलिए वह सदैव पुरुष के भक्षण की ताक में रहती है और संस्कृति की अस्थि-मज्जा को निगल जाना चाहती है।
★★★★
सम्बोधि के क्षणों में उन्हें साक्षात्कार हुआ कि 'यह' तो समग्रता में अराजकता का नग्न नृत्य है। चूंकि अब उनकी दृष्टि विकसित थी अतः उन्होंने इस इस अराजकता के आयामो का पीछा करने का निश्चय किया ताकि उनकी चेतना इस अराजकता के आदि तक पहुँच सके। उन्होंने तप से प्राप्त समस्त ऊर्जा को एकत्र किया और इसके छोर के अंत को प्राप्त करने की यात्रा पर निकल पड़े।
समस्त ऊर्जा को खर्च करने के पश्चात भी उन्हें इस समग्रता का छोर न मिला बस उन्हें यही दिखता की एक अराजकता नष्ट होकर दूसरी अराजकता को जन्म दे रही है: अराजकताओं की एक अंतहीन श्रृंखला----।
प्रतीत्यसमुत्पाद,अराजकता इस शब्द के पश्चात यह यह उनकी चेतना में गूँजने वाला दूसरा शब्द था।
सामान्य अवस्था मे पुनः वापस आने के पश्चात वह इन दो आर्य सत्यों के अलावा भी दो अन्य आर्य सत्य का उपदेश दे रहे होते जिनमे से पहला यह था कि अराजकता का अंत सम्भव है तथा दूसरा यह कि अराजकता का अंत किस विधि किया जाय।
कुछ लोग कहते हैं कि बाकी के ये दो सत्य भी उनके द्वारा साक्षात किए गए हैं जबकि अनेक लोगो का कहना है कि उन्होंने झूठ बोले थे अन्यथा मनुष्यता विक्षिप्त हो जाती, चारो ओर हाहाकार मच जाता यद्यपि उन्हें यह ज्ञात था कि शेष मनुष्यो को भी देर-सबेर इसका साक्षात होना ही है लेकिन मनुष्यता कम से कम अभी इसके लिए परिपक्व न है।
★★★★★
चार आर्य सत्य निम्न है: सर्वम दुखम :दुख, दुख का काऱण है: दुख समुदय,
दुख का निवारण है: दुख निरोध एवम् दुख निवारण का मार्ग है: दुख निरोध गामिनिप्रतिपदा।
सम्बोधि के पश्चात नये बुद्ध ने एकबार पुराने बुद्धों के सिद्धांतों को भी बुद्ध की दृष्टि से देखा।
जब वह चार आर्य सत्यों को ध्यान से देखते तो उन्हें इनमे सांख्य के प्रकृति और पुरुष का द्वैतवाद दिखने लगता है: प्रथम दो आर्य सत्यों में प्रकृति दिखती है तथा अंतिम दो आर्य सत्यों में पुरुष।
इन चार आर्य सत्यों को उन्होंने और ध्यान से देखा तो प्रथम दो आर्य सत्य माया दिखे जबकि अंतिम दो आर्य सत्य माया के निराकरण के पश्चात की सत्ता, ब्रह्म।
प्रथम दो आर्य सत्यों में संहारकर्ता महाकाली दिखती हैं और अंतिम दो आर्य सत्यों में उनका रास्ता रोककर लेटे कल्याणकारी भगवान शिव।
उन्होंने देखा कि अंतिम दो आर्य सत्य, शिव, पुरुष और ब्रह्म बुद्धों की स्वयम की रचना हैं और बुद्धजन इस बात को जानते हैं कि वास्तविकता में मात्र दो आर्य सत्य हैं, मात्र प्रकृति है, मात्र महाकाली हैं, मात्र माया है तथापि वह मिथ्या सम्भाषण करते हैं, झूठ बोलते है क्योंकि उन्हें मनुष्यता के कोमल मन का भान है जो इन आशाओं के अभाव में विक्षिप्त हो जाएगा।
★★★★★★
वेश्या
तुम एक वेश्या हो, मात्र कामकला में सिद्धहस्त नही वरन पुरुष के काम मनोविज्ञान के अंतरतम की ज्ञाता। यह सँच है कि संस्कृति ने नर और मादा के सम्बन्ध को विवाह में बांध दिया है; एक नर और एक मादा लेकिन, प्रवृत्तियां कहाँ मानती हैं, जीवन तुम्हे अंदर ही अंदर ढूंढता है। इसलिए नही की तुम एक वेश्या हो बल्कि इसलिए की तुम जीवन की सबसे मूल प्रवृति को तृप्त कर देती हो; तृप्तिका!
तो क्या वह दूसरी स्त्री मेरी प्रवृत्तियों को तृप्त नही कर पाती? न ऐसा नही है लेकिन तुम्हारे पास आकर मुझे अपने पुरुष होने का अहसास और प्रबलता से होता है। मेरे पसीने से कमाए धन का तुम बढ़कर मोल चुकाती हो; तुम्हारे पास आकर मैं इस संस्कृति से बदला लेता हूँ; तुम्हारे पास हलाकि मैं चोरों की तरह आता हूँ लेकिन मेरा और तुम्हारा कुछ ऐसा नाता है कि मैं रोमांचित तो महसूस करता ही हूँ, अंततोगत्वा एक विजेता, नही विजेता पुरुष की भांति महसूस करता हूँ और इसमें तुम मेरे साथ कदम से कदम, हांथो से हाथ, कंधे से कंधा और सांसो से साँस मिलाकर चलती हो।
लेकिन तुमने उस दिन मेरे पूर्ण पुरुष होने के भ्रम को खंडित कर दिया था जब मैंने तुम्हारे आस-पास एक दूसरे पुरुष की उपस्थिति को महसूस किया था। उस दिन वह पुरूष तुम्हारी बातों में था, तुम्हारी आंखों में था, तुम्हारे शरीर पर मैंने उसके छाप महसूस किए थे, तुम्हारे पसीने में उसके पसीने की बदबू थी, तुम्हारी सांसों में उसके सांसों की दुर्गंध थी---- हाँ तुम वेश्या हो--मुझे तुमसे घृणा हो गई है---वेश्या!!
-----------★★★★----------
नरक पहुँचने पर उसे सबसे पहले नरक के अधिकारी के पास पेश किया गया। अधिकारी के पास ही नरक के डॉक्टर और मुंशी बैठे थे। डॉक्टर ने उसकी डॉक्टरी जाँच की, एक रिपोर्ट बनाई और उससे उस रिपोर्ट के नीचे अँगूठा लगवा लिया। मुंशी ने भी अपना काम किया। उसने सबसे पहले यमदूतों के रिसीविंग लेटर पर हस्ताक्षर और मुहर लगाई और उसके बाद वह रिसीविंग लेटर यमदूतों को वापस किया फिर उसकी निजी संचिका में उसके साथ आए समस्त कागज, डॉक्टरी रिपोर्ट वगैरह लगा कर स्थापना प्रभारी की ओर फाईल बढ़ा दिया।
हालांकि यह चाय-पानी का वक्त हो चला था लेकिन तब भी स्थापना प्रभारी ने कर्तव्यपरायणता दिखाते हुए उसके फाईल मे उसके लिये वार्ड, सेल वगैरह आवंटित करते हुए कर्मी को बुला भेजा, जो उसको उसके वार्ड में पहुँचा देगा।
अभी तक उसको यह पता चल चुका था कि नरक में वार्ड और सेल होता है लेकिन अभी उसको वार्ड इंचार्ज, तन्डेल, जोड़ा लगना, पगली घण्टी, भन्सा आदि के बारे में भी जानना था जो वह अब आगे नरक भोगते-भोगते स्वयम जानेगा।
नरक के प्रत्येक वार्ड का वार्ड इंचार्ज कोई दबंग नरकवासी ही बनता है। कर्मी उसे लेकर उसके आवंटित वार्ड में पहुँचा और वार्ड इंचार्ज को आवाज लगाई।
वहाँ कोने में वह दो तीन आत्माओं से तेल मालिश करवा रहा था। यह तेल वह कड़ाहे से काढकर लाया था जिसमे पिछले हफ्ते उसकी पकौड़ी तली गई थी।
अपना नाम सुनकर वह झट से अंगोछा लपेटते खड़ा हुआ और वार्ड के दरवाजे के पास पहुंचा।
-नया नरकी है, कर्मी ने बताया कि स्थापना बाबू तो इसको दूसरे वार्ड में भेज रहे थे लेकिन यह उस कर्मी की पैरवी है कि इसको इसी वार्ड में भेजा गया है।
जब से नरक में तन्डेली या वार्ड इंचार्ज वाली व्यवस्था लागू हुई थी, तब से कानूनन नीचे आत्मा के नाम पर दिए गए दान, दक्षिणा, अर्पण, तर्पण आदि पर तन्डेल का भी कुछ हक निर्धारित कर दिया गया था। यही काऱण था कि तन्डेल अपने वार्ड में अधिकतम आत्माओं को रखने के लिए मुशी, कर्मी या प्रभारी को घूस देते क्योंकि तर्पण अर्पण में तो उनका हिस्सा था ही उन्हें यह भी पता था कि आने वाली नई आत्माओं को डराकर, धमकाकर, उन्हें प्रताड़ित कर नीचे उनके सगे-सम्बन्धियो से और अधिक अर्पण-तर्पण, पिंडदान करवाया जा सकता है।
अपने इस तन्डेल ने तो इसी प्रकार से कमाई कर दो-दो ट्रक ले लिए थे और उन ट्रकों को नरक की फूड सप्लाई डिपार्टमेंट में लगवा कर मोटा पैसा भी कमा रहा था।
इससे पहले की वह तन्डेल के वार्ड में दाखिल हो, तन्डेल ने उससे कड़कती आवाज में पूछा, "नीचे कौन-कौन हैं?'
-"एक बूढ़ा बाप, बीमार माँ, अनब्याही बहन और दो बेरोजगार भाई।"
--"सरकारी योजना का लाभ मिलता था?"
--"जेनरल के घर पैदा हुआ था, साहब।"
--"खुद क्या करता था नीचे?"
--"बेरोजगार था, साहब।'
--"भरी जवानी में यहाँ ऊपर कैसे पहुंचा?"
--"साहब एक दिन विचार किया तो पाया कि नर्क इस दुनियॉ से तो बेहतर ही है क्योंकि वहाँ केवल उसे भोगना है जबकि इस दुनिया के नरक को भोगना तो है ही, इस नरक को भोगने के लिए विविध यत्नो से जीवित भी बने रहना है, और इसलिए आत्महत्या कर लिया----"
तन्डेल कुढ़ते हुए कर्मी से कह रहा था, "तुझे कितनी बार कहा है कि पैरवी से पहले थोड़ी छान-बीन कर लिया कर--अब ले यह आवेदन और प्रभारी को दे आ, इसमे लिख दिया है कि इस वार्ड में पहले से ही ओवरक्राउडिंग है।"
-----★★★----------
और उस कॉन्क्लेव में टकीला की शिप और सिगरेट का कश लेते हुए उस महिला कॉमरेड ने
वहां---- सुदूर उस आदिवासी इलाके में क्रांति के सब्ज बाग की मार्केटिंग के लिए अपनी इस कविता के टैग लाइन का प्रोपोजल किया जिसे बाकी कामरेडों ने अपनी अपनी पसंद के शराब की घूंट पीते हुए स्वीकार कर लिया:
'तुम सभ्य सुसंस्कृत
टकीला पिया है
माँ की छाती से तुमने
हमने माँ की छाती से आंसू
जो जम गया है हर तह में बारूद बनकर
हाँ हम आदिवासी हैं!'
बाकियों ने कहा: हाँ कॉमरेड इस कविता में बारूद है, आदिवासियों की मांए तो अभाव में आंसू पीकर ही बड़ी होती हैं, अब अपने बच्चों को तो अपनी छाती से वह आंसू ही पिलाएंगी न और बुर्जुवा लडकिया चुकि टकीला पीकर बड़ी होती हैं इसलिए उनके स्तनों से तो टकीला ही निकलेगा।
नेपथ्य से आवाज आई कामरेडायन, "तुम क्या पी रही हो" जिसे बाकी कामरेडों ने अनसुना करते हुए कहा:
---वाह कॉमरेड, वाह कॉमरेड, वाह कॉमरेड!!
"लेकिन कॉमरेड यदि उन आदिवासी इलाकों में सरकार विकास की योजनाएं लेकर पँहुचे तो?"
एक दूसरे कॉमरेड ने सवाल किया।
-इसके लिए एक अलग नैरेटिव है, साथी।
मूलता के खतरा का नैरेटिव।
और उसकी मार्केटिंग का टैग-लाइन होगा,
'राम, तेज पियोगे हमारा?
हमारी नाभी में अमृत नही है,
बारूद है, आपादमस्तक:
फट जाएगा तुम्हारे
नीलकण्ठ का कण्ठ भी',
और फिर कहीं कुछ केन बम लगवा देना है!
सारे कामरेडों ने एक साथ शराब होठो से लगाते हुए कहा: लाल सलाम कॉमरेड, क्रांति अमर रहे!!
---------★★★--------
विद्रोही
विद्रोही ने दो बार यमदूतों को मारने की कोशिश की थी हालांकि दोनों ही बार वह असफल हुवा। तीसरी बार जब वह उनको मारने की योजना बना रहा था तब यमराज के क्रूर यमदूतों ने उसे गिरफ्तार कर लिया और बेड़ियों में जकड़ कर यमराज के पास ले गए। यद्यपि वह उन क्रूर यमदूतों द्वारा पकड़े जाने से बचने के लिए आत्महत्या कर सकता था लेकिन उसने उनके द्वारा खुद को पकड़ लिए जाने के विकल्प को चुना क्योकि कोई तीसरा विकल्प नही था।
यम-दरबार मे मुकदमा चला और यमराज ने उसके सामने दो विकल्प रखे--या तो वह यम-सत्ता के साथ हो जाए या सजा स्वीकार करे।
विद्रोही को यम की सत्ता के साथ हो जाना भी उसका आत्महत्या ही लगा, एक दार्शनिक आत्महत्या। अतः यहाँ भी उसने सजा का विकल्प चुना।
सजा देने के लिए यमराज ने उसे नीचे धर्मराज के पास भेज दिया।
विद्रोही को तब तक कोड़े मारने की सजा सुनाई गई जब तक वह मर न जाए लेकिन उसे यह बात न बताई गई या उसने यह नही सुना या सम्भवतः उसने सुन कर भी अनसुना कर दिया।
अगले दिन उसे खुले मैदान में लाया गया और उस मैदान के बीचों बीच वाले खंभे से उसका मुंह और पेट सटाकर बांध दिया गया। कमर तक उसके कपड़े उतार दिए गए ताकि उसकी नंगी पीठ जल्लाद के सामने हो।
धर्मराज के जल्लाद ने कोड़े लगाने शुरू किए--सौ- दोसौ कोड़ो तक विद्रोही के लिए सब कुछ सामान्य रहा: विद्रोही कोड़ो से उठे दर्द को अपने दांतों से दबा लेता तथा जल्लाद और अधिक वेग से उसकी पीठ पर कोड़े बरसाता। लेकिन इसके बाद वह टूटने लगा था: विद्रोही के मुँह से चीख भी निकलती और जल्लाद के कोड़े लगाने का वेग भी बढ़ता जाता।
लेकिन, केवल यही बात न थी--विद्रोही के अंदर कुछ और भी घट रहा था--विद्रोही के मन और शरीर को दो कोड़ो के बीच के अंतराल को महसूस करने लगे थे। धीरे धीरे उसके मन और शरीर ने उन अंतरालों को पकड़ना भी सिख लिया और और फिर मात्र पकड़ा ही नही बल्कि उन्हें जकड़ने और अपने पास उन अंतरालो को हमेशा रखने के लिए प्रयास भी करने लगे; उसके मन ने दो कोड़ो के अंतराल के उसके समय-बोध को बदल दिया; उसके लिए उसके मन ने इन अंतरालों में समय की चाल को अत्यंत धीमा कर दिया। इन अंतरालों में उसके मन और शरीर खुश हो जाते, उन्हें जीवन अच्छा लगने लगता, फिर से कुछ नए स्वप्न सृजित हो जाते लेकिन तभी कोड़े का पीठ से स्पर्श.... और सारे स्वप्न, खुशी पानी के बुलबुले की तरह फूट जाते। बहुत देर तक यही चला परन्तु धीरे धीरे अब कोड़े के दर्द के अंदर यह आशा भी पनप जाती की इसके बाद एक अंतराल है जिसमे पीड़ा नही होगी। हर दर्द के साथ ही पैदा हो जाने वाली इस आशा ने उसके पीड़ा को भी कम कर दिया और उसकी चीखों की तीव्रता भी थोड़ी कम हो गई---वह विद्रोही था--जीवन विद्रोही, क्योकि जीवन ही विद्रोह है।
वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी--!
लेकिन, यह अर्धसत्य है!!
जीवन निश्चितरूप से विद्रोह है लेकिन दार्शनिक ने उस विद्रोही को सम्पूर्णता में न देखा था तथापि यह कह डाला था 'वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी'। यह सच है कि पीड़ा ने विद्रोही के सामने उसके अस्तित्व के नए आयामो को खोल दिया था तथा उसे दो कोड़ो के बीच के अंतराल को पकड़ना आ गया था। इस अंतराल में समय-बोध को उसने काफी धीमा करना भी सीख लिया था और इन अंतरालों में उसके अंदर से स्वप्न भी फूट पड़ते जो आगे भले ही कोड़ो से उपजे दर्द में चकनाचूर हो जाते।
कोड़े के साथ उठने वाली पीड़ा में आशा का जन्म भी वास्तविक थी, लेकिन मात्र इन चीजों के देखकर जब दार्शनिक ने उसे जीवन-विद्रोही कह दिया था, वह गलत था। वह गलत था, क्योकि विद्रोही के अस्तित्व की गहराई में घटी उसकी अतार्किक, आस्था की छलांग को दार्शनिक देख ही नही पाया था। दार्शनिक यह भी नही देख पाया था कि विद्रोही के अस्तित्व में सपने दरअसल उसकी आस्था के छलांग के बाद से आते थे और उनके स्रोत वहीं अवस्थित थे जहाँ विद्रोही का अस्तित्व छलांग लगा कर पहुंचा था।
यहाँ पहुंच कर विद्रोही ने अपने व्यक्तिनिष्ठ तत्त्वमीमांसा की रचना कर डाली जिसमे वह मुक्त था ;उसके पास सारी स्वतंत्रता थी; यहाँ उसकी सारी पीड़ा मिट जाती।
उसे यह मुक्ति अच्छी लगी, अतः हर बार वह उन अंतरालों में अपनी इस तत्त्वमीमांसा का लेप इस स्थान से दोनों मुट्ठियों में उठाता और वहां अपने बंधे शरीर पर लेप आता--विद्रोह!
यद्यपि भविष्य में मनोवैज्ञानिक यह लिखने वाले थे कि असल मे उसका मस्तिष्क उसे धोखा दे रहा था ताकि उसकी पीड़ा की तीव्रता उसके लिए कम हो सके तथापि उसके लिए उसकी निजी तत्त्वमीमांसा असली थी जो उसके अस्तित्व ने छलांग लगाकर शून्य से रची थी। यह कोई दार्शनिक आत्महत्या भी नही थी क्योकि जीवन का स्वभाव ही यही है: दरअसल हर विद्रोह के पीछे आस्था है, विद्रोह का बीज विश्वास की जमीन पर ही पनप सकता है, चाहे वह जीवन-विद्रोह ही सही।
पोस्ट स्क्रिप्ट: माताजी का कैंसर के कारण लंबी बीमारी से देहांत हुवा। उन्हें असहनीय पीड़ा उठती थी लेकिन पीड़ाओं के बीच के अंतरालों को वह जीती थी, उन पीड़ाओं के बीच उठने वाले अंतरालों में उनके पास स्वप्न होते थे,आशाएँ होती थीं- माताजी विद्रोही थी, जीवन-विद्रोही।
(कामू के सिसिफस के मिथ और माताजी की पीड़ा से प्रेरित)
-----★★★★------
बब्बा के बब्बा चिंतित थे मानो प्रलय की घड़ी आने ही वाली है। बब्बा पिछले चार पांच घण्टो से चरनी चला रहे थे लेकिन अग्नि प्रज्वलित होने का नाम ही नही ले रही थी। बब्बा के सहयोगी बैठे जोर जोर से गाते जाते थे:
अग्नि तुम आओ, अग्नि अपनी अनेक जिव्हाएं फैलाओ, अग्नि अपना अंश ग्रहण करने हेतु प्रकट हो, प्रकट हो।
एक आदमी बब्बा के बगल से गुजर रहा था, शायद भविष्य से आया था। उसने अपनी बीड़ी सुलगाई, बब्बा की ओर चवन्नी की माचिस फेंकी और आगे बढ़ गया।
उधर भविष्य में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि क्या फॉस्फोरस की रगड़ से जलने वाली आग पवित्र है और शीघ्र ही इस विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार करने की तैयारी चलने वाली थी।
------------●●●●●●------------
आरम्भ में यह कल्याणकारी सिद्धान्त पर चल रहा था लेकिन फिर ईश्वर की मत मारी गई और वह जगतसेठ बनने की कामना से युक्त हो गया। और देखो, उसने फिर जगत में मिलावट आरम्भ कर दी क्योकि असल चीजो को वह बेंच रहा था जिसके कारण बादल गरजते लेकिन उनमें जल न होता; अग्नि चमकती किन्तु उनमें तेज न था; पृथ्वी होती किन्तु उसमे न तो गन्ध होती न धारिता; आकाश तो था किंतु अब वह ऐसे शब्दों से पटा पड़ा था जिनका कोई अर्थ न था-----
ईश्वर को अब मेहनत भी कम करनी पड़ती और शनै: शनै: उसकी तिजोरी भी भरती जाती।
ग्रथो में 'वह जगतसेठ है और मुनाफा उसकी माया" लिखवा कर अपने नए रूप से मिलता हालांकि वह जगतसेठ बनने से कुछ मुहरे चुका हुआ था।
और देखो, तभी उसके मन मे एक विचार आया कि यदि वह अपना आत्मसम्मान भी बेच दे तो ये चुकी मुहरे उसे मिल जाएगीं और तक्षण उसने अपना आत्मसमान बेच दिया और लोगो के लिए एक नकली आत्मसम्मान ओढ़ लिया जो असल आत्मसम्मान से ज्यादा चमकीला था।
--------★★★★★----------
--लेकिन फिर मुनाफे में और लूट में अंतर क्या है?
---बस उसके वैद्य होने का, हर वह मुनाफा लूट है जो कानूनन मान्य नही है और हर वह लूट मुनाफा जो कानूनन मान्य है।
---लेकिन कानून तो मनुष्य बनाते हैं, शक्तिशाली मनुष्य।
---वह तो है लेकिन इन कानूनों पर एक परत चढ़ानी होती होती है--इनके दैवीय दिखने की परत।
---और यह परत चढाता कौन है?
---हा-हा, कवि, दार्शनिक, अर्थशात्री---क्या तुम्हें नही पता कि इनमे से नब्बे फीसद शक्तिशालियों की बौद्धिक वेश्याएं होती हैं और शेष दस फीसद को अपराधी और पागल करार करवा दे दिया जाता है?
----------★★★---------------
कपालिक वहाँ उपस्थित था। कपालिप ने वहाँ महादेव और भवानी के वार्तालाप भी सुने।
यह एक महाकल्प का एक चरण था और कपालिक साधना रत था, उसकी चेतना उसकी साधना से कल्पो, महाकल्पो, देशगत, दिशागत आयामो को पार कर शिव के समीप उपस्थित थी और शिव सानिध्य का आनंद ले रही थी तभी उसे कुछ ध्वनिमय हलचल की अनुभूति हुई: महादेव और भवानी वार्तालाप कर रहे थे।
महादेव ने भवानी से कहा: भवानी आपके बच्चे निस्तेज हो रहे हैं।
भवानी ने प्रतिउत्तर दिया: नही महादेव, मेरे बालक कभी शक्तिहीन और निस्तेज हो ही नही सकते, तनिक नीचे उस ओर देखिए, देखिए शिवा को वह कैसे युद्ध कर रहा है और धर्म पताका फहराता जा रहा है।
महादेव ने अहट्टास किया- भवानी भवानी मैं शिवा को देखु या शवों को देखु; तुम्हारे शेष शिवा तो शव बनते जा रहे हैं!
महादेव के व्यंग ने भवानी को चिढ़ा दिया और भवानी बोली: महादेव आप मेरे शिवाओ को शव न कहें, और आपको तनिक भी संदेह हो तो आप मेरे शिवाओ की परीक्षा ले सकते हैं।
महादेव मुस्कुराए, इस मुस्कान को मात्र तीन लोग पढ़ सके--महादेव, भवानी और वह कपालिक।
महादेव की मुस्कुराहट का अर्थ था कि वह कुछ वर्षों के लिए अंतर्ध्यान होने वाले हैं और फिर क्षणमात्र के लिए एक वापी में प्रकट होंगे।
यदि भवानी के बच्चों ने शौर्य और पराक्रम न दिखाया तो फिर वह इस महाकल्प से सदा के लिए अंर्तध्यान हो जाएंगे--यही नही वह निस्तेज और वीर्यहीन शव प्रजाति भी सदा सदा के लिए खत्म हो जाएगी--स्वयम भवानी उन्हें खत्म करेगी।
कपालिक को अब भय की अनुभूति होने लगी थी और उसकी चेतना भयाक्रांत वापस उसके भौतिक शरीर मे लौट रही थी तभी भवानी उसके निकट आई और भवानी ने उससे कहा--कपालिक जा मेरे बच्चों को मेरा सन्देश सुना---मैं उनको कभी निराश नही करूंगी किन्तु उन्हें भी भवानी के बच्चे होने की लाज रखनी होगी!
---------★★★★---------
तब हरफ़ बिखरे पड़े थे। अलिफ़ कहीं, लाम कहीं और हे कहीं। किसी ने हरफों को जोड़ दिया, हरफो में उसको बांध दिया। माटी भी बिखरी पड़ी थी, पत्थर भी तब लावारिश थे। किसी दूसरे ने माटी में, पत्थर में उसको गढ़ दिया।
कौन मोमिन, कौन काफ़िर?
मुल्ला कहता बुत वाले काफ़िर,
जबकि बुत,माटी से सिफ़ात और वो सिफात, हरफो से गढ़ी मूरत।
हरफो में देखो तो माटी मिलेगी
पत्थर में देखो तो हरफ!!
काश बुतशिकन यदि थोड़ी बुद्धि का उपयोग करते---
"ख़ुदा है और क्या इसके सिवा तो कुछ भी नही
है वो हसरतें, बनी आदम का ही जमते जाना"
खुदा/भगवान आदम की औलादों की हसरतों का ही जम जाना है जी, कही पत्थरो में तो कहीं अल्फाज़ो में:
हसरतें खत्म, खुदा तमाम!
किसी ने हरफों से मूर्ती बनाई तो किसी ने पत्थरो से सिफ़ात!
हिंदुओ में वह पत्थर में जम गया है, मुसलमानों में निन्यानबे अल्फाज़ो में -----मकसद एक ही है।
-------★★★★--------
महेनदर बो (महेंद्र की औरत--महेंद्र की वधु---महेनदर बो) को नाग ने डँस लिया--विरह के नाग ने नही असली वाले नाग ने। उनको लेकर लोग सामुदायिक चिकित्सा केंद्र भागे--वहां न डाक साब, न ए एन एम--रात थी और महेनदर बो को राते में मैदान लगा था और मैदाने में नाग ने डँस लिया--अब डाक साब तो सुबह आते लेकिन उनके पहले ही यमदूत आए और महेनदर बो का शरीर-कपड़ा-टिकली-बिंदी उसी बेड पर छोड़ के बाकी चीज अपने साथ ले गए---चलs ढेर भईल!!
सुबह जनता ने किया बवाल---हेल्थ विभाग ये--हेल्थ विभाग वो---मुआवजा दो---सस्पेंड करो----इत्यादि।
परशाषन भी पहुंचा और साहब ने कहा ठीक है सब होगा पहिले पोस्टमार्टम ऑस्टमार्टम तो करवा लेने दीजिए।
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ऐसी बनाई गई कि उसमें आया--- महेनदर बो सामुदायिक केंद्र लाने के पहले ही मर चुकी थी----उधर महेनदर बो को अस्पताल ले जाने वाले और उनके मरने तक साथ रहने वाले भौचचक---साला मरा आदमी भी जिंदा टाइप करता है----! करता ही होगा----डाक साब लोग पढ़े है तब न डाक साब बने हैं---!!----उ लोग जिंदा आ मुर्दा का भेद जादा बुझते हैं---!!!!!
-----------★★★---------
सेठ जी सेकुलर हैं, आप के अनुसार धर्म फर्म का काम खाता के पहले पन्ने पर शुभ-लाभ और लक्ष्मी-गणेश लिखने तक सीमित है। हाँ, व्यापार में बरक्कत के लिए आपने एक अरबी में कुछ लिखा भी फ्रेम करा के दरवाजे के इस ओर टाँग रखा है, दरवाजे के उस ओर नीबू-मिर्च टँगा है और अगल बगल अनेक स्टिकर जिनपर "उधार प्रेम की कैंची है", "आज नगद कल उधार" 'उधार मांगकर शर्मिंदा न करें', "नगद वाले डिस्को उधार वाले खिस्को" वगैरह लिखा है।
सेठ जी दिन भर अखबार पढ़ते हैं और खबरों पर ग्राहक के साथ चर्चा करते हैं।
सेठ जी राम मंदिर पर अनेक बार संघियो पर बिगड़ते हुए पाए गए थे--यह कोई तरीका है--अरे तब राजतन्त्र था और अब प्रजातंत्र है--सेकुलरिज्म का ताना बाना टूट रहा है--
सेठ जी ग्राहकों को समझाते--देखिए इस कपड़े से अगर एक सूत निकल जाए तो बाकी बुनाई भी खत्म हो जाएगी-----ए महेंदर दुगो चाय बोल के आव तो--ह बाकी हम आपको ऐसा कपड़ा दिखा रहे हैं जिसका सूत निकलने पर भी बाकी सुत छलक के एडजस्ट कर लेता है और कपड़ा को नोकसान नही होगा, बाकी ये थोड़ा महंगा है---।
कोर्ट ने राम मंदिर बनने का आदेश दे दिया था और सेठ जी को जैसे ही यह बात पता चली उन्होंने अपने फुफेरे साले को, जो कि फैजाबाद में मेवा का व्यवसाय करते थे फोन घुमाया---
मेवालाल जी कवनो जोगाड़ लगाइए ना कि मंदिर के आस पास, हाता में कोई छोटियो-मोट दोकान मिल जाए---।
--दोकान मिलल मुशिकल बा जी, मेवालाल जी ने कहा।
--आरे तबो, प्रयास करिए--किस्मत केहू का कोई नही जानता।
सेठ जी असल सेक्युलर हैं--अब आगे सेठ जी फिर संघियो, बाभनो और कोर्ट पर बिगड़ेंगे--ये कोई तरीका है और कोर्ट ने यह न्याय किया है, और मंदिर-फन्दिर से फायदा तो केवल बाभनो का न होना है जी?
-------★★★---------
माया महा ठगनी हम जानी
एक
कॉमरेड ढींगरा ने जीवन भर अमेरिकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगाकर पूंजी बटोरी थी और आज उन्ही की संतान अपना पेट पालने अमेरिका जा रही थी--प्रोफेसर ढींगरा की आँखों मे खुशी थी कि उनका अपने बच्चे को अमेरिका में सेटल करने का स्वप्न पूरा हो गया।
दो
कॉमरेड ढींगरा ने अभी अभी एक मार्मिक कविता कोश पूरी की थी जिसमे सरहदों को मिटाने की कल्पना थी--सबका देश सबके लिए।
उनको आशा थी कि इस कविता कोश के बिकने के बाद उनकी शहर के सबसे रईस इलाके में एक घर खरीदने का सपना पूरा हो जाएगा; वर्तमान की सोसायटी गन्दी थी--उनकी आंखों के सामने एक स्वप्न तैर गया जिसमें उस बंगले की ऊंची ऊंची दीवारों के कुछ नीचे उनका नाम लिखा था--कॉमरेड ढींगरा!
कॉमरेड की आत्मा चुकी मृत थी अतः उनके स्वप्न अबाध गति से चलते रहे--आत्मा जीवित होती तो झकझोरती की मुल्कों की सरहदे मकानों की हदों की ही विस्तार हैं!
-----------★★★★----------
राजन राज्य पर आक्रमण होने वाला है हमे भी तैयारी करनी होगी-राजन के बड़ा बाबू ने राजन से कहा।
क्या किया जाय-राजन ने पूछा।
बड़ा बाबू ने सलाह दिया-- दिक्कत क्या है, चिट्ठी निकाल के सबको सीन करा दीजिए और हाँ इस सीन की प्रति संचिका में सम्भाल कर रिकॉर्ड रूम में अवश्य रखवा दीजिएगा-।
समस्त सैनिकों को चिट्ठी सीन कराते हुए एक बीघा कर्तव्य की जेरोक्स कॉपी भी बाँट दी गई--अब राज्य सुरक्षित था।
लेकिन, सैनिकों के न हथियार था, न बख्तर, न भाला, न बरछी न घोड़ा न--------केवल एक बीघा कर्तव्य की जेरोक्स कॉपी थी और यह मालूम था कि राज्य पर हमला होने वाला है।
सैनिकों ने हथियार व रशद की मांग की जिस हजूर कड़कते हुए बोले कि खजाने को अलॉटमेन्ट नही है, सब अपना अपना खरीद लीजिए और बिल वाउचर दे दीजिएगा, बाद में जब अलॉटमेन्ट आएगा तो राशि की भुगतान कर दी जाएगी, कहिए तो फिर एक चिट्ठी निकाल दें।
सैनिकों ने अपनी जरूरत के समान खरीदे और युद्ध जीतने के पश्चात नजारत में अपना-अपना बिल वाउचर प्रस्तुत किया जो तीन चार वर्ष बीतने के बाद आज भी पास होने की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि अबकी फिर राज्य पर हमला हो गया--दो तीन बार ऐसा ही हुवा चौथी बार फिर से चिट्ठी निकाल कर सबको सीन करा दी गई---राज्य सुरक्षित!
अबकी सैनिकों ने बिना लड़े आत्मसर्पण कर दिया था और राज्य नष्ट हो गया साथ ही वह पूर्व के चारो बिल वाउचर भूल चुके थे-- गलती हो गई--और राज्य गुलाम हो गया।
•--------★★★--------
चचा के बाबा का प्लान यह था कि पहले ढेर सारे अलग-अलग अल्पसंख्यक बनाओ फिर यहां के बहुसंख्यको पर अल्पसंख्यको से हमले करवाओ और फिर जब मैदान खाली हो जाए तो लाल झंडा फहरा दो: जब लाल लाल लहराएगा तब होश ठिकाने आएगा, हहा!
चचा के बाबा ने इसके लिए भारतवर्ष को कई नेशन बताया था और उनकी छाती पाकिस्तान बनने पर ठंढी भी हुई थी।
चचा ने "यत" प्रत्यय का अब तक के भाषाई इतिहास में सर्वाधिक उपयोग किया और कश्मीरियत, असमियत, बंगालियत, आदिवासियत जैसे असंख्य शब्द गढ़ डाले।
ये शब्द डफली के साथ बोलने पर और अधिक अच्छे लगते--हम देखेंगे देखेंगे--कश्मीर मांगे आज़ादी, असम मांगे आजादी---नून तेल मरीचा-हींग पुदीना धनिया--यत!!
चचा जब जब परबाबा की पोथी पढ़ते एक नए शब्द की "यत" प्रत्यय के साथ रचना करते और डफली बजाते।
लेकिन चचा के परबाबा ने एक गलती की थी; उनको लगा था कि वह एक ही पैना से पूरी दुनिया हांक देंगे क्या यूरोप, क्या अमेरिका, क्या भारत--
अब जब बीज में ही दोष हो तो वृक्ष कहाँ से सही पैदा हो--चचा तक आते-आते उनके परबाबा का बीज वृक्ष नही कुछ विकृत वनस्पति बन गया: न हर्ब, न शर्ब, न ट्री--पता नही क्या!
चचा थे तो मानव ही, मोह तो आपको होगा ही-- है तो यह खानदानी चिराग ही जिससे भारतवर्ष को जलाना है लेकिन इसको पालें कैसे यह बड़ी समस्या थी: विकृत पागल वंश और कमाई छोटी अतः चचा जेहाद की तवायफ बन गए और अपनी नाच-बाजा को उन्होंने नाम दिया सेक्युलरिज्म--तक धिन धिन धा--तक धिन धिन धा--भारत तेरे टुकड़े होंगे--ताल मिलाना ओस्ताद!
--------★★★-----------
खोजा फकत जिस्मानी तौर पर नही होते, ज़हनी तौर पर भी होते हैं और ये ज़हनी खोजा ही भविष्य में तेरे हरम की पहरेदारी करेंगे--उस फकीर ने शहनशाह से कहा।
लेकिन ऐ फकीर, भला यह कैसे मुमकिन है कि किसी को ज़हनी तौर पर खोजा बना दिया जाय--हमारे हकीम तो इस इल्म से नावाकिफ हैं--सुल्तान ने कहा।
तू फिक्र ना कर, जैसे सिर्फ एक नस दाब कर तेरे हकीम मर्द को खोजा बना देते हैं आगे बस यह एक अल्फ़ाज़ उनको खोजा बना डालेगा--और फकीर ने अपने झोले से कोयला निकाला और कागज के टुकड़े पर "सिकुलर" लिख सुल्तान को पकड़ा दिया और गायब हो गया।
सुल्तान की आंखों में अब इत्मीनान के जज्बात तैर रहे थे, पेशानी की लकीरें मिटती जाती थी और सुल्तान के कदम हरम की ओर बढ़ने लगे।
-------★★★★--------
पलायन
बाबू साहब अगर शाही परिवार के वंशज थे तो जादो जी की विधायक मदन जादो होते हुए लालू जी से पहचान। बाबू साहब के पूर्वज अगर सामंती युग के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे तो जादो जी इस नवीन युग मे प्रतिष्ठित हुए जाते थे। बाबू साहब के पास यदि पुराने गढ़ और किला थे तो जादो जी आधुनिक सुविधाओं से लैस बंगला बनवा रहे थे।
बाबू साहब के पास अगर अतीत था तो जादो जी के पास वर्तमान और ईश्वर की माया देखिए कि एक दिन अतीत और वर्तमान की भिड़ंत हो गई लेकिन यह भिड़ंत किसी युद्ध क्षेत्र में न हुई बल्कि बाजार स्थित धेनुआ की सब्जी की दुकान पर हुई और कारण न ज़र था, ना जोरू ना जमीन बल्कि कृत्रिम नाक थी-नाक, जो पेट, मष्तिष्क और ह्रदय से ज्यादा बल्कि बहुत ज्यादा बड़ी हो गई थी।
हुआ यह कि धेनुआ की सब्जी की दुकान पर बाबू साहब और जादो जी दोनो शायद साथ किंतु अलग-अलग दिशाओं से पहुंचे और दोनो का दिल धेनुआ की टोकरी में रखी उस छोटी सी गोभी पर आ गया और दोनो ने ही एक साथ धेनुआ से उस गोभी को खरीदने के लिए उसका मूल्य पूछा। धेनुआ ने जवाब दिया: बीस रुपया।
बाबू साहब और जादो जी दोनो एक दूसरे की मंशा ताड़ चुके थे अतः दोनो ने अपनी जेब मे हाथ डाले और संयोग से दोनो के ही जेब से पचास-पचास रुपए की नोट निकले और दोनो के ही मुख से समान शब्द निकले की यह ले पचास रुपए बाकी गोभी हमको ही दो--अतीत और वर्तमान के झूठे शान की भिड़ंत हो चुकी थी।
इस भिड़ंत में पैसों का कोई मोल न रहा-कभी जादो जी बढ़कर बोली लगाते तो ठीक उसके बाद बाबू साहब उससे बढ़कर बोली लगा देते।
गोभी की कीमत बीस रुपये से होते हुए धड़ा धड़ हजार, पन्द्रहसौ, दो हजार, पांच हजार, दस हजार पार कर बीस हजार पर पहुंच गई थी।
जादो जी ने अबकी बार गोभी के लिए पच्चीस हजार देने की बात कही तो जवाब में बाबू साहब ने धेनुआ से कहा--एक कट्ठा जमीन।
इधर धेनुआ गोभी की हर बढ़ती कीमत के साथ घबराता जाता और उधर बाबू साहब के लोग बाबू साहब की ओर इकट्ठे हो रहे थे और जादो जी के लोग जादो जी की ओर जिनमे दोनो ही तरफ के लोगो के पास बंदूकें और रायफल थीं।
पहले तो धेनुआ के मन मे विचार आया कि वह गोभी के दो टुकड़े कर के उनके आधे-आधे हिस्से क्रमश: बाबू साहब और जादो जी को दे दे और मूल्य लेने के समय हाथ जोड़ ले किन्तु तभी उसे याद आया कि अभी दो वर्ष पूर्व ही खदेरन की लिट्टी-बाटी की दुकान पर कुर्सी पर कौन बैठे इस बात को लेकर एक विवाद हुआ था और खदेरन ने जब वह कुर्सी हटा कर विवाद ही खत्म करना चाहा तो उसे अपने प्राण देने पड़े। उसने लोगो से सुना था कि जब वह कुर्सी हटा रहा था तो बाबू साहब और जादो जी दोनो ने ही उसे यह कहते हुए एक एक गोली मारी थी कि यहां बात आन की है और यह कुर्सी ही हटा रहा है।
उधर अब बाबुसाहेब और जादो जी के बीच रायफल तना तनी भी हो गई थी-अब बेचारा धेनुआ क्या करे-आगे कुँवा तो पीछे खाई!
तभी धेनुआ ने देखा कि स्टेशन पर अपर इंडिया खड़ी है। यह ट्रेन, अपर इंडिया मुगलसराय से सियालदह जाती है और धेनुआ की दुकान से रेलवे स्टेशन भी बमुश्किल सौ मीटर दूर था।
धेनुआ ने स्वयम को समेटा, हिम्मत जुटाई और गोभी अपने काँख में दबाकर सरपट स्टेशन की ओर भागा। यद्यपि वह बहुत तेज भागा था तब भी उसके स्टेशन आते-आते ट्रेन खुल चुकी थी लेकिन फिर भी उसने हिम्मत न हारी और वह ट्रेन में चढ़ ही गया।
लोग कहते हैं कि वह सीधे कलकत्ता उतरा और वहां उसने उस गोभी को मात्र दस रुपए में बेच दिया लेकिन इस दस रुपए में जो शांति थी वह उसे आज तक महसूस न हुई थी।
धेनुआ फिर वापस कभी नही लौटा, वह पलायन कर चुका था।
-------★★★--------
शास्त्री झूठ कहते हैं कि वो आद्य पाप के कारण उस स्वर्ग से निष्काषित हुए और चूंकि वह दयावान और सबका भला चाहने वाला है, उसने उन्हें पुनः स्वर्ग में दाखिले के मार्ग बताए और उनके आद्य पाप को धोने के लिए वह अपना पुत्र बनकर उनके लिए सलीब पर चढ़ गया।
असल मे उसे मजदूर चाहिए थे जिनके श्रम को वह चुरा सके और इसलिए उन्होंने उन्हें बनाया था। उसके एजेंट फरिश्ते उन्हें सब्ज-बाग दिखाते रहे और वह दोनो गधों की तरह बाग में खटते रहे।
फिर एक दिन उसने उस बाग को सबसे अधिक बोली लगाने वाले सेठ को बेंच दिया और उसके फरिश्ते-एजेंटों ने ट्रेंड कराया- खुल्द खुदा का।
वह दोनो भी ताउम्र यही मानते रहे कि वह खुल्द उसी का है जबकि उस बाग की एक-एक क्यारियों को उन्होंने बनाया था, एक-एक पौधों को उन्होंने सींचा था, एक-एक फूल उन्होंने खिलाए थे। असल मे यह बाग किसी ग़ैब या मिरेकल या चमत्कार से बाग न बना था बल्कि उनके खून-पसीने से बना था और यह बात केवल दो लोग जानते थे एक वह और दूसरा वह जिसके बारे में उसके एजेंटों ने उसके साँप होने का दुष्प्रचार कर दिया--जबकि वह साँप न था बोध था, सम्भवतः वह शक्ति, जिसे कुछ कुंडलिनी कहते हैं और जो कही कहीं झंडों पर हंसिया और हथौड़े के रूप में अंकित है।
----------★★★----------
माले मुफ्त
एकबार ईश्वर को धरती पर अमृत और विष के स्टॉल लगाने की सनक सवार हुई। ईश्वर ने शर्ट पेंट पहना, एक रजिस्टर लिया, आंखों पर चश्मा चढ़ाया और "अमृत पांच रुपए में एक पैकेट" का बोर्ड लगा कर स्टॉल पर बैठ गया।
दूसरे विष वाले स्टॉल के लिए उसने अपने को एक दूसरे भाग में विभक्त किया, उसे भी शर्ट पेंट पहनाया, रजिस्टर थमाया, चश्मा लगाया और "विष बिल्कुल मुफ्त" के बोर्ड के साथ विष वाले स्टॉल पर बैठा दिया।
विष वाले स्टॉल पर लोगों की भीड़ जमा होनी शुरू हो गई। लोग मुफ्त में विष ले जाने लगे और ईश्वर उनका नाम रजिस्टर में लिखता, उनसे दस्तखत, ठेपा लगवाता और विष की पोटली दे देता। तभी बवाल हो गया। ईश्वर ने देखा लोग विष लेने वाली लाईन में कौन आगे था और कौन पीछे इसके लिए लड़ने लगे थे। खैर किसी तरह ईश्वर ने उनको शांत कराया तभी उसने देखा कि यह आदमी तो दुबारा विष लेने आया है। ईश्वर ने उससे कहा कि दुबारा विष नही मिलेगा तो उस आदमी ने चीखते हुए कहा कि बाकी बीस तीस लोगो को फिर दुबारा विष क्यो दे दिया गया?
ईश्वर परेशान की ये लोग दुबारा भी विष ले रहे हैं--कंट्रोल करना होगा और उसने उस आदमी से कहा कि उसे दुबारा विष बिल्कुल नही मिलेगा। इतना सुनना था कि उस आदमी ने विधायक जी को फोन मिलाते हुए कहा कि लीजिए तब विधायक जी से बात करिए। विधायक जी फोन पर ईश्वर को धमकाते हुए बोले कि इसे विष की पोटली मिल जानी चाहिए, यह मेरा आदमी है वरना....!
ईश्वर ने उस आदमी को दूसरी पोटली दे दी तभी एक सफेद शर्ट पेंट और सफेद बिना लेस वाले जूते में एक आदमी आया और उसने एक अन्य दूसरे आदमी को विष की दो पोटलिया देने को कहा। ईश्वर ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो वह लोकल नेता था। ईश्वर ने उसकी बात भी रख ली और उसके आदमी को भी एक्स्ट्रा विष की पोटली दे दी। दोनों चले गए। तभी ईश्वर ने पुनः दिव्य दृष्टि से देखा कि कोने में ले जाकर वह लोकल नेता उस आदमी की दूसरी पोटली में से अपने कमीशन का विष मांग रहा था।
विष की पोटलियो का स्टॉक खत्म हो गया लेकिन अभी बहुत ज्यादा लोगो की भीड़ थी और जब लोगो ने सुना कि विष की पोटली खत्म हो गई तो मारे गुस्सा के भीड़ ने विष वाली स्टॉल को उलाट दिया। ईश्वर का शर्ट फाड़ दिया, उसका चश्मा तोड़ दिया और रजिस्टर छीन लिया। ईश्वर वहां से किसी तरह जान बचा कर भागा हालांकि उसको तब तक दस बीस घुसा लग चुका था।
वह स्टॉल जहां "अमृत पांच रुपए में एक पोटली" लिखा हुआ था उसके इर्द-गिर्द तब तक कोई गया ही नही था-आखिर पांच रुपए में अमृत कौन खरीदे और अमर हो, मुफ्त का जहर ही ठीक है भले उससे मौत हो जाएगी।
------●●●●--------
कल मुझे एक सपना आया:
बायें हाथों को दलित बता,
किसी ने क्रांति का गीत सुनाया---
काट दो दाएं हाथ को जो स्वयम् तो अन्न
पकड़ता है और तुमसे मल धुलवाता है।
स्वयं तो वह कलम पकड़ता है लेकिन तुमसे ?
●●●यही तो ब्राह्मणवाद है।
"ओ बाएं हाथ, क्या तुमको पता है कि हाँथो के आदिम समतावाद में दाएं और बाएं हाथ में कोई भेद न था: मनुष्य मल त्याग कर बिना हाथों के इस्तेमाल के अंगविशेष धरती में रहड़कर साफ कर लिया करता था लेकिन फिर दाहिने हाथ ने मष्तिस्क को अपनी जकड़ में लिया और मष्तिस्क ने यह फरमान सुनाया की दायाँ हाथ प्रमुख होगा।
अब तुम्हारा काम केवल मल धोना रह गया!!!!
तुम्हे पता है बाएं हाथ, इंग्लिश में जो बाएं हाथ का इस्तेमाल करते है उनको सिनिस्टर अर्थात अभागा कहा जाता है?"
मेरा बयां हाथ अब क्रांति को बेताब था, उसने कटार पकड़ ली और झपटा दाएं हाथ की ओर लेकिन, तभी मेरी नींद टूट गई और मैं जग गया।
हालांकि मै लतरहत्था हूँ तो जग गया लेकिन जो दाहिने हाथ से अन्न खाते है और बाएं से मल धोते है उनका क्या???
■■■■■
वेस्टर्न टॉयलेट के आने से दाएं हाथ और बाएं हाथ का भेद मिट गया और कलम की जगह कीबोर्ड ने दाहिने हाथ की सामन्तशाही को समाप्त कर दिया।
कांटे-चम्मच के इस युग में अब दाहिने हाथ से भोजन?
जंगलीपन है, असभ्यता, गंवारपन की निशानी है।
हमे इस नई तकनीक का स्वागत करना चाहिए जिसने हाथों के बीच समरसता लाकर उस पुराने हाथों के आदिम समतावाद को पुनर्स्थापित कर दिया।
अब हवन की आहुति डालते वक़्त इस बात की परवाह नही करनी की हवि किस हाथ से दी जा रही है।
यद्यपि कुछ पुरातनवादी आज भी मौजूद हैं जो पाश्चात्य शैली के टॉयलेट पर बैठने और प्रेशर वाश के बावजूद हाथ धोने की रूढ़ि से बाहर नही निकल पाए हैं।
और कुछ पुरातनवादी तो इस नई व्यवस्था को स्वीकार ही नही कर पाए और कब्ज से मर गए।
सौ दो सौ सालों तक तक तो सब ठीक चला लेकिन मष्तिस्क इस बात से अंजान न था कि एक नयी सेंसिब्लिटी जन्म ले रही है।
यह सेंसिब्लिटी पहले की तरह स्थूल न थी बल्कि काफी सूक्ष्म थी क्योंकि मानव मष्तिस्क भी स्थूल से सूक्ष्म हो चला था।
इस काल से उस सेंसिब्लिटी को महसूस कर पाना या उसके विषय में क्ह पाना भविष्य में देखने जितना कठिन होगा।
■■■■■
यह क्या???
ये द्विपदी मानव हाँथो और पैरों के बल क्यों चल रहे हैं? मानव चौपाया बनने की कोशिश क्यों कर रहा है?
ओह,तो अब पैरों ने हाथों के खिलाफ विद्रोह कर दिया है!!
पैरों की उंगलियां, हाथों की उँगलियों के बराबर हक़ चाहती हैं।
ये किया लिखा है---
" हमे हज़ारो सालो से भार के नीचे दबाया गया वरना ऐ हाथ हम भी तुम्हारी तरह कीबोर्ड चलाते, हम भी तुम्हारी तरह कांटा-चम्मच उठाते।"
अब तो हमे भी बराबरी का हक़ चाहिए-अब हम अकेले भार नही उठाएंगे, अब मनुष्य को फिर से चार पैरों पर चलना होगा!"
चलना होगा!!चलना होगा!!!
( हमारा दमन हुवा है।)
और अब द्विपदी मनुष्य को पुनः चौपाया बनाने की बात चल रही है !!!
-------★★★★---------
श्रीयुता
श्री, श्रृंगार, ऐश्वर्य, श्रेय, श्रेयस
श्रीं---लक्ष्मी का बीज मंत्र है।
सीता हल द्वारा बनी धरा में आकृति को भी कहते है।
कृषकों ने एक संस्कृति विकसित की जिसको गैर-कृषकों (आखेटक?) द्वारा ध्वस्त करने का प्रयास किया गया और राम शायद आखेटक संस्कृति के ऊपर कृषक संस्कृति की विजय गाथा है---श्री राम!
वैष्णव बनाम शैव?
आर्य बनाम द्रविड़?
शायद कृषक संस्कृति बनाम आखेटक संस्कृति!!!
वाल्मीकि के पहले, बहुत पहले, हज़ारो वर्ष पहले भी राम कथा, सीता कथा होगी।
श्रीयुक्ता (श्रीयुता)
यह रुद्र का धनुष था, कई पीढ़ियों से यही सम्भाल कर रख दिया गया था। कोई इसे स्पर्श न करता। इस धनुष से राजन के पुरखे आखेट करते, विनोद या विलासिता के लिए नही परन्तु अपनी और प्रजा की क्षुधा शांति के प्रयोजनार्थ। अब कई हज़ार वर्षो से आखेट और आखेटक संस्कृति उनके जीवन से बाहर हो चुकी थी और अब यह कृषक संस्कृति थी।
यद्यपि राजन ने अपने पूर्वज-पित्तरों से कृषियज्ञ, कृषि कार्य करना सीखा था तथापि बहुधा कृषि की देवी उनसे रुष्ट हो जाती और दुर्भिक्ष आते रहते।
एक बार ऐसा ही भंयकर दुर्भिक्ष उपस्थित हुवा। समग्र प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी।
राजन मात्र राजन न थे, एक साधक, एक ब्रह्मज्ञानी भी थे और यह दुर्भिक्ष का काल उनके ब्रह्मज्ञान का परीक्षण था।
राजन ने कई दिनों तक ध्यान किया और अंततः कृषि की एक नई विधि का साक्षात्कार कर ही लिया--राजन ने इसका नामकरण किया--श्रीयुक्ता।
राजन ने समस्त प्रजा के सम्मुख इस नई विधि का प्रदर्शन किया और धरती हरियाली और बालियों से लहलहा उठी।
ऐसा न था कि इस काल मे समस्त भूलोक में कृषक संस्कृति ही थी। कृषक संस्कृति के पूर्व मानव आखेटक था और बहुत से आखेटक आज भी आखेट संस्कृति के साथ ही जी रहे थे।
आखेटकों के भी देवता शिव ही थे। आखेटक इन कृषकों को पसंद नही करते क्योकि कृषक वनों को जला कर उनमें कृषि करते और आखेटकों को आखेट मिलना क्रमशः कम होता जा रहा था।
●●●●
आखेटकों में वे वह सबसे शक्तिशाली आखेटक था, अत्यंत क्रूर भयावह और रुद्र का उपासक।
उसके भय से धरा के सभी राजा, क्या आखेटक, क्या कृषक समस्त राजन भयातुर रहते। वह विशेषकर कृषक संस्कृति वालो पर हमले करता और उनकी भूमि, उनकी फसलें सब नष्ट कर देता। आखेटक नृपों पर उसके आक्रमण प्रायः कम होते और यदि होते भी तो अपने शाषन को विस्तार कर आखेटकों को एक सूत्र में बाँधने के उद्देश्य से।
महाआखेटक के दो भाई थे, एक सुरा सुंदरी में ही डूबा रहता परन्तु दूसरा चिंतनशील था।
महाआखेटक के इस भाई ने भविष्य देख लिया था और वह प्रायः इस महाआखेटक से आखेट संस्कृति त्याग कृषक संस्कृति को स्वीकार करने की प्रार्थना करता; इसने भविष्य में झाँक लिया था कि मनुष्य अब आखेट त्याग देंगे।
तब समग्र धरती को इस नई कृषक संस्कृति के सूत्र से बांध कर एक करने वाले भी थे जो वन वन जाते और आखेटकों के मध्य कृषि की महिमा गाते, आखेटकों को कृषि कर्म के लिए प्रेरित करते और उन्हें कृषि कार्य की दीक्षा देते। यह लोग महाआखेटक की महत्वकांक्षा व उसकी शक्ति से अनभिज्ञ न थे। इन्हें भान हो चला था कि महाआखेटक का विनाश आवश्यक है वरना धरा से कृषि विलुप्त हो जाएगी किन्तु इनमे से मात्र वाल्मीकि जानते थे कि भविष्य में कृषि को भी वापस धरा की गोद मे कई स्थलों पर समा जाना होगा और वह "कल-युग" अवश्य आएगा।
●●●●●●
राजन ने आपने मनन और चिंतन से प्राप्त श्रीयुक्ता को अन्य कृषक राजाओ के साथ साझा करने के उद्देश्य से एक आयोजन करने का विचार किया और इस सम्बंध में विचार विमर्श करने हेतु अपने गुरु के आश्रम पहुंचे।
राजन यह तो अति शुभ कार्य है किंतु ध्यान रहे अभी आखेटक संस्कृति पूरी तरह से धरा से विलुप्त नही हुई है, मैं भविष्य में कृषकों और आखेटकों के मध्य एक निर्णायक युद्ध देख रहा हूँ--राजन के गुरु ने कहा।
गुरुदेव आपकी दिव्य दृष्टि इस सम्भावित युद्ध के परिणाम के विषय मे क्या देख रही है--राजन ने अपने गुरु से प्रश्न किया।
सम्भावित---? राजन यह युद्ध अवश्यम्भावी युद्ध है--गुरु ने राजन के संभावित शब्द का प्रतिकार करते हुए कहा---राजन मेरी दृष्टि की भी एक सीमा है--मैं समस्त प्रयासों के पश्चात भी इसके परिणाम नही देख पा रहा।
ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए गुरुदेव---राजन ने प्रश्न किया।
राजन क्या तुम्हें नही दिखता की कृषक संस्कृति अभी भी यदा-कदा धनुष उठा लेने को बाध्य हो जाती है? अतः तुम स्वयम्वर करो और श्रीयुक्ता को अपना रक्षक स्वयम चयन करने दो----राजन, तुम चिंतित न हो-वह स्वयम ही अपने रक्षक का वरण कर लेगी--पीढ़ियों से तुम्हारे यहाँ रखा वह रुद्र का धनुष इसमे तुम्हारी सहायता करेगा।
-----------★★★★---------
(एक साथ--असंपादित)
फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस 【एक】
-----------------------------------------------------------
हम कुछ भी सीखते ही क्यों हैं इसका एक पंक्ति में उत्तर है सर्वाइव करने के लिए। विकास क्रम में निम्न स्पीशीज में सम्बंधित बेहेवियर इंस्टिक्ट में होता है। एक मधुमक्खी अपना छत्ता बनाना कहीं सीखती नही है, यह उसके अंदर है। एक चिड़िया अपने घोंसले बनाने के लिए विश्विद्यालय नही जाती, उसके अंदर है। विकास क्रम में चेतना के विस्तारण के साथ, मन के इमर्ज होने के बाद, मस्तिष्क के और जटिल होने के बाद इंस्टिक्ट के अलावा लर्नड बिहेवियर इमर्ज होता है। अब सूचना हमारे इंस्टिंक्ट के बाहर भी स्टोर किया जा सकता है और बिना किसी जेनेटिक्स के इसको अगली पीढ़ी में ट्रांसफर किया जा सकता है।
इस जेनेटिक्स के बाहर उपस्थित सूचना का भी मूल अभिप्राय इंस्टिंक्टिव बिहेवियर की तरह सर्वाइवल ही है, अंतर मात्र यह है कि इस सूचना पर आधारित व्यवहार अतःस्फूर्त नही होता है।
विकास क्रम में उच्चतर जीव के आने के बाद व्यवहार का एक अनुषांगिक पक्ष भी होता है:
हमारे लिए भोजन मात्र स्वयम को जीवित रखने के लिए नही है, इससे सम्बंधित एक अनुषांगिक पक्ष भी है: स्वाद। और हम इसके लिए भी पाकशास्त्र सीखते है। सेक्स हमारे लिए अब मात्र अपनी प्रजाति को जीवित रखने का करण नही है, सेक्स अब हम मजा के लिए भी करते हैं।
ज्ञान का भी मात्र और मात्र सर्वाइवल मूल्य जो आज तक होता था, मानव में इससे सम्वन्धित एक अनुषांगिक पक्ष भी उभरता है और इसमें ज्ञान का सर्वाइवल मूल्य प्रमुख नही होता।
हममें अब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की। हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।
-----☆★★★☆------
【दो】
-------
गणित सर्वाधिक व्यववस्थित व संरचनाकृत या स्ट्रक्चर्ड चिंतन है। भौतिकी गणित के माध्ययम से चिंतन मनन करती है। गणित के विषय मे दो मत हैं: हमारी चेतना इस सर्वाधिक स्ट्रक्चर्ड वे को ब्रह्मांड, प्रकृति पर आरोपित करती है या दूसरे मत के अनुसार मैथमेटिक्स इज़ ऑलरेडी आउट देयर।
खैर, जो भी हो भौतिकी के लिए गणित अपरिहार्य है। यदि समग्र भौतिकी से गणित निकाल दिया जाय तो भौतिकी अधिभौतिकी या मेटाफिजिक्स के आस पास आ जाती है या स्वयम ही मेटाफ़िजिक्स बन जाती है।
ऐसा नही है कि इस मेटाफिजिकल चिंतन में गणित युक्त भौतिकी के निष्कर्ष नही आते लेकिन अधिभौतिकी को भौतिकी के समान गणितीय चिंतन की अनुपस्थिति में जगत के ऊपर नियंत्रण स्थापित करने का करण नही बनाया जा सकता।
ज्ञान का कार्य सामर्थ्यवान बनाना है शरणागत नही या ज्ञान यदि ज्ञेय से बिल्कुल डिटेचड़ हो तो भी वह ज्ञान एक बायोलॉजिकल बीइंग के रूप में हमारे लिए किस काम का?
अतः हमारे एक जैविक बीइंग के रूप में भौतिकी हमारे लिए अधिभौतिकी से अधिक, बल्कि बहुत अधिक उपयोगी है।
-----☆★★★☆----
फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस 【तीन】
ज्ञान की आदर्श सीमा (आइंस्टिन)--क
----------------------------------------
वैज्ञानिक प्रज्ञा जब दार्शनिक चिंतन करती है तो वह बड़ी सावधान होती है और उन बड़े बड़े दावों, रसेल के शब्दों में बॉम्बेस्टिक नॉनसेंस, से बचते हुए बड़ी शालीनता से अपनी बात कहती है।
वैज्ञानिक चेतना प्रायः निरपेक्ष और सत्य ज्ञान जैसे दार्शनिक सम्प्रत्यय के प्रयोग से बचती है।
वस्तुतः वैज्ञानिक चेतना में निरपेक्ष, वास्तविकता आदि शब्दो का प्रयोग नही होता क्योकि वैज्ञानिक विधि में "आगमन की समस्या" "थ्योरी लैडननेस" और हमारी "संवेदनात्मक सीमितता" इसकी विधि में ही इन्हेरेंट है। इन कारकों की उपस्थिति में निरपेक्ष ज्ञान या यथार्थ आदि की बात करना आत्मव्याघात है।
हॉकिंग "समय का संक्षिप्त इतिहास" इस पंक्ति से प्रारम्भ करते हैं कि कही कोई एक ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक (कुछ के अनुसार बर्ट्रेंड रसल) ने खगोलशास्त्र पर एक पब्लिक व्य्याख्यान दिया। व्य्याख्यान की समाप्ति पर व्य्याख्यानशाला के पीछे की पंक्ति में बैठी एक बुजुर्ग महिला उठीं और उन ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक से कहा कि अब तक आपने जो कुछ भी बताया है वह कूड़ा है--असल मे विश्व एक बहुत बड़े कछुवे की पीठ पर रखी एक बहुत बड़ी थाली है---।
हॉकिंग आगे अपनी बात रखते हैं कि विश्व विषयक बहुत सारे प्रश्नों के जवाब आज हमारे पास है लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए ये भी यह जवाब वास्तविक जवाब ही होंगे या उसी कछुआ और थाली की तरह एक हास्यास्पद नॉनसेंस यह केवल समय ही बता सकता है!
-----इतनी अनिश्चितता?
वास्तव में यह अनिश्चितता विज्ञान में समाहित है और यह अनिश्चितता हमे तबतक ही अजीब लग सकता है जबतक हम भौतिकी के सिद्धांतों को यूजफुल की बजाय सत्य माने। एक बार सत्य को यूजफुल से प्रतिस्थापित कर दिया जाय, यह अनिश्चितता हमे सहर्ष स्वीकार हो जाती है, कोई कॉग्निटिव डिज़ोनेंस उतपन्न नही होता क्योकि भविष्य में हमे और अधिक उपयोगी सिद्धान्त मिलते है न कि और अधिक सत्य।
----☆★★★☆-----
फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस 【चार】
ज्ञान की आदर्श सीमा (आइंस्टिन)--ख
------------------------------------------------
क्या यह सम्भव नही है कि हम भौतिकी के माध्ययम से प्रतिज्ञप्तियों या प्रोपोजिशन्स का एक ऐसा तन्त्र रच रहे हों जो आपस मे सुसंगठित और कोहरेन्ट तो हो किन्तु इस तंत्र के अनुरूप कोई वाह्य सता न हो अर्थात इस सुव्यस्थित, सुसंगठित और कोहरेन्ट तन्त्र के अनुरूप कोई कोरोस्पोंडेंस या संवादिता न हो?
ऐसा सम्भव है की हमारी थ्योरी, हमारे मॉडल के अनुरूप एक्सटर्नल रियलिटी हो ही नही बावजूद इसके हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट हो और काम कर रही हो। यहाँ काम करने और सेल्फ कंसिस्टेंट होने का अर्थ मात्र इतना है कि हमारी थ्योरी में प्रेडिक्टिव पावर हो, अपवादों की संख्या न्यूनतम हो तथा इस थ्योरी-तन्त्र के लिए कम से कम अज़्मप्शन्स बनाने पड़े।
आइंस्टीन के शब्दों में हमने घड़ी नही खोली किंतु घड़ी हमारे लिए काम कर रही है, घड़ी से सम्बंधित हमारी अवधारणाओं का तंत्र काम कर रहा है अर्थात हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट है, इसमें प्रेडिक्टिव पावर है तथा यह हमारे आनुभविक जगत की घटनाओं की व्याख्या कर दे रहा है बावजूद इसके की हम घड़ी के अंदर नही झाँक सकते। आइंस्टीन इसे ही ज्ञान की आदर्श सीमा कहते हैं (एवोल्यूशन ऑफ फ़िजिक्स)
-------☆★★★☆------
"अर्थक्रियाकरित्व लक्ष्मण सत"
सत के लक्षण के विषय मे कहा गया है-"अर्थक्रियाकरित्व सत लक्षणम"। अर्थ का अभिप्राय, प्रयोजन को पूर्ण करने का सामर्थ्य है। इसी आधार पर अनुवादकों ने "प्रैगमटिज़्म" का अनुवाद "उपयोगितावाद" के साथ "अर्थक्रियावाद" भी किया है। अतः सत प्रयोजन को पूर्ण करने के सामर्थ्य की स्थिति है।
------☆★★★☆-------
फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस 【पाँच】
----------------------------------------------------
विज्ञान का चरित्र छद्मविज्ञान से इस अर्थ में भी भिन्न होता है कि कालांतर में इसके पूर्वमान्यताओ की पृष्ठभूमि में प्रारम्भ किए गए अन्वेषण यदि किसी ऐसे निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं जो अब उस पूर्वमान्यता से ही संगति नही रखते तो विज्ञान इन नवीन निष्कर्षो को अपनी पूर्वमान्यताओ में ही ढालने के लिए तोड़-मरोड़ नही करता बल्कि अपनी पूर्वमान्यता की ही जाँच करता है और उसमे अपेक्षित सुधार करता है। यदि सुधार से भी काम न बना तो फिर विज्ञान उनका परित्याग करने से भी नही हिचकता और एक नवीन पूर्वमान्यता को स्थापित कर उसे आगे के अनुसंधानों के लिए लिए पृष्ठभूमि में स्थापित करता है।
इस सन्दर्भ में दृष्टांत के लिए निरपेक्ष देश और काल, जिनमे घटनाएँ घटती थी, से जनरल रिलेटिविटी के उस देश-काल तक, जो मात्र कोई स्टेज न होकर घटनाओ में हिस्सा लेता है, की यात्रा बड़ी मनोरंजक है।
यहाँ दार्शनिक एक प्रश्न उठाते हैं कि क्या इस द्वितीय स्तर की पूर्वमान्यतावो के अस्तित्व में आने के बाद भी क्या यह कहा जा सकता है कि इन मान्यताओं के अनुरूप वाह्य जगत में भी वैसी ही सत्ता है? क्या यह सम्भव नही है कि हम प्रतिज्ञप्तियों या ज्ञान का एक ऐसा तन्त्र रच रहे है या हमारी बुद्धि हमसे धोखा करते हुए एक ऐसा ज्ञानतन्त्र रचवा रही हो जिसमें इस तंत्र के अव्ययों में संगति और सुसंगतता तो है किंतु उस पूर्वमान्यता के अनुरूप कोई सत्ता ही न हो?
अपनी बात को पुष्ट करते हुए एक ऐसे स्वप्न का उदाहरण दिया जा सकता है जिसमें सुख-दुख आदि की अनुभूति तो होती है किंतु यह बोध नही होता कि स्वप्न में हम स्वप्न-जगत में रहते हैं और उस स्वप्न के "मैं" मे भी मैं और जगत विषयक कुछ पूर्वमान्यता विद्यमान होती है।
यहाँ व्यक्ति की "ज्ञान" विषयक क्या अवधारणा है यह निर्धारित करता है कि वह अज्ञेयवादी, संशयवादी, शून्यवादी, मायावादी या अर्थक्रियावादी विश्वदृष्टि अपनाएगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण ज्ञान के विषय मे एक अर्थक्रियावादी समझ रखता है। इसके अनुसार ज्ञान किसी अतीन्द्रिय सत्ता के निमित्त नही है बल्कि इसका केवल और केवल सर्वाइवल मूल्य है हालांकि विकास वृक्ष में अपनी अब तक सबसे विशिष्ट अवस्थिति के कारण मनुष्य इसका कुछ उपयोग ठीक उसी प्रकार अलग भी कर सकता है ज्यों हम अपने कंकाल तन्त्र और पेशी तन्त्र का उपयोग ब्रेकडान्स के लिए भी कर लेते है हालांकि हमारी पेशियाँ और कंकाल ब्रेक-डांस करने के निमित नही विकसित हुए।
-----☆★★★☆----
यथार्थ बनाम अनुकूलन
जिस प्रकार बहुत से शब्द आज फॉसिल शब्द बन चुके है ठीक वही स्थिति क्रमश: शब्द यथार्थ (रियलिटी) और सत्यता के साथ हो रही है। फॉसिल शब्द से आशय है कि ये शब्द समकालीन विमर्शों में समकालीन जगत, संसार और ब्रह्मांड तथा मानव को समझने में प्रयुक्त नही होते। इसका कारण यह है कि ये शब्द किसी दृष्टिकोण विशेष, किसी खास फ्रेमवर्क के हिस्से थे और आज सम्बंधित विमर्शों में ये दृष्टिकोण और फ्रेमवर्क ही अप्रासंगिक हो गए है और हमारे नए दृष्टिकोण, नए फ्रेमवर्को ने नवीन संकल्पनाओं में चिंतन और विमर्श करना आरंभ कर दिया है।
यद्यपि आधुनिक चिंतन ने इन पुराने फॉसिल शब्दो से दूरी तो बना ली तथापि वह यथार्थ और सत्यता शब्द को स्वीकार करती रही और इनसे सम्बंधित चिन्तनों और विमर्शों में नवीन संकल्पनाओं और शब्दों यथा मैटर, एनर्जी, एटम, क्वांटम फील्ड आदि का प्रयोग किया। नवीन चिंतन जो कि वैज्ञानिक फ्रेमवर्क से जगत को समझने का पर्याय है, मैटर, एनर्जी---आदि शब्दो द्वारा यथार्थ अथवा रियलिटी की समझ विकसित करती रही है लेकिन धीरे-धीरे मानवीय चेतना ने इस बात को समझना आरंभ कर दिया है कि वास्तव में यथार्थ नाम की कोई चीज उन अर्थों में होती ही नही है जिसको हमने पहले तो आत्मा, परमात्मा जैसे शब्दों से समझने का प्रयास किया और फिर कालान्तर में इन शब्दो और संकल्पनाओं की जगह वैज्ञानिक शब्दावली और संकल्पनाओं के माध्यम से यथार्थ या रियलिटी की एक तस्वीर खींचनी चाही।
मानवीय चेतना के इस तृतीय चरण में यह तथ्य उभरकर सामने आने लगे कि हमने वैज्ञानिक संकल्पनाओं और शब्दावलियों से भी जिसकी तस्वीर खिंची है या खींचने का प्रयास करते हैं वह उस अर्थ में यथार्थ नही होता जिसके हम पूर्व में दावे करते थे। हमारे लिए परम और वस्तुनिष्ठ यथार्थ और रियलिटी की बात करना ही बेमानी है क्योकि प्रथम तो हम यथार्थ जानने के लिए जन्म नही लेते। हम अनुकूलन करते हैं और इस अनुकूलन में अपने अनुभवों की व्याख्या इस लिए करते है कि इस व्ययख्या मे उपजे सिद्धांत एक स्पीशीज के रूप में हमारे जीवित रहने के दावों को और पुष्ट करे।
दूसरा, जिस अनुभव को या जिस अनुभव के आधार पर हम "यथार्थ" शब्द की रचना कर डालते है वह अनुभव बहुत ही सीमित है। एक माइक्रोऑर्गेनिज्म के लिए सम्भवतः धरती एक्जिस्ट ही नही करती, एक बैक्टेरिया के लिए सम्भवतः आकाश एक्जिस्ट ही नही करता। बहुत सी ऐसी चीजें हो सकती है जो है किंतु हमारे लिए एक्जिस्ट ही नही करती हालांकि हमसे विकसित और जटिल जीव के लिए शायद वो एक्जिस्ट करे लेकिन तब भी वो सत्यता को नही खोज रहे होंगे बल्कि अनुकूलन कर रहे होंगे।
हमारे विमर्श में "अनुकूलन" शब्द को शामिल करने की तार्किक निष्पत्ति यह होती है कि हम जिस सत्यता और यथार्थ की बात कर रहे थे वह वास्तव में एक फॉसिल शब्द है।
---------★★★----------
ब्रह्मांड में चेतना का इमर्ज होना एक अद्भुत घटना है। कार्ल सेगन कहते हैं कि जो कुछ भी था, जो कुछ भी है और जो कुछ भी होगा वह कॉस्मॉस है।
अर्थात हम ज्ञाता हो जाने से ब्रह्मांड से बाहर नही हो जाते बल्कि हम भी ब्रह्मांड के हिस्से हैं।
अब यह उद्वेलित नही करता कि ब्रह्मांड का एक हिस्सा ब्रह्मांड ने ऐसा रचा जो ब्रह्मांड को जानने लगता है और जानने ही नही लगता बल्कि ब्रह्मांड में एक नए स्तर से पार्टिसिपेट करने लगता है।इस स्तर पर ब्रह्मांड में पार्टिसिपेट कोई नही करता: न कोई ग्रह, नक्षत्र, तारे, निहारिका या बैक्टेरिया, वायरस, वृक्ष, पशु कोई भी नही।
एक अल्टरनेट ब्रह्मांड में सम्भव है कि वह इंटेलिजेंट लाईफ को तो छोड़िए, लाइफ को ही नही इमर्ज होने देता। हमारे ब्रह्मांड ने हमे यह या तो मौका दिया है या यह हमारे ब्रह्मांड के अस्तित्व में आने की शर्तों में ही है।
क्या यह असम्भव है कि ब्रह्मांड ने हमे इसलिए रचा है कि हम ब्रह्मांड को रचे?
हमारे माता-पिता हमे जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों को जन्म देते हैं लेकिन दरअसल जीन के स्तर पर हमारे माता पिता हमारे माध्ययम से स्वयम को जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों के माध्ययम से स्वयम को। दृष्टि को थोड़ा और विस्तार दिया जाय तो हम अपनी सन्तति के माध्ययम से अपने पूर्वजो को जन्म दे रहे होते हैं।
हम ब्रह्मांड के बच्चे हैं, शायद ब्रह्मांड ने हमे इसलिए इंटेलिजेंस दिया है कि हम ब्रह्मांड को जन्म दें और अनुकूलन के बहाने ही सही इसलिए भी ब्रह्मांड अपने रहस्य हमे बताता है।
सम्भव है कि कल हम ब्रह्मांड को जन्म दे रहे हों और ब्रह्मांड ने हमे इसीलिए रचा हो।
वैसे अभी यह मात्र एक विज्ञान गल्प है।
---------★★★★----------
स्टीफेन हॉकिंग इमेनुएल कांट के जूते में
:
स्टीफेन हॉकिंग एक पैराडाक्स का उल्लेख करते हैं जिसे निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है :
यदि वास्तव में एक यूनिफाइड थ्योरी है तो यह हमारे कृत्य, हमारे अनुसन्धान, हमारी जगत को समझने की कोटियों, हमारे वैज्ञानिक फ्रेमवर्क को भी प्रभावित और कंडिशन्ड करेगा और इस प्रकार यह यूनिफाइड सिद्धान्त हमारे यूनिफाइड सिद्धान्त विषयक निष्कर्ष को निश्चित रूप से प्रभावित करेगा।
और अब आता है असली प्रश्न: यूनिफाइड थ्योरी द्वारा कंडिशन्ड हमारे अनुसन्धान, हमारा इंटेलिजेंस, हमारे वैज्ञानिक फ्रेमवर्क हमे प्रमाणों से #सही निष्कर्ष, असल यूनिफाइड थ्योरी की ओर ले ही जाएंगे इस बात की क्या गारंटी है?
हाकिंग जब इस पैराडॉक्स का उल्लेख करते हैं तो वह एक वैज्ञानिक की हैसियत से यह बात नही कहते बल्कि वह स्वयम एक दार्शनिक बन जाते हैं जिसके विषय मे उन्होंने कहा कि दर्शन मृत हो गया है क्योंकि दर्शन के उन सारे प्रश्नों का उत्तर वैज्ञानिकों द्वारा दिया जा रहा है।
विज्ञान के पास उनके अपने स्वयम के इस पैराडॉक्स का कोई उत्तर नही है। वैज्ञानिक फ्रेमवर्क में इन प्रश्नों को प्रश्न स्वीकार भी नही किया जाता। हॉकिंग महोदय यहाँ स्वयम दार्शनिक कांट के जूतों में चले जाते है जिनकी उन्होंने आलोचना की है।
कांट ने अपने पूर्ववर्ती अनुभवाद और बुद्धिवाद दोनों की आलोचना, समीक्षा की और फिनामिना तथा न्युमोना के द्वैत को प्रस्तुत किया।
कांट के अनुसार #न्युमोना, थिंग इन इटसेल्फ या अपने आप मे वस्तुए हैं लेकिन यह न्युमोना ज्ञाता में फेनोमेना के रूप में प्रस्तुत होता है। कांट के अनुसार परम् सत्ता है लेकिन इसका ज्ञान (Gnosis) मानव को नही हो सकता। वैज्ञानिक ज्ञान सम्भव है किंतु यह वैज्ञानिक ज्ञान #मानव_मन_के_स्वरूप से नियंत्रित होता है। मानव-मन किसी भी ज्ञान वस्तु को तभी जान सकता है जब वह इस ज्ञेय को अपने a priori या पूर्वानुभविक रूपो के द्वारा अभिरंजित कर देता है। इस स्थिति में जो भी मानव ज्ञान का विषय होगा वह अपने असली रूप में नही जाना जा सकता।
ध्यातव्य है कि जगत पर कोई भी गम्भीर चिंतन जगत को व्यवहार और परमार्थ या फिनामिना और न्युमोना में बांट ही देता है और हाकिंग के उपरोक्त पैराडॉक्स में यह विभाजन अपनी जगह पा ही लेता है।
प्रश्न है कि यदि यह विभाजन आ ही जाता है तो क्या किया जाय?
इसके तीन उत्तर हो सकते हैं: पहला इस विभाजन को स्वीकार करते हुए परमार्थ पर भी चिंतन किया जाय दूसरा इस विभाजन को स्वीकार करने के बावजूद फिनामिना पर अपना ध्यान केन्दित किया जाय या तीसरा न्युमोना को बकवास मानते हुए केवल फेनोमेना की ही बात की जाय।
एक रिगरस वैज्ञानिक के लिए तीसरे विकल्प को चुनना उसकी मजबूरी होती है क्योंकि वैसा कुछ भी जो अनुभव में पकड़ नही आ सकता उसको विज्ञान विषयक कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार विज्ञान के लिए अनआवश्यक विषय है।
निश्चित तौर पर विज्ञान की प्रकृति के कारण न्युमोना को बकवास मानना विज्ञान की बाध्यता है लेकिन चेतना जब जगत पर समग्रता से विचार करती है तो यह प्रश्न मात्र बकवास नही हैं क्योंकि विज्ञान सीमित है और जगत असीमित: जगत मात्र #कैसे चर (वेरिएबल) के साथ मौजूद नही है।
-------------★★★★---------
वैज्ञानिक तथ्य लिखने वालों की भाषा कैसी होनी
--------------------------------------------------------------
चाहिए?
--------------------
यद्यपि हम जो कुछ जानते है, जो कुछ अभिव्यक्त करते है वह अपने ही परिप्रेक्ष्य में कर सकते है तथापि हमरा परिप्रेक्ष्य जितना बड़ा हो उतना बेहतर होता है। कम से कम वैज्ञानिक तथ्य या वैज्ञानिक विवरण लिखते समय परिप्रेक्ष्य विषयक इस बात की सावधानी बरतनी बहुत आवश्यक है अन्यथा वह तथ्य जो लिखा गया है वैज्ञानिक नही रह जाता।
ऐसा नही है कि हमने वैज्ञानिक भाषा और उसकी शब्दावली के रूप में एक पूर्णतया वस्तुनिष्ठ अभव्यक्ति का मध्ययम प्राप्त कर लिया है; सम्भव है कि मेटा-साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली से तुलनात्मक रूप से अधिक वस्तुनिष्ठ हो लेकिन, यह भविष्य की बात है। वर्तमान में वैज्ञानिक व्याख्याएँ अभिव्यक्त करते समय उन शब्दों के, उन वाक्य विन्यासों के प्रयोग से बचना चाहिए जो शब्द और वाक्य विन्यास भावात्मक और सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित या प्रीलोडेड हैं। ध्यान रहे कि भावात्मक या सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित शब्दावली और वाक्यविन्यास द्वारा वैज्ञानिक व्याख्या एक व्याख्या नही बल्कि एक मंडन या अपोलॉजी बन जाती है यथा, "सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी"।
विज्ञान के अपने नियम हैं, अपने अनुसाशन हैं और इनका पालन अपरिहार्य है। नवीन तथ्यों की अभिव्यक्ति के लिए विज्ञान ने नवीन शब्दावली, नवीन वाक्य विन्यास रचने की छूट दे रखी है अतः बजाय उस प्राचीन और शास्त्रीय भाषा के प्रयोग के, नवीन भाषा की रचना की जानी चाहिए।
मानवीय जगत तथ्य-मूल्य की समष्टि है। विज्ञान तथ्य का अनुसंधान करता है। इसका क्षेत्र मूल्यो की खोज या व्याख्या कतई नही है। अब, हमारी भाषा के तीन कार्य हैं (इर्विन कॉपी):
■इंफोर्मेटिव यूज ऑफ लैंग्वेज (भाषा का सूचनात्मक कार्य)
■इमोटिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का भावात्मक कार्य)
■ डिडेक्टिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का निदेशात्मक कार्य)
भाषा यह तीनो कार्य वाक्य विन्यास (सिंटेक्स) और शब्दावली से सम्पन्न करती है और प्रायः होता यह है कि इसके भावात्मक व निदेशात्मक कार्य मे प्रयुक्त शब्द वाक्य से अलग एकांत में भी वही भावात्मक और निदेशात्मक कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं: यह भाषा के साथ एक प्रकार की कंडिशनिग है।
इन शब्दो का भाषा के सूचनात्मक कार्य मे दो कारण से उपयोग हो सकता है: जानबूझकर या अनजाने में।
मंडनशास्त्री यह जानबूझ कर करते हैं ताकि उनके पक्ष की मान्यता स्थापित हो सके और विज्ञान में कम प्रशिक्षित लोग अनजाने में। इन दोनों ही हालातो में विज्ञान का नुकसान ही होता है और छद्मविज्ञान की ही प्रतिष्ठा होती है।
वैज्ञानिकों ने इस बात को समझा है और तभी आज प्राकृतिक विज्ञानों के शीर्ष पर बैठी भौतिकी प्रतीकों (सिंबल्स) और गणितीय सम्बन्धो का प्रयोग करती है।
दार्शनिकों ने भी इस बात को समझा और यह स्पष्ट किया कि बहुत सी दार्शनिक समस्याएं तो मात्र भाषाजन्य भ्रम हैं; हमारी भाषा हमे स्प्ष्ट हुई नही की ये समस्याएं वाष्पीकृत हो जाती हैं।
प्रख्यात दार्शनिक और गणितज्ञ बर्ट्रेंड रसेल ने इसी लिए दर्शन के लिए एक अलग वस्तुनिष्ठ, भाव-निदेश निरपेक्ष भाषा विकसित करने की वकालत की और इस सम्बंध में प्रयास किया।
-------------------●●●●●●-----------------
वैज्ञानिक तथ्य लिखने वालों की भाषा कैसी होनी
--------------------------------------------------------------
चाहिए?
--------------------
यद्यपि हम जो कुछ जानते है, जो कुछ अभिव्यक्त करते है वह अपने ही परिप्रेक्ष्य में कर सकते है तथापि हमरा परिप्रेक्ष्य जितना बड़ा हो उतना बेहतर होता है। कम से कम वैज्ञानिक तथ्य या वैज्ञानिक विवरण लिखते समय परिप्रेक्ष्य विषयक इस बात की सावधानी बरतनी बहुत आवश्यक है अन्यथा वह तथ्य जो लिखा गया है वैज्ञानिक नही रह जाता।
ऐसा नही है कि हमने वैज्ञानिक भाषा और उसकी शब्दावली के रूप में एक पूर्णतया वस्तुनिष्ठ अभव्यक्ति का मध्ययम प्राप्त कर लिया है; सम्भव है कि मेटा-साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली से तुलनात्मक रूप से अधिक वस्तुनिष्ठ हो लेकिन, यह भविष्य की बात है। वर्तमान में वैज्ञानिक व्याख्याएँ अभिव्यक्त करते समय उन शब्दों के, उन वाक्य विन्यासों के प्रयोग से बचना चाहिए जो शब्द और वाक्य विन्यास भावात्मक और सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित या प्रीलोडेड हैं। ध्यान रहे कि भावात्मक या सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित शब्दावली और वाक्यविन्यास द्वारा वैज्ञानिक व्याख्या एक व्याख्या नही बल्कि एक मंडन या अपोलॉजी बन जाती है यथा, "सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी"।
विज्ञान के अपने नियम हैं, अपने अनुसाशन हैं और इनका पालन अपरिहार्य है। नवीन तथ्यों की अभिव्यक्ति के लिए विज्ञान ने नवीन शब्दावली, नवीन वाक्य विन्यास रचने की छूट दे रखी है अतः बजाय उस प्राचीन और शास्त्रीय भाषा के प्रयोग के, नवीन भाषा की रचना की जानी चाहिए।
मानवीय जगत तथ्य-मूल्य की समष्टि है। विज्ञान तथ्य का अनुसंधान करता है। इसका क्षेत्र मूल्यो की खोज या व्याख्या कतई नही है। अब, हमारी भाषा के तीन कार्य हैं (इर्विन कॉपी):
■इंफोर्मेटिव यूज ऑफ लैंग्वेज (भाषा का सूचनात्मक कार्य)
■इमोटिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का भावात्मक कार्य)
■ डिडेक्टिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का निदेशात्मक कार्य)
भाषा यह तीनो कार्य वाक्य विन्यास (सिंटेक्स) और शब्दावली से सम्पन्न करती है और प्रायः होता यह है कि इसके भावात्मक व निदेशात्मक कार्य मे प्रयुक्त शब्द वाक्य से अलग एकांत में भी वही भावात्मक और निदेशात्मक कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं: यह भाषा के साथ एक प्रकार की कंडिशनिग है।
इन शब्दो का भाषा के सूचनात्मक कार्य मे दो कारण से उपयोग हो सकता है: जानबूझकर या अनजाने में।
मंडनशास्त्री यह जानबूझ कर करते हैं ताकि उनके पक्ष की मान्यता स्थापित हो सके और विज्ञान में कम प्रशिक्षित लोग अनजाने में। इन दोनों ही हालातो में विज्ञान का नुकसान ही होता है और छद्मविज्ञान की ही प्रतिष्ठा होती है।
वैज्ञानिकों ने इस बात को समझा है और तभी आज प्राकृतिक विज्ञानों के शीर्ष पर बैठी भौतिकी प्रतीकों (सिंबल्स) और गणितीय सम्बन्धो का प्रयोग करती है।
दार्शनिकों ने भी इस बात को समझा और यह स्पष्ट किया कि बहुत सी दार्शनिक समस्याएं तो मात्र भाषाजन्य भ्रम हैं; हमारी भाषा हमे स्प्ष्ट हुई नही की ये समस्याएं वाष्पीकृत हो जाती हैं।
प्रख्यात दार्शनिक और गणितज्ञ बर्ट्रेंड रसेल ने इसी लिए दर्शन के लिए एक अलग वस्तुनिष्ठ, भाव-निदेश निरपेक्ष भाषा विकसित करने की वकालत की और इस सम्बंध में प्रयास किया।
-------------------●●●●●●-----------------
जीवित रहने या जीवित होना किसी एक भाववाचकता या भावार्थ के साथ उपस्थित पद नही है, यह एक पूरा स्पेक्ट्रम है जिसमे विभिन्न प्रकार के "जीवित रहने या होने" की घटनाएं है जो आपस मे समान होते हुए भी गुणात्मक रूप से भिन्न हैं।
बुद्धि का काम है कि वह इन्द्रिय प्रदत्तो (सेंस डाटा) पर क्रियाशील होकर जीव को व्यष्टि रूप और समष्टि रूप से जीवित रखे तथा गुणात्मक रूप से श्रेष्ठ 'जीवित होने' की ओर जीव को ले जाए किन्तु इसके लिए बुद्धि को अलग अलग प्रयोग करने की स्वतन्त्रा चाहिए होगी जो प्रकृति ने उसे दिया--जादू, मिथक, मेटाफिजिक्स, विज्ञान बुद्धि के उन्ही प्रयोगों की स्वतंत्रता में 'गुणात्मक जीवन" के निमित्त ही जन्मे हैं: इन समस्त प्रयोगों में विज्ञान सबसे सफल है।
हमे मिथक, तत्त्वमीमांसा और विज्ञान को इस दृष्टि से देखनी चाहिए वनिस्पत इसके की इनमें से कौन जगत की वास्तविक तस्वीर देता है क्योकि सम्भव है वास्तविक जैसा कुछ होता ही न हो और यह शब्द स्वयम बुद्धि के प्रयोग की स्वंत्रता के कारण उसके कुछ प्रयोगों के लिए उसके द्वारा रचित एक तदर्थ प्रत्यय या कॉन्सेप्ट हो।
जिस प्रकार बहुत से शब्द आज प्रेत-शब्द बन चुके है ठीक वही स्थिति क्रमश: शब्द यथार्थ (रियलिटी) और सत्यता के साथ हो रही है। प्रेत शब्द से आशय है कि ये शब्द समकालीन विमर्शों में समकालीन जगत, संसार और ब्रह्मांड तथा मानव को समझने में प्रयुक्त नही होते। इसका कारण यह है कि ये शब्द किसी दृष्टिकोण विशेष, किसी खास फ्रेमवर्क के हिस्से थे और आज सम्बंधित विमर्शों में ये दृष्टिकोण और फ्रेमवर्क ही अप्रासंगिक हो गए है और हमारे नए दृष्टिकोण, नए फ्रेमवर्को ने नवीन संकल्पनाओं में चिंतन और विमर्श करना आरंभ कर दिया है।
यद्यपि आधुनिक चिंतन ने इन पुराने प्रेत-शब्दो से दूरी तो बना ली तथापि वह यथार्थ और सत्यता शब्द को स्वीकार करती रही और इनसे सम्बंधित चिन्तनों और विमर्शों में नवीन संकल्पनाओं और शब्दों यथा मैटर, एनर्जी, एटम, क्वांटम फील्ड आदि का प्रयोग किया। नवीन चिंतन जो कि वैज्ञानिक फ्रेमवर्क से जगत को समझने का पर्याय है, मैटर, एनर्जी---आदि शब्दो द्वारा यथार्थ अथवा रियलिटी की समझ विकसित करती रही है लेकिन धीरे-धीरे मानवीय चेतना ने इस बात को समझना आरंभ कर दिया है कि वास्तव में यथार्थ नाम की कोई चीज उन अर्थों में होती ही नही है जिसको हमने पहले तो आत्मा, परमात्मा जैसे शब्दों से समझने का प्रयास किया और फिर कालान्तर में इन शब्दो और संकल्पनाओं की जगह वैज्ञानिक शब्दावली और संकल्पनाओं के माध्यम से यथार्थ या रियलिटी की एक तस्वीर खींचनी चाही।
मानवीय चेतना के इस तृतीय चरण में यह तथ्य उभरकर सामने आने लगे कि हमने वैज्ञानिक संकल्पनाओं और शब्दावलियों से भी जिसकी तस्वीर खिंची है या खींचने का प्रयास करते हैं वह उस अर्थ में यथार्थ नही होता जिसके हम पूर्व में दावे करते थे। हमारे लिए परम और वस्तुनिष्ठ यथार्थ और रियलिटी की बात करना ही बेमानी है क्योकि प्रथम तो हम यथार्थ जानने के लिए जन्म नही लेते। हम अनुकूलन करते हैं और इस अनुकूलन में अपने अनुभवों की व्याख्या इस लिए करते है कि इस व्ययख्या मे उपजे सिद्धांत एक स्पीशीज के रूप में हमारे जीवित रहने के दावों को और पुष्ट करे।
दूसरा, जिस अनुभव को या जिस अनुभव के आधार पर हम "यथार्थ" शब्द की रचना कर डालते है वह अनुभव बहुत ही सीमित है। एक माइक्रोऑर्गेनिज्म के लिए सम्भवतः धरती एक्जिस्ट ही नही करती, एक बैक्टेरिया के लिए सम्भवतः आकाश एक्जिस्ट ही नही करता। बहुत सी ऐसी चीजें हो सकती है जो है किंतु हमारे लिए एक्जिस्ट ही नही करती हालांकि हमसे विकसित और जटिल जीव के लिए शायद वो एक्जिस्ट करे लेकिन तब भी वो सत्यता को नही खोज रहे होंगे बल्कि अनुकूलन कर रहे होंगे।
हमारे विमर्श में "अनुकूलन" शब्द को शामिल करने की तार्किक निष्पत्ति यह होती है कि हम जिस सत्यता और यथार्थ की बात कर रहे थे वह वास्तव में एक प्रेत-शब्द है।
"यथार्थ" कोई वस्तुनिष्ठ वस्तु या सत्ता नही है बल्कि यह हमारे संज्ञान में आए आए विषय-वस्तु को एक कोहरेन्ट, संगतिपूर्ण रूप में सजाना है। हमारे संज्ञान के विषय-वस्तु के कारण क्या हैं अथवा उस अज्ञात पर बुद्धि रचित विविध कोटियाँ लागू हो भी सकती है हम यह कभी नही जान सकते: हमारे पास कोई तरीका ही नही है, हम मात्र और मात्र अपने अनुभव में गोते लगा सकते हैं; हर बार और अधिक गहराई में उतर सकते हैं।
---------★★★★------------
पीड़ा, मनुष्य को व्यवहार से बाँधे भी रखती है और मनुष्य से परमार्थ के रूप में पलायन की अधिभौतिकी भी रचवाती है।
पुरुष की अधिभैतिकी भी पीड़ा के ही गर्भ से जन्म लेती है।
मनुष्यों, यह संसार केवल तुम्हारा नही है। तुम किसी प्रयोजन के निमित्त यहाँ नही हो-------------बस हो!
तुम नही भी हो तो प्रकृति को कोई फर्क नही पड़ेगा। तुम्हारे पुरुष की कल्पना बस अपने मन की तुष्टि के लिए है।
पुरुष है ही नही, केवल प्रकृति है: सत तम रज से युक्त, उन्मुक्त!
उन्मुक्त क्योकि उसका कोई नियंता नही है और वह स्वयम भी सचेतन कोई कार्य नही करती।
देश-काल के द्वि पदों से वह बस विचरण करती रहती है, निरुद्देश्य।
उस प्रारंभिक बीज से वह प्रस्फुटित है या वह बीज भी उसने ही जना है यह तुम नही जान सकते क्योंकि उसने तुम्हे यह स्वतंत्रता दी ही नही है।
उसके किसी कदम पर तुम्हारे होने की घटना घट गई, बस यूं ही, निरूद्देश्य और यंत्रवत और तुमने समझा तुम उस प्रकृति के पुरुष हो!
सत चित आनंद का नही पता, सत और चित का भी नही मालूम लेकिन वेदना है, यह निर्विवाद है।
----------★★★★ ------------
गुफामानव का दर्शन।
"वह, वह जो अभी पश्चिमी क्षितिज पर टँगा हुआ है, शीघ्र ही मरने वाला है। मेरे चहुओर मिट्टी लाल हो गयी है। वृक्ष लाल हो गये है। आकाश लाल हो उठा है। मैं खुद भी लाल हो गया हूँ; प्रत्येक वस्तु, जीव और व्यक्ति सम्भवतः उसके रक्त में सने हुए है और वह रोज उसके ही रक्त में सन कर लाल होते है तथा आज तक प्रतिदिन उसका रक्त बहता रहा है और वह जाने कब से प्रतिदिन मरता रहा है-आखिर प्रतिदिन इस लालिमा के फैलने के पश्चात अंधकार हो जाता है।
अंधकार! यह बड़ा भयावह समय है। इस अंधकार में हम उन पशुओं के शिकार बनते हैं जिनके हम दिन में शिकारी हैं। अभी तीन अंधकारों के पहले वाले अंधकार में ही तो जंगली हाथियों के झुंड ने मेरे कबीले के कई लोगो को मार डाला था।
लेकिन यह पूरब में जब निकलता है तब भी तो सब कुछ लाल हो जाता है। हम शिकार के लिये भी तो उसी दिशा में जाते है। निश्चित ही वह पूरब से निकलने के पहले हमारी तरह उसी दिशा में शिकार करता है और पशुओं का रक्त पीता है।
शिकार के दौरान किसी जानवर के आक्रमण से घायल हो रक्त बहने से क्या हमारा पिछला अगुआ नही मर गया था?
तो क्या हो अगर मैं उसके लिए यदि अभी रक्त की व्यवस्था कर दूँ? शायद वह मरने से बच जाएगा और हमारे लिए अंधकार न होगी।
मैं इसके लिए रक्त की व्यवस्था करता हूँ---मेरे कुछ पालतू पशुओ को तथा कुछ उन जानवरो को आज ही मरना होगा जिनको हमने आगे के भोजन के लिए पकड़ा है। इन जानवरों का रक्त उसके लिए बहाना होगा।
ओह यह क्या, अब तो यह लालिमा कालेपन में बदल रही है। तो क्या उसका खून जमना शुरू हो गया है और वह शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा?
मुझे अपनी गुफा की ओर जल्दी पहुंचना होगा ताकि इसके मरने से पहले मैं इसके लिए उन जानवरो का खून बहा सकूँ।"
----------★★★★★-------------
No comments:
Post a Comment