Tuesday, December 28, 2021

सांस्कृतिक टकराहट

संस्कृति एक अमूर्त तत्व है।  
संस्कृति में हस्तांतरणतीयता होती है।
संस्कृति की अभिव्यक्ति में प्रतीकात्मकताओ का प्रयोग होता है।
संस्कृति उन समस्त मूल्यों, अनुभवों, ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार-व्यवहार की समष्टि है जिनके माध्यम से सम्बंधित समाज अपने ज्ञात-अज्ञात ध्येय को प्राप्त करने का प्रयास करता है और संस्कृति ही वह माध्ययम है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी जैविक पहचान के ऊपर अपने द्वारा बनाई गई अपनी पहचान स्थापित करने का प्रयास करता है क्योंकि मनुष्य ही एक मात्र प्राणी है जो प्रदत जगत में न रहकर अपने जगत का निर्माण स्वयम करता है; वह अपने बनाए हुए जगत में रहता है।
संस्कृति के साथ ज्यादा मानव बनने का भाव निश्चित रूप से होता है और यही बात  कालांतर में अपनी-अपनी  श्रेष्ठता का दावा बनकर दो संस्कृतियों के मध्य टकराहट को जन्म देता है।

इस टकराहट के दो परिणाम हो सकते है: क्षणिक तौर पर खून-खराबा या उस कमज़ोर संस्कृति का सम्पूर्ण विनाश और काल के वृहत परिप्रेक्ष्य में एक नवीन संस्कृति, नवीन मूल्यों, नवीन सामाजिक लक्ष्यों के जन्म जिनमे टकराने वाली संस्कृतियों के समस्त लक्षण समाहित होकर समाज के लिए एक नए ध्येय की स्थापना होती है।

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