भ्रम और भारतीय दर्शन--1
प्रत्ययवादी ज्ञानमीमांसा के अनुसार चेतना जगत की रचना करती है; जगत हमारी चेतना वाह्य नही है जबकि यथार्थवाद की प्रतिज्ञा है कि जगत हमारी चेतना से परे उपस्थित है और हमारे ज्ञान में वह स्वयम को अभिव्यक्त करता है।
वैज्ञानिक ज्ञान और अनुसंधान की पूर्वमान्यता यथार्थवाद में विश्वास है और इसमें जगत के अज्ञात अंशो तक मानवीय चेतना पहुंचा कर उसके पीछे के कार्य-कारण की श्रृंखला ज्ञात की जाती है।
भारतीय दर्शन में विज्ञानवादी बौद्ध सम्प्रदाय को छोड़कर लगभग समस्त दार्शनिक सम्प्रदाय यथार्थवादी है: ये वाह्य जगत की सत्ता को स्वीकार करते हैं। यथार्थवादी नैयायिक विज्ञानवादी बौद्धों की स्थापनाओं का यह यह कहकर खण्डन करते हैं कि हम यह नही कहते कि अहम पर्वतम अथवा अहम वह्नि बल्कि लोक व्यवहार में यह कहा जाता है कि यह पर्वत है या यह अग्नि है। यदि जगत विज्ञानमात्र होते और हमारा विज्ञान जगत की रचना कर रहा होता तो मैं अग्नि हूँ अथवा मैं पर्वत हूँ आदि वाक्य अपने अविधात्मक अर्थ में सही होते किन्तु ऐसा नही है और "यह" एक वाह्य जगत की सत्ता सिद्ध करता है।
ध्यातव्य है कि भ्रम की उपस्थिति यथार्थवादियों के लिए एक बड़ी दार्शनिक समस्या लिए हुए आता है क्योंकि भ्रम में व्यक्तिष्ठ अंश होता है; भ्रम किसी को होता है।
अब यदि यथार्थवादियों के अनुसार जगत स्वयम को हमारे अनुभव, हमारी चेतना में प्रस्तुत करता है तो भ्रमजनित वस्तुओ के स्रोत भी इस दृष्टि से वाह्य जगत को ही स्वीकार करना होगा और इस स्थिति में जगत एक साथ समान क्षण में दो चीजें प्रदर्शित कर रहा होगा जो यथार्थवाद के अनुसार संगत नही है। इसके विपरीत भ्रम की उपस्थिति प्रत्यवादियो की स्थापना को पुष्ट करता दिखाई देता है जिसमे व्यक्ति की चेतना या अनुभव जगत की रचना कर रहा होता है।
अतएव यथार्थवादियों के सामने भ्रम एक कठिनाई लिए उपस्थित होता है किंतु विविध यथार्थवादीयो ने अलग-अलग तरीको से अपने यथार्थवाद की भी रक्षा की है और भ्रम की समुचित समीक्षा भी प्रस्तुत की है।
भ्रम और भारतीय दर्शन --2
भारतीय दार्शनिक पंरपरा में भ्रम को ख्याति कहते हैं और ख्याति की जितनी विवेचना इस परपरा में हुई है वह अन्यत्र नही मिलती। ख्याति अथवा भ्रम पर लगभग प्रत्येक दार्शनिक सम्प्रदाय ने अपनी समीक्षा प्रस्तुत की है; यथार्थवादी, जिनके अनुसार जगत की वास्तविक चेतना वाह्य सत्ता है, के लिए तो भ्रम की समीक्षा करना और भी आवश्यक हो जाता है क्योंकि भ्रम की सत्ता यतार्थवाद के विपरीत ज्ञानमीमांसीय प्रत्यवाद को पुष्ट करता प्रतीत होता है जिसकी स्थापना के अनुसार जगत और संसार हमारी चेतना में रचा जाता है।
प्रभाकर मीमांसक है अर्थात यह मीमांसा दर्शन परपरा के दार्शनिक हैं। मीमांसा के अनुसार जगत की सत्ता चेतना स्वतन्त्र है और वह स्वयम को हमारे अनुभव में प्रदर्शित करता है।
मीमांसा दर्शन की विशेषता यह है कि इनके लिए शब्द प्रमाण सरवोपरी हैं। यहाँ शब्द प्रमाण से मुख्य अभिप्राय वेदवाक्य हैं।
वेदवाक्य अपने सँग ही अपनी प्रमाणता लिए उपस्थित होते हैं, अर्थात इनकी प्रमाणता की सिद्धि हेतु हमे इनसे बाहर जाने की आवश्यकता नही है।
इसे न्याय दर्शन के परतः प्रमाणवाद से तुलना कर समझा जा सकता है जिसके अनुसार ज्ञान बस होता है और इसे यथार्थ बनने के लिए इस ज्ञानात्मक घटना से बाहर जाकर इसकी प्रमाणिकता सिद्ध करनी होती है। ज्ञानात्मक एपिसोड या प्रक्रिया से बाहर जाकर यदि हमे यह देखना होता है कि इसमें अर्थक्रियाकरित्व अथवा प्रवृति साफल्य है अथवा नही परन्तु मीमांसा के लिए ज्ञाननात्मक एपिसोड अपने साथ ही अपनी प्रमाणिकता लिए उपस्थित होता है।
अब यदि ज्ञानात्मक एपिसोड अपने साथ ही अपनी प्रमाणिकता लिए उपस्थित होता है तथा जगत भी चेतना से वाह्य स्वतन्त्र रूप से अवस्थित है तो भ्रम की व्याख्या कैसे की जाय।
प्रभाकर भ्रम की भावात्मक सत्ता को ही नकार देते हैं। उनके अनुसार भ्रम की कोई वास्तविक सत्ता नही है बल्कि यह अभी ज्ञानात्मक एपिसोड का पूरा न होना है। यह एपिसोड अभी पूरी नही हुई है अतएव रज्जु हमे सर्प प्रतीत होती है; सीपी रजत प्रतीत होती है।
प्रभाकर के इस ख्याति सम्वन्धी मत को आख्याति वाद कहा जाता है।
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